अपराजिता -77

अपराजिता -77

दरवाजे पर अपनी मां को खड़ा देख भावना कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह गई, और फिर आगे बढ़कर अपनी मां के गले से लग गई।

“अब क्या यही खड़ा रखेगी? अंदर भी नहीं बुलाएगी मुझे?”

” कैसी बात कर रही हो मां? तुम्हें अंदर नहीं बुलाऊंगी तो किसे बुलाऊंगी?”

भावना अपनी मां का हाथ पकड़ कर अंदर ले आई।

” तू कर क्या रही थी?”

भावना की मां ने बाहर वाले कमरे में इधर-उधर नजर डाली, और वहां बिछे गद्दे पर बैठ गई।

” कुछ नहीं कर रही थी। आज डॉक्टर साहब की तबीयत बिगड़ गई है बस।
     अस्पताल नहीं जा पाए हैं वह, अभी उन्हें दवाई दे कर उठी कि तभी तुम आ गई। उनके एक दोस्त को बुलाया है, आकर उन्हें देख जाएंगे।”

“अरे डॉक्टर साहब की तबीयत बिगड़ गई, कैसे?”

भावना की मां के चेहरे पर थोड़ी सी परेशानी के भाव छलकने लगे। लेकिन भावना ने उन्हें आश्वास्त किया और वहीं बैठा छोड़कर उनके लिए पानी लेने चली गई।

         उस वक्त राजेंद्र का दोस्त भी चला आया। उसे अंदर बुलाकर भावना ने राजेंद्र के कमरे में पहुंचा दिया और खुद अपनी मां और उस दोस्त के लिए चाय बनाने लगी।

  भावना की माँ इधर-उधर देखती हुई धीरे से रसोई में चली आई।
भावना के पास खड़ी वह चुपचाप भावना को देख रही थी। भावना भी चुप ही थी।

” भावना!!  देखते ही देखते यह क्या से क्या हो गया? हमने क्या सोचा था, और क्या हो गया ? हम तुझे यह नहीं कहेंगे कि तू जिस हाल में है, उसी को अपना भाग्य समझ कर समझौता कर ले।
   नहीं, हम यह कभी नहीं कहेंगे। हम जानते हैं तुम्हारी शादी उस चंद्रभान ने जबरदस्ती करवाई है। और हम उसका थोपा हुआ भाग्य तुम्हें सहने नहीं देंगे। हम मानते हैं कि डॉक्टर साहब अच्छे आदमी है, पढ़े लिखे हैं, कमाते हैं। लेकिन हमें यह शादी मंजूर नहीं है।
       हम पुलिस थाने भी गए थे, तुम्हारी शादी जबरदस्ती करवाने के लिए चंद्रभान के खिलाफ रपट लिखवाने। लेकिन तभी पता चला कि… “

” क्या पता चला अम्मा?”

” चंद्रभान अपनी छत से गिर गया है।”

” क्या बात कर रही हो? कब?”

” अभी कल परसों ही तो हुआ है..।
सुना तीसरी मंजिल में खड़ा था, कुछ हिसाब किताब कर रहा था कि गिर गया।
     हमने भी बहुत बद्दुआ दी थी उस लड़के को। लेकिन सच कह रहे भावना,  यह नहीं सोचा था कि वह जीवन और मृत्यु के बीच झूलने लगेगा।
    हम उससे नाराज थे, उससे बदला भी लेना चाहते थे, लेकिन ऐसा बदला नहीं चाहिए था बिटिया।
     अब तो बस मन में एक ही आस है कि तुम्हारा तलाक करवा कर तुम्हें अपने साथ ले जाए।”

अपनी मां के इतनी प्रगतिशील विचारों को सुनकर भावना निःशब्द खड़ी थी। उसे लगा था उसकी मां भी बाकी मांओं की तरह उसे यही समझाएगी कि जो मिला, जैसा मिला, उसे अपने सर माथे लगाकर रह लेना।

