अपराजिता -69
राजेंद्र नहा कर तैयार हो गया.. उसने भावना की तरफ देखा, भावना ने भी रात में पहन रखे कपड़े बदल कर वापस अपना शादी वाला लहंगा पहना और चली आयी..
इतनी देर में गेंदा ने उन दोनों के लिए चाय बना ली..
राजेंद्र चाय पीते हुए आपने मोबाइल पर खबरे पढ़ रहा था..
भावना चुप चाप चाप सुड़क रही थी.. वहीँ गेंदा रसोई में लगी हुई थी..
किसी का कुछ भी बोलने का मन नहीं था..
सब चुप थे, शांत !!
जैसे अपनी अपनी जंग खुद लड़ रहे हों ! अकेले..
दरवाज़े पर कुछ आहट सी हुई, राजेंद्र ने देखा सरना अंदर दाखिल हो रहा था..।
सरना को देखते ही राजेंद्र अपनी जग़ह पर खड़ा हो गया, सरना आगे बढ़ कर उसके गले से लग गया..
भावना को वहाँ बैठे देख सरना पल भर को सकते में पड़ गया और उसके बाद राजेंद्र ने इन चौबीस घंटो में बीती हर बात उसे बता दी…।
सरना खुद भी सर पकड़ कर बैठ गया…. कुछ वक्त तक वो भी खामोश सा हो गया..।
सबसे पहले राजेंद्र ही अपनी जग़ह से उठा..
“सरना मुझे आज ही निकलना होगा.. ग्यारह बजे तक ड्यूटी पर जाना है मुझे !”
“एक आध दिन की छुट्टी डाल देते राजी !”
“क्या करूँगा छुट्टी लेकर.. अब यहाँ इस गांव में दम घुट रहा है मेरा… नहीं रहना यहाँ ! और न कभी वापस लौटना है.. !”
राजेंद्र ने अपनी बात कही और बाहर निकलने लगा.. सरना ने चुपके से भावना की तरफ देखा..
भावना की खुद की हालत सोचनीय थी.. उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे ? कहाँ जाये ?
राजेंद्र के साथ जाने का उसका रत्ती भर मन नहीं था..। लेकिन वापस लौट कर अपनी माँ के पास भी नहीं जा सकती थी..।
चंद्रा के गुंडों के अनुसार वो रात दिन मानो उसके घर के बाहर ही पहरा देते बैठे थे…. और अगर वो अपनी माँ के घऱ गयी तो उन्हें गोली मार देंगे..।
इसी भय से वो भी राजेंद्र के साथ जाने खड़ी हो गयी..
उसे राजेंद्र के साथ जाने के लिए खड़ा होते देख सरना के चेहरे पर हल्के राहत के भाव चले आये..
उन लोगो को निकलते देख गेंदा अंदर से कुछ टिफिन बांध कर ले आयी..
एक बड़े से झोले में रखे टिफिन को देख भावना ने गेंदा की तरफ देखा..
“वहाँ जाते साथ रसोई में पता नहीं क्या होगा क्या नहीं.. इसीलिए खाना बना कर दे दिए हैं। और रात के लिए थोड़ी साग भाजी रख दिए हैं, जिससे बनाने में आपको उलझन न हो.. !”
भावना ने हाँ में गर्दन हिलायी और वो झोला पकड़ लिया…
जाते जाते जाने क्या सोच कर भावना मुड़ गयी और दीवार से लग कर खड़ी गेंदा के पास चली आयी..।
उसने गेंदा को गले से लगा लिया..।
उससे विदा लेकर वो वापस राजेंद्र के साथ चल पड़ी..
थोड़ा आगे एक मोड पर से शहर जाने वाली बस निकलती थी..।
सुबह का समय था… कुछ देर में ही बस वहाँ से निकली और वो तीनो लोग बस में सवार हो गए..।
बस इस वक्त लगभग खाली ही थी..
भावना अकेली एक सीट पर बैठ गयी.. सरना और राजेंद्र साथ में बैठ गए..
बस गजदलपुर के लिए आगे बढ़ गयी…।
दूर्वागंज छूटते छूटते पीछे, बहुत पीछे छूट गया..।
***
अपनी हवेली की सबसे ऊपरी छत पर खड़ा चंद्रभान शादी में हुए हिसाब किताब को सुन रहा था..
वो एक किनारे छत की रेलिंग से लगा खड़ा था, और सामने बैठे मुनीम उसे ब्यौरा दे रहे थे..।
वो किसी बात पर हामी भर रहा था तो किसी पर बात पर ज़िरह भी कर रहा था..
कुछ लोगों के पैसे देने बाकी थे, उन्ही सब का हिसाब वह कर रहा था..
