अपराजिता -86

अपराजिता -86

    भावना को बार बार रोना आ रहा था, लेकिन डॉक्टर साहब ने उसे ना रोने के लिए कह रखा था…
उसका दिल बार बार भर आ रहा था.. क्या करे, कैसे करे.. कैसे खुद को संभाले यही सोच सोच कर भावना बार-बार कमजोर पड़ती जा रही थी..
वह अभी अपनी मां के पास अंदर नहीं गई थी! बाहर गलियारे में बैठी रो रही थी कि उसकी अड़ोस पड़ोस की रहने वाली औरतें उसकी मां को देखने चली आई! जिस वक्त भावना और डॉक्टर साहब उसकी मां को एंबुलेंस में लेकर अस्पताल जा रहे थे, उस वक्त ही उसके पड़ोस वाले पूछताछ करने चले आए थे, और इसीलिए उन सब को मालूम चल गया था कि भावना की मां की तबीयत खराब है! एक-एक कर मिलने के लिए वह लोग आने लगे..
वहीं पड़ोसी जिन्हें देखकर कभी भावना का मन बुझ जाया करता था, आज बड़े अपने से लग रहे थे! किसी समय यही पड़ोस की गुप्ताइन और शर्माइन जाकर उसकी मां के कान भरा करती थी..

“जिज्जी कहे दे रहे हैं अपनी भावी को उस ठकुराइन से जरा दूर रखो..उसके लक्षण ठीक नहीं है।
    जैसे गाड़ी को फटफटाते हुए धुर्रा  उड़ाती गाड़ी गांव में घुमाती है ना कहीं किसी दिन कोई कांड जरूर करेगी यह छोरी।  और उसके पीछे-पीछे अपनी सीधी-सादी भावना भी फंस कर रहेगी ।
    हम तो कह रहे हैं जिज्जी ऊंचे लोगों की दोस्ती भी बुरी और दुश्मनी तो और बुरी.। दोस्ती भी अपने बराबर वालों में करनी चाहिए।
    आप काहे नहीं समझाती अपनी भावी को, की अपने साथ के लोगों के साथ उठा बैठा करें।
      ना उन ठाकुरों के बराबरी का घर द्वार है, ना उतना रुतबा है, ना उतना धन दौलत है हमारे पास। फिर काहे उनके पीछे-पीछे घूमना।”

भावना जब तब उन लोगों के मुंह से अपनी और कुसुम की दोस्ती के लिए यही सुना करती थी। एक बार तो पलट कर उसने जवाब भी दे दिया था, उसके बाद से इनमें से कोई भी औरत उसके सामने कुछ नहीं कहा करती थी। लेकिन भावना अच्छे से जानती थी कि उसके पीठ पीछे यह लोग भर भर कर कुसुम को कोसती हैं। एक ठंडी सी आह भर कर वो रह गई। आज उसे कुसुम की भी बहुत याद आ रही थी।

         लेकिन आज जब यही गुप्ताइन और शर्माइन जाकर उसके अगल-बगल बैठी तो उनका एक स्पर्श पाते ही वह भरभरा कर रो पड़ी। ऐसा लगा उसे जैसे वह डूब रही थी और उसे एक छोटा सा ही सही सहारा मिल गया था।.
उन दोनों ही औरतों ने उसे अपनी बाहों में भरकर सांत्वना देना शुरू कर दिया..।

“मत रो भावी  तेरी अम्मा ठीक हो जाएगी। भगवान इतने भी निर्दई नहीं होते। अच्छा सुन तूने अपने बाबूजी को खबर तो दे दी ना कि तेरी अम्मा की तबीयत इतनी खराब है।
सुन देर मत करना, उन्हें जल्दी खबर कर दे। और कह देना कि अब तो आ ही जाएं। कम से कम एक बार देख तो ले कि उनके पीछे उनकी पत्नी ने कैसा राज रोग लगा लिया है खुद को।”
उन दोनों की बातें सुनकर भावना थम कर रह गई। कैसे किसी से बताएं कि जिसे खबर देने की बात वो लोग कह रहे हैं, वह खुद यह खबर सुनने के लिए अब इस दुनिया में कहां रह गए हैं…,

