अपराजिता -72
अखंड यज्ञ सुजाता सभी दरवाज़े तक पहुँच गए थे..
दादी पथराई सी आँखों से दरवाज़े को देख रही थी.. उनके घऱ का चिराग, उनकी मन्नतों का प्रसाद अंदर जीवन और मौत से जूझ रहा था…
कुछ देर बाद रेशम और जय बाहर चले आये…
राजेंद्र अंदर ही रुका हुआ था..
रेशम और मृत्युंजय को बाहर आते देख एक बार फिर यज्ञ और सुजाता तेजी से उन लोगों की तरफ बढ़ गए… अखंड भी अपनी जगह से उठकर आगे बढ़ने को था कि रेशम पर उसकी नजर पड़ी और वह वही पत्थर बनकर खड़ा रह गया।
उसे नहीं मालूम था कि इतने सालों बाद ऐसे अचानक उसका सामना रेशम से हो जाएगा। वह जैसे बर्फ की सिल्ली में बदल गया था।
बड़ी मुश्किल से उसने इतने सालों में अपने आप को संभाला था। ले देकर यज्ञ की शादी के वक्त से वह थोड़ा बहुत हंसने और बोलने लगा था, वरना वह तो अपने आप तक को भूल चुका था…।
यज्ञ की बार-बार की जिद और उसकी शादी के बाद अखंड ने खुद को भी सामान्य दिखाने की कोशिश शुरू कर दी थी। लेकिन उसकी सारी कोशिशें पर घङों पानी पड़ गया।
वह अपनी जगह पर बुत बना खड़ा रह गया। उसमें इतनी भी हिम्मत नहीं बची कि, वह मुड़कर वहां से बाहर निकल जाए। दिल ही दिल में उसे यह भय भी सता रहा था कि रेशम ने उसे देख लिया तो पता नहीं सबके सामने वह क्या करेगी।
लेकिन उसकी किस्मत अच्छी थी कि रेशम की उस पर नजर नहीं पड़ पाई। रेशम सुजाता को देखते हुए ही चंद्रभान की स्थिति के बारे में बता रही थी। रेशम की नजर और किसी पर पड़ ही नहीं रही थी। यज्ञ और सुजाता के पीछे ही चंद्रभान के पिता, उसकी मां, कुसुम और बाकी लोग चले आए।
एक-एक कर रेशम और जय के चारों तरफ लोगों की भीड़ इकट्ठी होती चली गई और अखंड पीछे कहीं छिपता चला गया..।
रेशम ने सारी जानकारी दी, और उसके बाद अंदर चली गई। जय भी उसके साथ चला गया। लेकिन चंद्रभान का ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो गया है, यह सुनकर सभी के दिलों में राहत पहुंच गई थी। हालांकि अब भी डॉक्टर ने बाहर मौजूद लोगों को यह नहीं बताया था कि चंद्रभान के नीचे की हड्डी में नस दब जाने से उसे पता नहीं कब तक बेड पर ही रहना पड़ सकता है ?
लेकिन फ़िलहाल सभी प्रसन्न थे..।
कुछ देर पहले ही भावना की माँ भी अस्पताल पहुँच चुकी थी, लेकिन चंद्रभान को दी हुई लानतों के बोझ तले दबी एक किनारे चुप चाप खड़ी थी..
उन्होंने चंद्रभान को जितना भी कोसा था, उसके बारे में यहाँ मौजूद किसी को कुछ भी नहीं मालूम था, बावजूद वो आत्मग्लानि में सिक्त होती खड़ी थी..
ऐसा ही होता है दिल के साफ और सच्चे लोग बिना गलती के भी सिर्फ कभी के कहे अपशब्दों के लिए भी क्षमाप्रार्थी हो बैठते हैं, लेकिन अहंकारी अपने जघन्य अपराधों के लिए भी आत्ममुग्धता की हदों को पार करते सर उठाये घूमते हैं…
एक किनारे खड़ी भावना की माँ पर कुसुम की ही नजर पड़ी और वो उन तक चली आयी..
उनके पास पहुँच कर वो कुछ पलों के लिए ठिठक कर खड़ी रह गयी, उन्हेँ अचानक भावना और राजेंद्र का साथ साथ दिखा चेहरा याद आ गया।
उसी वक्त भावना की माँ ने आंखे उठा कर कुसुम को देखा, उनकी आँखों की पीड़ा ने कुसुम का दिल मरोड़ कर रख दिया..।
वो उनके गले से लग कर बिलख उठी…।
भावना की माँ भी कुसुम की पीठ पर हाथ फेरती उसे सांत्वना देती रही..
