अपराजिता -79
कुसुम नाश्ते की प्लेट से खाने लगी.
उसने दो पूरियां खत्म की, तभी सिम्मी की भाभी उसकी प्लेट में और नाश्ता परोसने लगी,
” अरे नहीं नहीं भाभी रुकिए, इतना खाएंगे तो मोटे हो जाएंगे हम!”
“अरे ऐसे कैसे मोटी हो जाएंगी? हमारे देवर जी हैं ना बिल्कुल मोटाने नहीं देंगे आपको!
वैसे यह बताइए देवरानी जी कि आपको हमारे घर का खाना कैसा लगा..?”
“खाने की तो पूछे मत भाभी, आपके घर के खाने की खुशबू से पेट में ऐसे चूहे कूदते हैं कि क्या बताएं? हमें तो इतनी भूख कभी अपने मायके में नहीं लगती थी! वहां तो कभी-कभी हम पूरा दिन खाए बिना ही कॉलेज निकल जाया करते थे! और यहां जब देखो तब भूख लगी रहती है…।”
कुसुम के यह बात कहते तक में उसकी सास भी वहां चली आई थी। मुस्कुराते हुए उन्होंने दो और पूड़ियाँ अपनी बहू की प्लेट में परोस दी..
“खाओ बहू अभी तो तुम्हारे खाने पीने की उम्र है। इस उम्र में खाने से मोटापा नहीं आता। दिनभर तो ऊपर नीचे सीढ़ियां चढ़ती उतरते बीत जाता है। और वैसे एक बात कहें हमारे घर में खाना जरूर अच्छा बनता है, लेकिन तुम्हारे में भी खाना उतना ही अच्छा बनता है।
वह तो लड़कियों की आदत ही होती है, जब तक मायके में रहती हैं, फुदकती फिरती है। किसी भी बात पर उनका ध्यान ही कहा जाता है? और खासकर मायके की रसोई में तो लड़कियों के कदम ही नहीं पड़ते।
इसीलिए कभी ध्यान नहीं जाता कि कैसी खुशबू उठ रही है? और कैसा खाना बन रहा है? अब जब जाओगी ना मायके, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारे घर कैसा खाना बनता है..?”
कुसुम सोच में पड़ गई।
उसकी सास कह तो सही रही थी। वाकई अपने मायके में उसका ध्यान किसी भी बात पर कहां जाता था? उसकी मां कैसी साड़ियां पहनती हैं? कैसे तैयार होती हैं? कैसे जेवर पहनती है? किन्हीं बातों पर उसका ध्यान नहीं गया।
जब उसे देखने के लिए लड़के वाले आने वाले थे, तब उसकी भाभी ने उसके पहनने के लिए साङियों का ढेर लगा दिया था। तब भी वह कहां किसी पर भी ध्यान दे पा रही थी।
और अब यहां ससुराल में उसका हर एक बात पर ध्यान जाता है। उसकी सास अक्सर लाल पीले नारंगी हरी चटक रंगों की साड़ियां पहनती है। हाथ हाथ भर के चूड़ी पहनी रहती हैं। और जब रसोई में काम करती है तो उनकी चूड़ियां खनकती हुई कितनी प्यारी लगती हैं।
पूरी मांग भरकर सिंदूर लगाती हैं, और सिंदूर का ही बड़ा सा माथे पर गोल टीका लगाती है। उनके गले में हमेशा सोने का एक जगमगाता हार जरूर रहता है, और हर दो-तीन दिन में वह उस हार को बदलकर नया हार पहन लेती हैं।
आज तक उसने इतने ध्यान से कभी अपनी अम्मा को देखा ही नहीं था।
अपनी इक्कीस साल की उम्र में उसने वाकई आज तक कभी ध्यान से अपनी मां को नहीं देखा था। उसे पता था उसकी मां बहुत खूबसूरत है, और उसके नैन नक्श उसकी मां की ही देन है, लेकिन बस रंग में वह मार खा गई थी।
उसकी माँ पिघले हुए सोने से रंग की मालकिन थी..
पर उसे अपना संवला रंग बहुत प्यारा था..
