अपराजिता -88
जीवन का पंछी उड़ कर अपने बसेरे को चला गया.. अब उसे रोकने के साधन करना फ़िज़ूल था..
लेकिन इंसान का लालच कब खत्म हुआ है.. जब तक कर सकता है वो जाने वाले को रोकने का प्रयास करता ही है…!
इसीलिए राजेंद्र भी नहीं रुका..!
उसने इंजेक्शन लगाया और तुरंत दूसरे तरफ से जाकर उन्हेँ सीपीआर देने लगा..!
सीपीआर देने के साथ ही उसकी नजर मॉनिटर पर लगी हुई थी, लेकिन धड़कन पर कोई असर नहीं हुआ..
उसने शॉक थेरेपी के लिए नर्स को भेजा.. और नर्स तुरंत सारी तैयारी कर मशीन ले आयी..
“कोई फायदा नहीं राजी.. वो चली गयी !”
सीनियर सर ने राजेंद्र से कहा लेकिन राजेंद्र के कान में कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.. उसने शॉक ट्रीटमेंट देना शुरू कर दिया..
भावना की माँ के शरीर में विद्युत् प्रवाह के द्वारा झटके दिए जा रहे थे कि उनका निष्प्राण ह्रदय एक बार फिर से काम करना शुरू कर दे, लेकिन ये इतना भी आसान नहीं था..
कांच का दरवाज़ा खोल कर भावना भीतर चली आयी..
उसके अंदर आते ही एक नर्स उसके पास चली आयी..
“मैडम… शी इज़ नो मोर !”
राजेंद्र के सीनियर ने आकर राजेंद्र को पीछे से पकड़ कर रोक लिया… बाहर की सर्दियों में भी अंदर राजेंद्र पसीना पसीना हो चुका था….
“राजी सम्भालो खुद को.. वो अब हमारे बीच नहीं रही.. मैं उनकी डेथ डिक्लेयर कर रहा हूँ.. डेथ टाइम पांच बजकर चालीस मिनट !”
साथ खड़ी नर्स ने भावना की माँ की फाइल उठा कर उसमे नीचे रेड पेन से क्रॉस किया और मृत्यु का समय डाल दिया..
राजेंद्र थक कर रुक गया और उसके हाथ से मशीन लेकर इसके सीनियर सर ने एक तरफ रखने के बाद उसे सहारा देकर एक किनारे कर दिया..
दीवार से टिक कर राजेंद्र खड़ा हुआ और उसने ऑंखें मूँद ली.. उसी समय उसके पास आकर एक नर्स ने धीरे से उसकी बांह पर अपना हाथ रख दिया..
.”सर मैडम अंदर आ चुकी हैं !”
अब तक बेसुध से पड़े राजेंद्र को भावना अंदर आ गयी है, सुन कर एकदम से होश सा आ गया.. उसने आंखे खोली., भावना अपनी माँ का हाथ अपने हाथ में लिए खड़ी थी….
एकदम शांत…
राजेंद्र उसके पास पहुंचा और पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया…
ये अपनेपन का स्पर्श पाते ही भावना खुद को रोक नहीं पायी और भरभरा कर बिखर गयी..
अब उसके जीवन में क्या शेष रह गया था…?
पिता पहले ही चले गए अब माँ भी छोड़ गयी थी…..
उसका रो रोकर बुरा हाल हो रहा था…
लेकिन वहाँ मौजूद स्टाफ के लिए ये ऱोज़ का काम था, वो लोग भी इस बात को समझते थे कि किसी का मर जाना क्या होता है?
अब वो इंसान कभी दिखाई नहीं देगा, कभी सुनाई नहीं देगा, बावजूद उन्हेँ ऱोज़ ऐसे केस देखने पड़ते थे। अगर वो भी परिजनों के साथ आंसू बहाने लगे तो अस्पताल का काम ही ठप हो जायेगा…
वो लोग तत्परता से अपना काम निपटा रहे थे..