कुछ देर बाद सबके कहने समझाने पर घऱ के लोग वापस लौटने को तैयार हो गए..
फ़िलहाल चंद्रा को होश नहीं आया था, और इतनी जल्दी आने की संभावना भी नहीं थी। इसलिए सबका वहाँ बैठ कर इंतज़ार करने का कोई औचित्य भी नहीं था..।
सुजाता वापस जाने को तैयार नहीं थी, लेकिन दादी की ज़िद के आगे उसे भी सर झुकाना पड़ा और वो सब लोग घऱ के लिए निकल गए….
अखंड अस्पताल में रुकना चाह रहा था.. उसने रेशम को देख था, लेकिन उसे देखते ही वो छिपने लगा था। इसलिए अब भी उसका मन गवाही नहीं दे रहा था कि वो रेशम ही है.. उसे लगा कहीं उसे कोई भ्रम तो नहीं हुआ.. लेकिन उसका दिमाग भले उसे भरमाये लेकिन उसका दिल जानता था वो रेशम ही थी..।
उसे एक झलक देखने को वो बेताब हो उठा…।
इतने सालो बाद अचानक ऐसे रेशम का सामने आना.. वो इतना विस्मित था कि उसने रेशम को ध्यान से देखा ही नहीं, इसलिए उसे रेशम की मांग के पास माथे पर लगा सिंदूर दिखा ही नहीं..
अखंड की वहाँ रुकने की इच्छा थी, लेकिन यज्ञ के बार बार कहने पर वो भी लौटने को तैयार हो गया..।
लेकिन नियति को अखंड का ऐसे लौट जाना शायद मंजूर न था !
वो सब बाहर की तरफ निकल रहे थे कि सुजाता का ही ध्यान इस बात पर अटक गया कि उनके गांव की डाक्टरनी भी उन्हीं के साथ आयी थी..
उसने मुड़ कर यज्ञ से इस बारे में कह दिया..
“कुंवर सा, हमारे दूर्वागंज की डाक्टरनी को हम लोग अपने साथ बिठा लाये थे, हो सकता है, उन्हेँ भी वापस लौटना हो.. एक बाए उनसे पूछ ले क्या ? रात होने को है, यहाँ से अकेली कैसे लौटेंगी वो ?”
“आप रुकिए, हम पूछ कर आते हैं !”
यज्ञ ने कहा और वापस अंदर चला गया..
कुछ देर में ही आपना बैग कंधे पर टांगे रेशम भी यज्ञ के साथ बाहर आती दिखाई देने लगी.. इतनी देर में अखंड गाड़ी लेने जा चुका था, इसलिए उसे मालूम नहीं चला की यज्ञ रेशम को लेने अंदर गया है..।
अखंड गाड़ी लेकर आया और सुजाता के साथ खड़ी रेशम वापस उसे नजर आ गयी, वो तुरंत मुँह फेर कर दूसरी तरफ देखने लगा…
जैसे उससे अपना चेहरा छुपा रहा हो..
यज्ञ अखंड के बाजु में बैठ गया और रेशम कुसुम के साथ पीछे बैठ गयी…
सुजाता ने झुक कर कुसुम की तरफ देखा..
“पहले तो घऱ ही चलोगी न, वहाँ से फिर अपने घऱ चली जाना !”
कुसुम ने हामी भर दी..
सुजाता अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गयी और अस्पताल से एक के पीछे एक गाड़ियां दूर्वागंज के लिए निकल गयी..
चंद्रभान के गुर्गे वहीँ बैठे थे..
बाहर बैठे लड़को के बीच दीपक भी बैठा था..
वहीँ बैठे बैठे उसने अखंड को अस्पताल में आते और जाते देख लिया था….