     लेकिन उसकी मां ने ऐसा बिल्कुल नहीं कहा।

” सुनो भावना हम तुम्हें लेने आए हैं। तुम दोनों की शादी में ना तुम्हारी मंजूरी थी, और ना डॉक्टर साहब की।
तो फिर एक साथ रहने की भी कोई बाध्यता नहीं है। तुम अपना सामान बांधो और चलो हमारे साथ।
जितनी भी मियाद है, तुम दोनों अलग रहकर भी तो पूरी कर सकते हो। उसमें साथ रहने की क्या जरूरत है?
अगर छह महीने बाद ही तलाक होगा तो ठीक है।
  छह महीने बाद ही कचहरी जाकर तलाक ले लेंगे। लेकिन तब तक तुम हमारे ही साथ रहो, समझी।
 
    भावना हां बोले या ना उसे समझ नहीं आ रहा था। फिलहाल उसे इस घर में सिर्फ एक दिन और एक रात बीती थी।
   उसे अब तक किसी भी चीज से लगाव नहीं हुआ था। ना यह घर अपना सा लग रहा था, और ना इस घर का मालिक।

   बावजूद जब उसकी मां ने उसे अपने साथ चलने कहा तो दिल में एक मरोड़ से उठी थी। समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ?  शायद डॉक्टर साहब बीमार पड़ गए हैं, इसलिए उसने धीरे से अपनी मां के हाथ में अपना हाथ रख दिया।

” हम आ जाएंगे अम्मा, हमारी चिंता मत करो। तुमने हमें पाल-पोसकर बड़ा किया है। तुमने हमें जन्म दिया है। तुम्हारे ही रक्त मांस का फल है हम। तो फिर हम कैसे डरपोक हो जाएंगे ?
जैसी निडर हमारी अम्मा है, वैसे ही निर्भीक हम भी हैं। डॉक्टर साहब को इस वक्त हमारी जरूरत है। बीमार है वह, इसलिए कुछ दिन उनके साथ रहकर हम आ जाएंगे।”

” यह कैसा मोह पाल रही हो बिटिया? उनसे तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। कागज पर एक दस्तखत हो जाने से शादी ब्याह नहीं होते।
    ना पितरों का पूजन किया, ना देवताओं का आवाहन किया, ना अग्नि के फेरे हुए। फिर कैसा ब्याह?
ना उन्होंने तुम्हारे माथे पर सिंदूर लगाया हैं, ना गले में मंगलसूत्र बांधा है अपने नाम का।
     हम नहीं मानते, इस तरह के रिश्ते को।”

” अम्मा हम यह कहां बोल रहे हैं कि, हम किसी रिश्ते को मान रहे हैं।
सिर्फ दोस्त समझ कर तो उनकी मदद कर ही सकते हैं ना।”

” तुम फिजूल में जज्बाती हो रही हो भावना।”

” नहीं अम्मा, उन्होंने भी हमारी मदद की है। एकाध बार नहीं, कई बार।
वह बहुत अच्छे इंसान है। और देखा जाए तो उनके साथ बहुत बुरा हुआ है। मानते हैं कि कुसुम हमारी दोस्त है, और कुसुम के कारण हम डॉक्टर साहब से जुड़े थे। लेकिन सच कहे तो कुसुम उनके पीछे बुरी तरह से पागल हुई पड़ी थी।
     वह एक तरह से कुसुम की जिद बन गए थे। कुसुम के अंदर शुरू से एक विद्रोही लड़की थी। उसे अपने जीवन में सब कुछ मिला, फिर भी उसे विद्रोह करना था। किसके खिलाफ वह नहीं जानती थी।
     बावजूद उसे विद्रोहीणी बनना था, और बस विद्रोह करने का एक कारण उसे मिल गया, डॉक्टर साहब के रूप में।
      हमें तो लगता है कि अगर डॉक्टर साहब नहीं होते, उनकी जगह कोई और भी होता, तब भी शायद कुसुम प्यार में पड़ जाती।”

” यह सब क्या बोल रही हो भावना? कुसुम तुम्हारी सहेली है।”

