अपराजिता -105

अपराजिता -105

अब तक अपराजिता में आपने पढ़ा यज्ञ किसी से मिलने अपने ननिहाल जाने वाला होता है, तब कुसुम भी जिद करके उसके साथ हो लेती है। यज्ञ के ननिहाल में कुसुम को बहुत अपनापन महसूस होता है, वही कुसुम को मालूम चलता है कि जिस दाई मां आजी ने बचपन में यज्ञ और अखंड को पाला पोसा था उन्ही आजी से मिलने के लिए ही यज्ञ अपने ननिहाल आया है। और साल में 2 से 3 बार वह यहां आकर उनसे मिलकर उनकी दवों का इंतजाम करके लौटता है।
यह जानकर कुसुम को बहुत अच्छा लगता है, उसके दिल में धीरे-धीरे यज्ञ की जगह बनने लगी होती है कि यज्ञ की बातों के बीच कहीं दूर से एक गोली चलती है और यज्ञ को लग जाती है।
यज्ञ के खून के छींटे कुसुम के चेहरे और माथे को रंग जाते हैं

अब आगे..

खून के छींटे उड़ कर कुसुम का माथा और आधा चेहरा लाल कर गए….

पल भर के लिए उसे समझ में नहीं आया कि यह क्या हो गया है? अचानक कहीं से एक गोली चली और यज्ञ उसके सामने लड़खड़ा कर गिर गया। हकबकाई सी कुसुम इधर-उधर देखने लगी..।

वह जोर से चीख पड़ी

“कौन है, हिम्मत है तो सामने आ।”

लेकिन अगर गोली चलाने वाले में वाकई इतनी हिम्मत होती तो वह सामने आकर ही गोली मारता, छिपकर नहीं। जिस तरह छिपकर उसने यज्ञ पर गोली चलाई थी उसी तरह वह वहां से भाग गया।

कुसुम ने जमीन पर गिरे हुए यज्ञ को देखा और उसे संभाल कर धीरे से उठाने की कोशिश करने लगी।
वह लोग जिन आजी से मिलने आए थे, उनकी गली बहुत सकरी थी। और उस गली के बहुत दूर, बाहरी तरफ खाली पड़े मैदान में यज्ञ ने गाड़ी खड़ी की थी।
यज्ञ को इस वक्त यहां अकेले छोड़कर मदद के लिए लोगों को लेने जाना भी एक तरह से रिस्क ही था।

कहीं वह छुपा हुआ व्यक्ति जिसने सिर्फ एक गोली चलाकर तौबा कर ली थी, आकर और गोलियां यज्ञ के सीने पर उतार गया तो कुसुम क्या करेगी?

इस वक्त उसके आंसू बहते चले जा रहे थे। लेकिन उसने अपनी सारी हिम्मत इकट्ठा की और यज्ञ को सहारा देकर धीरे-धीरे खींच कर गाड़ी तक ले आई। बड़ी मुश्किल से उसने यज्ञ को दोनों बाँहों का सहारा देकर उठाया और सामने वाली सीट पर बैठा दिया।
दर्द के कारण यज्ञ को जैसे होश ही नहीं था। उसकी आंखें मूंदी हुई थी, कुसुम ने देखा यज्ञ की काली जैकेट खून से भरी जा रही थी। कुसुम की समझ से परे था कि वह क्या करें, क्या नहीं? उसने तुरंत यज्ञ का मोबाइल निकाला और अखंड को फोन लगाने लगी…

एकाध रिंग जाने पर ही अखंड ने फोन उठा लिया..

“बोलो यज्ञ.. ।”

“यज्ञ नहीं हम बोल रहे हैं कुसुम! हम लोग यहां आए हुए थे,आजी के घर के ठीक बाहर गाड़ी में थे कि किसी ने इन पर यानी आपके छोटे भाई, छोटे ठाकुर पर गोली चला दी है..।”

“क्या.. लेकिन किसने.. यज्ञ कैसा है.. ?”

“हमें नहीं पता किसने गोली चलाई है, इन्हें होश नहीं है। हम गाड़ी लेकर अस्पताल की तरफ निकल रहे हैं, आप तुरंत पहुंचिए..।”

“कौन से अस्पताल जा रही हो.. ?”