दीपक के दिल में अखंड के लिए अब भी बदले की आग जल रही थी…
दीपक अनजाने में ही अपने साथ हुए हर गलत काम के लिए अखंड को दोषी मानता आया था। दीपक ने अपने छोटे भाई पंकज को खो दिया था। और दीपक के दिल दिमाग में यह बात बैठी हुई थी कि पंकज का खून करने के बावजूद अपने रसूख और पैसों के दम पर अखंड जेल से छूट गया था, और इसीलिए दीपक अखंड से बुरी तरह चिढ़ता था..।
अखंड का जीवन बर्बाद कर देने के लिए दीपक ने अपनी तरफ से ढेर सारी चालें चली थी। अखंड और उसके परिवार का नाम खराब हो जाए, उसके छोटे भाई का जीवन बर्बाद हो जाए, इसीलिए दीपक ने राजेंद्र से मिलकर उसे कुसुम को साथ लेकर भाग जाने की बात भी कही थी..।
राजेंद्र के पास जिस वक्त फोन नहीं था, दीपक ने खुद अपनी तरफ से ले जाकर उसे मोबाइल, नई सिम कार्ड के साथ इसीलिए दिया था, जिससे राजेंद्र कुसुम के साथ बातचीत करता रहे। और उन दोनों की आपस में बातचीत बनी रहे। राजेंद्र के भाग जाने के लिए उसने अपनी तरफ से बहुत कोशिश की थी। यहां तक कि चंद्रभान के गुंडो को भी उसने इधर-उधर भटकाने की कोशिश की थी। लेकिन चंद्रभान के दिमाग के सामने दीपक की सारी प्लानिंग धरी रह गई थी। और चंद्रभान अपनी बहन को मंडप में पकड़ कर ले ही आया था….
दीपक चाहता था कुसुम राजेंद्र के साथ भाग कर शादी कर ले और यज्ञ की बारात बिना दुल्हन के वापस लौट जाए।
एक ठाकुर परिवार में बारात का बिना दुल्हन के वापस लौट जाना, पूरे समाज में बहुत बड़ी शर्मिंदगी का कारण बन सकता था। उसे पूरा यकीन था कि यज्ञ की बारात लौट जाती तो यज्ञ अपनी शर्मिंदगी से बचने के लिए या तो आत्महत्या कर लेता या अपना मुंह छुपाए इस गांव को छोड़कर कहीं और चला जाता।
लेकिन दीपक के सारे मंसूबों पर पानी फिर गया था। और एक बार फिर अखंड का बुरा चाहने के बावजूद वह बुरा नहीं कर पाया था..।
इत्तेफाक की बात थी कि दीपक की नजर अब तक रेशम पर नहीं पड़ी थी..
अखंड की गाड़ी आगे बढ़ गयी…
यज्ञ ने दूर्वागंज पहुँच कर पीछे बैठी रेशम से सवाल कर लिया..
“आपका घऱ कहाँ हैं मैडम ? आपको वहाँ उतार देंगे !”
रेशम ने हामी भरी और आपने घऱ का पता बताने लगी.. वो जैसे जिस मोड पर मुड़ने बोलती जाती, अखंड वैसा वैसा मुड़ता जा रहा था..
आखिर एक मोड पर जाकर रेशम ने एक घऱ के सामने गाड़ी रुकवा दी..
छोटे से आंगन के पार दुमंजिला घऱ था !
रेशम के दुर्गागंज शिफ्ट होने के पहले अथर्व और रेशम पूरे गांव में घूम कर रेशम के लिए घर तलाश रहे थे। तब यही घर उन्हें सबसे ज्यादा ठीक-ठाक लगा था। पक्का बना दो मंजिला घर था, जिसमें नीचे दो कमरे और एक रसोई थी, और ऊपर भी दो कमरे बने थे..।
ऊपर के कमरों में मकान मालिक का सामान रखा था, और वहां ताला डला हुआ था…
रेशम को वहीँ पास में रहने वाली एक लड़की भी काम के लिए मिल गयी थी, जो घऱ के सारे काम के साथ खाना भी बना कर धर जाया करती थी.।
लेकिन शाम में कई बार वो घऱ पर रुक कर रेशम के वापस आने पर उसे चाय पिला कर ही निकला करती थी.. लड़की की उम्र यही कोई सोलह सत्रह की थी..।
आज भी शाम ढल चुकी थी, रात गहरा रही थी और उसकी रेशम दीदी अब तक घऱ नहीं वापस लौटी थी..।
इसीलिए दरवाज़े की सीढ़ियों पर बैठी वो उसका रास्ता देख रही थी…
जीप को गेट के सामने खड़ा होते देख वो भी खड़ी हो गयी..
रेशम ने कुसुम की तरफ देख मुस्कुरा कर उसका आभार व्यक्त किया और गाड़ी से उतर गयी..
