अपराजिता -67

अपराजिता -67

   राजेंद्र और भावना जा चुके थे… और निनाद खड़ा उन्हें देखता रह गया था…

राजेंद्र भावना, भावना के घऱ के मुख्य द्वार से बाहर निकल कर रास्ते पर आ गए…!
उन्हें यहाँ छोड़ कर जाने वाले लफंगे गुंडे जा चुके थे.. बाहर रास्ते में दोनों चुप खड़े किसी ऑटो या रिक्शा का रास्ता देख रहे थे..
पर गांव में इस वक्त उन्हें कहाँ का रिक्शा मिलता..?
कुछ देर खड़े रहने के बाद राजेंद्र ने ही बोलना शुरू किया..

“भावना, तुम अपनी माँ के घर ही रुक जाओ ! तुम मेरे साथ क्यों आ रही हो ?”

भावना ने भीगी आँखों से राजेंद्र की तरफ देखा, और पलट कर पीछे देखने लगी..
उसके घऱ के दरवाज़े पर खड़े निनाद की हलकी छाया सी बस उसे नजर आ रही थी.. इतनी  दूर से उसका चेहरा नहीं दिख रहा था..
लेकिन उसके चेहरे पर जो लाचारगी भावना ने देखी थी वो अब भी आँखों के रास्ते भावना के दिल में उतर कर उसका दिल मरोड़े जा रही थी..।

“नहीं… हम आपके साथ ही चलेंगे !”

आगे राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा और धीरे से कदम बढ़ाते आगे बढ़ गया…

“अभी यहाँ से शहर जाने के लिए बस भी नहीं मिलेगी.. मेरे घऱ चलते हैं !”

भावना ने हामी भरी और उसके पीछे चल दी..
कुछ दूर बढ़ कर वो अगली गली में मुड़ गए और चलते हुए राजेंद्र के घऱ पहुँच गए..

दरवाज़े पर पड़ा ताला उनका मुहं चिढ़ा रहा था..
चाबी तो राजेंद्र की जेब में नहीं बल्कि उसके शहर वाले सरकारी आवास की अलमारी में पड़ी ऊंघ रही थी..।
राजेंद्र ने खीझ कर अपने माथे पर अपना हाथ मार लिया..

लेकिन जाने किस कोने से झांक उन्हें वहाँ खड़ा देख गेंदा चली आयी.. उसके घर पर भी राजेंद्र के घऱ की एक चाबी रहती थी..
उसने आकर दरवाज़ा खोल दिया..

राजेंद्र और भावना अंदर चले गए, उन्ही के पीछे गेंदा भी अंदर घुस गयी..
राजेंद्र के वहाँ न रहने पर भी उसने उस घऱ को साफ सुथरा कर रखा था..

रोज़ सुबह एक बार आकर वो सफाई कर के घऱ में दिया बाती कर जाती थी…

राजेंद्र अंदर घुसते ही एक तरफ रखे तख़्त पर फ़ैल गया..
अब उसकी हिम्मत चूक गयी थी..।
उसका ये घर सिर्फ एक कमरे का ही था, जिसमे एक तरफ एक तख़्त बिछा था, दो कुर्सियां थी..।
दीवार पर बने आले में भगवान रखे थे और वहीँ एक तरफ हल्का पर्दा सा खींच कर रसोई की व्यवस्था थी..

उसे तख़्त पर पड़े देख भावना संकोच से एक तरफ खड़ी हो गयी..
गेंदा ने तुरंत उसकी तरफ एक कुर्सी बढ़ा दी, और घऱ के पिछले दरवाज़े से बाहर निकल कर अपने घर चली गयी…

सुबह शाम की दिया बाती के कारण घर पर गुग्गुल कपूर की खुशबु फैली हुई थी…

भावना ने चुपके से राजेंद्र की तरफ देखा, राजेंद्र पलंग पर आंखे बंद किये पड़ा था, अपनी एक बांह उसने अपनी आँखों के ऊपर से रखी हुई थी.. जूते नहीं उतारने के कारण उसने पैर अब भी ज़मीन पर ही रखे थे…।

उसे देखने के बाद भावना इधर उधर पानी के लिए देखने लगी.. उसे प्यास सी लग रही थी..
पता नहीं कब से उसने पानी नहीं पिया था..

वो खड़ी हुई और परदे के पार बनी रसोई की तरफ बढ़ने को थी कि, उसका सर घूम गया और जब तक वो सम्भल पाती चक्कर खा कर वो ज़मीन पर गिर पड़ी..

