अपराजिता -82
यज्ञ को देखने के बाद कुसुम भीतर चली गयी…. अपने कमरे में बैठी वो इस बात का इंतज़ार करने लगी की कब उसे बुलाया जायेगा..
समय बीत रहा था लेकिन घऱ का कोई सदस्य कुसुम को बुलाने नही आ रहा था..!
हद है, ये घर के लोग भी पागल हो गए है…!
ना ससुराल वालो को ही उसकी चिंता है, ना मायके वालो को..।
अरे कोई नीचे तो बुला लो..। जिससे वो अपनी शान में नीचे जा सके, ये क्या तरीका है कि अब तक आवाज़ भी नही लगाई उसे..।
अब ऐसे ही मुहं उठाये चला जाना भी तो अच्छा नही लगता…।
घऱ के भी सारे सदस्य बावले हो गए हैं.. अरे कुसुम कुमारी हैं हम, हमारी भी इज्जत है..।
वो खुद में बातें करती अपने कमरे में यहाँ से वहाँ हो रही थी कि दरवाज़े पर आहट सी हुई…।
उसे लगा सुजाता उसे बुलाने चली आयी….
वो खुद को संभाल कर खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गयी….
दरवाज़ा हल्का सा खुला और किसी के अंदर आने की आहट भर हुई….
लेकिन फिर सब शांत हो गया…
कुसुम को ये शांति खाये जा रही थी…. अरे जो बोलना है घऱ वाले जल्दी बोल कर काम ख़त्म क्यों नही करते..?इतना रहस्य रचने की क्या ज़रूरत है ?
जब कुछ पांच मिनट और बीत गए, तब कुसुम ही बोल पड़ी..
“क्या हुआ भाभी ? कुछ काम था क्या हमसे ?”
उसे लगा सुजाता उसे बुलाने आयी है..
“हाय ये भोलेपन की एक्टिंग !”
यज्ञ की आवाज़ कानो में पड़ते ही कुसुम चौंक गयी.. उसका दिल धक से रह गया..।
ये यहाँ क्या कर रहे? सीधा ऊपर ही चले आये..? अब मुड़ना तो पड़ेगा ही सोच कर कुसुम पीछे पलट गयी..
सामने यज्ञ खड़ा था..
“उफ़ क्या एक्टिंग करती हैं आप कुसुम कुमारी जी ? मतलब अगर ऑस्कर वालो की नजर पड़ जाये ना तो आपको उठाकर सीधा हॉलीवुड ले जायेंगे..।”
कुसुम के माथे बल पड़ गए..
“क्या कह रहे हैं आप. हमे समझा नहीं !”
“हाय, इतना भोलअपन कहाँ से ले आती है आप?जबकि भोले का ‘भ’ भी आपको देख कर सात समंदर पार चला जाता है..।”
“कहना क्या चाह्ते हैं आप, साफ़ कहिये। हमे ये आपका बातों को गोल गोल घूमाना पसंद नही …. ।”
“कायदे से तो हम ही पसंद नही है.. तो हमारी कोई भी बात पसंद क्यों आएगी.. ?”
कुसुम ने कुछ नही कहा..
“हमे झांक कर देख चुकी थी आप.. और आपकी आँखों में सौ वाट के बिजली के लट्टू भी चमकते दिखायी दिए थे हमे, जब आपने हमारा दीदार किया.. ।”
पल भर को कुसुम जीभ काट कर रह गयी..
“ओह बड़े आये.. इनका दीदार करेंगे, वो भी हम.. ? सवाल ही नही उठता..!”
“तो सवाल उठाइए, क्यूंकि हम हैं दीदार करने लायक ! अब वो तो आप अपनी अंखियों में मोतियाबिंद पाले बैठी है, तो हम क्या करे…?”
“बकवास !”
“जो सुनने के लिए मरी जा रही थी.. है ना ?”
“पगला गए हैं क्या ? हमारे पास बात करने के लिए लोग भरे पड़े हैं। हम काहे आपकी बकवास सुनने के लिए मरेंगे…।”
“ये हमसे नही खुद से पूछ कर देखिएगा.. वो भी अकेले में..।
क्यूंकि हमको याद तो बहुत कर रही थी आप..। कसम से गज़ब हिचकी आ रही थी और आप ही का नाम लेने पर रूकती थी कम्बख्त।”
कुसुम एकदम से कुछ कह नही पायी लेकिन पलट कर जवाब तो उसे देना ही था..।
क्या बोले यही सोच रही थी की सुजाता नौकर के साथ नाश्ते की प्लेट्स लिए चली आयी..