उसकी दादी पर पड़ी थी वो…
कुछ सोच कर वो मुस्कुरा उठी..
“अम्मा जी.. हम घऱ जाना चाह्ते हैं.. जा सकते हैं क्या ?”
बड़े शिष्टाचार से कुसुम कुमारी ने अपनी सास से पूछा और तुरंत ही उसके दिल से आवाज आई…
“हैं …..यह क्या कर रही है तू? तुझे तो मुंह फट और बुरी बहू बनना है ना? और अम्मा जी अम्मा जी क्या लगा रखा है ? जब यज्ञ को पति नहीं माना तो उसकी मां तेरी अम्मा जी कैसे हो गई?” लेकिन फिर दूसरे ही पल अपने आप को उसने समझा लिया।
मायके जाने के लिए इतना प्यार से बात करना तो बनता ही है..
और इसी के साथ दूसरा विचार कुलबुलाया… अगर इन्होने जाने देने से मना किया तो फिर तो तांडव होगा इस घऱ में !
“हां बहु! बिल्कुल जाओ हम तुम्हारे लिए गाड़ी निकलवा देते हैं। हम समझते हैं इस बात को…
क्योंकि इस सबसे हम भी गुजर चुके हैं! हम भी जब शादी करके नए-नए इस हवेली में आए थे, तो शुरू के दिनों में तो इतना दम घुटता था और अपनी अम्मा की इतनी याद आती थी।
ऐसा लगता था भाग कर उनके पास चले जाए। दिन भर काम और फिर रात में…
हमारी तो कुछ समझ में भी नहीं आता था! बहुत छोटी उम्र में ब्याह कर दिया था हमारी अम्मा और बाबूजी ने। उसे उम्र में जिसमे हम खुद गुड्डे गुड़ियों का ब्याह रचाकर खेला करते थे, उसी उम्र में हमरा ब्याह हो गया था। और तभी हमने सोच लिया था कि हम किसी भी बहुत छोटी उम्र की लड़की को अपनी बहू बनाकर नहीं लाएंगे..
हम एक उचित उम्र की लड़की से ही अपने बेटों का ब्याह रचाएंगे..
“अम्मा जी एक बात पूछे..?”
“पूछो.. का पूछना है.. “
“अखंड भैया तो घर पर सबसे बड़े है ना फिर उनका ब्याह काहे नहीं हुआ अब तक..?”
शचिरूपा की दुखती हुई नस दबा दी थी कुसुम ने। कुछ देर के लिए शचि चुपचाप खड़ी रह गई। फिर ठंडी सी आह भर कर वो रसोई में अंदर की तरफ चली गई।
” तुम नाश्ता करो बहू। तुम्हारे लिए गाड़ी निकलवा रहे हैं हम..।”
अब तक प्यार से हंसती बोलती उसकी सास को अखंड के नाम पर अचानक क्या हुआ, यह सोचकर कुसुम वापस अपने नाश्ते की प्लेट में झुक गई।
फटाफट खा पी कर वह अपने कमरे में चली आई। एक छोटा सूटकेस निकाल कर उसने दो-चार दिन वहां रुकने की तैयारी की, और फटाफट सीढ़ियां उतरकर नीचे चली आई।
मायके जाने के नाम पर उसका उत्साह उसके हर ओर छोर से बह रहा था, और इसी चक्कर में वो सर से पल्लू लेना भूल गयी..
” अरे क्या कर रही है नैकी दुल्हनिया.. सर उघाड़े घूम रही है पूरे घर में..।
ए भाभी समझाती काहे नहीं हो अपनी बहुरिया को..!”
सिम्मी की माँ ने शचीरूपा को टोक दिया…
” हां जीज्जी सही बोल रही हैं आप, लेकिन अब जब बहू ने सर उघाङ ही लिया तो फिर सर के पल्लू का नियम खत्म कर दीजिए।
अब नई जितनी बहुएं आएंगी, नहीं धरेंगी पल्ला।
क्या हो जाएगा? हम तो जब आए थे ससुराल, तब से ले रहे हैं.. आज तक ले रहे। और जब तक जिएंगे तब तक लेंगे।
अब इन लोगन को मुक्त कीजिए इस सब जंजाल से..।”
” बहू के आते ही बढ़िया आधुनिक हो गई हो भाभी..?”