उसके गिरने से हुई ज़ोर की आवाज़ से राजेंद्र ने आंख खोल दी..
उसने देखा भावना ज़मीन पर पड़ी हुई थी..

वो एक झटके में उठा और भावना के पास पहुँच गया..
उसने धीरे से उसे उठाया और तख़्त पर लेटा दिया…
दीवार पर बने आले में उसका बीपी एप्रेटस रखा था, उसने तुरंत भावना का बीपी जांचा… बीपी बहुत ज्यादा कम बता रहा था…
उसने तुरंत अपने यहाँ रखे बैग से कुछ इंजेक्शन निकले और भावना को देने के बाद उसके सरहाने बैठ गया..
लगभग दस बारह मिनट में भावना ने आंखे खोल दी..
खुद को पलंग पर पा कर उसने राजेंद्र की तरफ देखा..

“चक्कर आ गया था तुम्हे ? सुबह से कुछ खाया नहीं था क्या तुमने ?”

“खाया तो था !”  रिरियाती सी आवाज़ में उसने कहा

कुछ देर में ही गेंदा उन दोनों के लिए खाना और चाय ले आयी..

गेंदा ये जानती थी कि राजेंद्र कुसुम से ब्याह करने जा रहा है, लेकिन कुसुम की जग़ह भावना कैसे आ गयी
उसने किसी से इस बारे में कोई सवाल नहीं किया..।

वो चुपचाप उन दोनों के लिए थाली में परोस कर नमकीन मसाला पूरी, आम का अचार और चाय ले आयी..
उसने स्टूल उठा कर राजेंद्र के पास रख दिया..
गेंदा को इस तरह सारा काम करते देखा राजेंद्र को बुरा लग रहा था, लेकिन इस वक्त उसकी उठकर कुछ भी करने की हिम्मत नहीं थी।
टेबल सरका कर गेंदा ने परोसी हुई थाली राजेंद्र के सामने रखी स्टूल पर धर दी।
    जिस तखत पर भावना लेटी थी, उसके ठीक बगल में कुर्सी डालकर राजेंद्र बैठा था। और उन दोनों के बीच में रखे स्टूल पर एक थाली में ढेर सारी गरमा गरम पूड़ियां अचार और दो चाय के गिलास रखे थे।

राजेंद्र ने भावना की तरफ देखा और उसे खाने का इशारा कर दिया। लेकिन भावना ने ना में गर्दन हिला दी ..

“हमें भूख नहीं है..।”

“इस वक्त भूख के कारण नहीं, तुम्हारे शरीर की ज़रूरत के कारण तुम्हे खाना होगा !”

राजेंद्र ने दो टूक शब्दों में कहा और एक पूरी का रोल बना कर चाय में डूबा कर खाने लगा..

राजेंद्र के शब्दों में नाराज़गी नहीं थी, लेकिन शब्द कठोर ज़रूर थे..।
वो भी क्या करता ? अगर भावना के साथ गलत हुआ था तो क्या राजेंद्र के साथ गलत नहीं हुआ था..? वो इस वक्त किसी का नाज नखरा उठाने की फुरसत में नहीं था..।

भावना ने भरी भरी आँखों से थाली की तरफ देखा, थाली धुंधली सी पड़ने लगी थी, वो भी चुपचाप एक पूड़ी का टुकड़ा उठा कर कुतरने लगी..

गेंदा कुछ देर चुप बैठी रही, फिर उठ कर चली गयी…
उस बेज़ुबान ने अब भी राजेंद्र से किसी बात की कैफियत न ली..

चुपचाप अपने घऱ जाने के बाद पिछले आंगन की सीढ़ियों पर बैठी अपने घुटनो पर सर दिए वो सिसक उठी..
उसकी माँ घऱ के अंदर ज़मीन पर अपना बिस्तर डाले लेटी पड़ी थी..
उन्होंने गेंदा को आवाज़ भी लगाई.. “का हुआ बिटिया, अब तक सोने नहीं आयी ?”
इतना पूछ कर करवट बदल कर वो सो गयी…
और सीढ़ियों पर बैठी गेंदा अपनी किस्मत को सिसकती रही..