वह दोनों औरतें अपने साथ फल और कुछ खाने पीने का सामान लेकर आई थी। उन्होंने भावना से उसकी मां से मिलने की इच्छा जाहिर की, इस वक्त राजेंद्र भी बाकी की रिपोर्ट्स लेकर चला आया। उन लोगों को देखकर उसने भावना के साथ अंदर जाने की इजाजत दे दी।

   भावना के साथ अपनी दोनों सहेलियों को अंदर आया देख भावना की मां के चेहरे पर खुशी झलक आई।

” यह क्या किया जिज्जी, कौन सा रोग लगा बै ठी तुम भी।  तुम्हारा तो खाना पीना भी कितना नपा तुला होता है। इतना अच्छा भोजन करने के बाद भी ऐसा कैसे हो गया ?”

“यह बीमारी भोजन से नहीं होती है।” भावना ने अपनी तरफ से कहना चाहा।

” हम सब जानती हैं। हर एक बीमारी की जड़ में कहीं ना कहीं पेट ही जुड़ा होता है। पेट की समस्या से शुरू होने वाली हर समस्या बड़ी बीमारी का रूप धर लेती है। कुछ गलत कह रहे हैं हम? खैर, छोड़ो।
हम तो यह कह रहे थे, एक बार भावना के बाबूजी को भी खबर करवा दो।”

उनकी यह बात सुनकर भावना की मां ने बड़ी आस से भावना की तरफ देखा, और उस समय वहां आकर खड़ा हुआ राजेंद्र उनकी तरफ देखकर उन्हें अश्वस्त कर गया।

” आप चिंता ना करें, उन्हें आज ही कॉल करके भावना बता देगी।”

भावना ने पलट कर राजेंद्र को देखा और फिर अपनी मां को देखकर चुपचाप खड़ी रह गई। लेकिन उसकी आंखों में कुछ तो ऐसा था जो राजेंद्र को चुभ गया।

उसे लगा कि कोई ऐसी बात है जो भावना उन सब से छिपा रही है। लेकिन वह कौन सी बात है, यह राजेंद्र समझ नहीं पाया…

उसके इशारे पर भावना अपनी पडोसनो को लेकर बाहर निकल गयी..
राजेंद्र ने भावना की माँ की फाइल में उनकी रिपोर्ट्स को जमाया और वो भी बाहर चला आया..।

अब तक वो औरतें चली गयी थी, भावना भी अब खुद को संभाल चुकी थी..

“हम घर जाकर अपने लिए कपड़े और चादर वगैरह लेकर आते हैं.. रात में हम यही रुक जायेंगे !”

“सिर्फ कपड़े और चादर ही तो लाना है ना, वो यही मिल जायेगा, उसके लिए इतनी दूर कहाँ जाओगी ?”

“ठीक है !”  भावना ने कहा और चुप रह गयी.. लेकिन सोच में ज़रूर पड़ गयी कि चादर और कपडे आएंगे कहाँ से..

कुछ देर बाद राजेंद्र वहाँ से चला गया…
भावना अपनी माँ के कमरे के बाहर बैठी थी.. उसकी माँ दवाओं के असर में सोई पड़ी थी.. उनके पास बैठ कर वो उनकी नींद ख़राब नहीं करना चाहती थी..
अचानक उसे ख्याल आया कि उसे एक बार कुसुम से बात कर लेनी चाहिए.. उसकी नाराज़गी तो चंद्रा से थी, जो किया चंद्रा ने किया, फिर इसमें कुसुम का क्या कसूर..

उसने कुसुम को फ़ोन लगा लिया..

कुसुम का फ़ोन ऊपर कमरे में पड़ा था और अपने फ़ोन से बेखबर कुसुम नीचे घर की औरतों के साथ बैठी खाना खा रही थी…

कमरे में बैठा यज्ञ अपने कचहरी के कुछ हिसाबी कागज़ देख परख रहा था कि फ़ोन बजने लगा..
बिना फ़ोन की तरफ देखे ही उसने फ़ोन उठा लिया.. उठाने के बाद उसका ध्यान गया कि उसने अपना फ़ोन समझ कर गलती से कुसुम का फ़ोन उठा लिया है..

