अपराजिता -83
अखंड ने तुरंत अपने साथ आये ड्राइवर को भी दवा लेने के बहाने अंदर भेज दिया, और खुद बाहर खड़ा उन लोगो के बाहर आने का रास्ता देखने लगा…
उसी समय वहाँ से गुजरती कुसुम कुमारी ने अपने जेठ को मय गाड़ी वहाँ खड़ा पाया और अपने माथे पर ज़ोर डालती अपने घर चली गयी..
उन लड़कों को अंदर घुसते समय यह मालूम नहीं था कि रेशम के अलावा वहां बिट्टू भी मौजूद है।
सिर्फ बिट्टू को वह लोग एक तरफ कर रेशम को परेशान कर सकते थे, लेकिन उस समय अखंड का ड्राइवर भी वहां दवा लेने के नाम पर पहुंच गया।
दो आदमियों को देखकर उन लड़कों की कुछ ज्यादा करने की हिम्मत नहीं हुई, बस उन्होंने रेशम से दवाइयां ली और चुपचाप बाहर निकल गए…
अखंड ने अपने ड्राइवर को भी ज्यादा कुछ जानकारी नहीं दी थी, उन दोनों के निकलने के बाद ड्राइवर ने अपने लिए दवाई ली और वह भी बाहर निकल गया।
तब तक में और बाकी की महिला मरीज भी रेशम से मिलने आ गई थी और डिस्पेंसरी में भीड़भाड़ बढ़ने लगी थी। इसलिए ड्राइवर के निकल जाने के बाद दूर खड़े इंतजार करते वह लड़के वापस अंदर नहीं गए। बल्कि बाहर खड़े ही इंतजार करने वालों कि कब डिस्पेंसरी खाली हो और वह लोग वापस रेशम को धमकाने के लिए अंदर जा सके।
इसीलिए अखंड भी अपनी थार में बैठा इंतजार करता रहा।
उसकी पूरी नजर उन लड़कों पर थी। इस बार वह उन लड़कों का पीछा करके जानना चाहता था कि आखिर बात क्या है। दो ढाई घंटे तक बाहर धूप में इंतजार करने के बाद आखिर वह दोनों लड़के अपनी बाइक पर सवार हुए और जलसों गांव के लिए मुड़ गये।
अखंड ने तुरंत अपनी गाड़ी उनके पीछे घुमा दी। अपने ड्राइवर को उसने वही डिस्पेंसरी के सामने ही बैठा रहने को कहा और खुद उन लड़कों का पीछा करने लगा। वह लड़के जैसे ही अपने गांव पहुंचे, अखंड को समझ में आ गया कि यह लोग जलसों गांव के रहने वाले हैं।
लेकिन अब भी अखंड को यह समझ में नहीं आया था कि यह लोग आखिर रेशम के डिस्पेंसरी के चक्कर क्यों लग रहे हैं? वह लड़के आगे बढ़ते हुए एक छोटी सी पान की गुमटी में पहुंच गए, और वहां अखंड को एक दिन पहले पत्थर फेंक कर भागने वाला लड़का भी नजर आ गया।
यह सारे लड़के बाईस तेईस साल से लेकर अट्ठाइस उन्तीस साल के बीच के थे।
हालांकि इस गांव का नाम बाहर बहुत खराब था। इस गांव के युवक हो या प्रौढ़, सभी नशे की लत में बुरी तरह से गिरफ्त थे…।
अखंड ने वहां के एक लड़के को बुलाकर वहां की जानकारी लेनी चाही और तब अखंड को मालूम हुआ कि पास के गांव में आई नई-नई डॉक्टरनी ने जलसों गांव में मौजूद शराब के ठेके को कलेक्टर से शिकायत करके बंद करवा दिया है।
और इसलिए गांव के अधिकतर पुरुष इस बात से नाराज है….।
अब अखंड को सारा माजरा समझ में आ रहा था…
यह सारी बातें जानने के बाद वह वापस डिस्पेंसरी लौट आया! अब तक उसका ड्राइवर वहीं मौजूद था। डिस्पेंसरी बंद करने का वक्त होने लगा था और तभी डिस्पेंसरी के सामने एक लंबी सी कार आकर रुकी।
अखंड की गाड़ी काफी दूर खड़ी थी।
डिस्पेंसरी से वह इतनी पर्याप्त दूरी पर थी कि डिस्पेंसरी में आने जाने वाले लोगों का ध्यान आसानी से उस पर नहीं पड़ता, लेकिन अखंड का ध्यान उस गाड़ी पर बराबर बना हुआ था।
आखिर किसकी गाड़ी थी जो डिस्पेंसरी के ठीक दरवाजे पर जाकर खड़ी हुई थी। अखंड की नजर गाड़ी पर टिकी हुई थी। लेकिन अंदर से अब तक कोई नहीं उतरा था।
अखंड सांस रोके देखने का प्रयास कर रहा था कि आखिर कौन गाड़ी से उतरता है…!
