अपराजिता -101
उसे नहीं मालूम था कि उसके दरवाजे के ठीक बाहर लगे नीम के पेड़ के पीछे खड़े डॉक्टर साहब उसे देख रहे थे..
वो इधर उधर देखती आगे बढ़ गयी..
उसका इधर उधर देखना भी राजेंद्र के अंदर खलबली मचा रहा था.. उसे लग रहा था शायद भावना उसे ही ढूंढ़ रही.. कि कहीं वो आ तो नहीं गया..
पेड़ के अँधेरे में राजेंद्र ने खुद को थोड़ा और समेट लिया..
भावना तेज़ कदमो से बस स्टेण्ड की तरफ बढ़ गयी.. अँधेरा था बावजूद भावना का रिक्शा नहीं लेना राजेंद्र को और भी खल गया..।
भावना चल रही थी, और राजेंद्र उसके पीछे बढ़ता चला जा रहा था..
कुछ आगे बढ़ कर भावना ज़रा ठिठकी और थम कर पीछे पलट गयी.. तुरंत राजेंद्र खम्भे की ओट में हो गया..
भावना फिर आगे बढ़ गयी..।
उसके हाथ में लबा चौड़ा बैग था, राजेंद्र ने मन ही मन तय कर लिया कि इसी बैग में भावना ने ज़रूरत भर के कपड़े भी रख लिए हैं.. इसका मतलब वो निनाद के साथ भागने ही वाली है..।
राजेंद्र का दिल टूक टूक हो गया..
मन भर का बोझ सीने पर लिए वो कैसे चल पा रहा था ये वही जानता था..।
बस स्टेण्ड पर पहुँच कर भावना उधर उधर देखते हुए निनाद को ढूंढने लगी..
उसे दूर एक बेंच पर सर झुकाये बैठा निनाद नजर आ गया..
वो उसकी तरफ बढ़ गयी.. उसका खुद दिल तेज़ी से धड़क रहा था.. लेकिन फिर भी वो चलती चली जा रही थी….
कुछ देर में वो निनाद के सामने पहुँच गयी..
निनाद सर झुकाये बैठा था, वो उसके ठीक सामने खड़ी हो गयी..
निनाद ने आंखे उठायी और भावना को देखता रह गया..।
हल्की नारंगी रंग की साडी में उसका गोरा रंग और खिल रहा था… बाल कायदे से बंधे थे, कानों में छोटी छोटी बालियाँ, नाक में छोटी सी लौंग और भौंहो के ठीक बीच लगी लाल बिंदी…
और उस पर माथे पर सजा लाल सिंदूर…
भावना का चेहरा ही बदल गया था….
निनाद अपलक उसे देखता रह गया……
कुछ देर के लिए भावना भी उसे देखती रह गयी.. कितने दिन बाद दिखा था निनाद..
“बावना !”
निनाद ने उसके चेहरे को अपनी बांहों में ले लिया..
“मेरे साथ चलो ! मैं तुम्हे लेने आया हूँ !”
भावना तो सिर्फ बावना सुन कर ही पिघल गयी…
उसकी ऑंखें भर आयी.. कितना बावला था ये लड़का ? कौन आज के ज़माने में इतना करता है किसी के लिए.. ? उसके पिता ने एक बार उसे अपने कमरे में सहारा क्या दिया, वो तो ज़िंदगी भार के लिए उसके पिता की ज़िम्मेदारी अपने सर ले बैठा ?
आज के संसार में ऐसा निस्वार्थ इंसान कहाँ मिलेगा ? भावना की आँखों से आंसू बह रहे थे, वो कुछ भी कहने में असमर्थ हो रही थी….
और निनाद का ये हाल था कि भावना को देख कर उसकी ऑंखें झपकना भूल गयी थी, ज़बान जम गयी थी…
लेकिन चेहरे की मुस्कान थम नहीं रही थी…
वो लगातार मुस्कुरा रहा था..
“बावना… चलो… अब हम यहां से दूर चले..!”
“निनाद…
“हम्म.. “
“सुनो.. माँ !”
“हाँ तुम्हारी अम्मा को बी लेकर जायेंगे बावना.. बिलीव मी… मैं उनको अपना अम्मा मान कर चलेगा..!”
“नहीं निनाद.. सुनो. !”
“हम्म !”
“माँ अब नहीं रही.. !”
“व्हाट !”
“हाँ… !”
“कैसे ? क्या हुआ ?”