“यहां से जो भी सबसे पास होगा, उस अस्पताल में चले जाएंगे।  वहां पहुंचकर हम अपनी लोकेशन भेज देंगे..।”

“ठीक है.. हम निकल रहे हैं यहां से..।”

कुसुम ने इतनी देर में गाड़ी स्टार्ट कर ली थी। उसने गाड़ी एक दिशा की तरफ आगे बढ़ा दी।
इस वक्त किसी को भी मदद के लिए वापस लेने जाने का कोई मतलब नहीं था…।
कुसुम के दिमाग में इस वक्त सिर्फ एक बात घूम रही थी, कि जितनी जल्दी यज्ञ को चिकित्सा सहायता मिल जाएगी उतना ही उसके जीवन पर मंडराता खतरा कम होगा।

अगर वह इस वक्त नानी जी के घर गई और सबको समझा बुझाकर इकट्ठा करके फिर अस्पताल के लिए निकली तो भी नहीं-नहीं में दस मिनट तो व्यर्थ हो ही जाएंगे। ये सब सोचकर उसने इधर-उधर देखे बिना गाड़ी हाईवे की तरफ निकाल दी
अपने मोबाइल पर उसने सबसे पास मौजूद अस्पताल को ढूंढना शुरू किया और मोबाइल पर बताये डायरेक्शन की तरफ गाड़ी भगाने लगी।

लगभग 15 से 20 मिनट में ही वह पास के शहर गजदलपुर के एक अस्पताल में पहुंच चुकी थी…
अस्पताल प्राइवेट था..।

वो गाड़ी से उतर कर तेज़ी से भागती हुई दरवाजे पर रखी स्ट्रेचर के पास पहुंच गई।
वहां जो गार्ड बैठा था, उसे साथ लेकर वह गाड़ी तक आई और उसकी मदद से उसने यज्ञ को स्ट्रेचर पर लिटा दिया।

” इमरजेंसी है भैया इन्हे गोली लगी है, जल्दी अंदर ले चलिए।”

गोली लगी है शब्द सुनते ही गार्ड स्तब्ध रह गया।

” मैडम ये तो पुलिस केस है। यहां नहीं लिया जाएगा। इनको आपको सरकारी अस्पताल ले जाना होगा।”

“भैया  वहां तक ले जाने में उनकी हालत और खराब हो जाएगी। कम से कम कोई प्राथमिक उपचार तो दे सकते हैं ।”

“इसमें कोई प्राथमिक उपचार नहीं हो सकता मैडम..।”

” आप अपने डॉक्टर को बुलाए।”

  हङबङाई सी कुसुम इधर-उधर देखते सफेद चोगे वाले डॉक्टर को ढूंढ रही थी, तभी सामने से एक युवा डॉक्टर आता दिखाई दिया। उसने आगे बढ़कर उसके सामने हाथ छोड़ दिए।

” डॉक्टर साहब हमारे पति को देख लीजिए, उन्हें गोली लगी है..।”

डॉक्टर ने कुसुम की तरफ देखा और सामने स्ट्रेचर पर लेटे यज्ञ की तरफ देखा, उसके शरीर से खून बहकर जमीन पर गिरने लगा था।

यज्ञ के पास पहुंचकर डॉक्टर ने यज्ञ की नब्ज़ जांची ,जो अब धीमी पङने लगी थी।

“देखिए मैडम ये एमएलसी  केस है, और इसे यहां पर हम नहीं ले सकते! आप ऐसा कीजिए कि तुरंत सरकारी अस्पताल चली जाइए..!”

“किस काम का है आप लोगों को यह अस्पताल? जब आप लोग एक मरीज की जान नहीं बचा सकते? क्या फायदा है आप लोगों की डिग्री का, आप लोगों की पढ़ाई का। जब आप लोगों के दिमाग में इतना पुलिस का डर बैठा है। क्यों खोल कर रखा है आपने इतना बड़ा अस्पताल..?”