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भावना अपना बैग उठाई डॉक्टर साहब के घर से निकल गई थी।
उसे पूरी उम्मीद थी कि डॉक्टर साहब उसे नहीं रोकेंगे, और उसकी उम्मीद सही साबित हुई।डॉक्टर साहब ने ना उसे पीछे से आवाज दी और ना ही अपनी इतनी तीमारदारी के लिए कोई धन्यवाद दिया। इतने दिनों में भावना भी डॉक्टर साहब का स्वभाव समझ गई थी। कहीं ना कहीं वह उनके हृदय की पीड़ा को बिल्कुल वैसे का वैसा अपने अंदर भी महसूस कर पाती थी। आखिर वह भी तो निनाद से अलग कर दी गई थी। जो दर्द उसके दिल में उठ रहा था, उसी कसक से डॉक्टर साहब भी तो गुजर रहे थे…।
दोनों के दर्द एक से ही तो थे..
एक सी टीस, एक सी कसक..
इसी लिए दोनों को ही एक दूजे से ना कोई उम्मीद थी ना आस..। जैसा चल रहा था उसे वैसे ही दोनों चलने दे रहे थे।
जीवन के इस प्रवाह में दोनों ने अपने आप को भगवान के भरोसे छोड़ दिया था। अब ना दोनों की आंखों में भविष्य को लेकर कोई सपना था। और ना ही वर्तमान को लेकर कोई योजना थी। दोनों के पास थी, बस अतीत की खट्टी मीठी यादें, जिन्हें अपने जीवन का एक अभिन्न अंग मानकर दोनों ने निहर्ष स्वीकार कर लिया था…।
दोनों ने इस बात को स्वीकार कर लिया था कि दोनों कुछ समय के लिए एक रिश्ते में जुड़ गए थे। और अब इस रिश्ते को तब तक तो चलना ही था जब तक इस रिश्ते की मियाद थी। उसके बाद भले ही अलग हो जाएंगे। लेकिन अभी दोनों के मन में किसी भी तरह की कोई इच्छा या कोई अनिच्छा नहीं रह गई थी।
रह गई थी एक कोरी निर्लिप्तता, स्वयं के लिए भी और अपने आसपास के परिवेश के लिए भी।
वही हाल भावना का था जो हाल राजेंद्र का था…।
भावना अपने घर पहुंच गई। रिक्शा से उतरकर उसने अपनी छोटी सी बगिया के सामने लगे गेट को खोला और अंदर चली गई।
उसके चले जाने के बाद उसकी बगिया भी उसके जीवन जैसी सूनी वीरान पड़ी थी..।
आम और अशोक के सूखे पत्ते नीचे गिर गिरकर छोटे पौधों को दबाने लगे थे। देखकर ऐसा लग रहा था जैसे इन्हें साफ सुथरा रखने वाला, इनका पालनहार, इन्हें छोड़ कर चला गया था।
भावना ही तो अपनी छोटी से बगिया की देखभाल करती थी। क्योंकि उसकी मां घर के बाकी काम करने से फुर्सत भी कहां पाती थी। इन्हें भी कल से व्यवस्थित करना शुरू कर दूंगी, यह सोचकर भावना अंदर की तरफ बढ़ गई।
मुख्य दरवाजे पर दस्तक देने के लिए उसने हाथ दरवाजे पर लगाया और हाथ के दबाव से दरवाजा अंदर की तरफ खुल गया। उसे लगा उसकी मां दरवाजा बिना बंद किये ही अंदर कुछ कर रही होगी। अपना बैग बाहर वाले कमरे की कुर्सी पर पटक कर वह अंदर चली गई। अंदर घुसते ही वह सीधा रसोई में गई। लेकिन रसोई में सारे बर्तन जस के तस अलमारी में जमे पड़े थे।
