अपराजिता -78
कुसुम थक कर गहरी नींद सो रही थी…
तभी उसे दरवाज़े के खुलने की आहट सी सुनाई पड़ी.. लेकिन वो इतनी गहरी नींद में थी कि उसका हिलने का भी मन नही कर रहा था..
वो कुनमुना कर करवट बदल कर पड़ी रही..
लेकिन फिर कुछ धीमी कदमो की आहट उसी की तरफ बढ़ने लगी….।
अब उसकी नींद हलकी होने लगी थी, लेकिन अब भी उसकी आंखे खुल नही रही थी..
कमरे में घुप्प अँधेरा था.. वो अब कच्ची नींद में थी और तभी उसे याद आ गया कि वो अपने मायके नही ससुराल में है..
वो झटके से आंख खोलने ही वाली थी कि एक हाथ उसकी तरफ बढ़ा और उसकी ओढी हुई चादर को खींच लिया..
कुसुम को लगा जैसे उस हाथ ने उसके वस्त्र छीन लिए… वो हाथ वापस उसकी और बढ़ा और इस बार उसका आंचल उस हाथ में था..
एक झटके से उस हाथ ने कुसुम के आंचल को उसके सीने से खींचा, और एक घुटी हुई सी चीख के साथ कुसुम उठ बैठी..
उसका चेहरा पसीने से तरबतर था..
उसने तुरंत पलंग के बाजु में रखे लैंप को जला दिया… वहाँ कोई नही था…
कुसुम ने खुद को देखा.. उसके कपड़े ठीक थे, ऊपर से दोहड़ भी उस पर लिपटा था.. तो क्या वो सपना देख रही थी.. ?
हाँ सपना ही था.. पर कितना डरावना !!
वो गहरी गहरी सांसे भरने लगी, उसका गला सूख गया था.. डर से उसके बदन में झुरझुरी सी दौड़ गयी…।
दो दिन से उस अनजान आदमी के साथ कमरे में बङे चैन की नींद वो सोई पड़ी थी, तब तो कभी नही लगा कि यज्ञ उस पर हाथ ना डाल दे..।
जबकि वो उसके पति की हैसियत से उसके साथ उसके कमरे में सो रहा था..।
वो ऐसा प्रयास कर सकता था, लेकिन कभी भी उसके दिमाग में ये नहीं आया कि यज्ञ उसके साथ ज़बरदस्ती करेगा..
और आज जब वो पूरे कमरे में अकेली थी, ऐसा डरावना सपना उसे दिख गया..।
उसने टेबल पर रखा ग्लास उठाया, लेकिन वो खाली था..
पानी की बोतल उठाये वो कमरे से बाहर निकल गयी..
वो सीढ़ियां उतर रही थी कि, सीढ़ियों पर लड़खड़ाते हुए ऊपर आते वीर पर उसकी नजर पड़ गयी..
वीर ने उसे देखा और नशे में लड़खड़ाती जबान से उसे प्रणाम भाभी बोल कर ऊपर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया… उसे एक बार पलट कर देखने के बाद वो रसोई में चली गयी..
पानी लेकर वो वापस ऊपर चली आयी..
लेकिन अब नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी..
उसने अपना फ़ोन उठाया और डॉक्टर साहब को भेजे मेसेज को देखने लगी.. उसके आश्चर्य का ठिकाना नही था, उसके लिए जवाब आ चुका था..
उसने डॉक्टर साहब से पूछा था..
कैसे हैं आप ?…
जवाब हाज़िर था… “ठीक हूँ !”
कुसुम की ख़ुशी का ठिकाना न रहा उसने दूसरा मेसेज भेज दिया..
“मेरे बारे में नही पूछा कि मैं कैसी हूँ ? अच्छा सुनिए, मेरी याद आती है या नही ?”
उसने ये दो मेसेज भेजे और जवाब का इंतज़ार करने लगी..
लेकिन उस वक्त कोई जवाब नही आया…
उसने समय देखा, रात के तीन बज रहे थे.. ज़ाहिर था सब सो रहे होंगे.. !
लेकिन उसकी नींद उडी बैठी थी..।
पलंग पर बैठे बैठे उसने सामने पड़े काउच को देखा..
वहीँ वो सो रही थी..
कहीं जग़ह बदलने से नींद नही आ रही.. ऐसा तो नही है, सोच कर वो काउच में पहुँच गयी.. लेकिन नींद तब भी किसी रूठी सखी सी उसे नचा रही थी..।
उसने टीवी लगा लिया..
लेकिन मन उसका टीवी में भी नही लग रहा था..।
उसने वापस मोबाइल निकाला और डॉक्टर साहब के प्रोफाइल में चली गयी..