***

खाना खत्म हुआ और भावना प्लेट उठाने जा रही थी कि राजेंद्र ने प्लेट उठा ली.. वो उसे लिए परदे की ओट में बनी रसोई की तरफ बढ़ गया।
राजेंद्र ने ही रसोई में एक किनारे एक छोटा सा सिंक लगवा दिया था। वहीं जाकर उसने दोनों कप और प्लेट धोकर उल्टा कर रख दिए।
   भावना चुपचाप राजेंद्र को यह सब करते देख रही थी। लेकिन उसका उसे रोकने या टोकने का मन ही नहीं किया।
राजेंद्र वापस आया और कमरे में एक किनारे रखी चटाई को निकाल कर उसने जमीन पर डाल दिया।
तख्त पर एक ही इंसान के सोने लायक जगह थी। उसमें रखी दो तकिया में से एक तकिया उसने ली और चटाई पर डालकर नीचे लेटने लगा कि भावना ने उसे रोक दिया।

” डॉक्टर साहब आप ऊपर सो जाइए। हम नीचे सो जाएंगे।”

   राजेंद्र ने भावना की बात का कोई जवाब नहीं दिया। और चुपचाप नीचे लेट गया। सीधे लेट कर उसने अपनी आंखों के ऊपर अपनी बाहें रख ली। जैसे जानबूझकर अपनी आंखें बंद कर लेना चाहता हो, अपनी परिस्थितियों से, अपने आसपास चल रहे शोर शराबे से, अपने अंधेरे भविष्य से, और अपने आप से दूर जा चुकी कुसुम से….. हर बात से वह जैसे आंखें मून्द लेना चाहता था।
इतनी कोशिशें के बावजूद उसे नींद नहीं आ रही थी। तख्त पर बैठी भावना नीचे लेटे राजेंद्र को देख रही थी। उसे राजेंद्र की तकलीफ समझ में आ रही थी, लेकिन वह भी कुछ नहीं कर सकती थी।

अचानक राजेंद्र उठकर बैठा और झटके से खड़ा हो गया।
   कमरे में पिछले तरफ के दरवाजे को खोलकर वह बाहर निकला और अचानक जोर से चीख उठा। भावना घबराकर पीछे की तरफ भाग कर पहुँच  गई।
   राजेंद्र ने अपनी दोनों मुट्ठियाँ भिंची और जोर-जोर से चिल्लाने लगा। ऐसा कर के वो अपने अंदर के दर्द को बहा देना चाह रहा था, भावना चुपचाप दरवाजा पर खड़ी रह गई। उसकी आंखों से एक बार फिर आंसुओं की मोटी मोटी बूंदें गिरने लगी।
  पता नहीं रात कब दोनों वापस आए, और अपनी अपनी जगह पर सो गए।

सुबह गेंदा ही दरवाजा सरक कर अंदर चली आई। वह चाय लेकर आई थी ।
   गेंदा के आने तक में भावना की नींद खुल चुकी थी, लेकिन उठने का उसका मन ही नहीं कर रहा था। वह यूं ही तख्त पर पड़ी हुई थी। लेकिन गेंदा को आते देखकर वह उठ बैठी। कमरे के अंदर आते ही गेंदा ने देख लिया कि पलंग पर भावना बैठी है, और नीचे चटाई पर पेट के बल राजेंद्र सोया पड़ा है।

एक किनारे से होते हुए गेंदा रसोई की तरफ बढ़ गई। वहां से एक गिलास में पानी लेकर वह भावना के लिए ले आई। भावना ने गेंदा को देखकर मुस्कुराने की कोशिश की लेकिन उसकी यह कोशिश नाकाम साबित हो गई। गेंदा ने चाय का प्याला भावना की तरफ बढ़ा दिया।
भावना ने राजेंद्र को देखा, वह गहरी नींद सोया पड़ा था। भावना अपनी चाय का प्याला लिए पीछे की तरफ बने आंगन की तरफ बढ़ गई। उसने गेंदा को भी चाय लाने का इशारा कर दिया।

गेंदा भी भावना के साथ पीछे चली आई। पिछले आंगन में कभी राजेंद्र के दादा ने ढेर सारे पौधे लगाए थे, जो अब काफी बड़े हो गए थे। एक तरफ केले का झाड़ था, तो एक कही नींबू का झाड़ लगा हुआ था। नींबू के झाड़ में ढेर सारे नींबू भी फले हुए थे। दो ऊंचे ऊंचे आम के पेड़ थे। कुछ फूलों की क्यारियां लगी हुई थी। एक तरह से वह आम्र कुंज उस वक्त भावना को बहुत शांति दे रहा था। एकाध तितली भी इधर से उधर उड़ रही थी। भावना दरवाजे की सीढ़ियों पर बैठ गई। उसने गेंदा को भी बैठने को कहा और दोनों ही लड़कियां अपनी अपनी चाय पीते चुपचाप बैठ रही ..।
भले ही गेंदा ने सांत्वना के शब्द नहीं कहे, लेकिन उसके क्रियाकलाप भावना के तप्त ह्रदय को जैसे अपने प्रेम की अमृत बूंदो से सींचे दे रहे थे.. ।