“यह सब बोल कर मैडम आप अपना और अपने मरीज का समय व्यर्थ कर रही है। कोई फायदा नहीं है इन बातों का यहां।
हम मरीज को छू भी नहीं सकते, जब तक पुलिस आकर पंचनामा न कर दे, और उस सब में बहुत समय निकल जाएगा। सरकारी अस्पताल में कम से कम इनका इलाज शुरू हो जाएगा। पुलिस आने के बाद एमएलसी रजिस्टर होता रहेगा।
हम प्राइवेट अस्पताल वालों की भी अपनी सीमाएं होती है, जिससे आगे बढ़कर हम कुछ नहीं कर सकते।
आप चाहे तो मैं आपके साथ सरकारी अस्पताल तक चलता हूं, मेरे साथ के कुछ दोस्त वहां है, मैं उन्हें अभी फोन कर देता हूं कि वह तैयारी करके रखें, ज्यादा दूर नहीं यहां से सिर्फ 10 मिनट का रास्ता है..।”

उस डॉक्टर ने नर्स को बुलाकर एक ऑक्सीजन सिलेंडर मंगवाया और यज्ञ को ऑक्सीजन चढ़ा दी।
इसके साथ ही अपने दोस्तों को फोन करने लगा वह कुसुम के साथ आ पाता इसके पहले ही कुसुम ने गाड़ी वहां से निकाल कर सरकारी अस्पताल की तरफ बढ़ा दी…।

लेकिन उस डॉक्टर के फ़ोन कर देने से ये फायदा हुआ कि कुसुम के वहाँ पहुंचने तक में अस्पताल वालों ने पुलिस को इस बारे में जानकारी दे दी थी।
कुसुम जैसे ही वहां पहुंची, सामने खड़े डॉक्टर और नर्स ने तुरंत यज्ञ को स्ट्रेचर में लिया और उसे लिए सीधे ऑपरेशन थिएटर की तरफ निकल गए..।

उसी समय फ़ोन पर किसी से बात करता हुआ राजेंद्र ऑपरेशन थियेटर के अंदर जाते जाते बदहवास सी बैठी कुसुम को देख ठहर गया..

“कुसुम.. ?”

कुसुम के पास पहुँच कर उसने कहा और जानी पहचानी सी आवाज़ में अपना नाम सुन कुसुम पलट गयी..

राजेंद्र को सामने देखते ही उसका सब्र का बांध ढह गया..

“डाक साब.. हमारा सब कुछ चला गया.. ।”

“क्या हुआ.. !” राजेंद्र के चेहरे पर चिंता की लकीरें चली आयी..

” ठाकुर साहब को गोली लग गयी है! “

“क्या.. कैसे.. मतलब कब.. खैर वो सब बाद में बताना.. तुम रुको.. मैं देखता हूँ.. !”

राजेंद्र तेज़ी से ऑपरेशन थियेटर में दाखिल हो गया…

और कुसुम वहीँ दीवार से टिक कर खड़ी सिसकती रही…

अंदर ऑपरेशन चल रहा था, लेकिन गोली शरीर में अगर धंसी है तो उसे निकालना इतना भी आसान नहीं होता..
उसी सब में अंदर समय निकलता जा रहा था, और कुसुम का सब्र समाप्त होने को था..

कुसुम इस वक्त खुद को ढाँढस बनाये रखना चाहती थी, वो यज्ञ के बारे में सोचना नहीं चाहती थी, लेकिन यज्ञ की निरीह मूर्ति हर क्षण उसकी आँखों के सामने घूम रही थी..

कभी बालों पर हाथ फिराता यज्ञ, कभी कोई गीत गुनगुनाता यज्ञ, कभी किसी बात पर उसे छेड़ता यज्ञ तो कभी किसी की मदद करता यज्ञ..।

हकीकत तो यह थी कि आज से पहले उसने यज्ञ को ना कभी इतना सुंदर पाया था और ना कभी उसे इतना प्यार ही किया था..।
उसे खुद पर आश्चर्य हो रहा था कि यज्ञ के लिए उसके अंदर इतना सारा प्यार कहाँ छिपा बैठा था.. वो तो आजतक अपने मानसिक भरम जाल में उलझी समझ ही नहीं पायी थी कि उसका सच्चा और असली प्यार क्या था..?