जिसका जितना बाकी था वो निकाल कर अपने साथ खड़े लड़के को पकड़ता जा रहा था..।
कुछ रूपये उसके पास कम पड़ गए..।
वो झटके से पलट कर दरवाज़े की तरफ बढ़ने को था की जाने कैसे उसका संतुलन बिगड़ा और वो तीसरी मंजिल की छत से अपने घर के आंगन में गिर पड़ा..
एक ज़ोर की आवाज़ हुई और पूरा घऱ स्तब्ध रह गया…
एक दिन भी तो नहीं हुआ था घर की लड़की की विदाई हुए…।
सब अभी ठीक से आराम तक नहीं कर पाए थे, और इतनी बड़ी अनहोनी हो गयी..।
जो जहाँ था वहीँ से आंगन की तरफ दौड़ पड़ा..।
दादी तो आंगन में ही अपने तख़्त पर बैठी सुमिरनी फेर रही थी..
उनके ठीक सामने चंद्रा ज़मीन पर गिरा पड़ा था..
उसके गिरते ही रसोई में खाने की तैयारी देखती उसकी अम्मा चीख कर बाहर की तरफ दौड़ी, सुजाता ऊपर अपने कमरे में बच्ची को कुछ खिला रही थी..।
धड़ाम की आवाज़ और उसके पीछे अपनी सास के चीखने की आवाज़ सुन किसी अनहोनी की आशंका से कांपती वो बालकनी तक आयी और नीचे का दृश्य देख उसका सर घूम गया..।
उसका पति, साढ़े छह फ़ीट का ऊँचा पूरा कद्दावर चंद्रभान ज़मीन पर बेसुध पड़ा था..
उसके शरीर के नीच यूँ लग रहा था खून की नदी बह रही है..
चीखती चिल्लाती वो भी नीचे की तरफ भागी…
हवेली में जो जहाँ था, जैसा था वैसे ही आंगन की तरफ दौड़ पड़ा…
आनन फ़ानन में नौकरों ने मिलकर चंद्रभान के शरीर को उठाया उसकी जीप में पिछली सीट पर उसे डालकर वह सब गांव में मौजूद एक मात्र अस्पताल की तरफ ले चले।
पीछे एक के बाद एक आई गाड़ियों में घर के सदस्य और बाकी नौकर निकल गये ।
घर की सबसे पुरानी बाई, सबके निकलते ही तुरंत ऊपर की तरफ दौड़ गई और सुजाता की बेटी को उसने अपनी गोद में संभाल लिया!
अपने पति के सामने सुजाता को अपनी पांच साल की गिट्टू भी याद न रही..।
रोते रोते सुजाता का बुरा हाल था..।
उसकी अम्मा होंठो ही होंठो में अपने सारे देवी देवताओं का नाम जपती चली जा रही थी…
गाड़ी आगे बढ़ी और गांव के प्राथमिक स्वाथ्य केंद्र के सामने खचाक से जा रुकी…
चंद्रभान का खून बहता चला जा रहा था… उसे उठा कर स्वास्थ्य केंद्र के अंदर ले जाना मुश्किल था..
फिर भी नौकर चाकर उसे उठाने लपके और सुजाता चीख पड़ी..
“मार ही डालेंगे क्या उन्हें.. यहाँ से वहाँ उठा पटक कर..!
डॉक्टर को यही बुला कर लाइए, जो प्राथमिक उपचार दे सकता है दे, उसके बाद इन्हे सीधा शहर के अस्पताल ले जाना होगा.. !
दो नौकर भागते हुए स्वास्थ्य केंद्र की तरफ दौड़ पड़े..
उन दोनों को मालूम था कि यहाँ काम करने वाले डॉक्टर तो शहर तबादला करवा कर जा चुके हैं… ज्यादा से ज्यादा गांव का गंवई कम्पाउंडर बैठा होगा.. वही शायद खून रुकने का कोई इंतज़ाम कर दे..
“पहले ही शहर निकाल लेना था !”
उनमें से एक ने कहा और दूसरे ने भगाते हुए हामी भर दी..
मुख्य दरवाज़े से अंदर झांकते ही दोनों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा..
डॉक्टर साहब की कुर्सी पर एक सुन्दरी डाक्टरनी बैठी किसी रजिस्टर में अपनी आंख गड़ाए कुछ लिख रही थी..
“रे बिट्टू जे कौन ?”
“ये मैडम हैं.. यहाँ नया नया ज्वाइन किया है इन्होने.. !”
बिट्टू ने पूरी अकड़ से जवाब दिया..
और उनमे से एक लड़का हड़बड़ा कर रेशम के सामने गिड़गिड़ाने लगा..