भावना की माँ के शरीर से जुड़े सारे यंत्र हटाये जाने लगे थे.. बांह में लगी नीडिल को जैसे ही नर्स ने निकालना चाहा भावना चीख उठी.. “आराम से… उन्हेँ दर्द होगा !”
नीडिल निकालती नर्स ने दया से भावना को देखा और उसकी भावनाओ का ख्याल कर बहुत धीरे से उस निडिल को निकाल लिया..।
एक नर्स ने उनके कान और नाक में रुई लगा दी..
राजेंद्र को इसी बीच सीनियर डॉक्टर ने बुला लिया था.. कुछ ज़रूरी कागज़ो पर दस्तखत कर राजेंद्र जब लौटा तब तक में भावना का रो रोकर बुरा हाल हो चुका था..।
उसके सामने उसकी माँ के शरीर को पैक किया जाने लगा था.. और वो असहाय सी रोये जा रही थी…।
राजेंद्र धीरे से उसके पास आया और उसने भावना का चेहरा अपनी तरफ घुमाया और बिना कुछ बोले उसे अपने सीने में छुपा लिया..
भावना जो अब तक अपना चेहरा छिपाये रो रही थी, राजेंद्र को दोनों हाथों से कस कर पकड़े सिसक उठी….
उसे अपनी बाँहों में भरे वो उसके बाल सहलाता खड़ा रहा..
राजेंद्र ने जानबूझ कर उसका चेहरा खुद में भींच लिया था, जिससे उसकी माँ के शरीर के साथ होने वाली औपचारिकताओं को वो ना देख सके..
कुछ देर बाद ही एक स्टाफ बॉय राजेंद्र के पास चला आया..
“सर बॉडी कहाँ भेजनी है ? गाड़ी में लोड करवा दे ?”
उसके सवाल पर राजेंद्र ने धीरे से हामी भर दी..
“भावना.. !” उसने भरसक नरमी से भावना को आवाज दी..
“संस्कार कहाँ से करवाना चाहती हो ? तुम्हारे घर से या यहाँ मेरे घर ले चले ?”
“घर ही जायेंगे.. जहाँ अम्मा रहती थी, वहीँ से आखिरी बिदाई भी होगी.. !”
“हम्म.. !” उसने लड़के को दूर्वागंज के लिए बोल दिया..
अब भावना खुद को संभाल कर राजेंद्र से अलग होने जा रही थी कि तेज़ी से चलती हुई कुसुम उन दोनों तक पहुँच गयी…
कुसुम के पहुंचने तक भी राजेंद्र की बाँहों का घेरा भावना के इर्द गिर्द था और कुसुम को देखने के बाद भी राजेंद्र ने अपनी बांह नहीं हटाई..
कुसुम को अस्पताल में घुसते ही मालूम चल गया था कि भावना की माँ नहीं रही..
वो राजेंद्र और भावना तक आयी, उसने धीरे से अपना हाथ भावना के कंधे पर पीछे से रखा, और राजेंद्र के सीने में मुहं छुपा कर रोती भावना पलट गयी..
सामने कुसुम को देखते ही भावना बिखर गयी… सिसकते हुए वो कुसुम के गले से जा लगी.. कुसुम ने उसे अपनी बाँहों में संभाल लिया.. दोनों सहेलियां एक दूसरे के गले से लगी रोती रहीं…
यज्ञ भी कुसुम के पीछे ही था..
उसने राजेंद्र को देखा और देखते ही समझ गया कि कुसुम के डॉक्टर साहब यहीं हैं…।
लेकिन यज्ञ के दिमाग में अब भी एक विचारणीय प्रश्न कौंध रहा था, कि कुसुम के डॉक्टर साहब और कुसुम की सबसे पक्की सहेली ने आपस में शादी क्यों की..?
राजेंद्र ने एक नजर यज्ञ पर डाली, दोनों की ऑंखें मिली और एक हलकी सी दृष्टि के बाद राजेंद्र ने नजर घुमा ली…
उसके पास नर्स, भावना की माँ के डिस्चार्ज पेपर्स लेकर चली आयी..