” इसमें आधुनिकता की क्या बात है जी? अब आखिर वह भी साड़ी तो पहनी रही है ना? अपने मायके में तो नहीं पहनती रही होगी। हमें तो यही लगता है कि अपनी परिपाटी को हम उतना ही हस्तांतरित करें, जितना सामने वाली पीढ़ी संभाल सके।
उनके हाथों में ना अट सके अगर इतने नियम हम उन पर उड़ेल देंगे ना, तो उनके हाथों से सारे नियम नीचे बह जाएंगे और फिर वह पीढ़ी कुछ भी पालन नहीं करेगी।
हमें लगता है जितना जरूरी है, उतना ही निभाओ और निभाने को बोलो। किसी पर कुछ भी थोपो नहीं। हम यह सब झेल चुके हैं जीज्जी। तभी कह रहे हैं, सर के पल्लू से ज्यादा जरूरी आंखों का पर्दा होता है। गांव घर में कई जगह ऐसा देखा है, जहां बहुएं चेहरा तो छुपाए होती है, लेकिन पीछे पीठ पूरा उघाङे घूमती है। का मतलब हुआ ऐसे पल्ले का ,और सर से पल्लू ढक कर रसोई में घुसकर औरतें जो भर भर के आदमियों के लिए गालियां निकलती हैं, फिर क्या ?
फायदा क्या हुआ ऐसे ससुर और जेठ का जिसके नाम पर बहू भर भर कर गालियां भी दे और सर में पल्लू रख रहे..
ऐसे आदर से तो निरादर ही भला…
कुसुम अपनी सास और बुआ सास की बातें सुन रही थी उसने तुरंत अपने सर पर पल्लू रखा और सासू मां के पास चली आई..
जाने अंदर से ऐसी क्या प्रेरणा हुई उसे कि वह अपनी सास के पैरों में स्वत: झुक गई!
अपने दोनों हाथों से अपनी सास के पैरों को दो-तीन बार दबाकर उसने उनके चरण स्पर्श किए और मुस्कुरा कर खड़ी हो गई..।
” जीते रहो, खूब खुश रहो। मन भर कर रह लो..
यज्ञ आएगा तो हम भेज देंगे तुम्हें लिवाने के लिए..!”
मुस्कुराकर कुसुम ने हां कहा और बुआ सास, दादी सास और काकी सास की तरफ उनके पैर छूने बढ़ गई.. लेकिन जैसे उसने अपनी सास के पैर छुए थे, वैसे फिर किसी के नहीं छुए!
फटाफट चरण स्पर्श का यह कार्यक्रम निपटाकर वह अपना बैग लिए गाड़ी में सवार हो गई, और ड्राइवर उसे लेकर उसके मायके के लिए निकल गया…
मानौर से दूर्वागंज की दूरी ज्यादा नहीं थी।
दूर्वागंज में प्रवेश करते ही उसे राजेंद्र की डिस्पेंसरी नजर आ गई। उस डिस्पेंसरी के सामने से होकर ही उसके घर जाने का रास्ता जाता था। वहां से गाड़ी गुजर रही थी कि उसे दूर खड़ी अपनी जेठ की थार नजर आ गई।
उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, उसने ड्राइवर से बोलकर गाड़ी एक तरफ खड़ी करवा दी..।
” काली भैया जरा रुकिए। हमारी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है। हम अस्पताल से अपने लिए दवा लेकर आते हैं..।”
“जी बहु जी !”