“तबियत सही नहीं थी, डॉक्टर साहब ने बहुत कोशिश की लेकिन बचा नहीं सके !”
“कहाँ के डॉक्टर ?”
“मेरे डॉक्टर साहब !”
निनाद की भँवे तन गयी..
“कौन ?”
“मेरे पति, माय हस्बैंड !”
निनाद मुँह बाये उसे देख रहा था..
“उस नॉनसेंस शादी को तुम क्यों मान रही हो ? आर यू मैड?मैं नहीं मानता.. बावना, ये सब भूल जाओ.. चलो मेरे साथ !”
“निनाद…. हम कैसे समझाएं तुम्हे, !”
“क्या समझाना है ? इस बात में समझाने का क्या सेन्स? तुम्हारी शादी ज़बरदस्ती की गयी है, उसे निभाने की क्या ज़रूरत ? मैं ऐसी शादी को नहीं मानता ?”
“लेकिन मैं अब मानने लगी हूँ….
निनाद.. कैसे बताऊँ तुम्हे कि डॉक्टर साहब क्या हैं.. ?
निनाद मैं जानती हूं, तुम जैसा इंसान होना आसान नहीं है। तुमने मेरे पिता के एक छोटे से एहसान के बदले उनकी पत्नी और बेटी का जिंदगी भर का बोझ अपने कंधों पर ले लिया था।
तुम इंसान नहीं देवता हो मेरे लिए।
मेरी इस तरह डॉक्टर साहब से जबरदस्ती शादी नहीं हुई होती तो मैं पूरे मन से, खुले दिल से तुम्हारे साथ तुम्हारा हाथ पकड़ कर चली जाती। लेकिन अब मैं शादी से पहले कि वह लड़की भावना नहीं हूं।
तुम्हारा निस्वार्थ प्रेम देखकर मैं भी तुमसे प्रेम करने लगी थी। झूठ नहीं कहूंगी तुमसे, लेकिन मुझे तुम में मेरे आराध्य श्री कृष्ण दिखने लगे थे। और मुझे लगा था स्वयं कृष्ण मुझे मेरी कठिनाइयों से बचाने के लिए चले आए हैं।
तुम्हारी अलग भाषा, तुम्हारा अलग परिवेश, अलग खानपान, कुछ भी हम दोनों के बीच नहीं आता।
लेकिन हम दोनों के बीच आ गई मेरी शादी!!
मानती हूं कि मेरी शादी मेरी मर्जी के बिना करवाई गई, लेकिन इसमें डॉक्टर साहब का कोई कुसूर नहीं। वह तो मुझसे भी ज्यादा तकलीफ झेल रहे हैं।
जानते हो वह मेरी सहेली कुसुम से बहुत प्यार करते थे। उन्होंने तो सारे सपने देख लिए थे कुसुम के साथ जिंदगी बिताने के।
अपने लिए नया घर ले लिया था। उस घर को वह कुसुम की पसंद की चीजों से सजाना चाहते थे।
और कुसुम की जगह मैं चली आई उस घर में।
कहां कुसुम और कहां मैं?
हम दोनों का कोई मुकाबला नहीं। कुसुम की एक उंगली के बराबर भी मैं नहीं हूं। इसके बावजूद डॉक्टर साहब ने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं किसी भी बात में कुसुम से या उनसे कमतर हूं। उन्होंने हमेशा मुझे बहुत इज्जत दी है। इतनी इज्जत आज तक मुझे किसी ने नहीं दी निनाद!