कितना अजीब होता है संसार और संसार के नियम..
जाने वाला अपनी साँसे समेट कर बिना किसी औपचरिकता के चला जाता है, लेकिन उसके जाने के बाद भी संसार निरर्थक औपचारिकताओं को सहेजने में लगा रहता है..
राजेंद्र ने उन सभी कागज़ों पर दस्तखत किये और रिसेप्शन की तरफ चला गया..
वहां से शरीर को लेकर जाने के पहले भी कई सारी बातें थी, जो पूरी करनी थी..
कुसुम और भावना वहीँ एक तरफ रखे बेंच पर बैठ गयी थी..
“मामा जी लोगों को और चाचा जी के तरफ खबर कर दी ?”
कुसुम ने धीरे से पूछा…
भावना के रिश्तेदारी में अब गिने चुने लोग ही बचे थे.. एक मामा थे वो भी दो साल पहले श्रीधाम निवासी हो गए थे… एक मामी बची थी जो मामा जी की दुकान संभालती थी, उनका एक बेटा था… जो यहाँ वहाँ आवारा फिरा करता था…।
वहाँ से मामी ही आ रही थी..।
दादा जी के परिवार में उसके ताऊ जी का परिवार था, लेकिन उन्होंने बहुत पहले भावना के माता पिता से संबंध विच्छेद कर लिया था…।
एक चाचा थे, जिन्होंने साधु संतो की संगत में फक्कड़ी का जीवन जीना चुना था, आजीवन विवाह ना करने का प्रण किये ये चाचा बस नदी पहाड़ों की खाक छाना करते थे.. उनका नंबर भावना के पास था, लेकिन उनके पहुँच पाने की उम्मीद कम थी..
इत्तेफाक से जब भावना के फ़ोन से राजेंद्र उसके रिश्तेदारों के नंबर ढूंढ़ कर लगा रहा था, तब इन चाचा जी से बात हो गयी.. उन्होंने उससे कहा कि वो फ़िलहाल आसपास है और वो दो घंटे में पहुँच जायेंगे..
भावना अपने दुःख में ऐसी ग़ुम थी कि उसे होश ही नहीं रह गया था कि रिश्तेदारों को खबर भी करनी है…।
कुसुम के सवाल पर वो सोचने लगी, तभी भावना के लिए पानी का गिलास लेकर आयी नर्स बोल पड़ी..
“मैडम, सर ने कहीं फ़ोन किया तो है..वो शायद आपके रिलेटिव्स को इन्फॉर्म कर चुके हैं !”
भावना ने नर्स की तरफ देखा उसने पानी का गिलास भावना की तरफ बढ़ा दिया..।
उसी वक्त तेज़ी से उन्ही लोगो की तरफ राजेंद्र चला आया..
“चलो अब निकलते हैं.. घर पहुंचने में भी वक्त लगेगा.. !”
भावना अपनी जगह से खड़ी हो गयी.. कुसुम भी उसे पकड़े हुए खड़ी हो गयी…
“आप लोग हमारे साथ चलिए.. !”
यज्ञ ने राजेंद्र की तरफ देख कर कहा और फिर भावना की तरफ देखने लगा..
राजेंद्र का दोस्त अमित भी भागता दौड़ता वहां पहुंच गया था। उसने राजेंद्र के कंधे पर हाथ रखा और उसे यज्ञ की गाड़ी में जाने का इशारा कर दिया…
“राजी तू भाभी को लेकर गाड़ी में निकल, मैं एंबुलेंस में आता हूं। वैसे भी यह वाली एंबुलेंस सिंगल सीटर ही है। इसमें पेशेंट के अलावा एक ही इंसान बैठ पाएगा…!
तुम लोग जल्दी निकलो भाई, मैं एंबुलेंस में निकल रहा हूं..!”
