अपराजिता -104

अपराजिता -104

हम तो साथ जायेंगे !”  कुसुम की आँखों की ज़िद देख कर यज्ञ ने हाथ आगे बढ़ा कर उसे साथ चलने का इशारा कर दिया…
और खुद भी निकल गया..

कुसुम तेज़ी से चलती हुई यज्ञ के साथ उसकी गाड़ी की अगली सीट पर बैठ गयी..

यज्ञ मुस्कुरा कर ड्राइविंग सीट पर बैठा और उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

कुसुम खामोश से बैठी थी। वह पूछना तो बहुत कुछ चाहती थी लेकिन चुप ही थी..।
उसके दिल दिमाग में खलबली मची हुई थी..
आखिर कौन थी वो जिससे मिलने के लिए सुबह सुबह ही छोटे ठाकुर तैयार हो गए..।
इतनी खलबली, इतनी जलन तो डाक बाबू को भावना के साथ देख कर भी नहीं उठी थी..।

आखिर कुछ दूर पहुँच कर यज्ञ ने रास्ते के एक तरफ गाड़ी खड़ी की और उतर गया..

“यहां से पैदल चलना होगा.. चल पाओगी ?”

“हाँ क्यों नहीं चल पाएंगे ! हमारे पाँव में मेहन्दी थोड़े ना लगी है ?”.

यज्ञ हँस कर आगे बढ़ गया और कुसुम उसके साथ चल पड़ी..

संकरी संकरी गलियों को पार कर वो चलता चला जा रहा था…
उन गलियों में कहीं खुली नाली से गंध उठ रही थी, कहीं रास्ते पर पड़े गोबर पर मक्खियां भिनक कर फिर मिठाई वाले की खुली रखी मिठाई पर मंडरा रही थी..।

कहीं गले के कुत्ते एक दूसरे को भौंक भौंक कर परेशान थे..।
नाक पर अपना आंचल रखे कुसुम चलती जा रही थी..
अब तो उसके पेट में खलबली होने लगी थी…

आखिर एक घर के सामने जाकर यज्ञ रुका और अंदर चला गया.. कुसुम भी चली गयी..

अंदर से एक लड़का बाहर निकल रहा था, उसने यज्ञ को देखा और उसके पैर छू कर उसे अंदर ले गया…

“आजी कैसी है आकाश ?”

उस लड़के ने धीमे से”ठीक ही हैं ! भैया” कह दिया..

“आपको याद कर रही थी !”

“हम्म… डॉक्टर्स का क्या कहना है ?”

“अब कुछ नहीं कह रहे… बस यही बोला की घर ले जाओ, अब जितने दिन हैं परिवार के बीच रहे !”

“हम्म.. !”

हमेशा हंसने खिलखिलाने वाले यज्ञ को कुसुम ने पहली बार इतना गंभीर देखा था..

यज्ञ को वो लड़का एक बड़े से ओसारे को पार कराता हुआ एक कमरे में ले गया…

कमरे में हल्का सा उजाला था.. एक चारपाई पर एक बूढी औरत लेटी हुई थी..

यज्ञ उनके पास पहुंच कर बैठ गया… उसने धीरे से उस बुढ़िया औरत की हथेली थाम ली..
उस औरत ने अपनी आँखे खोली और यज्ञ को देख ख़ुशी से उनकी आंखे चमकने लगी..

“बाबू…..

उन्होंने बड़े कष्ट से कहा और यज्ञ ने हाँ में गर्दन हिला दी..

“ये क्या हाल बना रखा है आजी… ऐसे कैसे चलेगा ? अब जल्दी से अच्छी हो जाओ ! उसके बाद हमारे साथ चलना !”

लड़खड़ाती ज़बान से उन्होंने कुसुम की तरफ देख कर उसके बारे में पूछा..

“ये कौन है बाबू ?”

“आपकी बहु है आजी !”..

“सुन्दर है.. पर तुम से कम!” उनके चेहरे पर हलकी सी मुस्कान चली आयी..