गाड़ी से उतरकर कुसुम अस्पताल की तरफ बढ़ गई।
वह इधर-उधर देखती हुई आगे बढ़ रही थी। थार अस्पताल से जरा दूर खड़ी थी। लेकिन थार में बैठा अखंड उसे नजर आ गया।
“जेठ जी यहां हमारे गांव में, इस अस्पताल के सामने क्या कर रहे हैं? क्या यज्ञ ने इन्हें भी सब कुछ बता दिया? लेकिन डॉक्टर साहब ने तो पहले ही यहां से तबादला करवा लिया था ,जिससे हम दोनों शादी के बाद शहर में रहे।
फिर वह यहां वापस तो नहीं आ सकते। लेकिन अस्पताल तो खुला है। इस वक्त अस्पताल में कौन होगा बिट्टू ही होगा..।”
सोच कर कुसुम भड़भड़ाते हुए अंदर दाखिल हो गयी…
सामने बैठी डॉक्टरनी को देख कुसुम चौंक गई..
“आप कौन?” कुसुम ने पूछा
रेशम ने कुसुम की तरफ देखा और अपना परिचय देने लगी ।
“मैं यहां की डॉक्टर हूं..डॉक्टर रेशम! आप कौन? दिखाना था या दवाई लेनी थी क्या..?”
“यहां तो आपसे पहले डॉक्टर राजेंद्र कुमार थे ना..?”
“हां उनका सिटी सेंटर में ट्रांसफर हो गया है..।
जिला अस्पताल देख रहे हैं अभी वह..।
अभी यहां मेरी पोस्टिंग है। क्या तकलीफ थी आपको?”
रेशम को लगा कुसुम डॉक्टर साहब की कोई पुरानी मरीज है, जो उन्हें ढूंढते हुई आई है।
रेशम ने कुसुम को बैठने का इशारा किया और अपनी पर्ची में उसका नाम लिखने के लिए उसका नाम पूछने लगी।
” नाम बताइए आप अपना।”
कुसुम ने रेशम की तरफ देखा और बिना कुछ बोले खड़ी हो गई। उसे अचानक कुछ समझ नहीं आया। वह दरवाजे से बाहर निकलने को थे कि तभी मुड़कर वापस लौट आई।
” रेशम जी एक बात पूछ सकते हैं आपसे? आपने पढ़ाई कहां से की है ?”
रेशम ने ध्यान से कुसुम की तरफ देखा जैसे उसे पहचानने की कोशिश कर रही हो। और रेशम को याद आ गया।
” मैंने आपको कहीं देखा है, आप यहां के ठाकुरों की रिश्तेदार है क्या?”
कुसुम चौंक गई ।
“यहां मायका है हमारा। हम इस वक्त मानौर से आ रहे हैं। दूर्वागंज हमारा घर है। चंद्रभान सिंह तोमर की बहन है हम..कुसुम कुमारी.. ।”
“तभी मुझे आपका चेहरा देखकर लगा जैसे मैंने आपको कहीं देखा है। उस दिन हॉस्पिटल में जब आपके भाई का इलाज चल रहा था, वही शायद मैंने आपको भी देखा था।
और हां यहां जो डॉक्टर साहब थे ना, डॉक्टर राजेंद्र कुमार! उन्होंने ही तो आपके भाई साहब का ऑपरेशन किया है।”
“क्या? क्या बोल रही है आप?”
” हां सच बोल रही हूं!
” नहीं यह नहीं हो सकता।”
” क्यों नहीं हो सकता, वह सर्जन है। और बहुत अच्छे सर्जन है। इसलिए तो शहर चले गए। यहां गांव में इतना स्कोप नहीं था ना।”
” लेकिन जब वह सर्जन है तो वह गांव क्या करने आए थे?”
“हां उनसे बहुत से लोग यही पूछते हैं, क्योंकि उनके लिए स्कोप शहर में ज्यादा है। लेकिन डॉक्टर साहब एक बहुत अच्छे ईमानदार आदमी है। वह अपने गांव की जनता की सेवा करना चाहते थे। वह चाहते थे कि गांव के लोगों को अपनी परेशानियों के लिए बाहर या दूर न जाना पड़े। लेकिन जाने फिर क्या हुआ, वापस लौट गये..।”
अनमनी सी कुसुम अपनी जगह पर खड़ी हो गई। रेशम ने उसे आवाज भी दी लेकिन बिना रेशम की बात सुने कुसुम बाहर निकल गई।
बाहर निकलते ही उसकी नजर दूर खड़ी थार पर वापस पड़ गई। उसका माथा ठनका। वह जब आई थी, तब से थार यहां खड़ी है।
वह लगभग आधे घंटे अंदर रेशम के साथ बैठी थी। उतनी देर थार वही मौजूद थी। आसपास और कोई ऐसी जगह नहीं थी। जहां अखंड का कोई काम चल रहा हो। वैसे भी वह मानौर के रहने वाले थे। उनका दूर्वागंज में कोई खास काम नहीं था। ना ही उनके कोई रिश्तेदार थे। तो फिर अखंड भैया यहां क्या कर रहे थे ?