“हेलो कुसुम… कैसी हो..?
सुनो, हमारा जी बहुत घबरा रहा है.. अम्मा की बहुत तबियत ख़राब हो गयी है, उन्हेँ शहर के अस्पताल में भरती किया है… हमें समझ नहीं आ रहा, अब क्या होगा.. तुम सुन रही हो ना ?”

फ़ोन उठते ही भावना अपनी रौ में बोलती चली गयी…

“हम यज्ञ बोल रहे हैं, कुसुम के पति.. रुकिए हम उन्हेँ बुला देते हैं.. !”

“नमस्ते यज्ञ जी.. हम भावना बोल रहे हैं..। कुसुम की सहेली.. ।
उससे बात करने का मन हो रहा था, इसलिए बिना समय देखे ही फ़ोन लगा दिए.. अभी वो व्यस्त होगी तो रहने दीजिये.. हम बाद में फ़ोन लगा लेंगे !”

“वैसे कौन से अस्पताल में है आपकी माताजी ?”

“तीरथराम  जिला अस्पताल में !”

“ठीक है.. हम कुसुम को लेकर आते हैं !”

“नहीं कोई हड़बड़ी नहीं है… आज तो अब दिन निकल ही गया.. कल ले आइयेगा !”

“जी.. किसी चीज़ की ज़रूरत लगे तो बता दीजियेगा !”

“जी.. !”

भावना ने फ़ोन रख दिया.. उसे बड़ी राहत सी लगी थी..।

उसने वहीँ बेंच पर बैठे बैठे आंखे मूँद ली थी… उसे हल्की सी झपकी लग गयी थी कि तभी उसे लगा कोई उसे धीमे से आवाज़ दे रहा है..
उसकी आंख खुल गयी…
सामने राजेंद्र खड़ा था, उसके हाथ में दो बड़े बैग्स थे..

“उधर मेरे केबिन में चल कर आराम से हाथ मुहं धोकर आराम कर लो.. !”

“नहीं मैं ठीक हूँ !” भावना की बात पर राजेंद्र के चेहरे ओर कोई भाव नहीं आये.. उसने हाथ में पकड़ रखे पॉली बैग्स भावना के एक तरफ बेंच पर रखे और चला गया..
भावना को लगा राजेंद्र नाराज़ हो गया है..।

ऐसा ही तो था वो, उसके मन में क्या चल रहा कभी स्पष्ट नहीं करता था…।
भावना को यही लगता था कि अगर राजेंद्र को कुछ चाहिए या वो किसी काम को चाहता है तो स्पष्ट तौर पर बोल दिया करे। लेकिन वो राजेंद्र का स्वभाव ही नहीं था..।
किसी पर हुक्म चलाना उसने सीखा ही नहीं था..।
एक बार अपनी मंशा बताने के बाद अगर सामने वाला मना कर दे, तो वो चुपचाप एक किनारे हो जाता था..।

अभी भी वो चला गया..
उसके जाने के बाद भावना उस कॉरिडोर में अकेली रह गयी..।
उसने झांक कर कांच के दरवाज़े से अंदर देखा, उसकी माँ गहरी नींद सोई हुई थी..।
नर्स उनके सैलाइन में कुछ दवा डाल रही थी..।
मेडिकल कॉलेज का अस्पताल होने के कारण यहाँ ढेर सारे डॉक्टर्स मौजूद थे..।
और हर वक्त कोई ना कोई नर्स उसकी माँ की तीमारदारी में नजर आती ही थी..

उसने एक झलक उन्हेँ देखने के बाद वो दोनों बैग्स उठाये, और राजेंद्र के कमरे की तरफ बढ़ गयी..