“हम्म, लेकिन नकचढ़ी हमसे ज्यादा है !” यज्ञ ने मजाक करते हुए कहा और आजी ने धीरे से अपना हाथ उठा कर यज्ञ को मारने का इशारा सा किया.. यज्ञ ने झुक कर अपना गाल उनकी हथेली के पास कर दिया..

कुछ देर तक दोनों वैसे ही बैठे रहे.. उसके बाद यज्ञ उन्हेँ तमाम सलाहें देता रहा…
और वो हँस हँस कर सब सुनती रहीं…।

इसी बीच आकाश, यज्ञ और कुसुम के लिए चाय ले आया…

कुसुम ने चाय की गिलास उठायी लेकिन पता नहीं क्यों इस गरीब से घर में, एक रुग्ण लाचार वृद्ध महिला के कमरे से उठती अजीब बीमारी वाली गंध के बीच चाय उससे पी नहीं जा रही थी….।

कमरे में छोटी सी खिड़की थी वो भी ठीक से खुली नहीं थी…
कुसुम यही सब देखती बैठी थी और यज्ञ ने चाय उठा कर अपने होंठो से लगा ली..

“हम्म… तो आकाश को चाय बनानी सीखा ही दी आजी ! अब जाकर ढंग की चाय बनाना सीखा है इसने !”

आकाश हल्का सा मुस्कुरा उठा..
यज्ञ की बात सुन कर कुसुम ने भी चाय का प्याला उठा कर मुहं से लगा लिया…

लेकिन चाशनी सी मीठी पनियल उस चाय में उसे कोई स्वाद नहीं मिला..।
दो घूंट ज़बरदस्ती भरने के बाद कुसुम खुद पर और अत्याचार नहीं कर पायी और उसने चाय का गिलास नीचे रख दिया..।
वो बड़े आश्चर्य से सलीकेदार पसंद रखने वाले अपने अनोखे पति का कारनामा देख रही थी..
पता नहीं उसे इस गोबर सी चाय में क्या रस मिल रहा था… तारीफ कर कर के पी गया पूरी.. !

यज्ञ चाय ख़त्म कर अपनी जगह पर खड़ा हो गया..

“अब चलता हूँ आजी… आज ही वापस भी लौटना है !”

आजी ने बिना कुछ बोले हाँ में गर्दन हिला दी..

उन लोगो को बाहर तक छोड़ने आकाश कमरे से बाहर निकल गया.. कुसुम भी निकलने वाली थी कि तभी उसका ध्यान यज्ञ पर चला गया.. यज्ञ ने अपनी जेब से कुछ रूपये निकाले और आजी के हाथ में रख दिए..

“ज़रूरत नहीं है बाबू.. हमारा इलाज तुम ही तो करा रहे हो, घर में अनाज भरवा रहे हो.. और फिर किस के लिए रुपये दे रहे ?”

“कभी चाट पकौड़ी खाने का मन किया तो क्या हमारी आजी मन मार कर रह जाएँगी.. ना कभी नहीं.. !”

“अब कुछ खाया नहीं जाता बाबू.. अब सब ख़त्म.. हो सकता है तुम्हारे अगली बार आने तक में हम रहे ही ना… पर आकाश का कुछ ख्याल कर लेना बाबू.. उसका अब कोई नहीं है..।
बिना माँ बाप का बच्चा कहाँ जायेगा.. ?
उसे अपने साथ कुछ काम पर लगा लेना,यहां भी ठीक है लेकिन इस इतने पिछड़े गांव में ये चावल ही फटकता रह जायेगा..
    जैसे हमने की ये भी जिंदगी भर तुम्हारी सेवा कर लेगा.. !”

उन्होंने धीरे से अपने हाथ जोड़ लिए और उनके हाथो को अपने माथे से लगा कर यज्ञ ने थाम लिया..

.”चिंता मत करो आजी.. हम है ना !”

“बस तुम्हारा ही आसरा है बाबू… मुन्ना ठीक है ? कुछ भूत उतरा उसका ?”

“हाँ अखंड भाई ठीक है !”

इससे ज्यादा यज्ञ ने अखंड के लिए कुछ नहीं कहा और आजी से विदा लेकर बाहर निकल गया…।

कुसुम को कुछ समझ नहीं आ रहा था..
वो भी बाहर निकल गयी..।

आकाश कुछ दूर तक उन दोनों के साथ आया…

“आकाश कभी कुछ भी लगे हमे तुरंत बताना !”