उसके सवाल का कोई जवाब अब तक नही आया था..।
उसने जाने क्या सोच कर यज्ञ का प्रोफाइल खोल लिया..
उस वक्त कुसुम बस अपना समय काट रही थी..
बिना ज्यादा कुछ सोचे समझे उसने यज्ञ को मेसेज कर दिया..
“क्या कर रहे हो ?”
कुछ सेकण्ड्स के बाद ही यज्ञ का जवाब चला आया..
“हम तो सो रहे थे, लेकिन लगता है हमारी शरीके हयात को हमारे बिना नींद नही आ रही !”
यज्ञ का मेसेज देखते ही वो चौंक गयी..
उसने तुरंत अगला मेसेज कर दिया..
“तुरंत मेसेज का जवाब दिया मतलब सो तो नही रहे थे.. !
कुसुम का जवाब गया और उधर से यज्ञ का विडिओ कॉल आने लगा.. बिना उठाये कुसुम के पास चारा भी नही था.. उसने कॉल उठा लिया..
कुसुम ने देखा, यज्ञ की आंखे भी ठीक से नही खुल रही थी.. माथे पर फैले बालों को समेटता यज्ञ आँखों को मसल कर पूरा खोलने की कोशिश कर रहा था..
“यार तुम तो बिलकुल फ्रेश लग रही हो जैसे सोई ही नही..! क्या हुआ..?”
यज्ञ के सवाल पर कुसुम जरा भावुक होने को थी लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाल किया.. उसे यज्ञ के सामने ये नही दिखाना था कि वो एक अदद सपने से डर गयी है..
” आज आप नहीं थे ना, तो हम बड़ी चैन से जल्दी सो गए थे। वह तो बस यूं ही प्यास लगी तो नींद खुली..।”
“और हमारी याद आ गयी.. है ना ?”..
यज्ञ ने शरारत से कहा..
“पगला गए हैं क्या ? और कोई नहीं बचा जो आपकी याद आएगी।”
कुसुम ने यज्ञ को देखते हुए कहा।
यज्ञ कुसुम को देखते हुए मुस्कुरा रहा था।
” यह तो आप खुद सोचिए छोटी ठकुराइन, कि आधी रात में आप अपने पति को मैसेज करती है कि क्या कर रहे हो? और उसके बाद खुद ही सवाल कर रही है कि कोई और नहीं बचा क्या? अगर कोई और बचा होता ना तो आप हमें नहीं मैसेज करती..।”
“हम रख रहे हैं फ़ोन.. !”
यज्ञ की आंखों की ताप कुसुम से सहन नहीं हो रही थी। इसलिए वह उसके चेहरे को छोड़ इधर-उधर देख रही थी। और यज्ञ ने मुस्कुरा कर अपने फोन का कैमरा अपने पूरे कमरे में घूमाकर उसे दिखा दिया..
” देख लीजिए छोटी ठकुराइन हमारे कमरे में हमारे और आपकी यादों के सिवा और कोई नहीं है..!”
“हमे कोई फर्क नही पड़ता, कोई होती तब भी और नही है तब भी !”
“ओह्ह अच्छा.. तभी वहाँ से झांक झांक कर हमारे बिस्तर की तलाशी ली जा रही थी.. !”
“बकवास बंद करेंगे आप !”
“हम तो बकवास करने ही पैदा हुए हैं, लेकिन सुनिए, सो जाइये आप.. सुबह आपको जल्दी उठना पड़ेगा..। आखिर अब आप ठाकुरों की बहु जो हैं !”
“हम नही उठेंगे जल्दी.. देखते हैं कौन हमें जल्दी उठाने आता है !”
“आप तो अभी से जागी बैठी हैं.. किसी को उठाने का मौका दिए बिना !”
“हम फ़ोन रख रहे !”
एक गहरी ठंडी सी आह भर कर कुसुम को शरारत से देखते हुए यज्ञ ने फ़ोन काट दिया…।
कुसुम ने फ़ोन अपने तकिये के पास रखा और लेट गयी…
अब हल्का हल्का सा उजाला उसकी खिड़की से कमरे के अंदर आने लगा था…।
हल्की गुलाबी सी ठण्ड शुरू हो गयी थी.. खिड़की से ठंडी हवाएं आ रही थी..।
गांव के एकमात्र गिरजाघर की सुबह की पहली घंटी बजी टन टन..
और उसी के थोड़ी देर में गायों के झुण्ड को हकालता ग्वाला वहीँ के रास्ते से होकर निकल गया..