दरवाज़े पर पहुँच कर उसने धीरे से दस्तक दी और अंदर चली गयी..।
राजेंद्र एक तरफ लगे लम्बे सोफे पर पैर पसारे लेटा हुआ था..। हालाँकि उसकी लम्बी टांगे सोफे से बाहर झूल रही थी.. भावना को आते देख वो बैठ गया..।

भावना भी अंदर चली आयी..।
उसने एक टेबल पर सारा सामान रख दिया.. और इधर उधर बाथरूम ढूंढने लगी..।
राजेंद्र ने इशारे से उसे बाथरूम दिखा दिया..
भावना उसमे से एक बैग लेकर अंदर चली गयी..
उसने बैग खोल कर देखा और उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा..
उसके लिए कुर्ते के सेट के साथ ही फेस वाश, टूथपेस्ट टूथब्रश, कंघी नैपकिन के साथ ही कुछ दो तीन सेट इनर्स भी मौजूद थे..।

उन कपड़ो को देख वो बुरी तरह से झेंप गयी..।

“हे भगवान, कैसे खरीदे होंगे डॉक्टर साहब ने ये अंदर के कपडे.. ! वो तो हम से भी ज्यादा शर्मीले हैं ! लेकिन हैं बहुत समझदार, तुरंत समझ गए की हम क्यों कपड़े लेने जाने की ज़िद कर रहे थे..।
आखिर डॉक्टर हैं, दिमाग तो चलाएंगे ही.. !”

अपनी सोच पर मुस्कुरा कर उसने अच्छे से हाथ मुहं धोया और कपड़े बदल कर बाहर चली आयी..।
बाहर आकर उसने बैग एक तरफ रखा और धीरे से अपनी चोटी खोल ली.. धीरे धीरे बालों को वो अपने हाथों से सुलझाती भी जा रही थी..

“कुछ खाओगी ?”

राजेंद्र ने सपाट सा सवाल पूछ लिया..

भावना ने सोचा अगर ना बोल देगी तो ये सनकी डॉक्टर वाकई कुछ नहीं मंगवाएगा…

“हम्म खा लेंगे !”

“ठीक है, देखता हूँ कैंटीन में क्या है.. ? “
राजेंद्र कमरे का दरवाज़ा खोल कर चला गया.. और दरवाज़े को बंद कर भावना वहां बिछे सोफे पर बैठ गयी.. सोफा आरामदायक था, वो धीरे से उस पर लेट गयी…
थकान तो बहुत थी, बावजूद वो आंखे खोले कमरे को ध्यान से देख रही थी.. आजकल सरकारी अस्पतालों का रूप रंग भी बदल सा गया है..।
ये कमरा कितना सुन्दर सा लग रहा है..।
ऊपर लगी फाल्स सीलिंग को देखते हुए वो सोच रही थी… खिड़की पर लगे परदे हवा से झूल रहे थे..
कमरे में एक मीठी मीठी सी खुशबु आ रही थी..।
बीच बीच में कमरे में लगा एयर फ्रेशनर फिस की आवाज़ निकाल कर स्प्रे कर रहा था..
धीरे धीरे उसकी ऑंखें मूंदने लगी… और उसने आंखे बंद कर ली..
भावना को लगा अभी तो उसकी आंख बंद हुई थी और फिर कोई उसके सर पर सवार होकर उसे जगाने लगा..
.उसने आंखे खोल कर देखा सामने राजेंद्र खड़ा था..

राजेंद्र को देख वो उठ कर बैठ गयी… राजेंद्र ने उसके सामने एक बॉक्स और ऊपर से ढकी हुई चाय का कप रख दिया..।
वो बेचारा कैंटीन से खुद ही सब उठा लाया था..।
एक छोटी पन्नी में कुछ चिप्स और बिस्किट के पैकेट्स थे, एक ट्रे में दो मैगी और दो कप चाय थी..।
वो दोनों चुपचाप खाने लगे…

भावना ने जैसे ही खाना समाप्त किया.. सारा सामान उठा कर राजेंद्र ने अच्छे से बांध कर कमरे के बाहर लगे डस्टबिन में डाल दिया..

“तुम यहाँ सोफे पर ही सो जाओ !”

“और आप ?”

“मैं वहाँ अपनी कुर्सी पर.. !”

राजेंद्र ने अपनी रिवोल्विंग चेयर की तरफ ईशारा कर दिया…..