यज्ञ की तरफ देख कर उसने उसे भी आभार दिया । उसी वक्त उसकी नजर अखंड की तरफ भी गयी, लेकिन अखंड अपने तरफ की खिड़की से बाहर देखता रेशम की तरफ मुहं फेरे बैठा था..।
उस पर उड़ती सी नजर डाल रेशम अपना गेट खोल अंदर दाखिल हो गयी..
“तू अब तक घऱ नहीं गयी राधा ?”
.
“नहीं दीदी… आपका रास्ता देख रही थी.. !”
राधा ने वहीँ से मानौर के ठाकुरों की गाड़ी पहचान ली थी, इसलिए वो हाथ जोड़ कर विनम्रता से दुहरी हो गयी थी..।
लेकिन उस पर ध्यान दिए बिना ही अखंड ने गाड़ी मोड ली..
.इस वक्त उसके दिल का क्या हाल हो रहा था ये सिर्फ वही जानता था..
तुरन्त घऱ पहुँच कर अपने दिल का गुबार निकाल देने का उसका जी चाह रहा था..।
जिसे भूलने लगा है ये उसने अपने दिल को बखूबी समझा लिया था। आज उसे यूँ सामने देख वो उसे भूल जाने की अपनी सारी कस्मे ही भूल गया था..।
रेशम की झलक रोज़ एक बार पा लेने को वो बिलकुल वैसा ही व्याकुल होने लगा, जैसे कॉलेज के समय हुआ करता था…
वो यूथ फेस्ट की रंगोली, वो रक्तदान, वो रेशम का उसकी कमीज़ पर मोमेंटो टांकना…।
सब कुछ उसकी आँखों के सामने चलचित्र सा घूम रहा था, और उस चलचित्र को देखना महसूस करना उसे बहुत पसंद आ रहा था..
एक भीनी सी खुशबु में झूमता हुआ सा वो मानौर के लिए गाड़ी मोड गया..
यज्ञ ने भी उसे नहीं टोका और न ही कुसुम ने..
वो लोग घऱ पहुँच गए….
कुसुम एक बार फिर अपनी ससुराल में वापस चली आयी…
वो लोग दरवाज़े में पहुंचे ही थे कि सिम्मी और यज्ञ की माँ कलश में पानी लिए दरवाज़े पर चली आयी..
“अरे रुको रुको.. सर से पानी तो उतार दें। फिर अंदर आना ! अब एक तरह से बहु के पगफेरे भी हो ही गए.. !”
“हम कौन सा मायके से आ रहे हैं ?” अपनी सास की बात पर कुसुम ने तुनक कर कहा और यज्ञ ने एक जलती हुई नजर से कुसुम को देखा और अपनी माँ के द्वारा कलश उतारने के बाद तेज़ी से अंदर चला गया..
लेकिन कुसुम को घऱ की औरतों ने घेर लिया..
“कल कई रस्मे बाकी रह गयी थी, भाभी.. आज होने वाली हैं.. !”
सिम्मी उसे छेड़ने लगी कि तभी कुसुम की सास ने उसे झिड़क दिया..
“अरे अभी तो वो आयी है, ज़रा साँस तो ले लेने दो.. ! क्या हुआ बहु.. ठीक तो हैं तुम्हारे भाई ? कैसे अचानक गिर गए ?”
“पता नहीं, कैसे गिर गए ? ऑपरेशन तो हो गया है, लेकिन अब तक भैया को होश नहीं आया था। लेकिन डॉक्टर्स का कहना है कि खतरे से बाहर है। अस्पताल में ज्यादा लोगों को रूकने नहीं दिया जा रहा था, इसलिए हम सब भी वापस आ गए..!”
” हां ठीक ही किया, अस्पताल में भीड़ बढ़ाकर करना भी क्या है? अब चाहो तो कल सुबह चले जाना..!”
कुसुम ने धीरे से गर्दन हिला दी..
सिम्मी एक बड़ी सी परात में दूध लिए चली आई। उसने उस दूध को एक जगह बिछे कालीन पर रख दिया। और ढेर सारी गुलाब की पत्तियां उसमें डाल दी। वापस चटकती मटकती कुसुम के पास आई और कुसुम को उठाकर उस परात के पास ले जाकर उसने बिठा दिया। बाकी औरतें भी कुछ नानुकुर कर बैठ गई। उनमें से एक पुरखिन ने शचीरूपा को टोक दिया ।
“अरे क्यों शची कल कंकण नहीं खुल पाए बहू के?” तब कुसुम की सास को याद आया कि पिछले दिन हड़बड़ी में वाकई कुछ रस्में छूट गई थी। अंगूठी ढूंढना वगैरा तो फिर भी मनोरंजन के नाम पर की जाने वाली रस्में थी लेकिन कंकण छुङाई तो एक महत्वपूर्ण रस्म थी।
शचीरूपा जरा झेंपती हुई अपनी उस बड़ी ननंद से माफी मांग बैठी..