गायों के गले की घंटियां बजती हुई मोहक संगीत पैदा कर रही थी और ऐसा लगा वो मधुर संगीत थपकियाँ देकर कुसुम को वापस सुला गया…
सुबह कोई भी कुसुम को जगाने नही आया..।
सुबह आठ के करीब उसकी खुद ही आंख खुल गयी..। पल भर के लिए वह चौंक कर बिस्तर पर बैठ गई, आखिर उसकी ससुराल थी।
उसे समय पर तैयार होकर नीचे जाना था।
लेकिन फिर अपनी जिद और झूठे घमंड को बनाए रखने के लिए वह चुपचाप बैठी रही। आज जब तक कोई उठाने नहीं आएगा तब तक नीचे नहीं जाऊंगी।
कुछ देर बाद वह उठकर कमरे में चहलकदमी करने लगी। खिड़की के पर्दे खोलकर बाहर देखने लगी।
बाहर का आंगन उसे अपने कमरे की खिड़की से साफ नजर आता था। यह बाहर वाला दालान था, जहां ठाकुर परिवार के पुरुष बैठा करते थे। वहां लगे तख्त पर बड़े ठाकुर यानी कुसुम के ससुर जी बैठे थे। गांव के कुछ दो-चार लोग वहीं जमीन पर ऊकङू बैठे उन्हें अपनी समस्याएं बता रहे थे।
घर का एक नौकर ठाकुर जी के पैरों पर मालिश कर रहा था। एक तरफ रखी कुर्सी पर उसका जेठ अखंड बैठा था। वह अखबार पढ़ रहा था। नौकरों की आवाजाही वहां बढ़ गई थी।
ठाकुर साहब हुक्का भी गुङगुङा रहे थे। उसी समय अंदर की तरफ से एक नौकर बाहर आया और एक ट्रे में उन सबके लिए चाय रख कर चला गया।
कुसुम को बुलाने अब तक कोई नहीं आया था। वह वापस कमरे में चहलकदमी करने लगी।
पता नहीं आज यह सिम्मी भी कहां मर गई? यह नहीं की आकर औपचारिकता के लिए ही सही, हमें बुला कर ले जाए। अब हम ऐस थोड़ी ना खुद मुहं उठाये चले जायेंगे। आखिर घर की बहू है हम…।
इधर से उधर टहलते उसे लगा अब नहा लेना चाहिए.. नहाने के बाद वो तैयार भी हो गयी, लेकिन अब भी दरवाज़े पर कोई नही आया…
अब तक तो काफी समय बीत गया होगा… ना हो तो ग्यारह साढ़े ग्यारह बज ही गए होंगे..।
फिर भी कोई बुलाने क्यों नही आया..? घऱ में सब ठीक तो हैं ना..!
कहीं किसी को कुछ हो तो नही गया..
सोचती हुई खुद में परेशान कुसुम ने दरवाज़ा खोला और नीचे उतर गयी..
वो नीचे पहुंची तो घऱ की औरतें नाश्ते की तैयारी कर रही थी। उसकी सास की नजर उस पर पड़ गयी..
“बड़ी जल्दी तैयार होकर आ गयी बहु ?”
कुसुम को लगा उसकी सास उसे ताना मार रही…वो भी मन ही मन में कोई अच्छा कड़वा सा जवाब सोचने लगी, तभी उसकी नजर सामने टंगी लम्बी चौड़ी घड़ी पर पड़ गयी..
घडी नौ बजा रही थी..
कुसुम की आंखे फटी रह गयी…
हैं.. ये क्या.. वो इतना सारा समय बर्बाद कर के तैयार हुई कि यहाँ लोगो को परेशान कर सके और इनकी घडी में सिर्फ नौ बजे..।
ये तो उसके साथ नाइंसाफी हो गयी..।
यज्ञ रहता था, तब तो समय कितना जल्दी बीतता था… आज अब तक बस नौ ही बजे..
मतलब उसकी सास ताना नही मार रही थी, सच कह रही थी..
कहाँ तो वो ससुराल को तंग करने वाली बहु बनना चाहती है, और कहाँ ये पूरा घर उसे अच्छी बहु दिखाने का षड्यंत्र करने पर तुला हुआ है..।
वो बिना कुछ बोले रसोई में गयी और अपना नाश्ता निकालने लगी..
उसे लगा इसी बात पर सब औरते चिढ जाएँगी कि बहु ने ससुर और जेठ से पहले खा लिया..
वो जैसे ही प्लेट लेकर आगे बढ़ी, उसकी सास ने उसके हाथ से प्लेट ली और जाकर अपनी ननन्द यानी सिम्मी की माँ को पकड़ा दी..
“ये तो हद हो गयी… हमने खुद के लिए प्लेट परोसी और माताजी ने छीन कर बुआ जी को पकड़ा दी !” मन ही मन बड़बड़ाती वो वापस दूसरी प्लेट निकालने चली गयी..