” इसीलिए तो कह रहे हैं अम्मा की कुसुम के प्यार में वह गहराई हमें नजर नहीं आई, जो होनी चाहिए थी।
   खैर….  यह सब छोड़ो। जैसे तुम हमारी और डॉक्टर साहब की शादी को शादी नहीं मानती। हम भी नहीं मानते।
लेकिन हम उन्हे एक अच्छा इंसान मानते हैं,और चिंता मत करो। हम उनके साथ यहां बिल्कुल सुरक्षित हैं।”

” तुम समझती क्यों नहीं हो भावना? अगर तुम उस आदमी के साथ यहां बिना मर्जी के रहोगी तो बाद में परेशानी हो जाएगी।”

” कैसी परेशानी अम्मा?”

” अरे कल को तुम्हारे तलाक के बाद तुम्हारी दूसरी शादी भी तो करेंगे ना! उस वक्त तुम्हारा ब्याह के लिए लड़का कहां से ढूंढेंगे?”

” वाह री मेरी प्रगतिशील विचारों वाली अम्मा!!  एक तरफ तो कह रही हो कि इस ब्याह को तुम इसलिए नहीं मानती क्योंकि हमारी मर्जी नहीं है। और दूसरी तरफ हमारा दूसरा ब्याह कर देना चाहती हो।
    एक बात और कहें, अगर सामने वाला इंसान समझदार होगा तो वह हमसे ब्याह करने से पहले यह नहीं सोचेगा की ब्याह करूं या ना करूं?
      और अगर उसके मन में एक बार को भी यह ख्याल आ गया कि हम डॉक्टर साहब के साथ रहकर अपवित्र हो चुके हैं, और इसलिए हमसे वह ब्याह करें या ना करें तो उसके मन में यह विचार आने से पहले ही हम उसे ब्याह के लिए मना कर देंगे।”

भावना के चेहरे पर सुबह की किरणें पड़ रही थी। उसका चेहरा दमक रहा था।
        उस ओज से जिसने उस में विपरीत परिस्थितियों में भी लड़ने का जज्बा दिया था। पराजित ना होने का हौसला दिया था।

  एक अपराजिता सर उठा रही थी, अपनी भावनाओं और अपने कर्तव्यों के बीच के द्वंद्व को सुलझाते हुए।

      भावना की मां के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई। उन्होंने चाय का प्याला उठाया और अपने होठों से लगा लिया।
  उनके लिए भी शायद कठिन था, ब्राह्मण परिवार में जन्मी सर्वश्रेष्ठ द्विज के घर ब्याह हुआ..
जन्म से जिन्होंने अपनी परिपाटी को कभी नहीं लांघा था! आज एक अपने से निम्न जाति के लड़के के घर, उसकी रसोई में खड़े होकर चाय को पी लेना, इतना आसान भी नहीं था उस ब्राह्मणी के लिए…
      लेकिन भावना की मां वाकई प्रगतिशील थी।

   चाय का प्याला नीचे रखकर उन्होंने अपनी बेटी को अपने गले से लगाया, और उसके हाथ में एक छोटा सा बैग थमा दिया।

” यह क्या है अम्मा?”

” तुम्हारे लिए है, हमारे जाने के बाद देख लेना।”

भावना को समझ में नहीं आया कि उसकी मां ने उसके हाथ में क्या रखा है? वह ऐसे ही उस बैग को थामे हुए अपनी मां के साथ दरवाजे तक चली आई। अपनी मां को विदा कर वह लौटी, तब तक मे राजेंद्र भी उठकर बैठ चुका था।
उसके दोस्त ने आते ही दवाई और इंजेक्शंस लगा दी थी। लेकिन वह फिलहाल राजेंद्र को अपने साथ अस्पताल ले जाकर भरती करना चाहता था। लेकिन राजेंद्र का अस्पताल में जाकर भर्ती होने का बिल्कुल मन नहीं था। और उसकी जिद के आगे फिर उसके दोस्त ने कुछ नहीं कहा।
     दवाई और इंजेक्शंस भावना को बात कर वह भी वापस लौट गया…।