और सच कहूं तो यही बात मेरे दिल को छू गई। जब मां की तबीयत खराब हुई, तब ऐसा लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया है। लेकिन उस वक्त डॉक्टर साहब बिल्कुल किसी करीबी रिश्तेदार की तरह मेरे साथ खड़े रहे। उन्होंने पल भर के लिए भी मां को अकेला नहीं छोड़ा। उनकी तीमारदारी के लिए जो सब संभव था, वह सब उन्होंने कर लिया। उस वक्त अस्पताल में भले ही थकान से मैं सो जाया करती थी, लेकिन मैंने उन्हें जागते हुए देखा है।
वह रात रात भर अपने लैपटॉप में मेरी मां की बीमारी के लिए इलाज ढूंढ रहे थे। मैंने उन्हें विदेश में भी किसी से बात करते सुना था। वह इतनी मिन्नतें कर रहे थे उस आदमी से कि कैसे भी करके मां को देख ले और उन्हें बचाने का प्रयास कर जाए।
हालांकि उस आदमी के आने से पहले ही मां हम सब को छोड़कर चली गई।
एक रात डॉक्टर साहब का दोस्त अचानक घर चला आया था, हमने जो खाना बनाया था वह इन दोनों दोस्तों ने मिलकर खा लिया।
सच कहें तो बहुत कस के भूख लगी थी, लेकिन बनाने का बिल्कुल मन नहीं था। पता नहीं डॉक्टर साहब कैसे सब कुछ समझ जाते हैं। वह तुरंत उसे लिए बाहर निकल गये, और बाजार से हमारे लिए खाने का सामान लेकर वापस लौट आए।
यह बहुत छोटी छोटी सी बातें हैं निनाद, लेकिन जिंदगी बहुत लंबी है। और इस लंबी जिंदगी को गुजारने के लिए अगर आपका हमसफर इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना है ना, तो जिंदगी का दुष्कर मार्ग बहुत आसान हो जाता है।
हमने अपनी मां को बचपन से ही अकेले जूजते देखा है। हर छोटी सी चीज के लिए।
हमारे पिता जरूर बाहर चले गए थे कमाने के लिए,वह पैसे भी भेजते थे। लेकिन माँ को एक छोटी सी भी वस्तु की जरूरत हो तो उन्हें हमे साथ लेकर बाजार निकलना पड़ता था ।
कभी हम बीमार पड़ जाते थे, तो मां अकेले रात रात भर जागती थी। और उसके बाद दिनभर काम में लगी रहती थी। जब मां खुद बीमार पड़ जाती थी, तब दवाइयां खा खा कर वह घर के काम कर लेती थी…।
हमारी अम्मा की एक सहेली है जो अक्सर हमारे घर आया करती थी, और वह जब भी आती रोते हुए ही आती थी। क्योंकि उनके पति उनकी इज्जत नहीं करते थे। बात-बात पर उन्हें ताने देना, मारना पीटना उनका रोज का काम था, और वह अक्सर माँ से यही कहती थी कि मेरी जैसी किस्मत से अच्छा तो तुम्हारी किस्मत है कम से कम अपनी स्वतंत्रता से रह तो सकती हो। और तब माँ अपने दुखड़े गाती थी।
उन दोनों को देखकर हमें लगता था कि शादी करनी ही नहीं चाहिए। और सच कहें तो तुमसे मिलने के पहले हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हम इन सब जंजाल में कभी पङेंगे भी।
तुमसे मिलने के बाद पहली बार यह ख्याल आया था कि हां हम भी शादी कर सकते हैं।
और फिर इस ख्याल के आते ही अचानक हमारी शादी हो गई। और शादी के बाद धीरे-धीरे डॉक्टर साहब के साथ रहते हुए समझ में आया कि वो ऐसे इंसान है जो देवता बराबर है हमारे लिए।
सोचो निनाद कुछ समय पहले तक हम शादी के नाम से दूर भागते थे, और अब शादी के अपने इस रिश्ते में हम इस कदर मशगूल है कि हमें बहरी दुनिया की खबर ही नहीं रही.. ।”
निनाद के माथे पर बल पड़ गए थे। उसने भावना को देखा और उसकी दोनों ठंडी हथेलियों को पकड़ लिया..
“बावना प्लीज मुझे छोड़ने की बात मत सोचो। मैंने तुमसे इतने सालों से प्यार किया है कि मैं खुद नहीं जानता। तुम्हें बहुत खुश रखूंगा, तुम्हें किसी चीज की दिक्कत नहीं होगी..।”
“हम जानते हैं निनाद, तुम हमें बहुत खुश रखोगे। लेकिन अब हम तुम्हें खुश नहीं रख पाएंगे।
अब डॉक्टर साहब के अलावा हम किसी की खुशी का विचार नहीं कर पाएंगे। अब हमें उन्ही में अपना सब कुछ नजर आता है। हम जानते हैं वह हमसे प्यार नहीं करते। उन्हें अभी बहुत वक्त लगेगा कुसुम को भूलने में..।”
“ऐसे आदमी के पीछे तुम क्यों पागल हो रही हो? हो सकता है वह कभी कुसुम को ना भूल पाए, तो क्या करोगी..?”