उसके सामने एक छोटा स्टूल रख राजेंद्र अपनी कुर्सी पर बैठा और स्टूल पर पैर रख लिए..

उसे आराम से बैठा देख भावना भी सोफे पर लेट गयी…
थकान से थोड़ी ही देर में भावना को नींद आ गयी… राजेंद्र ज़रूर भावना की माँ की रिपोर्ट्स देखने के कारण बहुत देर तक सो नहीं पाया..

*****

खाना खा कर कुसुम भी ऊपर चली आयी…

कुसुम ऊपर आयी तब भी यज्ञ अपना काम ही कर रहा था.. वो पलंग पर फैला पड़ा था..।
उसके बाजु में जाकर बैठने का कुसुम के लिए सवाल ही नहीं उठता था..।
वो एक तरफ रखे सोफे पर बैठ गयी..

कुसुम को आया देख यज्ञ ने एक नजर उस पर डाली और बोल पड़ा..

“अच्छा सुनो.. !”

“नहीं सुनना !” कुसुम ने तुरंत पलट कर जवाब दे दिया… यज्ञ कसमसा कर रह गया.. वो उसे भावना के फ़ोन के बारे में बताना चाहता था..

“तुमसे कुछ बात करनी थी.. !”

“हमें नहीं करनी !” कुसुम ने पलट कर जवाब दे दिया.. उसे यज्ञ को उल्टा सुलटा जवाब देने में भारी मज़ा आता था..

यज्ञ ने एक नजर घूर कर कुसुम की ओर देखा एक गहरी सी फूंक मारी और अपना काम करने लगा…

“भाड़ में जाओ !” यज्ञ वापस अपने कागज़ देखने लगा..

“हम क्यों जाये.. आपको हमारा साथ पसंद नहीं आ रहा तो आप जाइये भाड़ में !”

यज्ञ की समझ से बाहर थी ये लड़की.. एक तरफ उसे उल्टा जवाब भी देती थी, दूसरी तरफ उसकी हर बात पर बोल कर बात को लम्बा भी खींचती थी…

“ये हमारा घर है और हम कहीं नहीं जायेंगे..। जिसे हमारे साथ रहने में दिक्कत हो वो स्वयं यहाँ से बाहर जाने में सक्षम है, उसे रोका नहीं जायेगा.. !”

“हम क्यों कमरे से बाहर जाये.. ?”

“हमने ऐसा कब कहा कि तुम कमरे से बाहर जाओ.. !”

“अभी कहा तो.. !” कुसुम टहुकी.. उसे इस जवाबी पलटवार में मजा आ रहा था….

यज्ञ किसी बहुत ज़रूरी से हिसाब किताब में उलझा हुआ था.. उसके हिसाब में लगभग डेढ़ लाख रूपये का खर्च का कोई ब्यौरा मिल नहीं रहा था, वो बहुत देर से उसी सब में लगा था और कुसुम अपनी बतकही में मशगूल थी.. उसी रौ में बहता यज्ञ भी बोल गया

” हम्म कहा.. जाओ.. मरो जाकर !”

“हमे मरने बोल रहे है आप ?”कुसुम घुटी सी आवाज़ में चीख पड़ी..

“हाँ बोल रहे हैं.. हमारे बोलने से मर जाओगी क्या ?”

यज्ञ ने खीझ कर कहा और कुसुम को घूरने लगा.. कुसुम ने यज्ञ को खा जाने वाली नजरो से घूरा और पलट कर जवाब दे गयी..

“क्यों मरेंगे… हम आपकी बात सुनेंगे और मानेंगे ही क्यों ? और कोई नहीं बचा क्या हमारी ज़िंदगी में जो हम आपकी बात सुन कर अपनी जिंदगी का निर्णय लेंगे..!”

मरने वाली बात पर कुसुम की ऐसी बेसर पैर की फिलासफी सुन यज्ञ को हंसी आ गयी..

उसने कुसुम को देखा..

“ठीक है हमारी बात सुन कर मरो मत, लेकिन क्या हमे एक कप चाय लाकर दे सकती हो.. इस हिसाब में दिमाग हिल गया है.. !”

