अपराजिता -80

अपराजिता -80

मोबाइल में मैसेज देखने के बाद चोर नजरों से राजेंद्र की तरफ भावना ने देखा। राजेंद्र का ध्यान मोबाइल पर नहीं था। उसकी आंखें बंद थी और बंद आंखों पर उसने अपना एक हाथ रखा हुआ था..।

“सो गए क्या?”

भावना ने धीरे से पूछा और राजेंद्र ने हम्म कह दिया!

“यह थोड़े से सेब और खा लेते आप..!”

“अभी नहीं खाया जाएगा भावना ! थोड़ा आराम करना चाहता हूं, नींद सी आ रही है..!”

“ठीक है!” बोलकर भावना ने अपना सारा ताम-झाम समेटा और कमरे से बाहर निकल गई..

उसी वक्त राजेंद्र का मोबाइल बजने लगा.. जाने किसका फोन आ गया है, राजेंद्र की कच्ची सी नींद कहीं टूट न जाए यह सोचकर भावना लपक कर कमरे में दाखिल हुई, और उसने तुरंत फोन उठा लिया फोन राजेंद्र के दोस्त का था..

“भाभी जी… राजी कैसा है अब..?”

“ठीक है ! पहले से काफी आराम है, अब बुखार भी नही आ रहा !”

” बढ़िया है..
  अच्छा सुनिए आज शाम ग्रैंड लोटस में आपके और राजी की शादी की खुशी में हम कुछ दोस्तों ने मिलकर एक छोटी सी पार्टी रखी है..
एक तरह से आपका स्वागत करने के लिए, आपको और राजी को आना ही है..!”

“लेकिन भैया उनकी तबीयत अभी इतनी तो नहीं सुधरी कि हम आ सके..!”

“राजी से सुबह फोन में बात हो चुकी है, उसे पूछने के बाद ही प्लान किया था! और उसने हां बोला था। अभी तो मैंने बस आपको बताने के लिए कॉल किया था। आप तैयार हो जाइएगा। मैं गाड़ी लेकर आऊंगा,आप दोनों को लेने के लिए।
ठीक सात बजे रेडी रहिएगा भाभी..!”

“लेकिन हम वहाँ किसी को नहीं जानते। हम क्या करेंगे आकर? आप इन्हें लेकर जाइएगा। आप सारे दोस्त मिलकर पार्टी कर लीजिएगा।”

“भाभी जी पार्टी आपके लिए रखी जा रही है। आपका वेलकम करने के लिए।
समझती है ना, तो आपका स्वागत के लिए आपके बिना पार्टी कैसे कर लेंगे…।”

भावना ने हां बोल कर फोन रख दिया।

उसके हाथ में फोन था और एक बार फिर कुसुम का मैसेज सामने नजर आने लगा।

कुसुम का मैसेज था- ” क्या हुआ आपने हमारा मैसेज देखने के बाद भी कोई जवाब नहीं दिया ? “

भावना से रहा नहीं गया और उसने जवाब लिख दिया..

“जवाब देने लायक अब कुछ बचा नहीं हमारे बीच !”

लेकिन फिर कुछ सोच कर भावना ने उस मैसेज को डिलीट कर दिया। उसे लगा आज नहीं तो कल डॉक्टर साहब अपना फोन देखेंगे ही और हो सकता है कि वह अब भी कुसुम से प्यार करते हो। यह भी हो सकता है कि कुसुम अगर उन्हें मैसेज कर रही है, तो वह कुछ अलग ढंग से कुसुम को जवाब देते।

भावना तो कुसुम की दोस्त के तौर पर उसे गलत रास्ते पर जाने से रोकना चाहती है। लेकिन अगर कुसुम और डॉक्टर साहब अब भी एक दूसरे में अपना भविष्य देखते हैं तो वह कौन होती है उन दोनों के बीच में आने वाली।
यह सोचकर उसने मोबाइल ले जाकर वापस राजेंद्र के सिरहाने रखा और शाम को क्या पहनना है, यह देखने बाहर निकल गई।
अलमारी खोलकर उसने संदूक बाहर निकाल लिया…