“और किसे बताएँगे भैया जी… आप ही तो सहारा है, लेकिन अब लग रहा आजी बचेंगी नहीं !”

“हम्म… हिम्मत रखो.. हम हैं ना !”

आकाश ने यज्ञ और कुसुम के पैर छुए और लौट गया..
बड़े बोझिल कदमो से यज्ञ गाड़ी की तरफ बढ़ गया… कुसुम को समझ में आ गया था कि यज्ञ का मन ख़राब हो गया है..।

उसने अपनी तरफ से माहौल को हल्का करना चाहा लेकिन गफलत में बहुत हलकी बात कह गयी..

“अच्छा तो आप इन बूढी दादी से मिलने आ रहे थे, हमे तो लगा कहीं अपने बड़े भाई के सामान आपने भी कोई गांव गंवई की डाक्टरनी तो नहीं छांट रखी,  जिसके दीदार के लिए चले आये हैं.. !”

यज्ञ का पहले ही मन ख़राब था, उस पर अपने बड़े भाई के लिए ऐसे शब्द सुन उसका खून खौल गया और उसके हाथो वो हो गया जो उसने कभी नहीं सोचा था..

उसने खींच कर एक तमाचा कुसुम के गाल पर रसीद कर दिया…

कुसुम भौचक सी अपना गाल थामे आँखों में आंसू लिए यज्ञ को देखती रह गयी…

“आज बोल दिया कुसुम लेकिन आज के बाद कभी हमारे बड़े भैया के लिए कुछ भी बोला तो सोच लेना….
हम उनके खिलाफ कुछ नहीं सुन सकते..!
अगर तुम्हारे दिमाग में ऐसी कोई भी गलत बात है, और तुम्हारा स्वभाव ऐसा ही है तो हम साथ नहीं रह पाएंगे..।
तुम चाहो तो आज अभी यहां से वापस अपने घर लौट जाओ… !”

यज्ञ ने खींच कर गाड़ी का दरवाज़ा बंद कर लिया..

जिस दिन से शादी हुई थी, कुसुम यही तो चाह रही थी.. कुछ ऐसा हो जिसके बाद वो पैर पटकती, अपने मायके लौट जाये, लेकिन आज अचानक उसे ऐसा मौका मिल जायेगा उसने नहीं सोचा था..।
     आज जब यज्ञ ने उसे उसके घर लौटने बोल दिया तो वो खुश क्यों नहीं है…।
क्यों अब भी यज्ञ की गाड़ी का दरवाज़ा पकडे खड़ी है..

आज तो बहुत बड़ी बात हुई थी… कुसुम को जीवन में पहली बार किसी ने थप्पड़ मारा था…।
वो ठकुराइन जो जिंदगी भर किसी के आगे नहीं झुकी आज थप्पड़ खा कर भी यज्ञ के सामने झुकने को क्यों तैयार हुई जा रही थी….।
कुसुम की आँखों से लगातार पानी बह रहा था..

“गाड़ी के दरवाज़े को छोड़ो कुसुम.. हमें जाना है.. !”

“हमे यहां अकेले छोड़ कर चले जायेंगे ?”

कुसुम की आवाज़ भीगी हुई सी थी.. यज्ञ उसकी तरफ देख तक नहीं रहा था..
.कुसुम ने अपनी तरफ का दरवाज़ा खोला और अंदर चली आयी..

“हमे माफ़ कर दीजिये छोटे ठाकुर… हमसे गलती हो गयी..