” मैडम चंद्रा भैया छत से गिर गए हैं, गाड़ी में मैडम यहां तक लाने की सुविधा नहीं है। आप जरा आ कर देख लीजिए..!”
“एक्सीडेंट ?” रेशम ने पूछा और लपक कर खड़ी हो गयी..
वो तेज़ी से अपना स्टेथो उठा कर बाहर की ओर लपकी.. उसने बिट्टू को बाकी चीज़े लाने को कहा और तेज़ी से उन लोगो की दिखाई जीप की और बढ़ गयी..
जीप में सवार लोगो को किनारे कर उसने तुरंत चंद्रा की जाँच पड़ताल शुरू कर दी.. सर को घुमा कर उसने देखने की कोशिश की और अपने पास मौजूद दवाओं की सहायता से खून रोकने का इंजेक्शन देकर तुरंत उस स्थान पर पट्टी बांध दी..
“इन्हे तुरंत मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल ले जाना होगा..।”
वो खुद जीप पर बैठी ये सब कर रही थी कि जीप चालक ने गाड़ी बढ़ा दी..
वो सिर्फ रिफरल देना चाहती थी, लेकिन उन लोगो की हड़बड़ाहट देख उसने कुछ नहीं कहा.. सोचा वहाँ अस्पताल में सीनियर डॉक्टर को सब बता कर वापस लौट आएगी..
चलती गाड़ी में उसने अपने साथ लाया ऑक्सीजन मास्क चंद्रा को लगाया और शहर के सीनियर डॉक्टर को फ़ोन लगा दिया…।
सारी बातचीत करते हुए वो वहाँ इमरजेंसी उपचार के लिए बेड तैयार करने के बारे में बात करने लगी..
कुछ देर में ही वो लोग अस्पताल पहुँच चुके थे..
अस्पताल में तुरंत ही चंद्रा को आपातकाल में भरती कर लिया गया…
रेशम भी साथ ही अंदर चली गयी…
चंद्रभान के पिता ने कुसुम को जानकारी देने के लिए उसके ससुराल में भी फ़ोन लगा कर बता दिया..
*****
कुसुम नहा कर आने के बाद आईने के सामने बैठी कुछ सोच रही थी…
आज भी उसकी सासु माँ का फरमान आ चुका था कि उसे सुबह जल्दी तैयार होकर नीचे आना है..।
कुछ पूजा पाठ है..।
लेकिन कुसुम अनमनी सी बैठी थी.. तभी सिम्मी उसके कमरे में चली आयी..।
सिम्मी के पीछे सिम्मी की भाभी भी चाय लिए धमक पड़ी..।
उन्हें तो बस नए नवेले जोड़े के कमरे में जाने का बहाना चाहिए था..।
पलंग पर कुचले बिखरे से पड़े फूल देख कर उनके चेहरे पर तिरछी मुस्कान चली आयी..।
वो जो सोच रही थी, वैसा कुछ भी इस कमरे में नहीं घटा था..।
रात कुसुम को साथ लाने के बाद यज्ञ तो पलंग पर फ़ैल गया, लेकिन कुसुम सोफे पर एक किनारे खुद में सिमटी बैठी रही..।
आधी रात में किसी वक्त उसे नींद आ गयी और वो वहीँ सोफे पर सो गयी..
सुबह अपने वक्त पर उठ कर यज्ञ बाहर चला गया। और कुसुम नहा धोकर नीचे से बुलावे का इंतज़ार करने लगी..
उसी वक्त सिम्मी और भाभी आ धमके..
चाय देख कर कुसुम को अपने सूखते गले का ध्यान आ गया.. उसने चाय का प्याला तुरंत उठा लिया..।
चाय की एक घूंट भरते ही उसे ताज़गी सी महसूस होने लगी…
उसने आंखे बंद कर ली..।
ये चाय उसे अपने मायके की याद दिला गयी थी..।
ऐसी ही चाय उसकी सुजाता भाभी बनाया करती थी..
लेकिन कुसुम के सामने बैठी सिम्मी की भाभी को कुसुम के ये भाव कुछ और ही इशारा करते से लगे…
उन्होंने धीरे से उसकी बांह पर चिकोटी काट ली..
“लगता है रात बड़ी सुहानी बीती है देवरानी जी !”..
सिम्मी वहीँ खड़ी कुसुम को तैयार कर रही थी..
“छी भाभी.. कुछ तो शर्म करो.. हमारे ही सामने शुरू हो गयी आप तो.. !”
“हाँ तो क्या हुआ ? तुम्हारी भी अब हो ही जाएगी.. !”
सिम्मी ने झटके से गर्दन हिला दी..
उसी समय हड़बड़ाया सा यज्ञ कमरे में पहुँच गया..