उसकी मां भी उसके कुछ कपड़े लेकर आई थी। लेकिन उसके यह सारे कपड़े उसकी शादी के पहले के थे। पुराने हल्के रंगों के सलवार कुर्ते।
बिल्कुल साधारण कपड़े। उनमें ऐसा कुछ भी नहीं था, जो वह शाम की पार्टी के लिए पहन सके।
बाहर पहन कर जाने के लायक एकमात्र वही लहंगा था जिसमें उसका और राजेंद्र का ब्याह हुआ था…
उस लहंगे को उसने तह करके अलमारी में कहीं बहुत नीचे डाल दिया था! और वह लहंगा ऐसा भी नहीं था कि दोस्तों की साथ जाने वाले एक साधारण से डिनर में उसे पहना जाए।

कुछ सोच कर भावना ने अपना एक गुलाबी कुर्ता निकाला और उसे ही शाम के लिए सहेज कर रख लिया।

ये सब निपटा कर वो बाहर पड़े गद्दे पर लेट गयी..

पिछली दो रातों से राजी के बुखार के कारण वो उसे  छोड़ कर अपने कमरे में जाकर सो नही पायी थी.. बुखार वैसा तेज़ नही था लेकिन राजेंद्र पर बुखार का अलग ही असर होता था..
ज्वर माथे पर चढ़ने पर वो प्रलाप करने लगता था..
उसके साथ बचपन से ही ऐसा होता था.. बुखार में उसे छत खुद पर गिरती दिखने लगती थी..
दोनों तरफ की दीवारे खुद पर सिमटती नजर आती थी और वो रात भर डर डर कर चौंकता रहता था…

इसलिए भावना उसके सिरहाने ही बैठ कर रात गुज़ार गयी थी.. जब राजेंद्र को नींद लग जाती वो भी दीवार से टिकी आंखे बंद कर झपकी ले लेती और जैसे ही राजेंद्र का बड़बड़ाना शुरू होता वो कभी उसके माथे को सहला कर तो कभी उसकी हथेली को थाम कर उसे सांत्वना देती उसे संभालने लगती..

पूरी दो राते उसकी ऐसे ही आँखों आँखों में कट गयी थी…

और अब उसे थकान सी लगने लगी थी.. इतना काम करने की उसकी भी आदत नही थी. घर पर वो माँ की मदद बस कर दिया करती थी ।
लेकिन इस इतने बड़े घऱ की साफसफाई, खाना बनाना, बर्तन साफ करना, उसके हिस्से बहुत काम पड़ गया था..।
गद्दे पर लेटे लेटे वो यही सोच रही थी कि क्या कुसुम राजेंद्र से शादी कर यहाँ आती तब इसी तरह घऱ का काम कर पाती..?
लेकिन दूसरे ही पल उसके दिमाग में यह विचार चला आया कि अगर कुसुम यहां शादी करके आती तो राजेंद्र उससे इतना काम ही नहीं करवाता। वह तुरंत एक काम वाली बाई रख देता।
लेकिन उसके लिए राजेंद्र के दिमाग में यह ख्याल थोड़ी ना आएगा कि उसे एक कामवाली बाई रख देनी चाहिए। और वैसे भी उसकी मां भी तो घर का हर काम खुद करती थी तो, घर का काम करने में कैसी हुज्जत?
    आज आदत नहीं है, लेकिन कल आदत हो जाएगी।

यह विचार आते ही वह पल भर के लिए सोच में पड़ गई क्यों आदत हो जाएगी। उसे हमेशा के लिए राजेंद्र के घर पर थोड़े ना रहना है?
कल को जब उनकी शादी की मियाद पूरी होगी तो वह उसे छोड़कर अपने घर चली ही जाएगी।

   और निनाद?
वह कहां होगा? क्या कर रहा होगा?
सोचती सोचती भावना की आंखें लग गई…

भावना को लगा जैसे कोई उसे आवाज दे रहा है! उसने धीरे से आंखें खोली। सामने राजेंद्र बैठा था। वह झटपट उठकर बैठ गई।
इधर-उधर ढूंढा और एक तरफ पड़े अपने दुपट्टे को उठाकर उसने खुद को अच्छे से ढक लिया।

राजेंद्र वहीं जमीन पर आलथी पालथी बनाकर बैठा था..सामने ही दो कप चाय रखी थी..

भावना ने चाय देखी और राजेंद्र की तरफ देखने लगी..

” आपने क्यों बनाई, चाय हम बना लेते.. हमें उठा देना था ना !”