कुसुम ने मुहं टेढ़ा कर घुमा लिया और पैर पटकती बाहर चली गयी..।
     पता नहीं चाय लाएगी या नहीं पर कम से कम हल्ला करना बंद तो किया, यही सोच यज्ञ वापस अपना हिसाब मिलाने लगा..

उसने अखंड को फ़ोन लगा लिया..
लेकिन उससे भी इस डेढ़ लाख का कोई हिसाब नहीं मिला…।

घर के सारे पैसे रूपये एक साथ बड़े ठाकुर की तिजोरी में ही जाते थे.. घर के जिस लड़के को जब जितना रुपया  चाहिए उन्ही से मांग कर ले जाता था….
ठाकुर साहब के पास की डायरी में हर हिसाब लिखा होता था.. अखंड ने यज्ञ को उसी डायरी से मिलाने बोल दिया..

लेकिन बड़े ठाकुर से डायरी निकलवा कर देखना भी टेढ़ी खीर था.. उनके सौ सौ सवालों के जवाब देने में सभी लड़को को नानी याद आ जाती थी..।
यही सब सोचता यज्ञ बैठा था कि कुसुम चाय लिए कमरे में चली आयी..

चाय का प्याला यज्ञ की टेबल पर रख उसने अपनी बड़ी बड़ी काजल अंजी आँखों से यज्ञ को देखा और दूसरी तरफ चली गयी…

यज्ञ ने चाय का प्याला देखा और हल्का सा मुस्कुरा कर चाय का कप पकड़ कर खिड़की पर खड़ा हो गया..।
चाय पीते हुए उसकी नजर बाहर ही थी.. तभी गेट के बाहर अपनी गाडी से लड़खड़ा कर उतरते घर के छोटे शहज़ादे वीर पर उसकी नजर पड़ी और उसका दिमाग तेज़ी से काम करने लगा…

क्रमशः

aparna..

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Meera Patel
Meera Patel
2 years ago

भावना का जितना साथ दे सकता है राजी दे रहा है, हर छोटी बड़ी जरूरत का ध्यान भी रख रहा है , पर ये कैसा स्वभाव है की एक बार बोले तो तुरंत मान भी जाता है की अपना तर्क रखना जरूरी नहीं समझता, अरे जब भावना के पिता को फोन कर ने की बात आई तब भावना को आंखो में देख कर पहचान गया की भावना जरूर कुछ छुपा रही है ,
अरे आज यज्ञ बाबू की बात भावना से ही गई , कितनी विनम्रता से बात करी यज्ञ ने, साथ ही साथ पूछ भी लिया कुछ जरूरत हो तो बता दे।

अब जब भावना और कुसुम का आमना सामना होगा तब क्या होगा ?? यज्ञ जब राजी से मिलेगा क्या प्रतिक्रिया होगी उसकी, बाकी तीनों अब कुसुम के व्यवहार से तो परिचित ही है की वो जब राजी को देखेगी तो यज्ञ का भी लिहाज नही रखने वाली शायद , और राजी से पूछ भी ले की मेरे msg का जवाब क्यों नही दिया था ??
डेढ़ लाख रुपए , वीर ने कही उड़ा दिए है यज्ञ का दिमाग ठनका।
अरे कैसे tom & Jerry जैसे लड़ रहे है दोनो , वाह चाय मांगी तो लेने चली गई ??🧐😳 मुझे तो लगा ये लड़ाकू विमान माना कर देंगी , नही लाती जाओ क्या कर लोगे !! पर यह तो उल्टा चली गई और चाय ले भी आई , और शायद नमक डाल कर भी नही लाई, अच्छी वाली चाय बना कर लाई है कुसुम 🤩 हाए कभी कभी ये लड़की न कमल ही कर देती है 😍🥰🙈😘

आगे के इंतज़ार में….. जान ना है की अब चंद्र का डर नहीं है तो ये सब मिलेंगे तो क्या प्रतिक्रिया होंगी चारो की !!!

S. Tiwari
2 years ago

thanks..