रसोई ऐसे दिख रही थी जैसे जाने कब से वहां भोजन बना ही नहीं।
उसे लगा शायद उसकी मां ने सुबह जल्दी ही खाना बनाकर खाकर रसोई समेट कर रख दी होगी, और अपने कमरे में या तो आराम कर रही होगी या उसके लिए कुछ बना रही होंगी। उन्हें बुनाई का भी तो बहुत शौक था।
यही सोच कर वह अपनी मां के सोने वाले कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे का दरवाजा उढका हुआ था। उसने धीरे से दरवाजा अंदर की तरफ धकेल कर खोल दिया। उसकी मां पलंग पर लेटी हुई थी। उनकी आंखें बंद थी। भावना उन्हें आवाज देती, उनके पास पहुंच गई। लेकिन उसकी मां इतनी गहरी नींद में थी कि उन्होंने उसकी आवाज ही नहीं सुनी।
भावना को बहुत आश्चर्य हुआ, वह उनके पास बैठकर उन्हें जगाने की कोशिश करने लगी। उसने जैसे ही उनके माथे पर हाथ रखा, चौंक कर उसने अपना हाथ पीछे कर लिया।
उसकी मां का शरीर जल रहा था। बुखार देख वह घबरा गई। उसने अपनी मां का हाथ छूकर देखा, पूरा शरीर तप रहा था। और उसकी मां एक चादर ओढ़ कर बेसुध पड़ी थी..।
वह घबरा गई उसने तुरंत अपना फोन निकाला और राजेंद्र को फोन लगा दिया..।
“क्या हुआ, पहुँच गयीं घऱ ?”
राजेंद्र के सवाल पर वो सिसक उठी..
” डॉक्टर साहब हम अभी घर पहुंचे हैं। अम्मा के पास जैसे ही पहुंचे अम्मा बिल्कुल बेसुध पड़ी मिली हमे।
और बहुत तेज बुखार हो रखा है उन्हें..।
हम क्या करे कुछ समझ नही आया तो आपको फ़ोन कर लिया.. !”
“अरे… ऐसे कैसे, उन्होंने तुम्हे फ़ोन तक नही किया.. तुम परेशान मत हो, मैं तुरंत वहाँ पहुंच रहा हूँ..।
तब तक तुम एक रुमाल को भीगा कर उनके माथे पर पट्टी करो, मैं तुरंत पहुँचता हूँ !”
भावना ने फ़ोन रखा और भाग कर रुमाल और पानी से भरा भगोना ले आयी …
जब तक राजेंद्र पहुँच नही गया तब तक भावना को चैन नही आया…
आखिर कुछ देर बाद राजेंद्र अपने साथ दवाइयों का पैकेट लेकर भावना के घर पहुंच गया। आते ही उसने सबसे पहले भावना की मां की नब्ज देखी और धीमी पड़ती नब्ज देखकर तुरंत इंजेक्शंस और दवाइयों के साथ उन्हें ड्रिप लगा दी..।
दवा के असर से कुछ देर बाद भावना की मां ने आंखें खोल दी। कुछ जरूरी जांचों के लिए राजेंद्र ने खून के सैंपल लिए और शहर से लैब अटेंडर को बुलाकर वह सैंपल लैब में जाँचने के लिए भिजवा दिए।
भावना की मां को सर्दी जुकाम या कोई और ऐसा इन्फेक्शन नजर नहीं आ रहा था, जिसके कारण इतना तेज बुखार हुआ था।
इसलिए राजेंद्र उनके बुखार को लेकर थोड़ा ज्यादा परेशान हो रहा था। बुखार उतरा और भावना की मां ने आंखें खोल दी।
अपनी बेटी को अपने पास देखकर उन्हें अच्छा लगा। भावना ने अपनी मां का हाथ कस कर थाम लिया..
” हमें फोन नहीं कर सकती थी माँ..? जब बुखार आ रहा था तो हमें बताया क्यों नहीं, और बुखार आया कब से..?”