“हाँ जिज्जी, कल इतने सब काम धाम में हम जरा भूल कर रह गए थे, और फिर कल मुहूर्त भी नहीं था सही, इसी के लाने सब कुछ आज करवा लेते हैं!”
वहीं बैठी शचिरूपा की ननंद ने घूर कर उसे देखा,
” हम ना हो तो इस घर में पता नहीं कैसे तीज त्यौहार शादी ब्याह होंगे? बहू आ गई है, लेकिन अब भी कोई तीज त्यौहार हो बराबर फोन करके पूछेंगी, जीज्जी बरगदाही में कितने बरगद बनाने हैं। बताओ… अब तक इनको याद नहीं हुआ है?”
वह अपना गुणगान गाती बैठी थी, और इतनी देर में सिम्मी और उसकी भाभी उठकर जबरदस्ती यज्ञ को भी उसके कमरे से उठाकर ले आए थे।
यज्ञ का फिलहाल किसी रस्म में शामिल होने का बिल्कुल मन नहीं था, लेकिन सिम्मी और अपनी भाभी का कहना वह नहीं मना कर सका, और नीचे चला आया।
उसे भी मालूम था कि यह मेहमानों की रौनक कुछ दिन की ही है। शादी ब्याह वैसे भी निपट चुका है, दो एक दिन में यह लोग वापस चले जाएंगे।
अगले दिन वर पक्ष की तरफ से होने वाला रिसेप्शन था। मानौर गांव भी काफी बड़ा था, और गांव के हर एक सदस्य को बारात में साथ लेकर जाना बड़े ठाकुर के लिए असंभव था। इसलिए कुछ गिने-चुने बारातियों के साथ ही वह दूर्वागंज गए थे, और इसीलिए ब्याह के दो दिन बाद मानौर गांव के लोगों के लिए उन्होंने अपने बेटे की शादी की पार्टी का इंतजाम कर रखा था…।
हालांकि अब यज्ञ को उस पार्टी में शामिल होने का बिल्कुल भी मन नहीं था। लेकिन अपने पिता और बड़े भाई का चेहरा देखकर वह मना नहीं कर सकता था..।
आज भी सिम्मी के साथ नीचे चला आया.. सिम्मी ने उसे कुसुम के ठीक सामने बैठा दिया..।
उन दोनों के बीच दूध से भरी परात रख दी ….
सिम्मी की भाभी ने डिब्बी खोल कर एक अंगूठी निकाली और दूध में गोल गोल घुमा कर छोड़ दी..
कुसुम और यज्ञ चुपचाप बैठे रहे..
“अरे.. आप लोग तो ऐसे शरमा रहे कि क्या कहे ? आप ही दोनों को अंगूठी ढूंढ़ कर लाना है.. जिसने अंगूठी ढूंढी, अंगूठी उसकी !”
और सिम्मी की भाभी ने कुसुम और यज्ञ का हाथ एक साथ उस परात में डुबो दिया….
कुसुम ने दूध में हाथ डाला और उसे अचानक राजेंद्र के साथ की एक बात याद आ गयी, जब वो उसकी डिस्पेंसरी गयी हुई थी, और कुसुम को आया देख राजेन्द्र हड़बड़ा गया और गलती से उसकी पेन गिर गयी..।
और उस पेन कैप को ढूंढने में जाने कितनी बार उसका और राजेंद्र का हाथ आपस में टकरा गया था…।
उन्हीं ख़यालो में खोयी वो तेज़ी से अंगूठी को खोजने लगी, यज्ञ ने जब कुसुम को तेज़ी से अंगूठे ढूंढते देखा तो उससे भी नहीं रहा गया और उसने भी अपना हाथ तेज़ी से इधर उधर दौड़ना शुरू कर दिया .. ।
इसी सब में कुसुम के हाथ अंगूठी लगी ही थी कि यज्ञ ने उसके हाथ से छीन ली और झट से बाहर निकाल लाया..