अमित की बात पर राजेंद्र ने गर्दन हिला दी…वो यज्ञ की तरफ घुमा और यज्ञ ने आगे हाथ बढ़ा कर चलने का इशारा कर दिया..
“आइये चले !” यज्ञ ने विनम्रता से भावना की तरफ देखा, भावना ने एक नजर उसे देख पलके झुका ली…
कुसुम के साथ भावना भी राजेंद्र और यज्ञ के पीछे चल पड़ी..
अपनी कार तक पहुंचने के बाद यज्ञ ड्राइविंग सीट पर आ गया.. लेकिन राजेंद्र थम कर खड़ा रह गया, उसे लगा शायद कुसुम सामने बैठना चाहेगी..।
लेकिन कुसुम ने पीछे का दरवाज़ा खोल कर भावना को बैठाया और खुद उसके बाजु में बैठ गयी..।
इतनी देर में एक बार भी कुसुम ने भावना को छोड़ा नहीं था…।
यज्ञ ने गाड़ी दूर्वागंज की तरफ बढ़ा दी…
उन लोगो के घर पहुँचते में भावना की पडोसनों ने घर में सारी व्यवस्था कर रखी थी…
भावना आश्चर्य में थी कि ये सब कैसे हो गया..।
वो गाड़ी से उतरी और उसकी मामी ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया..
धीरे धीरे पूरा अड़ोस पड़ोस जुट गया था… एम्बुलेंस भी आ गयी थी..
भावना की माँ को उसकी पडोसने, सहेलियां तैयार कर रही थी..
भावना चुपचाप एक किनारे बैठी थी.. कुसुम उसे सहारा दिए बैठी थी..
और तभी पड़ोस की भाभी ने भावना को आवाज़ लगा दी..
“भावना.. अपनी अम्मा की सिंदूरदानी लाना ज़रा… बड़ी भागवती है तेरी माँ, सुहागन गयीं हैं.. तो उनका पूरा साज सिंगार होना ज़रूरी है.. !”
ये बात सुन भावना सिहर गयी..
इतने लोगो के सामने कैसे बोले कि उसके बाबूजी नहीं रहे.. हालाँकि ये बात तो थी कि उसकी अम्मा इस बात को नहीं जानती थी, और ये बात भावना को पता चलने के बाद वो ज्यादा जी भी नहीं पायीं कै भावना उन्हेँ बाबूजी की सच्चाई बता पाती।
वो धीरे से उठ रही थी, कि एक लम्बा चौड़ा लम्बे लम्बे कंधे तक झूलते बालों वाला अवधूत सा आदमी गेट से अंदर घुस आया….
लंबी बढ़ी बेतरतीब दाढ़ी और आधे कच्चे पक्के से बालों के साथ गले में पड़ी ढेर सारी रुद्राक्ष की मालायें, मणिबंध में लिपटे तरह तरह के रंगीन मोती, और पत्थर..
हल्का आसमानी सा कुरता उनकी आसमानी आँखों से घुल मिल रहा था…
आँखों में अपूर्व शांति का भाव था..।
वो जैसे ही अंदर घुसा, उसे देख भावना उसकी तरफ मुड़ गयी..
“चाचा जी !” वो उनकी तरफ बढ़ी और लम्बे लम्बे कदम नापता वो दो कदम चल कर अपनी भतीजी तक पहुँच गया..
भावना के चाचा और उसके पिता जुड़वाँ भाई थे.. चाचा एक आध मिनट छोटे थे..।
उन्होंने अपना हाथ बढ़ा कर भावना के सर पर रख दिया और भावना उनके सीने से लग गयी..
चाचाजी भले ही हिमालयगामी हो चुके थे, पर कभी चार पांच साल में एक बार वो अपनी भतीजी और भाभी का हालचाल लेने पहुँच ही जाते थे, इसीलिए भावना उन्हेँ पहचानती थी…
भावना को थामे हुए वो अपनी भाभी के पार्थिव शरीर तक चले आये..और उनके पैरों के पास बैठ गए..।
पैरो को दबाते हुए वो होंठो ही होंठो में कुछ बुदबुदाते हुए अपने तरीके से अपनी भाभी को बिदाई दे रहे थे कि तभी पड़ोस वाली भाभी की आवाज़ गूंज गयी..