टेबल पर सारा नाश्ता सजा कर सुजाता ने बड़े प्यार से यज्ञ को खाने का न्योता दे दिया..
“आइये कुंवर सा थोड़ा जलपान कर लीजिये… !!
“आइये आप भी कुछ खा लीजिये, वैसे लगता है हमारे नही रहने पर आपकी नन्द रानी ने ठीक से कुछ खाया पिया नही है.. कैसे मुरझाई सी लग रही है !”
यज्ञ ने वापस कुसुम को छेड़ दिया..
“नही ऐसा तो कुछ नही है… !” कुसुम ने चिढ कर जवाब दिया, लेकिन तभी सुजाता मुस्कुरा उठी..
“अब देखिये ना समय भी कैसा ख़राब था कि इनके आने पर भी इन पर कोई ध्यान ही नही दे पाया…।
हम सब अपनी उलझनों में उलझे रहे.. ।
वरना क्या ऐसे सूखे सूखे अपनी नंद रानी को उसके मायके से विदा कर देते..?
बेचारी पांच दिन हो गया लेकिन एक दिन भी इन्हें शहर ले जाकर ढंग से ना खरीदारी कर पाये, ना नए गहने दिलवा पाए..।
यहां तक कि उनकी पसंद की मछली भी नहीं बन पाई! क्या करें, इनके आने के अगले दिन ही इनके भाई साहब की छुट्टी हो गई..।
बस जिस दिन से इनके भाई साहब घर पधारे हैं, पूरा परिवार उनकी तीमारदारी में लग गया। हमारी प्यारी नंद रानी ऐसे ही बैठे रह गई। इसलिए तो इन्हें अपने ससुराल की भी बड़ी याद आने लगी थी। जब बैठकर बात करती ससुराल के बारे में ही बताती थी..।”
सुजाता अपनी लय में बोली चली जा रही थी और कुसुम का जी जला जा रहा था। वह नहीं चाहती थी कि उसके हृदय की कमजोरी इस तरह यज्ञ के सामने आ जाए..
” बस बस भाभी आप भी कुछ भी बोलती हैं। हम अपने घर आए हैं, अपने घर में किसी औपचारिकता की जरूरत नहीं है। और हमें तो खुद शहर जाने का मन ही नहीं था..!”
सुजाता ने बड़े लाड से अपनी नंद की तरफ देखा और उसके बालों पर हाथ फेर कर उसके चेहरे को खुद से टीका लिया..
” एक बात तो माननी पड़ेगी कुंवर सा! बेटियां शादी के तुरंत बाद बहुत समझदार हो जाती है। देखिए घर बदले चार दिन नहीं हुआ और हमारी नंद रानी की धुआंधार फटकार सब काम हो गई।
आदतें भी बदल गई है इनकी, पहले कभी खाने में बिना मछली के इनका गस्सा नहीं टूटता था..।
हरी साग भाजी से यह दूर भागती थी। मुश्किल से गोभी ही कभी कबार खाती थी, वरना इन्हें रोज या तो चिकन या मछली चाहिए। और अभी देखें तीन दिन से जो बन रहा है, जैसा बन रहा है, चुपचाप निगल लेती है।
एक दिन भी कुछ नहीं बोला।
सच में हम लड़कियों का जीवन ही अजीब होता है। हमें खुद नहीं पता चलता कि कब हम ससुराल के रंग में रंग गए हैं..।”
“जितना आप तारीफ कर रही है ना, हम उतना भी नहीं रंगे हैं भाभी..।”
कुसुम ने सुजाता को घूर कर कहा और नज़रें चुराकर यज्ञ की तरफ देखने लगी।
यज्ञ उसे देख मुस्कुरा रहा था..
“भाभी साहब अब आज्ञा दीजिए। हम आपकी नंद रानी को लेकर निकलते हैं। वरना घर पहुंचने में देर हो जाएगी..।
हम तीन दिन का कह कर घर से निकले थे, लेकिन काम इतना बढ़ गया था कि दो दिन और रुकना पड़ गया..।”
यज्ञ भले ही सुजाता की तरफ देखकर बोल रहा था, लेकिन वह सुना कुसुम को ही रहा था। कुसुम चुपचाप उठी और अपना बैग निकालकर सामने कर लिया..
यज्ञ ने कुसुम का बैग देखा और हल्के से मुस्करा उठा..
” बैग वैग बिल्कुल तैयार करके बैठी थी आप..क्या बात है..? मतलब अगर आज हम लेने नहीं आते तो लगता है आप मायके की गाड़ी में ही ससुराल चली आती..!”