सोचती हुई कुसुम धीरे-धीरे अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गई। वह अपनी गाड़ी के पास पहुंची तो उसने देखा उसके ड्राइवर के साथ उसी के घर का एक दूसरा ड्राइवर भी मौजूद है। उसे देखकर कुसुम ने अनदेखा सा किया और दरवाजा खोलकर पीछे बैठ गई। वापस उसके ड्राइवर ने अंदर बैठकर गाड़ी कुसुम के घर की तरफ भगा दी। कुसुम ने अपने ड्राइवर से ही पूछ लिया “यह लड़का भी हमारे यहां ही गाड़ी चलाता है ना..।”
“जी बहु जी!” यह कभी-कभी अखंड भैया के साथ रहता है..।”
“अखंड भैया की भी गाड़ी यहां खड़ी थी.. भाई साहब यहां क्या कर रहे हैं..?”
“मालूम नहीं बहु जी! हो सकता है उनका कुछ काम लगा हुआ हो आसपास! वैसे आजकल रोज सुबह घर से यही निकल कर चले आते हैं..!”
“आपके छोटे भैया को मालूम है कि भाई साहब यहां आते हैं..?”
कुसुम ने यज्ञ के लिए पूछा और ड्राइवर ने ना में गर्दन हिला दी..
कुछ देर में ही कुसुम का घर चला आया और कुसुम उतरकर तुरंत घर के अंदर भाग चली..
ड्राइवर ने उसका सामान लाकर दालान में रखा और कुसुम को प्रणाम कर उसके पिता के चरणों को छूकर बाहर निकल गया.
वह जा ही रहा था कि कुसुम के पिता ने उसे थोड़ी मिठाई फल कपड़े और कुछ रुपए दे दिए! ड्राइवर ने एक बार फिर उन्हें प्रणाम किया और बाहर निकल गया! कुसुम अपने घर पहुंच कर खुश हो गई थी।
अपनी मां के गले लगे वह झूम रही थी। सुजाता भी कुसुम को देखकर खुश थी। घर पर अब सभी सामान्य हो गए थे। अब तक चंद्रभान की छुट्टी तो नहीं हुई थी, लेकिन अब उसकी स्थिति पहले से ठीक थी।
था तो वह अभी बिस्तर पर ही, लेकिन अब उसका सामान्य रूप से खाना पीना शुरू हो गया था..।
दिन में सुजाता सुबह का खाना लिए चंद्रभान के पास चली जाया करती थी। दिन भर वह उसी के साथ रहती थी। हालांकि चंद्रभान के गुर्गे भी कम नहीं थे।
लगभग 10- 12 लड़के हर वक्त अस्पताल में मौजूद रहते थे। रात में भी सोने के लिए घर से किसी को जाने की जरूरत नहीं होती थी। चंद्रभान के गुर्गे ही काफी थे। चंद्रभान ने भी अपने पिता और सुजाता दोनों को ही अस्पताल में रुकने से मना कर दिया था। एक-दो दिन में अस्पताल से छुट्टी हो जाने के आसार नजर आ रहे थे। घर में सभी खुश थे, और ऐसे में कुसुम का आना उनकी खुशी को और बढा गया।
कुसुम की मां ने कुसुम को देखा और खुश होकर उसकी पसंद की चीज बनाने रसोई में चली गई…
“आज तुम्हारी पसंद की मछली बना देते हैं.. !”
“ठीक है अम्मा !”