भावना ने इन दो दिनों में कोई कसर नही रखी..।
रात दिन राजेंद्र की तीमारदारी में लगी रही, वक्त पर उसे दवाये देना, समय पर खाना, दूध चाय आदि देना, उसका कमरा साफ़ करना, कपड़े धोना आदि काम तो वो कर ही रही थी, इसके साथ ही सुबह शाम घऱ के दरवाज़े खिड़की खोल कर ताज़ी हवा के भी भीतर आने का उसका प्रयास रहता था..।
सुबह शाम धूपबत्ती जला कर वातावरण को शुद्ध किये रहने का प्रयास भी था.. 
जाते जाते उसकी माँ ने उसे अपने काढ़े का नुस्खा भी पकड़ा दिया था..!
वो शाम और सुबह के वक्त राजेंद्र को काढ़ा भी बना कर पिला रही थी..
लेकिन इस सब में अपनी माँ का दिया बैग वो भूल कर रह गयी… बैग उसने अपने सोने वाले कमरे में यूँ ही रख दिया था, और भूल गयी थी !

आखिर भावना की तपस्या रंग लायी और राजेंद्र तीसरे दिन स्वस्थ अनुभव करने लगा…!

इधर कुसुम के रिसेप्शन के अगले दिन सुबह सुबह ही यज्ञ किसी काम से दूसरे शहर निकल गया..
कोई बड़ा टेंडर निकला था, जिसे भरने उसे अपने राज्य की राजधानी जाना था.. इसलिए बिना समय व्यर्थ किये  वो निकल गया था..
उसका काम दो तीन दिन में होना था, और वो उसी तैयारी से गया भी था, जाने से पहले उसने ना कुसुम को जगाया ना कुछ बताया और चुपके से निकल गया..!

सुबह कुसुम कुमारी की नींद खुली और उसे यज्ञ महाराज कमरे में नजर नही आये..!

कुसुम का माथा ज़रा ठनका ज़रूर लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया..!
तभी फुदकती हुई सिम्मी कमरे में चली आयी.. उसके हाथ में चाय का प्याला ना देख कुसुम गुमसुम सी हो गयी..

“क्या हुआ भाभी.. ?”..”

“नही.. कुछ भी तो नही !”

“कुछ चाहिए था ?”

“वो.. सुम्मी.. तुम  आज चाय नही लेकर आयीं ?”..

“भैया तो सुबह ही निकल गए, फिर चाय किसके लिये लाते ?”

“अच्छा तो ऱोज़ भैया के चक्कर में हमे चाय मिल रही थी.. !” मन ही मन सोच कुसुम का पारा खौलने तो लगा लेकिन ऊपर से उसने कुछ नही कहा..

“वैसे सिम्मी चाय तो हमें भी पीनी थी.. !”

“अब तो भाभी आपको चाय नीचे ही मिलेगी… सभी औरतें जहाँ मिल कर चाय पीती है ना वहाँ.. वो तो नयी बहु के लिए दो दिन छूट रहती है.. ऊपर कमरे में भेज दी जाती, वरना सब वहीँ पीते..।”

चाय के लिए कुसुम सिम्मी के साथ नीचे चली आयी..
उसे लगा था, पता नही कहाँ किस जहन्नुम में जाना होगा। हालाँकि चाय के लिए वो वाकई जहन्नुम भी जाने को तैयार थी..।
लेकिन यहाँ नीचे के आंगन में सभी औरतो को देख उसे भी अच्छा लगने लगा..

सुबह की हलकी सी धूप आंगन में पसर चुकी थी.. दादी एक तरफ अपने लकड़ी के तख़्त पर विराजी थी.. उनकी बिटिया यानी यज्ञ की बुआ उन्ही के पास बैठी थी..।
यज्ञ की अम्मा और काकी वहीँ एक तरफ मोढ़े पर बैठी थी..