” जी नहीं हम तो आज भी नहीं जाना चाहते, लेकिन क्या करें जाना तो पड़ेगा ही। आखिर कब तक मायके में रह सकते हैं..।”
” अच्छा तो मतलब हमसे अलग होने का विचार त्याग दिया आपने? हमें तो लगा था कि आप कुछ दिन में हमें छोड़कर अपने घर चली आएंगी, फिर हमें तलाक के कागज भेज देंगी और हमसे तलाक लेने के बाद वह क्या नाम था जिससे आप..
” बस आप चुप रहेंगे कुछ ज्यादा ही बोल रहे हैं..।”
” बस इसी बोलने से ही तो कमाते हैं हम.. खैर चलिए..।”
उन दोनों की बातों के बीच सुजाता पहले ही नीचे उतरकर कुसुम की विदाई की तैयारी में लग गई थी। कुछ देर में ही यज्ञ और कुसुम भी नीचे उतर कर चले आए। उनके पीछे घर का नौकर कुसुम का सामान लिये चला आया।
ढेर सारे साजो समान के साथ एक बार फिर ठाकुर परिवार की लाडली अपने ससुराल के लिए विदा हो गई। जाने से पहले वह एक बार चंद्रा भैया के पास चली आई..
” हम जा रहे हैं भैया, आपकी जिद को मुकम्मल करने। लेकिन जाने से पहले आपको बता देना चाहते हैं कि आपका ऑपरेशन किसने किया है..।”
चंद्रा आँखे फाडे कुसुम को देख रहा था..
” आपका ऑपरेशन उन्ही डॉक्टर राजेंद्र कुमार ने किया है जिनके हाथ पैर तोड़ने में आप कभी भी नहीं चूके। भैया आपने हमारे साथ सही किया या गलत किया, यह अभी आपको समझ नहीं आएगा।
हम तो फिर भी आपकी बहन है, इसलिए मान लिया कि हम पर आपका हक था। डॉक्टर साहब की जिंदगी आपने बदल कर रख दी। और उस बात का आपको बिल्कुल हक नहीं था।
डॉक्टर साहब के साथ जितना गलत कर सकते थे आपने किया। बावजूद उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। और तब भी आप जात पात को इतना मानते हैं।
उन्होंने तो नहीं सोचा कि आप ठाकुर है तो आपको नहीं बचाना चाहिए ।
उन्हें सिर्फ अपनी जात के लोगों को ही बचाना चाहिए। एक तरह से तो वह आपकी जात से कहीं ऊपर उठ गए। ऐसा नहीं लगता आपको ?
अभी आपके पास बहुत वक्त है, बिस्तर पर पड़े पड़े सोचकर देखिएगा।
वैसे हम सच कहें तो, आपको ऐसे देखा नहीं पा रहे हैं। हम चाहते हैं कि हमारा भाई एक बार फिर वैसा ही हो जाए जैसे हमारी पहली विदाई के समय था। हमारी बातों के लिए हमें माफ कर देना भैया, लेकिन हम इस बात को छुपा कर अपने मन में नहीं रख पाए…।”
कुसुम की आंखें झिलमिलाने लगी थी। अपने आंसुओं को पोंछ कर वह कमरे से बाहर निकल गई। कमरे के दरवाजे के ठीक बाहर खड़ा यज्ञ भी सब कुछ सुन रहा था। कुछ पलों के लिए वह भी गहरी सोच में डूब गया और फिर धीमे कदमों से चंद्रा भैया के कमरे में दाखिल होकर उसने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए…।
” अपना ध्यान रखिएगा भाई साहब और अपनी लाडली बहन की तरफ से निश्चित रहिएगा, अब वह सुरक्षित हाथों में है। और उनकी सुरक्षा और साज संभाल की जिम्मेदारी हम पर है..।”
चंद्रा गुमसुम सी नजरों से यज्ञ को देख रहा था। यज्ञ ने उससे इजाजत ली और बाहर निकल गया।
यज्ञ और कुसुम अपनी गाड़ी में बैठकर अपने गांव के लिए निकल गए..
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रेशम का अस्पताल अच्छा चलने लगा था।
आसपास के ही नहीं बल्कि दूर दराज के गांव के मरीज भी रेशम के पास आने लगे थे। राजेंद्र के खाली करके जाने के बाद से अस्पताल सुनसान पड़ा था। मरीज आते और डॉक्टर को अनुपस्थित देखकर वापस लौट जाते।
लेकिन जब से रेशम बैठने लगी थी मरीजों की आवाजाही भी बढ़ने लगी थी म।
रेशम बहुत अच्छे से ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दे रही थी। उसके मरीजो मे महिलाओं की संख्या ही ज्यादा थी…।
दुर्गागंज से लगा एक और गांव था जलसो..