इस बार उसकी प्लेट में उसकी काकी सास ने अपनी तरफ से भी कुछ सामान परोसा और फिर उसके हाथ से प्लेट लेकर उसकी सास को पकड़ा दिया…
एक ठंडी सी साँस भर कर वो रसोई में रखी डायनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गयी..
“बस अभी तुम्हारे ससुर काका ससुर ने खाया.. हम लोग बैठने ही वाले थे कि तुम चली आयी, हमारा नाश्ता परोसने..।”
बड़े लाङ से यज्ञ की माँ ने कुसुम को सम्बोधित किया, कुसुम इस बात पर ज़हर उगल पाती उसके पहले यज्ञ की माँ एक बार फिर अपना पिटारा खोले शुरू हो गयी..
“देखा अम्मा जी.. हम ना कहते थे हमारे यज्ञ की बहु बड़ी समझदार मिली है हमें….. ब्रम्हा जी तुम्हे सदा खुस रखे बहु.. सदा सुहागन रहो.. !”
“बताओ.. आशीर्वाद भी दिया तो खुद ही के बेटे की लम्बी उम्र का.. हुंह !!” मन ही मन कुढ़ती कुसुम की भूख फिर से जाग गयी…!
वो इस बात पर भी कुढ़ गयी.. पता नही कब जन्मो की भूख यहाँ आकर जाग गई है.. !
एक तो ये ठाकुर परिवार की रसोई..!
रसोई ना हुई मेनका हो गयी..
ऐसी ऐसी खुशबु की लपटे उठती हैं यहाँ से, कि अच्छे खासे व्रती विश्वामित्र का व्रत भी इनके घऱ का खाना तुड़वा कर ही माने..।
उसी समय उसके सामने सिम्मी ने उसकी प्लेट रख दी..
“लीजिये भाभी… आप भी खा लीजिये ! कल तो बड़े आराम से सोई होंगी.. पूरा पलंग में फ़ैल के !”
सिम्मी धीमे से उसके कान के पास गुनगुना गयी..
“काश इस बड़बोली का सर हम इस आलू की तरी में डूबा पाते तो कसम महादेव की इसी कटोरी में डूबा डूबा कर इसकी जान ले लेते.. जितनी उम्र नहीं उतना ज्ञान चाहिए.. छिछोरी कहीं की.. !” कुसुम मन ही मन सोच रही थी कि सिम्मी ने उसकी कुहनी पर हाथ मार दिया.. कुसुम तिलमिला गयी..
लेकिन सिम्मी की तरफ देख मुस्कुरा उठी..
“अरे कहाँ ? आपके भैया की बाँहों की इतनी आदत हो गयी है कि कल नींद ही नही आयी.. उनकी खुशबु के बिना अब पलक भी बंद नही होती.. !”
मुहं बना कर कुसुम ने कहा और खाने लगी.. उसी समय कुछ लेने के लिए अंदर आयी कुसुम की सास ने कुसुम को टोकने के उद्देश्य से अपना गला साफ़ किया और उसे धीरे से टोक दिया…
“बस बस बहु.. इतना सब, सबके सामने बोलने का कोनो ज़रूरत नही.. हम यज्ञ को आज ही बुलवा लेंगे.. !”..
कुसुम अपनी जीभ काट कर रह गयी..
छी भई!!… हम क्या करने की सोच रहे और क्या हो रहा है हमारे साथ..। ये सारे सवा सत्यानाश हमारे ही साथ क्यों होते ?
उसकी सास बाहर निकल गयी और एक बार फिर नौकर को अखंड के कमरे में झाँकने को बोल दिया..
“नही है अम्मा जी.. भैया जी कमरे में नही है !” नौकर ने वहीँ से हांक लगायी..
“हम का करे इसका.. ये अखंड बाबू का कोई ठिकाना ही नही है.. अभी तक तो बाहर बैठे थे, अब जाने कहाँ गायब हो गये…. ..
अखंड की माँ ने कहा और कुसुम का ध्यान भी इस बात पर चला गया.. उसने भी तो अखंड को बैठ कर अख़बार पढ़ते देखा था..
“क्या हुआ अम्मा जी.. भाई साहब ने नाश्ता नहीं किया क्या ?”
“अरे कहाँ कुछ खाया है बहुरिया… वो तो बाहर बैठा अख़बार पढ़ रहा था, फिर अचानक उठ कर अपनी गाड़ी निकाल कर कहीं चला गया..!”
कुसुम भी सोच में पड़ गयी कि आखिर ये अखंड के इस स्वभाव और अस्वाभाविक चुप्पी के पीछे कारण क्या है ?
क्रमशः
.
aparna..

Bahut bahut bahut bahut bahut bahut bahut bahut bahut hi khubsurat story ❤️
Hello mam 👋👋 thank you so much mam for giving us a beautiful story 💖💖💖💖