“हां ऐसा हो सकता है कि वह कुसुम को कभी ना भूल पाए, लेकिन तब भी हम अपनी आखिरी सांस तक जी जान से उनसे प्यार करेंगे। उनकी सेवा करेंगे, और उन्हें खुश रखने का हर एक उपाय करेंगे।
निनाद हम डॉक्टर साहब की बहुत इज्जत करते हैं। बहुत ही ज्यादा ।
हम तुम्हें समझा नहीं पाएंगे। एक लड़की का दिल ऐसा ही होता है। वो जिस से प्यार करती है बहुत टूट कर करती है। लेकिन अगर वह किसी लड़के की इज्जत करती है तो उसमें उसका दिल और दिमाग दोनों शामिल होता है। और उस इज्जत में जो प्यार घुलता है ना उसका कोई सानी नहीं।
हमारे तरफ शादी के बाद पत्नी पति के पैर छूती है। ना जाने हमारे समाज में कितनी ढेर सारी ऐसी शादियां होती है, जिनमें पति-पत्नी एक दूसरे को पहले से जानते तक नहीं। ऐसे में यह रस्म कितनी बेगानी हो जाती होगी?
सोचो जब लड़की अपने होने वाली पति को जानती ही नहीं, तो कैसे उसका मन गवाही देगा अपने पति के पैर छूने का?
लेकिन हमारा तो रोज मन करता है कि सुबह उठकर हम डॉक्टर साहब के एक बार पैर छू ले।
जब वो थक कर अपने पलंग पर लेटते हैं ना, तो बहुत बार हमारा मन करता है कि उनके पैरों के पास बैठकर उनके पैरों को प्यार से सहला दें। थोड़ा सा तेल लेकर उनके तलवों पर लगा दें, जिससे उनकी तकलीफ, थकान दूर हो जाए।
लेकिन हम जानते हैं डॉक्टर साहब हमसे इतनी सेवा कभी नहीं करवाएंगे।
लेकिन जब हमारे बनाए हुए भरवा बैंगन खाकर उंगलियां चाटते हैं ना, तो दिल खुश हो जाता है।
ऐसा लगता है हमारा खाना बनाना सार्थक हो गया है। जब वह हमें आवाज देकर कहते हैं ना, भावना एक पराठा और मिलेगा? ऐसा लगता है पूरी दुनिया समेटकर उनकी थाली में परोस दें..।
जब वह हमारी आयरन की हुई शर्ट पहन कर खुद को आईने में निहारते हैं तो ऐसा लगता है हमारा यह काम सार्थक हो गया। उनके जूते पर हम धूल का एक कण टिकने नहीं देते। हमेशा लगता है कि उनके आसपास किसी तरह की कोई गंदगी ना रहे।
क्या कहें निनाद, तुमसे बस इतना ही कहेंगे कि हमें माफ कर दो।
तुम सोच रहे होंगे हम कितनी स्वार्थी लड़की हैं। तुम्हारा सोचना भी सही है, लेकिन हम और कुछ नहीं कह पाएंगे बस तुमसे माफी मांगने के अलावा, हमें माफ कर दो..।
“बावना.. यू नो.. यू आर इन लव विद योर डॉक्टर साहब !”
भावना मुस्कुरा कर नीचे देखने लगी उससे कुछ नहीं कहा गया।
हालांकि उसकी आंखें भी भरी हुई थी। आंखें निनाद की भी भरी हुई थी।
लेकिन झिलमिलाती आंखों के साथ वह धीरे से मुस्कुरा रहा था ।
“एनीवेज आई एम हैप्पी फॉर यू, गॉड ब्लेस यू, ऑलवेज स्टे हैप्पी..।
अगर कभी चाहे तो मुझे दोस्त समझ कर,फोन कर लेना। मेरा नया नंबर मैंने उस चिट्ठी में लिखा था..।”
“हम्म। निनाद तुमसे एक बात और कहनी थी।
अब हम यह सारे रुपए और जेवर नहीं रख पाएंगे। हमें माफ कर देना प्लीज..।”
“लेकिन क्यों? इसमें से कुछ रुपए तुम्हारे बाबूजी के जोड़े हुए हैं..।”
“और बाबूजी के जोड़े रुपये से ज्यादा तुमने इसमें रुपए जोड़े हैं। सोने के कंगन बनवाये है हमारे लिए।
प्लीज हमें माफ कर दो, और वहां जाने के बाद मन लगाकर काम करना। और जब तुम्हारी अम्मा और तुम्हारे नाना तुम्हारी शादी के लिए कोई लड़की देखेंगे तो बिना किसी पूर्वाग्रह के हां बोल देना।
यह पूरा बैग हमारी तरफ से तुम्हारी वाइफ के लिए गिफ्ट है..।
प्लीज निनाद मना मत करना। हमारी बात को समझो अगर हमने आज यह बैग रख लिया तो एहसान के तले हम खुलकर सांस नहीं ले पाएंगे। प्लीज हमें इस एहसान में बांधो मत, इस बैग को तुम रख लो..।”
“मुझे भूलना चाहती हो, इसलिए यह बैग नहीं रखना चाहती हो ना..?”