भावना को गेंदा का साथ अच्छा लग रहा था..।
दोनों चुपचाप अपनी चाय गुटकती बैठी रहीं..।
चाय पीने के बाद भावना ने केले के झाड़ से कुछ कच्चे केले तोड़े और अंदर जाकर उन्हें साफ करके उन्हें काटकर उनकी भुजिया बनाने लगी। भावना कुछ देर तक सीढ़ियों पर बैठी रही, और फिर अंदर चली आई। इस वक्त तो उसके पास उसका सामान भी नहीं था, लेकिन उसे नहाने का मन हो रहा था।

उसने गेंदा से बाथरूम के लिए पूछा। गेंदा ने आंगन में निकल कर एक तरफ मौजूद बाथरूम की तरफ इशारा कर दिया। गांव के घरों का बना बाथरूम था, जहां सिर्फ एक बाल्टी रखने की ही जगह थी। बाथरूम ऐसा था, जहां नहाने के बाद कपड़े नहीं बदले जा सकते थे। इसी पसोपेश में भावना परेशान सी खड़ी थी..।

गेंदा सब्जी बनाकर भावना को बता कर अपने घर चली गई।
उसके जाने के बाद भावना ने दरवाजा बंद किया, और नहाने के लिए आंगन में चली आई। लेकिन बाथरूम का आकार प्रकार देखकर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। बाल्टी में उसने नहाने के लिए पानी तो भर लिया, लेकिन लहंगा उतारने के बाद वापस लहंगा पहनने की वहां हालात नहीं थे। वह कमरे में वापस आई और कमरे में मौजूद एक मात्र खुली हुई अलमारी में अलग-अलग रखे कपड़े ढूंढने लगी। आखिर उसे राजेंद्र का एक कुर्ता और पजामा मिल गया। उन्हें लेकर वह नहाने चली गई।  अपने सर से ढेर सारा पानी डालने के बाद उसे थोड़ी सी राहत मिलने लगी थी। नहा कर अब उसे अच्छा लग रहा था। कपड़े बदलकर वह कमरे में आई तो उसने देखा राजेंद्र उठकर बैठा हुआ था।

अपने मोबाइल पर वह कुछ मैसेज पढ़ रहा था। भावना के आते ही होने वाली आहट से राजेंद्र ने सर उठाया। और सामने भावना को अपने कपड़ों में देखकर वह कुछ पलों को चौक गया, लेकिन उसने अपने चेहरे पर उस वक्त भी कोई भाव नहीं आने दिए..।

“आपके लिए चाय बना दे ?”

भावना के सवाल पर राजेंद्र ने न में गर्दन हिला दी..

” आदत नहीं है मुझे सुबह-सुबह चाय पीने की.. फ्रेश होकर तैयार हो जाऊं, मुझे ड्यूटी ज्वाइन करना है। इसलिए जल्दी निकलना पड़ेगा.. !”

जरूरत भर की बात बोलकर राजेंद्र उठकर नहाने जाने को था कि गेंदा उसके लिए चाय और एक डिब्बे में कुछ पराठे लिए अंदर दाखिल हो गई। उसने चाय राजेंद्र के सामने रखी स्टूल पर रख दी..

राजेंद्र ने चाय का प्याला देखा, उठाया, और पीने लगा..
भावना ने राजेंद्र को चाय पीते देख कर फिर कुछ नहीं बोला..।
उसे थोड़ा सा बुरा जरूर लगा कि जब उसने पूछा तो इतने मुंहफट तरीके से उसे मना करने वाला गेंदा की लाई चाय तुरंत पीने लगा।
लेकिन भावना ने अपना सर झटक कर उस बात पर ध्यान नहीं दिया।

गेंदा ने प्लेट में दो पराठे और थोड़ी सी केले की सब्जी निकाली और उसके साथ ही मिर्च का अचार रखकर भावना की तरफ बढ़ा दी। भावना ने राजेंद्र की तरफ देखा, राजेंद्र चाय का प्याला रखकर नहाने जा रहा था। भावना ने भी प्लेट पकड़ी और एक कुर्सी पर बैठकर खाने लगी..

“तुम भी खा लो गेंदा !”

“आप खा लीजिये दीदी.. हम बाद में खा लेंगे.. !”

“ऐसे क्यों.. क्यों बाद में खाओगी.. ! जब बना खुद रही हो तो खाओ भी !”