अपनी भाभी को अंगूठी दिखा कर उसने उन्हेँ दें दी.. कुसुम ने घूर कर यज्ञ को देखा और वापस सर झुका कर बैठ गयी…
दूसरी बार कुसुम ने दूध में पहले ही हाथ डाल रखा था, यज्ञ ने अंगूठी ढूंढने जैसे ही अपना हाथ अंदर किया, चिढ़ी बैठी कुसुम ने बिलकुल ही बचपना करते हुए अपना नाख़ून यज्ञ की ऊँगली में चुभा दिया…
यज्ञ को बहुत ज़ोर से चुभन हुई, लेकिन उसने अपना दर्द ज़ब्त कर लिया….
चुभन के कारण उसके हाथ से अंगूठी छूटी और उसे कुसुम ने उठा लिया….
“अरे वह इस बार तो देवरानी जीत गयी.. देवर जी तो रह गए.. अब तक तो बराबरी का मुकाबला लग रहा है.. भाई इस में जो जीतेगा, ज़िंदगी भर दूसरे पर राज़ उसी का चलेगा..अब सोच लो देवर जी.. लगता है ठकुराइन, ठाकुर पर भारी पड़ रही है.. !”
कुसुम ने सामने बैठी सिम्मी की तरफ देख कर एक तीखी सी मुस्कान दी, जैसे मन ही मन इन परम्पराओं का मजाक उड़ा रही हो..
लेकिन उस शेरनी को अब तक भी समझ नहीं आया था की किस्मत ने उसका साथ एक शेर के साथ ही जोड़ा था…
अबकी बार वो जैसे ही अंगूठी ढूंढ़ कर उठाने वाली थी, यज्ञ ने पहले ही अंगूठी अपनी ऊँगली में पहन ली..
कुसुम ने अंगूठी उठानी चाही लेकिन उसका हाथ यज्ञ की चीनी ऊँगली पर ठहर गया.. बार बार अंगूठी निकालने की कोशिश में उसे यज्ञ की ऊँगली थामनी पड़ रही थी, और यज्ञ अपनी ऊँगली को मोड माड़ कर उसे अंगूठी नहीं लेने दे रहा था..
आखिर कुसुम अपना हाथ खाली ही बाहर निकालने लगी की यज्ञ को भी मस्ती सूझी और उसने कुसुम की ऊँगली में अंगूठी फंसा दी..।
ये सब इतनी जल्दी हुआ की कुसुम ने चौंक कर यज्ञ की तरफ देखते अपना हाथ ऊपर किया और उसकी ऊँगली में अंगूठी देख सिम्मी और बाकी औरते हलके से ताली बजाने लगीं…
“जिओ जिओ हमरी देवरानी, खूब बढ़िया… ठाकुर पर भारी ठकुराइन हमारी.. !” सिम्मी की भाभी की ये बात सुन कर भी कुसुम के चेहरे पर जीत की वो गर्व वाली भावना नहीं आ पायी..
लेकिन इस बार यज्ञ मुस्कुरा रहा था..
“क्या हुआ छोटी ठकुराइन… हमारी भीख में दी हुई जीत से खुश नहीं हैं आप ?” यज्ञ ने कुसुम के कान में फुलझड़ी छोड़ दी और खड़ा हो गया..
“अब हम चले, या अब भी कोई रस्म बाकी है भाभी ?” उसने पूछा और सामने बैठी उसके रिश्ते की भाभी बोल पड़ी..
“नेग तो देते जाइये देवर जी.. !”
यज्ञ ने कुसुम की तरफ देखा और उसे उस अंगूठी को उन्हेँ देने बोल दिया..
“आपकी जीत की इस अंगूठी को भाभी को पहना दीजिये, आज की यादगार के तौर पर हम आपको कोई और शानदार तोहफा दें देंगे.. !”..
कुसुम ने यज्ञ की बात सुन कर वो अंगूठी भाभी की तरफ बढ़ा दी..
“ये लो.. यहाँ तो जीतने के बावजूद ठकुराइन अपने ठाकुर की कही बात पर चल रही है.. !” वहाँ बैठी औरतों ने ठहाका लगाया और कुसुम को एक तीखी सी मुस्कान देकर यज्ञ वहाँ से चला गया..
क्रमशः
aparna…

Yajyn bahut hi achha hai.dhere dhere kusum ko ye samjh aa jayega.