“गलती नहीं गुनाह किया है तुमने.. तुम हमारे भाई के बारे में जानती क्या हो जो उनके बारे में निर्णय ले लिया? और उनका मजाक उड़ाने लगी। अरे ऐसा इंसान इस पूरी दुनिया में चिराग लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलेगा। उनके पैर की धूल बराबर भी नहीं हो तुम। जो आज इतनी शान से छोटी ठकुराइन बनी माथे पर सिंदूर सजा कर हाथों में चूड़ियां काढे घूम रही हो ना, इसका पूरा श्रेय सिर्फ और सिर्फ अखंड भैया को जाता है। हमने तो तुम्हारी प्रेम कहानी सुनते ही सोच लिया था कि हम तुम्हें छोड़ देंगे तुमसे अलग हो जाएंगे, और तुम्हें तुम्हारे प्रेमी को सौंप देंगे।
हमारा तो तुममे इंटरेस्ट ही खत्म हो गया था। लेकिन अखंड भैया ने हमें बैठ कर रात भर समझाया।
उन्होंने समझाया के रिश्ते इतनी आसानी से नहीं टूटते। उनके कहने पर हम तुम्हारे डॉक्टर साहब से मिलने गए थे।
उन्होंने हमें कहा कि एक बार डॉक्टर साहब से भी पूछ कर देख लो। अगर दोनों अब भी एक दूसरे से प्यार करते हैं तो कुसुम को बेशक तलाक दे देना। लेकिन अगर डॉक्टर साहब अब अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गए हैं तो तुम्हारे इस एक तरफा निर्णय से कुसुम कहीं की नहीं रह जाएगी। ना मायके की न ससुराल की।

यह सब उनकी समझाई थी, जो हम तुम्हारे डॉक्टर साहब से जाकर मिले, उनसे बात की और तब हमें समझ में आया कि तुम कितनी बड़ी बेवकूफ हो।
तुम्हारी बेवकूफी को तुम्हारा बचपना समझ कर आज तक हम अपने रिश्ते को संभाले रखने की कोशिश कर रहे थे। और इसके पीछे हमारे उन्ही अखंड भैया का हाथ था, जिनका नाम लेकर तुम मजाक उड़ा रही हो।
उनके पैर धोकर पियोगी ना, तब भी तुम्हारा यह गुनाह कम नहीं होने वाला….।

प्यार प्यार प्यार का नाम जपने वाली तुम, जानती क्या हो प्यार होता क्या है? प्यार किया है अखंड भैया ने उनकी कहानी सुनोगी ना तो पता चलेगा तुम्हें कि सच में प्यार क्या होता है?

लेकिन छोड़ो तुम इस लायक ही नहीं हो कुसुम कुमारी कि तुम्हें हम और मौका दें। तुम्हारे लिए यही ठीक रहेगा कि अभी हमारे साथ घर चलो, और वहां से तुम अपने घर वापस चली जाओ।
अब हम तुम्हें नहीं रोकेंगे..।”

” अरे रुकिए तो, हमारी बात तो सुन लीजिए। हम माफी चाहते हैं।
हमने तो बस आपका मूड सही करने के लिए मजाक किया था, हमें नहीं पता था कि आप इतना बुरा मान जाएंगे..।”

“अब पता चल गया ना कि हमारे लिए हमारे अखंड भैया भगवान के बराबर है। हम उनके लिए किसी के मुंह से कुछ भी गलत नहीं सुन सकते। तुम तो फिर भी बहुत दूर हो, हम तो अपने बाबूजी और अम्मा के मुंह से उनके खिलाफ कुछ नहीं सुन सकते..।”

“माफ कर दीजिए यज्ञ बाबू, हमसे वाकई बहुत बड़ी भूल हो गई। असल में हमें लगा कि उन बूढ़ी काकी से मिलने के बाद आप जरा अपसेट हो गए हैं, आपका मूड सही हो जाए बस इसीलिए।
     लेकिन हम नहीं जानते थे कि आपको इतना बुरा लग जाएगा। अगर हमें थोड़ा भी मालूम होता तो हम कभी ऐसा मजाक नहीं करते। वैसे हम जानना चाहते थे कि, यह बूढी काकी है कौन?
अगर आप हमें बताना सही समझे तो बता सकते हैं..।”