गेंदा ने चुपके से न में सर हिला दिया…

***

पलंग पर बैठी कुसुम यही सोच रही थी कि क्या करूँ… यज्ञ आया और उसके बाजु में बैठ गया..।

   लेकिन यज्ञ के बैठते ही ऊपर से नीचे लटकी हुई फूलों की लड़ियां जो यज्ञ के नीचे आ गई थी, झटके से गिर पड़ी और यह सारी की सारी लड़ियां कुसुम के सर पर ऐसे गिरी ऐसा लगा जैसे ढेर सारी फूल मालाओं के भीतर कुसुम कहीं फंसकर रह गई। उसे देखकर यज्ञ को हंसी आने लगी..।

कुसुम खुद को उन मालाओं से निकालने की कोशिश करने लगी। लेकिन उन लड़कियों से निकलने की जगह कुसुम और उलझती चली जा रही थी। कुसुम का सिर्फ चेहरा नजर आ रहा था। बाकी उसके चारों तरफ ढेर सारे फूल ही फूल थे। यज्ञ ने कुसुम की तरफ देखा,

” क्या हम कुछ मदद कर दें?”

यज्ञ के सवाल पर कुसुम ने उसे देखते हुए धीरे से हां में गर्दन हिला दी। और यज्ञ एक-एक कर उन फूल मालाओं को निकालने लगा..

“आपको पता है, हमें फिल्मी गानों का बहुत शौक है। अभी इस मौके पर एक गाना याद आ रहा है, सुना दे?”

कुसुम को यज्ञ की इस बात पर इतनी जोर से गुस्सा आया कि उसे लगा यज्ञ को पलंग से नीचे धक्का दे दे। लेकिन ऐसे कैसे वह अपने ससुराल में, अपने पति के साथ इतना बुरा कर सकती थी ।
इसलिए बेचारी चुप लगा गई।
यज्ञ को लगा लड़की की नाम में ही हां है और मुस्कुरा कर उसने गाना शुरू कर दिया..

फिर छिड़ी रात, बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की

फूल के हार फूल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की

आपका साथ-साथ फूलों का
आपकी बात बात फूलों की…

लड़के की आवाज में दम था और उसके सुर ताल में भी कोई खोट ना थी।

यज्ञ एक-एक लड़ियां निकालता जा रहा था और इसी सब में बार-बार उसके और कुसुम के हाथ आपस में टकराते जा रहे थे। परेशान होकर कुसुम ने अपने दोनों हाथ अपनी गोद में रख लिए, और चुपचाप बैठ गई।

गाना सुनते हुए जैसे वह किसी और दुनिया में पहुंच गई थी। इस वक्त उसे बस गाने के बोल और उसकी धुन सुनाई दे रही थी। और वह खोई हुई थी।
    उसने धीरे से आंखें बंद कर ली थी।
यज्ञ ने एक-एक कर हर एक लड़ी कुसुम के गले से निकालकर बाहर रख दी। वह धीरे से कुसुम के करीब पहुंच गया। उसने कुसुम के चेहरे को अपने हथेली में थामा और धीरे से उसके होठों पर अपने होंठ रखने जा रहा था कि अचानक कुसुम चौक कर खड़ी हो गई।

उसने आंखें खोली और उसका मन किया कि खींचकर एक तमाचा यज्ञ के चेहरे पर रसीद कर दे।

    लेकिन खुद पर काबू करके उसने खुद को रोक लिया। वह पलट कर वापस खिड़की पर जाकर खड़ी हो गई।

“हम आपसे कुछ कहना चाहते हैं।”

यज्ञ मुस्कुराता हुआ पलंग पर बैठा रहा।

” कहिए ना, हम आपसे सब कुछ सुनना चाहते हैं।”

” पता नहीं, आप हमारी बात को समझ पाएंगे या नहीं। लेकिन…।”

” कह दीजिए, आपको समझने और समझने के लिए ही तो आपसे ब्याह किया है। हमें तो आप पहली ही नजर में बहुत भा गई थी। हमें समझ में आ गया था कि हमारे साम्राज्य को संभालने के लिए, हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए आप ही बनी है।
हमारे जीवन की और हमारे इस घर परिवार की छोटी ठकुराइन आप ही हैं।
कहिए क्या कहना चाहती हैं आप।”

कुसुम ने सख्ती से अपने होंठ भींच लिए। अपनी ताकत जमा की और राजेंद्र के बारे में यज्ञ को सब कुछ सच-सच बताने के लिए उसने अपनी आंखें खोली और यज्ञ की तरफ घूम गई…

क्रमशः

aparna..

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