उसे आया देख सिम्मी और भाभी हंसती हंसाती बाहर चली गयी..
यज्ञ कुसुम के पास चला आया.. हालाँकि कुसुम की तरफ देखते ही उसे रात की सारी घटना आँखों के सामने कैमेरा रील्स सी घूम गयी, लेकिन फिर खुद को संभाल कर वो आगे बढ़ गया..
“कुसुम तुम्हारे चंद्रा भैया का एक्सीडेंट हो गया है !”
कुसुम चौंक कर यज्ञ की तरफ देखने लगी..
“क्या हुआ ?”
“छत से गिर गए गए है… तीसरी मंजिल से..।
उन्हें शहर के अस्पताल ले जाया गया है..
तुम्हारे बाबूजी का फ़ोन आया था.. हमारे बाबूजी के पास..।
नीचे अखंड भैया इंतज़ार कर रहे, चलो.. हमे तुरंत अस्पताल जाना होगा !”
“हमे नहीं जाना कहीं !”
कुसुम ने पलके झपकते हुए मुहं फेर लिया और यज्ञ आश्चर्य से उसे देखने लगा..
“पगला गयी हो क्या ? इतना भयानक एक्सीडेंट हुआ है और तुम अपने भाई को देखने नहीं जाना चाहती हो? हद बावली लड़की हो। तुम जैसी पागल हमने आज तक नहीं देखी..!”
” कभी देखेंगे भी नहीं। हमें बनाने के बाद बनाने वाले ने वो साँचा ही तोड़ दिया..!”
” अच्छा किया! वरना जाने कितने पागल पैदा हो जाते, पागलों की फैक्ट्री बन जाती.. !”
कुसुम ने कोई जवाब नहीं दिया..
“पागलपन छोड़ो कुसुम.. चलो हमारे साथ !”
” हम किसी को देखने नहीं जाएंगे, और आप पर भी कोई बंदिश नहीं है, कि आप अपने ससुराल वालों से अपनी रिश्तेदारी निभाएं।
आप भी अपना काम धाम देखे। यहां से किसी को अस्पताल जाने की जरूरत नहीं है..!”
” पागल लड़की !! डॉक्टर ने जवाब दे दिया है, तुम्हारे चंद्रा भैया किसी भी वक्त अपनी अंतिम सांस ले सकते हैं!
क्या अब भी सिर्फ इस बात के लिए उनसे नाराज रहोगी कि उन्होंने तुम्हे तुम्हारी पसंद की शादी नहीं करने दी… ?
जाओ जाकर मरो कहीं! तुम हो ही इस लायक !
स्वार्थी नीच !
अरे औरत तो अपने हर रिश्ते में मां बन जाती है। चाहे बूढ़ा पिता हो या बड़ा भाई। सबके लिए वह छोटी लाडली बेटी या बहन नहीं मां का स्वरूप हो जाती है। और एक तुम हो कि अपने स्वार्थ में ऐसी अंधी हुई पड़ी हो कि आखिरी सांस लेते हुए अपने भाई को भी माफ नहीं कर पा रही हो।
तुम जैसी स्वार्थी लड़की उनसे ना ही मिले यही अच्छा है..।
और सुनो, तुम होती कौन हो हमें यह सिखाने वाली कि हमें किस से निभाना है? और किस से नहीं? तुमसे हमारा जो भी रिश्ता हो, लेकिन वह घर अब हमारे रिश्तेदारों का घर है। हमारी ससुराल है वह। और वहां जो भी अच्छा या बुरा होगा उसमें हम शामिल होंगे, इसके लिए हमें तुमसे मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है..।”
यज्ञ गुस्से में पलटा और बाहर निकल गया…।
तेज तेज कदमों से चलता हुआ वह सीढ़ियां उतर कर बाहर निकल गया। बाहर अपनी जीप में ड्राइविंग सीट पर बैठा अखंड उसी का इंतजार कर रहा था। यज्ञ आया और अखंड के ठीक बगल में बैठ गया..।
“चलिए भैया !”
“कुसुम.. नहीं आयी ?”
“वो….
यज्ञ को समझ में नहीं आया कि आखिर अखंड से वह क्या कहें? लेकिन तभी अखंड की नजर दरवाजे पर पड़ गई..
“आ गयी !” अखंड के ऐसा कहते ही यज्ञ ने गुस्से में पलट कर देखा, दरवाज़े से बाहर आती कुसुम उसे भी नजर आ गयी..।
कुसुम चुपचाप आयी और गाड़ी की पिछली सीट पर सवार हो गयी..।
अखंड ने शहर के अस्पताल की तरफ गाड़ी दौड़ा दी..
क्रमशः
aparna…

बहुत अच्छा जी