” अरे सड़ा सा बुखार ही तो था, तुम्हें बता कर परेशान नहीं करना चाहते थे..!”
“कब से आ रहा आपको बुखार… ?”
अबकी बार राजेंद्र ने पूछा..
“ऐसे कभी ध्यान तो नही दिया… कमज़ोरी से आ जाता है कभी कभी !”
“कभी कभी नही.. आपको बहुत समय से ये बुखार आ रहा होगा, लेकिन कीन आपने ध्यान नही दिया.. !”
राजेंद्र ने पलट कर भावना की तरफ देखा..
“इन्हे कहीं दर्द भी रहता है क्या ?”
भावना के साथ साथ उसकी मां ने भी ना में गर्दन हिला दी।
लेकिन राजेंद्र को उनकी बात पर यकीन नहीं हुआ।
” आप जरा ध्यान से सोच कर देखिए, क्या आपको बहुत जल्दी खांसी सर्दी होती रहती है या फिर बार-बार पेट खराब होता है? या कमर पेट गर्दन कहीं दर्द होता है..?”
“हां गर्दन में तो दर्द बना रहता है, और यह तो काफी समय से है। पहले हमारा घर पटाव वाला था ना तो, ऊपर के पटाव में हम सामान रखा करते थे। उसे निकालना उतारने के लिए अक्सर हमें ही कोशिश करनी पड़ती थी।
बस तभी से लगता है कोई नस दब गई थी। सोने में भी हमारी ऊंची तकिया लेकर सोने की आदत है। अब तो बहुत समय से तकिया लेना भी बंद कर दिया। लेकिन गर्दन का यह दर्द बना ही रहता है..।”
“हम्म यही जानना चाहता था मैं….।
अभी फिलहाल कुछ सैंपल आपके खून के मैंने भेजे हैं, उनकी टेस्ट रिपोर्ट आ जाए,उसके बाद मुझे कुछ और जांच करनी पड़ेगी।
इसके लिए आपको हमारे साथ शहर चलना पड़ेगा।”
राजेंद्र ने भावना की तरफ देखा और अपना मोबाइल उठाएं किसी से बात करते हुए बाहर निकल गया। अब भावना की मां को आराम था। उनके लिए कुछ खाने का बनाने का सोच कर भावना रसोई में चली गई, और चाय बनाकर ले आई।
चाय के साथ अपनी मां को बिस्किट पकड़ा कर वह राजेंद्र को चाय देने बाहर चली आई। राजेंद्र को चाय का प्याला देने के बाद वह उसकी आंखों में देखकर उससे पूछ बैठी..
” कोई गंभीर समस्या है क्या डॉक्टर साहब..!”
” अभी जब तक सारी जांच ना हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन मुझे बोन टीबी का डाउट हो रहा है। तुम्हारी मां का वजन पहले से कुछ कम भी हुआ है, है ना..
” हां हम रोज ही उन्हे ने देखते हैं, इसलिए कभी ध्यान नहीं है गया। क्योंकि मां शुरू से ही दुबली पतली ही है..!”
“हम्म बस भगवान से प्रार्थना करो, अगर टीबी निकलता भी है तो दवाइयों से अच्छा हो जाए..।”
“जी.. आप यहाँ चले आये.. आपको तो अस्पताल जाना था ना ?”
“हम्म, आज के लिए ड्यूटी बदल ली.. मेरी जग़ह अमित कर लेगा और मैं उसकी जग़ह नाईट ड्यूटी में चला जाऊंगा !”
“कल माँ को लेकर अस्पताल आना होगा क्या ?”
“हाँ.. मैं वहाँ नंबर लगवा कर रखूँगा, तुम बस इन्हे लेकर चली आना.. यहां से बस में अगर उन्हें लेकर आने में असुविधा हो तो बताना, मैं अमित के हाथ से गाड़ी भिजवा दूंगा..
“जी हम बस में ले आएंगे !”
“हम्म.. !”