सबसे ज्यादा संख्या में जलसों गांव की औरतें ही रेशम के पास चिकित्सा के लिए आया करती थी..।
ज्यादातर औरतों के शरीर में चोट के निशान हुआ करते थे ।
शुरुआत में यह औरतें ज्यादातर यही बताया करती कि काम करते हुए फिसल कर गिर गई, इसलिए चोट लग गई या खाना बनाते हुए जल गई।
लेकिन धीरे-धीरे इनकी संख्या में बढ़ोतरी हो रही थी। और रेशम को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि इस सब के पीछे का कारण क्या है?
आखिर एक दिन जब कुछ महिलाओं की चिकित्सा करने के बाद उसने उन लोगों को भेज दिया तब दूर्वागंज की ही दो-तीन महिलाएं उन औरतों के बारे में रेशम को बताने लगी..
” अरे डॉक्टर दीदी, जलसों गांव में देसी शराब दुकान का ठेका है। वहां के सारे मर्द दिन रात शराब पीकर उसी के नशे में धुत रहते हैं। और अगर घरवाली मना करें तो उसे कूट पीट देते हैं, बस इसीलिए यह महिलाएं यहां पर आपके पास दवा लेने आती हैं..।”
यह सुनकर रेशम को बहुत बुरा लगा…इसके बाद उन महिलाओं के आने पर जरा जोर देकर पूछने पर उन लोगों ने भी रेशम को सब कुछ बता दिया।
रेशम ने उन लोगों को अपनी बातचीत से समझाया और उस गांव से शराब के ठेके को बंद करवाने के लिए एक आवेदन तैयार किया। और उसमें उन सारी महिलाओं के दस्तखत लेने के बाद शहर के कलेक्टर के पास ज्ञापन भेज दिया..।
कुछ दिन बाद ही कलेक्टर और उनकी टीम जलसो गांव का दौरा करने आई, और शराब के ठेके पर कुछ समय के लिए ताला डालकर चली गई। कलेक्टर और उनकी टीम वहां के बारे में जांच कर रही थी ।
यह सब बातें जब उस गांव के आदमियों को पता चली तो वह मन ही मन रेशम से नाराज हो गए। सीधे तौर पर वह लोग रेशम के खिलाफ खड़े नहीं हो सकते थे। इसलिए अलग-अलग तरीकों से उन्होंने रेशम को परेशान करना शुरू किया।
एक सुबह जब रेशम अपनी डिस्पेंसरी में बैठी मरीज देख रही थी। तब उसके कमरे की खिड़की पर किसी ने पत्थर फेंका और भाग गया।
भाग्य की बात थी कि वह पत्थर ना ही रेशम को लगा और ना ही उस मरीज को…
यह वही दिन था जब रेशम चंद्रभान को अस्पताल में भर्ती करवा कर लौट चुकी थी। उसके अगले दिन अखंड को मालूम चल चुका था कि रेशम दूर्वागंज में काम कर रही है..
इत्तेफाक से एक किसान अपने कुछ खेत अखंड के पास रेहन रखना चाहता था और इसके लिए उसने अखंड को दूर्वागंज बुलवाया था।
अखंड रेशम की डिस्पेंसरी के सामने से होकर गुजर रहा था और तब उसने पत्थर मार कर भागते उस युवक को देख लिया था। अखंड ने अपनी गाड़ी में उस आदमी का पीछा किया, लेकिन वह गायब हो गया। अखंड को यह सब कुछ सही नहीं लगा। उस किसान से बात करके आने के बाद वह कुछ देर तक डिस्पेंसरी के बाहर खड़ा रहा और फिर मानौर लौट गया। अगले दिन अखंड एक बार फिर दूर्वागंज पहुंच गया…
इस बार दो लड़के डिस्पेंसरी में दाखिल होते दिखे.. उन्हेँ देख कर ही अखंड को लगा कि इन्हे दवाओं की ज़रूरत नही है, ये सिर्फ रेशम को परेशान करने घुस रहे हैं..।
अखंड ने तुरंत अपने साथ आये ड्राइवर को भी दवा लेने के बहाने अंदर भेज दिया, और खुद बाहर खड़ा उन लोगो के बाहर आने का रास्ता देखने लगा…
उसी समय वहाँ से गुजरती कुसुम कुमारी ने अपने जेठ को मय गाड़ी वहाँ खड़ा पाया और अपने माथे पर ज़ोर डालती अपने घर चली गयी..
क्रमशः
aparna…