” ए भावना जल्दी सेंदूर लाओ.. !”
भावना चिहुंक कर हामी भर गयी… वो भारी क़दमों से अंदर चली गयी..
अपनी माँ के कमरे में पहुँच कर एक बार फिर वो भावुक हो गयी.. हर चीज़ हर वस्तु में उसकी माँ का स्पर्श था..।
दीवार पर लगा आइना, इसके सामने लकड़ी की छोटी सी अलगनी जिस पर उसकी माँ की कंघी, एक तेल की शीशी, बड़ी सी बिंदी का पत्ता और सिंदूर की गोल डिबिया रखी थी.. बस यही तो उसकी माँ का सिंगार था.. ।
ऱोज़ नहाने से पहले हलकी सी मलाई लगा लेती थी वो और नहाने के बाद चेहरे पर कुछ नहीं लगाती थी..। फिर भी उनका मक्खन मलाई सा रूप चमकता रहता था..।
माथे पर गोल बड़ी सी बिंदी और माथे के बीचोबीच भरी गाढ़ी सिंदूर की रेखा…
वो सिंदूर की डिब्बी उठाने जा रही थी कि उसके हाथ कांप गए…
“क्या हुआ भावना ?”
उसे नहीं मालूम था उसके चाचा भी पीछे ही खड़े हैं..
वो पीछे पलटी और भावावेश में उन्हेँ अपने पिता की सारी सच्चाई बता गयी..
बोलते बोलते वो रो पड़ी…
“अब आप ही बताइए चाचा जी, हम क्या करें? अम्मा को तो अपने आखिरी समय तक भी यह पता नहीं चल पाया कि बाबूजी नहीं रहे।
यहां सब कह रहे हैं उनके माथे पर सिंदूर लगाना है। उन्हें सुहागन की तरह सजाना है।
हम समझ ही नहीं पा रहे कि अब लोगों को सच्चाई बता दे या नहीं?”
“भावना एक बात पूछे? तुम क्या चाहती हो?”
भावना चुप खड़ी रह गई।
“चाचा जी हम तो यही चाहते हैं की अम्मा जैसी जीवन भर रही, वैसे ही अपने आखिरी समय में भी रहे। हम मांग से सिंदूर नहीं हटाना चाहते।”
“तो मत हटाओ। तुमसे किसने कहा, उनकी मांग का सिंदूर हटाने के लिए।”
“आप कहना क्या चाहते हैं?”
“भावना तुम्हारी अम्मा को यह मालूम ही नहीं चला कि उनके साथ कितनी बड़ी अनहोनी हो गई है।इसका कारण क्या है ?