चाय पीकर राजेंद्र अपने कुछ दोस्तों से भावना की मां के बीमारी के लक्षण बता कर बातचीत करने लगा। भावना अंदर अपनी मां के पास चली आई। कुछ देर में उसकी मां को जब थोड़ा ठीक लगने लगा, तब वह खाना बनाने अंदर चली गई।
खाना बनाकर उसने अपनी मां को खिलाया और अपनी और राजेंद्र की थाली परोसकर बाहर ले आई।
अब तक में राजेंद्र ने वहां बैठे-बैठे जाने कितने डॉक्टर्स से कितनी सारी जानकारियाँ इकट्ठी कर ली थी।
उसके सामने टेबल पर रखे एक पेज पर उसने ढेर सारे फोन नंबर और अलग-अलग अस्पताल के पते नोट कर लिए थे कि जिससे अगर बोन टीवी का भयानक बढ़ा हुआ स्टेज मालूम चलता है तो, किसी बड़े इंस्टिट्यूट में ले जाकर इलाज करवाया जा सके।
अगर बोन टीबी का शुरुआती दौर हुआ तो इलाज उसके खुद के अस्पताल में भी संभव हो जाएगा।। वह इन्हीं सब जोड़ घटाव में लगा था। तभी भावना उसका खाना ले आई।
उसने खाना टेबल पर रख दिया। आलू बैंगन की सब्जी के साथ गरमा गरम फुल्के देख राजेंद्र की भूख जाग गई।
सुबह भावना जब घर से निकली उसके बाद से राजेंद्र ने कुछ खाया ही नहीं था । भावना जो चाय पिला कर गई थी, बस उसी चाय के बाद से उसने कुछ नहीं लिया था। अपने विचारों में खोए हुए जाने उसे कब नींद लग गई थी। और उसकी नींद भावना के फोन से ही टूटी थी।
भावना के पास आने से पहले उसने फोन पर अमित को यह सूचना दे दी थी कि वह आज अस्पताल नहीं आ पाएगा। सामने परोसी गरमा गरम थाली उसकी भूख जगा गई। वह रोटियां खाने लगा। उसने दो रोटी खत्म करने के बाद भावना की तरफ देखा ?
“और चाहिए..?” भावना के पूछने पर उसने ना में गदर्न हिला दी.. लेकिन भावना समझ गयी की उसे और चाहिए..
“अरे डाक साब, हम मजाक कर रहे थे। आपके लिए ढेर सारी रोटियां बना कर रखी है हमने।”
और भावना हल्का सा मुस्कुरा कर रसोई में चली गई। उसके जाते ही राजेंद्र के चेहरे पर भी मुस्कान आते आते रह गई। भावना रसोई से रोटी का डब्बा बाहर ले आई और वापस दो फुल्के उसने राजेंद्र की थाली में परोस दी..
“आप निश्चिन्त होकर खाइये, हमें पता है आपको गर्म रोटियां पसंद हैं.. !
अपनी मुस्कान छुपाने का भरसक प्रयास करते हुए राजेंद्र खाने लगा और उसे इतनी तृप्ति से खाते देखकर भावना भी अपनी भूख भूल कर उसे प्रेम से खिलाने लगी..
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कुसुम और यज्ञ दूर्वागंज से निकल गए थे।
कुसुम अपना हाथ बंधे यज्ञ की बगल वाली सीट में अकड़ कर बैठी थी। और यज्ञ उसकी अकड़ देखकर अपनी हंसी छुपाने की कोशिश कर रहा था।
गाड़ी चलाते हुए वह कुछ गुनगुनाता जा रहा था, गुनगुनाते हुए उसने अपने मोबाइल से गाड़ी के सिस्टम को कनेक्ट किया और अपनी पसंद का गाना गाड़ी में बजा दिया
कहते डरती हो दिल में मरती हो,
जानेमन तुम कमाल करती हो।
जानेमन तुम कमाल करती हो
आँखों आँखों में मुस्कुराती हो,
बातों बातों में दिल लुभाती हो
नरम सांसों की गर्म लहरो से
दिल के तारो को गुदगुदाती हो,
अरे इन सब बातों का मतलब पूछे तो
रंग चेहरे का लाल करती हो
जानेमन तुम कमाल करती हो।।
चुप भी रहिए ये क्या क़यामत है,
आप की भी अजीब आदत है,
इतना हंगामा किसलिए आखिर
प्यार है या कोई मुसीबत है…
जब भी मिलते हो जाने तुम क्या-क्या
उलटे-सीधे सवाल करते हो?
जानेमन तुम कमाल करते हो।
क्रमशः
aparna