” दो दिन से सारा वक्त सिर्फ काम कर रही हो, तुम्हे आराम करने की भी फुर्सत नहीं मिली, इसलिए सोचा चाय मैं बना लेता हूं।
पी कर देखो,कैसी बनी है, वैसे मुझे चाय बनानी आती नहीं है..!”

भावना ने चुपचाप चाय का कप उठा लिया..चाय  सामान्य ही बनी थी। लेकिन बाकी दो दिन के इतने काम के बाद शाम को नींद से उठने पर हाथ में चाय मिल गई यही उसे सुकून सा लग रहा था।
वह चुपचाप चाय पी रही थी। राजेंद्र भी सामने बैठा चुपचाप चाय पी रहा था।
दोनों अपने ख्यालों में ग़ुम थे की तभी भावना के कानों में धीमी सी आवाज पड़ी….

“शाम में दोस्तों ने पार्टी रख ली है.. मैंने काफी मन किया लेकिन वह लोग सुनने को तैयार नहीं थे। और इसलिए हां बोलना पड़ा। थोड़ी देर के लिए चलेंगे बस, जल्दी वापस आ जाएंगे..।”

“हम्म.. !”

फिर ना राजेंद्र ने कुछ पूछा ना भावना ने कुछ कहा।
चाय पीकर राजेंद्र वापस अपने कमरे में चला आया। अपना लैपटॉप खोलकर वह कुछ पढ़ने लगा। भावना भी चुपचाप कमरे की बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। यह राजेंद्र का सरकारी निवास था। आसपास और भी सरकारी क्वार्टर बने हुए थे। जिनमें डॉक्टर्स की फैमिली रहा करती थी।
उनके फ्लैट के ठीक नीचे वाले फ्लैट में भी एक डॉक्टर दंपति रहा करते थे। जहां डॉक्टर साहब की मां भी साथ ही रहती थी। भावना की बालकनी से नीचे उनका गार्डन नजर आ रहा था, और इस वक्त वह अपने गार्डन में बैठी हुई थी। उन्होंने ऊपर भावना को देखा और मुस्कुरा कर हाथ हिला दिया भावना ने भी औपचारिकतावश उनके सामने हाथ जोड़ दिए..
वहीं से उन्होंने भावना को आशीर्वाद देते हुए घर आने का न्योता दे डाला, भावना ने भी हामी भर दी..

  शादी कब हुई ?कहां की रहने वाली हो ?राजेंद्र ने तो हमें बुलाया ही नहीं। कभी तुम ही अपने घर बुला लेना। आदि इत्यादि सवालों की झड़ी लगा दी आंटी जी ने।
और भावना अपने हिसाब से उनकी बातों का जवाब देती रही।
कुछ देर वहां खड़े रहने के बाद भावना को समझ आ गया कि उसे अंदर चले जाना चाहिए, वरना यह आंटी उसकी जन्मकुंडली निकाल रहेंगी और इसलिए उनसे इजाजत लेकर वह अंदर चली गई..!

शाम ढलने लगी थी। भावना ने सोचा उसे तैयार हो जाना चाहिए, क्योंकि सात बजे उन लोगों को लेने के लिए डॉक्टर साहब का दोस्त हाजिर हो जाएगा। हाथ मुंह धोकर उसने कपड़े बदले और बालों को संवारने लगी कुछ देर में ही उसके कमरे के बाहर से राजेंद्र ने उसे आवाज लगा दी..

” तैयार हो गई हो क्या ?”

भावना दरवाजा खोलकर बाहर चली आई। राजेंद्र ने पहले तो उसकी तरफ देखा नहीं और आगे बढ़ गया लेकिन आगे बढ़ते ही वह ठिठक कर रुका और पीछे मुड़कर उसे एक नजर देखने के बाद वापस सामने मुड़ गया..

” और कोई ड्रेस है तुम्हारे पास पहनने के लिए..?”

” यह बुरी लग रही है क्या?”

” नहीं बुरी तो नहीं है, लेकिन वहां पर कुछ दोस्तों की बीवियां भी आ सकती हैं। उनके सामने बहुत ज्यादा सोबर लगेगा… एक मिनट रुको.. !”

राजेंद्र अपने कमरे में गया और कुछ देर में ही एक साड़ी का बॉक्स लेकर वापस चला आया। उसने वह साड़ी भावना के हाथ में रख दी..