शायद उनके देवी देवता भी यही चाहते थे कि उनके भक्त अपनी मांग में सिंदूर सजाये हुये ही विदा हो, इसीलिए ना उन्हें जानने ही नहीं दिया।
वरना तुम पहले भी उनसे सब कुछ सच बता सकती थी। पर तुम्हारी हिम्मत ही नहीं हुई।
तभी उनके जीते जी उन्हें नहीं बताया ।
तो अब उनके पीठ पीछे संसार के इन लोगों के लिए इतना सब जतन करने की कोई जरूरत नहीं।
जो चला गया वह हाथ फैलाए तुम्हारी अम्मा का रास्ता देख रहा है, उन दोनों के मिलन को अब मत रोको। अपनी मां के माथे परअपने पिता के नाम का सिंदूर सजाओ और उन्हें हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए अंतिम विदाई दे दो। अब उन दोनों के मिलन में बाधा मत बनो।”
“चाचा जी लेकिन यह समाज क्या सोचेगा? जब इन्हे सच्चाई पता चलेगी।”
“जिस दिन इन्हें सच्चाई पता चलेगी, उस दिन का उस दिन देखा जाएगा।
अभी फिलहाल जो सामने है उनके बारे में सोचो।समाज के यह चार लोग सिर्फ हमारे जाने के बाद कंधा देने के लिए ही आगे आते हैं।और यह भी आपस में बातें तभी तक बनाते हैं,जब इनके पास करने को और कुछ नहीं होता।
किसी के दुख का मजाक उड़ाना या दुख का प्रदर्शन करना दोनों ही हमारी नजर में गलत है।
अब हम जहां पहुंच चुके हैं, वहां से जब इस संसार को देखते हैं तो, ऐसा लगता है सब कुछ नश्वर है। हम खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ ही जाना है।
इच्छाओं की पोटली हम जीवन भर साथ लिए चलते हैं, लेकिन कैसी अजब विडंबना है, अंतिम यात्रा में अपनी उसी इच्छाओं की पोटली को भी हमें यहीं छोड़ कर जाना पड़ता है।
अब तुम्हारी मां मुक्ति पा चुकी है। उनके मन में कोई इच्छा नहीं रही।
लेकिन तुम अभी जीवित हो, तुम्हारे मन में यह इच्छा है कि तुम अपनी मां को सुहागन रूप में बिदा करना चाहती हो, तो वही करो।
इसमें कुछ गलत नहीं। जाओ बाहर सब इस छोटी सी डिबिया का इंतजार कर रहे हैं।
इस छोटे से डिब्बे में भी बहुत बड़ी ताकत है,भावना।
भावना के हाथ अब भी कांप रहे थे, उसके चाचा ने आगे बढ़कर वह डब्बा उठाया और बाहर निकल गये बाहर जाकर उन्होंने उस औरत के हाथ में डिब्बी रख दी..।
उन्होंने सोलह सिंगार को पूर्ण करने के लिए भावना की माँ की मांग में सिंदूर भर दिया.. ..
“अंतिम बिदाई के पहले सभी सुहागने सुहाग ले लीजिये !”
कह कर शर्माईन ने अपने आंचल को सर पर सही से लिया और भावना की माँ के चेहरे के पास आकर बड़े आदर से उनके माथे का सिंदूर अपने माथे लगा लिया और उठ कर उनके दोनों पैरो पर सर रखे रो पड़ी..
उनके बाद एक एक कर पड़ोस की भाभियाँ काकियाँ आती गयीं और आशीर्वाद लेती गयी.. लेकिन ये सब देख कर भावना बेहाल होकर चीख पड़ी..
“रुक जाइये आप लोग… हमसे और नहीं देखा जायेगा..
आप सबको एक बात नहीं मालूम है कि कुछ साल पहले हमारे बाबूजी नहीं रहे थे..।
ये बात हमें भी अभी कुछ दिन पहले ही पता चली और हम अपनी अम्मा को ये सब बताने की हिम्मत जुटा पाते उसके पहले अम्मा की तबियत बिगड़ गयी..
उन्हेँ उनके जाने से पहले तक पता ही नहीं चल पाया की की वो अब सुहागन नहीं..
बोलते बोलते भावना रो पड़ी.. कुसुम ने आकर उसे थाम लिया..
“उन्हेँ नहीं मालूम था ना.. मतलब वो खुद को सुहागन मानती थी तो हम सब उन्हेँ सुहागन की तरह ही विदाई देंगे… और हम तो उन्हेँ सदा सुहागन मान कर उनका आशीर्वाद भी लेंगे.. !”
कुसुम कुमारी ने अपना विद्रोही सा बयान दिया और भावना की माँ के पास झुक कर बड़े आदर से उसने उनके माथे से सिंदूर लेकर अपने माथे लगा लिया..।
लेकिन उनके पैरो के पास पहुँच कर वो निर्भीक शेरनी भी टूट गयी.. उनके पैरो को पकड़ कर वो रो पड़ी… उसका प्रलाप सुन वहाँ मौजूद हर किसी की आंखे भीग गयी…
भावना ही कुसुम के पास चली आयी.. दोनों सखियाँ एक दूसरे दूसरे से लिपटी रोती रही..