“तुम्हें तो हम अपनी आखिरी सांस तक नहीं भूल पाएंगे निनाद, लेकिन अब हमारी यादों में तुम हमारे बाबूजी के बहुत करीबी और हमारे बहुत सच्चे दोस्त के तौर पर रहोगे।
हमने सुना था प्यार एक ही बार होता है, पर पता नहीं हम कैसी पागल लड़की हैं, हमें दो बार हो गया।
पहले तुमसे और अब डॉक्टर साहब से।
लेकिन जब से डॉक्टर साहब से प्यार हुआ, तब समझ में आया कि सच्चा प्यार क्या होता है। अब उनके बिना रहने की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। अब जो भी है, जैसा भी है हमारा संसार उन्हीं के साथ है।
और हम यह भी चाहते हैं कि तुम भी अपना संसार बसा लो ।
जोड़ियां ऊपर से तय होकर आती है। हमारी जोड़ी शायद डॉक्टर साहब के साथ ही बनी थी। अब जब पुरानी बातें सोचते हैं, तो याद आता है जब हम कुसुम के साथ उनकी डिस्पेंसरी में जाया करते थे, तो कुसुम की बावलेपन की बातों पर अक्सर डॉक्टर साहब हमें इशारे किया करते थे कि हम कुसुम को बाहर ले जाएं या चुप करवा दे, और पता नहीं कैसे हम एक बार में डॉक्टर साहब का हर इशारा समझ लेते थे! जबकि उनसे टूट कर प्यार करने वाली कुसुम कुमारी कभी उनके इशारों में कही बातें नहीं समझ पाती थी।
शायद उसी वक्त भगवान ने हमें यह इशारा दे दिया था कि हम दोनों को एक होना है। और हम भगवान के उस इशारे को समझ नहीं पाए, और उलझते चले गए जिंदगी की राहों में ।
निनाद अब हम घर जा रहे हैं, हमें माफ कर देना…।”
निनाद अभी बहुत कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसकी जबान सिल गई थी। उसने भावना को रोकना चाहा, लेकिन भावना ने उस बैग को बेंच पर रखा और मुड़कर वहां से अपने घर की तरफ चल दी।
उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान जरूर थी, लेकिन आंखें बह रही थी।
निनाद चुपचाप खड़ा भावना को जाते हुए देख रहा था। उसकी आंखें भी लगातार बह रही थी। और इन दोनों से जरा हट कर एक चाय की टपरी के पीछे खड़े डॉक्टर साहब की आंखें भी बह रही थी।
उन्होंने भावना और निनाद के बीच की सारी बातें सुन ली थी। वो धीरे-धीरे भावना की तरफ बढ़ने लगे, बस स्टैंड से बाहर निकलने के बाद भावना ने अपने पर्स को खोलकर उस चिट्ठी को निकाला और उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर वही मिट्टी में उन टुकड़ों को उड़ा दिया।
और भावना अपने घर की तरफ मुड़ गई। राजेंद्र ने एक ठंडी सी सांस भरी और आसमान की तरफ देखकर अपने हाथ जोड़ दिए…
यह अजूबा जोड़ी अब एक दूसरे के बंधन में बंधने को पूरी तरह से तैयार होने लगी थी…
क्रमशः
aparna..

Super part 😘😘😘👌👌👌👌
wah , Aaj bhavna ko wo saare ishare samaj me aagaye , jo doctor sahab or bhagwan kar rahe the ,
Aaj Jo ninad ne jawab me dua di hai , us se pata chalta hai ki bhavna k jivan me aane Wale dono hi ladke khara Sona nikle 👌👌
chitthi ka faad kar fek Dena bahot hi achha laga ,
ninad ko bhi dua ki wo apne jivan me khush rahe 🙌😊👌👌