“ये देख लो.. सही लगे तो इसे ही पहन लेना !”

भावना साड़ी का पैकेट लिए अंदर कमरे में चली गई।

उसने अंदर जाकर दरवाजा बंद किया और अपने माथे पर हाथ मार लिया।

   ” वाह रे डॉक्टर साहब! साड़ी पहनने के लिए उसके साथ पेटिकोट और ब्लाउज भी लगता है। साड़ी का डिब्बा लाकर पकड़ा दिए। अब कैसे पहने इस साड़ी को? उसने बडबडाते हुए धीरे से डिब्बा खोल दिया ऊपर बहुत सुंदर वाइन रेड साड़ी रखी थी.. ।
इस साडी का क्या अचार धरूँ.. ना पेटीकोट ना ब्लॉउस !
ये कहते हुए उसने साड़ी उठायी और उसके नीचे पेटीकोट नजर आ गया..।
उसे हटाने पर डिज़ाइनर ब्लॉउस रखा था…।
बिना बाँहों के वेलवेट के डिज़ायनर बेकलेस ब्लॉउस को देख भावना खुद शरमा गयी..
  छी, इसे कैसे पहन कर निकलेगी..वो भी डॉक्टर साहब के सामने..?
पर अब जो भी हो, पहनना तो यही पड़ेगा..
ज़रूर ये साड़ी वो कुसुम के लिए बतौर तोहफा लाये होंगे..

भावना का मन खाली सा हो गया…

इस साड़ी में डॉक्टर साहब अपनी कुसुम को देखना चाह्ते थे, लेकिन किस्मत ने उनके सामने खड़ी कर दी भावना..
भावना साड़ी बदल कर तैयार हुई और आईने में पल भर को खुद का चेहरा देख कर चौंक गयी.. सिर्फ साड़ी की आभा चेहरे पर पड़ने से ही कैसे उसका गुलाबी रंग और निखर सा गया था..
ना उसने बिंदी लगायी थी ना माथे पर सिंदूर था फिर भी चेहरा दमक रहा था..।

उसने अपना पर्स खोला.. उसमे शादी वाले दिन का काजल और लिपस्टिक पड़ी थी.. ये भी उसे कुसुम ने ही पर्स में रखने बोला था..
सूट पर लिपस्टिक की ज़रूरत भी नही पड़ रही थी। लेकिन साड़ी में बिना काजल लिपस्टिक के कुछ अधूरा सा लग रहा था.. उसने आँखों में काजल भरा और हलकी सी लिपस्टिक लगा ली..

उसके कमरे में छोटा सा जो आईना था उसी में अपना चेहरा देख कर वो शरमा गयी..

साड़ी का आंचल उसने फैला कर ही लिया था, उस फैले हुए आंचल को उसने अपनी खुली हुई दूसरी बाजु पर लपेट लिया.. जिससे अनावश्यक रूप से उसकी बाहें नजर ना आये..

“जल्दी कर लो.. अमित आ गया है !”

खुद को कैसे छुपाऊं सोचती भावना को राजेंद्र की आवाज़ ने झकझोर दिया..

ब्लॉउस जरा ज्यादा ही खुला था,उसलिए बाल खोल कर उसने पीठ पर डाल लिए और अपना पर्स टांग कर बाहर निकल आयी..

डॉक्टर साहब ने उड़ती सी नजर उस पर डाली और बाहर निकल गए..
वो भी चुपचाप बाहर चली आयी..
बाहर इंतज़ार करता राजेंद्र का दोस्त भावना को देख चलने के लिए खड़ा हो गया..

“बहुत अच्छी लग रही है आप भाभी !” उसने प्रशंसात्मक दृष्टी से भावना को देखा और वो वापस झेंप गयी.. यही तो उसकी सबसे बड़ी समस्या थी.. कोई सरे आम उसकी तारीफ कर दे या बुराई, उसके बाद बदले में अपनी प्रशंसा का अर्ध्य लेने की जग़ह वो उसी में डूब मरती थी..।

उसे अपने बात बात पर झेंप जाने से ही सबसे बड़ी झेंप थी.. ।

कुसुम उसका सार्थकार्ध थी..।
यानी जो जो कमियां भावना में थी उन्हेँ कुसुम अपनी संगति से पूरा कर जाती थी..
अभी अगर कुसुम साथ होती तो चट कोई जवाब दे देती लेकिन भावना के मुहं से सामान्य सा आभार प्रदर्शन भी नही हो पाया..।

वो लोग होटल पहुँच गए..
जैसा राजेंद्र के दोस्त ने बताया था वैसी छोटी पार्टी भी नही थी ये.. होटल ही इतना शानदार था कि भावना की ऑंखें चौड़ी हो गयीं..