इस सब के बाद मोहल्ले की वयोवृद्ध अम्मा जी ने घोषणा सी कर दी..
“भावना की अम्मा को मालूम ही नहीं चला, वो मन से सुहागन ही गयी है, इसलिए हमारे लिए वो सुहागन ही मानी जाएगी… सब सुहागने उनका आशीर्वाद ले लो !”
और एक एक कर औरतें आ आकर भावना की माँ का सिंदूर खुद के माथे लगा कर उनका आशीर्वाद लेती चली गयी…
समाज की संकीर्ण मानसिकता पर इस छोटे से गांव की औरतों की दिलदारी ने एक नया अध्याय लिख दिया था..।
पूरे नियमो के साथ भावना की माँ की अर्थी बिलकुल वैसे ही उठ कर घर घर से निकली जैसे आज से बाइस साल पहले डोली में बैठ वो यहाँ आयी थी…
देखने वालों की आंखे भीगा कर वो अपनी अंतिम यात्रा में निकल गयीं…
क्रमशः
aparna…
आज का भाग बहुत भारी है.. लेकिन कहानी आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी था..
आपकी भावनाओ को आहत करने के लिए माफ़ी चाहती हूँ.. लिखना मेरे लिए भी उतना ही मुश्किल था जितना आपके लिए पढ़ना…
कहानी है बस.. पढ़ लीजिये.. !!!

Sirf kahani nhi rhi ab ye…bahut gehre se jud chuki ab man se
आज की समीक्षा उधार रही , भावना की भावनाओ के बारे में लिख ही नही पाऊंगी उसने क्या को दिया है ।
राजी बस उसकी मां की आखरी इच्छाओं का मान रख ले और भावना को अपने से दूर न करे बस ।
यज्ञ , कुसुम को लेकर आया अपनी सहेली के पास अच्छा किया , आज भावना को इसकी बोहोत जरूरत थी ।
एक नया किरदार , चाचा !! भावना के पिता का जुड़वा भी है और उनका हुलिया जो आपने डिस्क्राइब किया है वाह!! नीली आंखें !!
भावना को अभी इन सब से संभल ने में वक्त तो लगेगा ही , और कोई इतना करीब नही रहेगा जितना राजी इस गहरे दुख से उसे बाहर निकाल पाए !! पर अभी तक राजी के दिल की बात ही नही पता चली की आखिर वो क्या चाहता है ?? वैसे हॉस्पिटल में कुसुम को आते देख लेने k बाद भी उसने भावना को अपने से दूर नही किया , तो शायद….
डॉक्टर लोग को इन संवेदनसील भावना से रोज गुजरना होता है , आज भी हम लोग किसी अनजान की भी अंतिम विदाई पर जाते है तो वो पूरा दिन , या उसके एक बाद के एक दो दिन हम लोग मायूस ही रहते है पर इन लोगो को तो जिनको सही सलामत रखना है , जिनका इलाज वो खुद अपने हाथों से करते हो , उनके सिर पर सफेद चादर अपने हाथों से ढकना कितना मुस्किल रहता होगा , फिर भी दूसरे ही पल वो नॉर्मल होने का दिखावा कर के दूसरे मरीज में अपनी जी जान लगाते है ।🫡🫡🫡🫡🫡🫡🫡
और आप इतनी संवेदन शीलता अपनी कहानी में लिख पाई हो की सच में दिल रो ही पड़ा 😭 आप कमाल की लेखिका हो , लिखते समय आप अपना सफेद कोट कही भूल ही जाते हो , याद रखते हो तो बस वो कलम , जिससे सब के दिल को जीत लेते हो 🫡🙏🙏🙏🙏🙏🙏