“वैसे इतने दिनों में हमें इतना तो समझ में आ गया कि कुसुम कुमारी जी आपको रिश्ते नातों की ना तो समझ है, और ना आप निभाना जानती हैं।
इसलिए यह कौन है, क्या है, यह भी आपको बताने से कोई खास फर्क पड़ेगा नहीं।
  फिर भी बता देते हैं, यह कहा था ना आपसे कि हमारी अम्मा की डिलीवरी यहीं इसी गांव में हुई थी। इसलिए हमारा और भैया का कुछ अलग ही लगाव जुड़ा हुआ है नानी के घर से।
हर साल गर्मी की छुट्टियों में हम दोनों यहां आते थे। यह आजी हमारी नानी के घर की सेविका थी। उन्होंने बचपन में हमें और भैया को खूब खिलाया है। भैया को वह मुन्ना कहा करती थी और हमें बाबू।
और आज तक यही नाम लिया करती हैं। इनका एक बेटा और बहु थे, जो किसी हादसे में नहीं रहे।
   उन्हीं का एक लड़का था, जिसको अब यह अपने साथ रखे हुए हैं। कुछ समय पहले आजी की तबीयत बहुत खराब हुई, और उसके बाद वह काम करने में असमर्थ हो गई। इसलिए नानी के घर से काम छोड़ दिया।
हालांकि उनके बेटे को हमारे मामा जी ने अपनी राइस मिल में काम दे दिया है। उसी से इनका घर चलता है। लेकिन जब पिछले साल आजी बहुत बीमार पड़ी तब आकाश अखंड भैया के पास आया था। उसके बाद अखंड भैया ने इनका इलाज वगैरह करवाया और अस्पताल में उनके लिए पूरी बात कर ली।

अब हर महीने उनकी दवाइयां अस्पताल से आ जाती हैं। पैसे कभी हम आकर भर जाते हैं, कभी अखंड भैया।

हमारा कुछ ज्यादा ही लगाव था, क्योंकि हम छोटे थे ना घर के।
हम इन्हीं की गोद गीली किया करते थे, और यह हमेशा मुस्कुरा कर हमारे कपड़े बदल देती थी।
बहुत बड़े होने तक हम उनके साथ खेलते आए थे। हम पंद्रह – सोलह साल के हो चुके थे, तब भी नानी के घर आते थे।
तब आजी हमें अपने हाथ से खाना खिलाया करती थी। अब आज हम उनके उस प्यार का एहसान तो नहीं चुका सकते, लेकिन कोशिश यही करते हैं कि साल में कम से कम दो-तीन बार आकर उनका हाल-चाल पूछ कर चले जाएं।

हमने तो पिछली बार जिद की थी कि हमारे साथ घर चलिए, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। वह अपने घर में ही आराम महसूस करती हैं, और यह बात हम भी समझते हैं।

हमारे घर पर हमारे बाबूजी अम्मा दादी यह लोग अब भी जात-पात की बेडियो में जकड़े हुए हैं। गांव का समाज इतनी आसानी से एक नीची जात की औरत को अपने घर पर रख कर खाना नहीं खिला सकता।
बस इसीलिए हम चुपके से इनसे मिलने चले आते हैं…।
अभी भी घर पर बाबूजी को यही पता है कि नानी की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए हम ननिहाल आए हैं।

आजी से मिलते हैं, थोड़े पैसे आकाश के हाथ में रख देते हैं, और थोड़े आजी के हाथ में। हालांकि हम जानते हैं कि हमारे दिए पैसे आजी कभी खर्च नहीं करती। लेकिन फिर भी उन्हें हमारे हाथ से लेने में बड़ी तसल्ली मिलती है। वह यह सोचकर खुश होती है कि उनके हाथ के पाले हुए लड़के आज इस काबिल हो गए हैं कि उनका खाना खर्चा बड़े आराम से उठा सकते हैं…।

यज्ञ अपनी बात कहते हुए गाड़ी से बाहर आ चुका था.. कुसुम भी उसकी बात ध्यान से सुनते हुए उसके पास पहुँच चुकी थी…

यज्ञ अभी अपनी बात कह रहा था की एक धीमी सी आवाज़ हुई और यज्ञ के गर्दन और कंधे के बीच एक गोली आ लगी और यज्ञ एक ज़ोर का झटका खा कर सम्भल नहीं पाया और नीचे गिर गया..

खून के छींटे उड़ कर कुसुम का माथा और आधा चेहरा लाल कर गए..

क्रमशः

aparna…

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Kavita
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1 year ago

Ye kya ho gya🥺