सिम्मी की भाभी रसोई से चाय लेकर आयी और सबके सामने बढ़ाने लगी… वहीँ एक तरफ रखे लकड़ी के टेबल पर सिम्मी उचक कर बैठ गयी..।

उन सबको देखती कुसुम सीढ़ियों पर ही बैठ गयी..। सुम्मी की भाभी ने सबको चाय दी और खुद भी एक मोढ़ा खींच कर बैठ गयी..।
सब आपसी बातों में लगी चाय पी रही थी. उन सबको सुनते हुए कुसुम भी चाय की चुस्कियाँ लेने लगी..।
बातों ही बातों में उसे पता चला, यज्ञ लगभग तीन चार दिन के लिए शहर चल गया है.. सुन कर कुसुम ने राहत सी महसूस की..।
अब वो पूरा कमरा उसका था.. पूरे तीन दिन के लिए..।

चाय ख़त्म कर वो अपने कमरे में गयी और दरवाजा बंद कर अपनी ख़ुशी सहेजने का प्रयत्न करने लगी..।

फटाफट नहाने के बाद वो तैयार हो रही थी कि उसका नीचे से बुलौव्वा आ गया..
उसका इस वक्त कमरा छोड़ने का मन नही था, मन मार कर नीचे चली गयी.. उसकी सास रसोई में उसका रास्ता देख रही थी..
उस हवेली में भले ही नौकर चाकर भरे थे, पर दोपहर के खाने में सब्जी और सामिष भोजन ठकुराइन ही अपनी निगरानी में पकवाया करती थी..
आज उन्होंने कुसुम को उसकी पहली रसोई के लिए बुलाया था..
कुसुम को  कुछ पकाना तो आता नहीं था..।
वो अचम्भित सी खड़ी थी..

इतनी बड़ी रसोई में उसे कुछ समझ नही आ रहा था…
रात नींद सही नही होने से उसे अब भी नींद आ रही थी..। और सबसे ज्यादा तो इस वक्त उसे अपने मोबाइल की ज़रूरत थी..

उसे डॉक्टर साब का सोशल अकाउंट खंगालना था..।
वो चुप खड़ी थी, कि उसकी सासु माँ ने उसे रसोई की बारहखड़ी समझना शुरू कर दिया…।

हालाँकि कुसुम के दिमाग में चल रहा था, उसके सामने उसे अपनी सासु माँ की बात का लवलेश भी पल्ले नही पड़ रहा था…।

कद्दू में मेथी की छौंक पड़ती या जीरे की, इससे उसे क्या लेना देना..।
उसे तो बस अभी सोशल अकउंट सूझ रहा था, वो भी डॉक्टर साहब का…

जैसे तैसे रसोई का तामझाम निपटा.. उसके बाद सबको खाना परोसने का महा नीरस और उबाऊ कार्यक्रम शुरू हुआ…।।

एक एक को खाना खिलाने के बाद सबसे अंत में जब उसका नंबर आया, तब तक उसके पेट में भरपूर कबड्डी खेल कर थक चुके चूहे सोने चले गए थे..।

जैसे तैसे दो चार उलटे सीधे कौर डाल वो अपने कमरे में चली आयी..

दरवाज़े को बंद कर वो सीधा बिस्तर पर गिर पड़ी..

उसने डॉक्टर साहब का अकॉउंट खोला और स्क्रॉल कर ही रही थी कि एक तस्वीर पर उसकी आंख अटक कर रह गयी..

डॉक्टर साहब के किसी दोस्त ने इस तस्वीर को खींचा था। और डॉक्टर साहब को टैग किया था। जिसके कारण डाक साहब के अकाउंट पर भी वो तस्वीर दिखाई दे रही थी..

गुलाबी सी साड़ी में भावना की कुछ परोसने को बढ़ी हुई कलाई और शरमाया हुआ चेहरा साफ़ नजर आ रहा था…

वो राजेंद्र को कुछ परोस रही थी और वो हाथ बढ़ाये मना कर रहा था.. दोनों ही एक दूसरे को देखने की जग़ह नीचे थाली की तरफ देख रहे थे.. लेकिन तस्वीर बहुत खूबसूरत आयी थी..।

उन्ही के साथ बैठे राजेंद्र के दोस्त ने खाने के वक्त उस तस्वीर को खींच लिया था.. एक और तस्वीर में वो तीनो ही थे.. सेल्फी ली गयी थी.. !