गिट्टू को गोद में उठाकर खूब सारा प्यार करने के बाद कुसुम मुस्कुरा कर सीढ़ियां चढ़ के ऊपर अपने कमरे में चली गई।
सुजाता ने कुसुम को यूं बलखाते हुए अपने कमरे में जाते देखा और एक ठंडी सी आह भर कर रसोई में अपने पति के लिए सूप बनाने चली आई।
यही तो होती है लड़कियों की किस्मत!! जब प्रेम में पङती है तो सारा संसार भूल जाती है। यहां तक की अपने आप को पैदा करने वालों को भी भूल जाती है। उस प्यार को पाने के लिए ।
लेकिन जब घर वाले कहीं ब्याह देते हैं, तब जिसके साथ गांठ बंध जाती है उसके रंग में ऐसी रंग जाती हैं कि अपने उसी पहले प्यार को भी भूल कर रह जाती हैं।
सुजाता ने अपनी आंख में अटका एक आंसू अपनी सास की नजर से बचाकर पोंछ लिया..।
वह क्या जानती थी कि कुसुम यज्ञ को सब कुछ बता चुकी है। और अभी शायद इस उम्मीद में है कि उसके डॉक्टर साहब उसे मिल जाए। हालांकि कुसुम का ऐसा सोचना यथार्थ के धरातल पर कहीं से नहीं टिकता था। जैसे स्वभाव का राजेंद्र था, कुसुम का ऐसा सोचना असंभव ही था।
लेकिन कुसुम कुमारी दुनिया से निराली थी। उसके लिए उसका जीवन उसका अपना था, और उसके जीवन के नियम उसके बनाए हुए थे।
उसने न किसी की सुनना था, और ना किसी के रोके रुकना था। अपने कमरे में पहुंचकर उसने दरवाजे को बंद किया, और सबसे पहले अपनी अलमारी खोलकर अपना एक खूबसूरत सा प्यारा सा कुर्ता निकाला और कपड़े बदल लिए।
अपने पुराने कपड़ों में आकर अब उसे लग रहा था कि वह मायके पहुंच चुकी है। खिड़की खोलकर उसने गहरी सी सांस अंदर भरी और अपने पलंग पर पसर गई। मोबाइल निकाल कर उसने तुरंत राजेंद्र का प्रोफाइल खोला और वापस उसे मैसेज कर दिया।
“क्या हुआ डॉक्टर साहब, आपने हमारी बात का जवाब नहीं दिया..?”
दूसरी तरफ मैसेज डिलीवर हुआ।
राजेंद्र अब पहले से काफी ठीक हो चुका था। लेकिन था अब भी वह पलंग पर। उसने आंखें बंद कर रखी थी। और उसके पलंग के ठीक बगल में एक स्टूल पर बैठी भावना उसके लिए सेब काट रही थी। भावना ने राजेंद्र के मोबाइल पर मैसेज देखा।
पिछली रात भी कुसुम ने राजेंद्र को जो मैसेज भेजा था, उसका जवाब राजेंद्र ने नहीं बल्कि भावना ने हीं दिया था। और बाकी के आये मैसेज को जानबूझकर बिना जवाब दिए छोड़ दिया था।
भावना का यह सोचना था कि कुसुम को अपने पति से ईमानदारी के साथ पेश आना चाहिए। अगर वह अपने पति को बिना बताए राजेंद्र को मैसेज कर रही है तो, यह गलत है।
आखिर भावना थी तो कुसुम की ही सहेली। बचपन से उसके हर सही गलत को उसने अपनी बातों से सुधारा था। फिर आज जब कुसुम अपने जीवन के सबसे अनोखे और अजीब से मोड पर खड़ी थी, ऐसे समय में भावना भला कैसे उसका साथ छोड़ देती? भावना ने मोबाइल में मैसेज देखने के बाद चोर नजरों से राजेंद्र की तरफ देखा। राजेंद्र का ध्यान मोबाइल पर नहीं था। उसकी आंखें बंद थी और बंद आंखों पर उसने अपना एक हाथ रखा हुआ था..।
क्रमशः
aparna..