अंदर दाखिल होते ही चौड़े आदमकद आईने लगे थे.. जिनमे खुद को देख भावना देखती ही रह गयी.. वो वाकई अप्रतिम सुन्दरी लग रही थी..
सुघड़ नयननक्श और सांचे में ढली उसकी आकृति..

राजेंद्र और भावना के वहाँ पहुँचते ही एकदम से बारह पन्द्रह लोग उन लोगो की तरफ चले आये.. एक पर एक फूलों के गुलदस्तों से उन लोगों ने भावना को पाट दिया.. कुछ एक महिलाएं भी थी….।

राजेंद्र के वो दोस्त जो शादीशुदा थे, अपनी डॉक्टर बीवियों के साथ आये थे। एक सीनियर डॉक्टर थे  जिनकी बीवी डॉक्टर नही थी, और एक आध कुंवारी डाक्टरनी भी मौजूद थी..
गुलदस्ते थामने के चक्कर में साड़ी का रेशमी पल्लू बांह से सरक कर नीचे चला गया और भावना उसे ठीक करने का प्रयास करने लगी..
राजेंद्र धीरे से उसके कान के पास चला आया..

“कुछ बुरा नही लग रहा, ऐसे ही रहने दो.. !”

भावना का गला सूख गया, कान की लोरियां जल गयी.. … और राजेंद्र बोल कर वहाँ से अपने दोस्तों के साथ चला गया.. !

भावना को बधाइयाँ देकर राजेंद्र के दोस्त उसे साथ लिए पीने पिलाने खिसक लिए और औरतों ने भावना को घेर लिया..

सभी उससे बड़े प्रेम से पेश आ रही थी.. हर कोई उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जान लेना चाहता था..।

“सो भावना.. राजेंद्र के गांव की ही हो ना तुम ?” उन में से सबसे सीनियर डॉक्टर की पत्नी ने उससे सवाल कर दिया..

“हाँ.. एक ही गांव के हैं !”..

“पहली बार कहाँ मिले तुम दोनों.. तुम्हारी लवमैरिज है ना.. और शायद इंटरकास्ट भी.. वैसे तुम हो ही इतनी सुंदर की राजेंद्र भी पहली नजर में तुम पर दिल हार गया होगा.. !”

भावना बिना कुछ बोले मुस्कुरा कर रह गयी..

“अरे इतना मत शर्माओ भाई.. हमारी भी लवमैरिज है.. हम तो साथ ही पढ़ते थे कॉलेज में.. और फाइनल ईयर में आकर ही हमने शादी भी कर ली थी..।
एक दूसरे के बिना रहा ही नही जाता था..
मैंने तो साफ कह दिया कि अगर साथ रहना है, तो पहले शादी कर लो !”

उनमें से एक ने कहा, उसी के साथ बैठी दूसरी भी डॉक्टर थी..

“और नही तो क्या.. मेरे वाले का भी यही हाल था.. मैंने कहा पहले शादी कर लो जिससे मैं फ्री होकर पढाई कर सकूँ, वरना तुम तो ऱोज़ किसी ना किसी नयी लड़की को नोट्स बाँटने निकल पड़ते हो और मेरी यहाँ टेंशन हो जाती है.. ।”

उन दोनों की बात सुन सभी हंसने लगे..

“बट आई मस्ट से, यु हैव अ स्कलप्चर्ड परफेक्ट फिगर बावना… राजेंद्र तो तुम्हे छोड़ता ही नही होगा.. क्यों?!”

उन्ही सीनियर मैडम ने कहा और उनकी बात सुन भावना बुरी तरह से शरमा गयी.. लेकिन उनके दक्षिण भारतीय उच्चारण में बावना सुन कर उसका दिल डूब गया…

क्रमशः

aparna…

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vermavkv
2 years ago

Very nice