भावना शर्माती हुई सी कैमेरा की तरफ देखती बड़ी प्यारी लग रही थी..
लेकिन इन तस्वीरो को देखने के बाद कुसुम के दिल में सांप लोट रहे थे..

उसने बिना ज्यादा कुछ सोचे मोबाइल बंद कर के एक तरफ रखा और आँख बंद कर लेट गयी..।

उसे भी मालूम नहीं चला कब उसकी आंख लगी और शाम भी हो गयी..।
     एक बार फिर दरवाज़े पर हुई दस्तक से उसकी आंख खुली, पता चला उसके मायके से कुछ लोग आये है…

वो मिलने के लिए नीचे उतर गयी..
उससे मिलने सुजाता के भाई के साथ उसके खुद के पिता आये थे..
सुजाता का भाई चंद्रभान को देखने आया था और यही रुका हुआ था….
कभी किसी समय सुजाता के इसी भाई के किये कुसुम के रिश्ते की बात सोची जाने वाली थी, लेकिन फिर सुजाता का भाई अंकुर कुछ ऐसी चीज़ो में व्यस्त हुआ कि कुसुम के पिता ने इस रिश्ते से मना कर दिया… हालाँकि मन ही मन अंकुर को कुसुम भा गयी थी, लेकिन फिर जब कुसुम का ब्याह हुआ तब उसने खुद के मन पर लगाम लगा ली लेकिन ब्याह में आया भी नही.. !

अपने पिता से मिल कर कुसुम एक बार फिर भावुक हो गयी..
चंद्रभान को होश आ गया था, और अब दो एक दिन में उसकी छुट्टी हो सकती थी।
ये सारे शुभ समाचार उसके बुझे से दिल को वापस रोशन कर गए..।

वो भी अपनी सास से पूछ एक बार फिर अपने भाई को देख आयी..!

चंद्रा ज्यादा बोल तो नही पा रहा था, लेकिन अपनी बहन को सामने देख उसकी भी आंखे बहने लगी.!
इन आंसुओ के पीछे किसी तरह का पश्चाताप नही था, कि उसने कुसुम की ज़बरन शादी करवाई थी..

ये आंसू सिर्फ बहन के प्यार के लिए थे.. कि अब उसकी छुटकी बहन ससुराल वाली हो गयी. ।

अपने खुद के घऱ, अपने मायके आने के लिए अब ससुराल की अनुमति उसके लिए आवश्यक हो गयी..।

ये ऐसा मौका था जब पत्थर भी पिघल जाये, चंद्रभान तो फिर भी इंसान था..।
दोनों भाई बहन के साथ बहते आंसूओ में दोनों के मन का क्लेश बह गया..।

कुसुम के मन में अपने भाई के लिए जो गुस्सा था, नाराज़गी थी, सब बह गया। लेकिन कुछ था जो बाकी रह गया….
राजेंद्र के लिए मुहब्बत … !!!

जिसके लिए वो अब भी उम्मीद में थी कि शायद उसके डाक सब उसे वापस मिल जायेंगे..।

भाई से मिल कर घऱ लौटने के बाद कुसुम वापस अपने कमरे में कैद हो गयी..।

कपड़े बदल कर वो पलंग पर आयी और वापस अपना मोबाइल खोल लिया..

पहले तो बड़ी देर तक वो अपने डाक साब की प्रोफाइल पर लगी तस्वीर को देखती और प्यार से उस चेहरे पर हाथ फेरती रही फिर उसने डाक साहब के मेसेंजर में उन्हेँ मेसेज छोड़ा और कुछ देर जवाब का इंतज़ार करने के बाद फ़ोन में एक के बाद एक तस्कीरें देखती वो जाने कब थक कर लुढ़क गयी…

क्रमशः

aparna…

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