छि किस मुहं से उसने यज्ञ से कह दिया था कि वो डाक साब से प्यार करती है… अब उसे अपनी इसी बात पर लज्जा अनुभव हो रही थी..
उसका कहा ये एक वाक्य आज सौ सौ हथौड़े बन कर उसके सर पर चोट पहुंचा रहा था..।
इससे अच्छा तो गोली उसे लग जाती, कम से कम इतना अपमान तो ना होता..।
आज अगर यज्ञ को कुछ हो गया तब उसका क्या होगा ?

उसमे अपने हाथो कि तरफ देखा..
घर से निकलने के पहले घर के रिवाज के अनुसार नानी जी ने उसे नयी हरियाली चूड़ियां पहनाई थीं..
उसकी कलाइयों में वो हरी हरी चूड़ियां खनक रही थी…
माथे पर लाल बिंदी और सिंदूर सजा था..
पैरो में पायल बिछुए थे..
हाय रे किस्मत… स्त्री के सारे गहने ही उसके पुरुष के नाम के क्यों थे.. ?

उसका ध्यान गया, हड़बड़ी में यज्ञ को उठाते समय उसकी कुछ चूड़ियां चटक कर उसकी कलाई पर चुभ गयी थी..
उसने देखा कहीं कहीं खून छलक आया था..
कोई और दिन होता तो इतना खून देख वो बवाल मचा देती लेकिन आज उसे इन खून कि बूंदो से तकलीफ होने कि जगह साहस मिल रहा था..
ये बूँदे उसे याद दिला गयी कि वो अपने पति को बचाने के लिए किस तरह जूझ गयी थी..
बिलकुल सावित्री की तरह जो सत्यवान को बचाने यमलोक तक चली गयी थी..।

वो हर एक स्त्री जो अपने पति को बीमारी या हताहत होने पर,उसे बचने को जूझती है, लड़ती है, सावित्री ही तो होती है…। किसी को सफलता मिल जाती है तो कोई समय के आगे असफल हो जाती है, लेकिन कभी भी कोई स्त्री,कोई सावित्री हारती नहीं है… अंतिम पलों तक लड़ती ज़रूर है !!
और सफल हो पाए या असफल लेकिन ऐसी हर स्त्री सही मायनों में सावित्री होती है !!

आज कुसुम को आभास हो रहा था, अपने आसपास फैली नीरव शांति का…!
ऐसा लग रहा था जैसे उसके आसपास का शोर, सारी आवाज़े सब कुछ यज्ञ ही था.. एक उसके चले जाने से कैसा सूनापन खालीपन आ गया था..!
अभी तो वो फिर भी ऑपरेशन थियेटर में है, अगर उसे कुछ हो गया तो ?

उसे एहसास हो रहा था कि वो किस कदर यज्ञ में डूब चुकी है..
वो वस्तु जो आसानी से लभ्य होती है, उसकी मनुष्य कदर नहीं करता, ऐसा ही कुछ कुसुम के साथ हो रहा था..
आज उसका चीख चीख कर रोने का मन कर रहा था..!

लग रहा था डॉक्टर एक बार अनुमति दे तो वो जाकर यज्ञ के गले से लग कर उसके चेहरे को चूम लेगी..
कुसुम उसे बताना चाहती थी कि ये ठकुराइन छोटे ठाकुर की ही है, पूरी तरह से..।

उसने किस कुबेला में यज्ञ से अपनी प्रीत प्यार की कहानी कह सुनाई..?
कहते है मृत्यु शैया पर लेटा व्यक्ति भी जीने की ललक हो तो यमराज से लड़ झगड़ कर वापस लौट आता है.. लेकिन यज्ञ के पास तो वापस लौटने का कोई कारण भी नहीं छोड़ा उसने..।

कुसुम फटी फटी आँखों से अपने आसपास को देख रही थी.. क्या कोई यहां है जो उसकी सहायता कर सकता है..
वरना ऐसे ही सोच सोच कर उसका मस्तक फट जायेगा..।
कुसुम को लग रहा था जैसे उसका गला घुट रहा है, उसे फांसी पर लटकाया जा रहा है..।
उसने तो अब तक अपने जीवन को समझना शुरू भी नहीं किया था कि इतनी बड़ी अनहोनी हो गयी..

वो सोचना चाहती थी लेकिन विचारो के बदले बस यज्ञ चला आ रहा था..
वो रोना चाहती थी, लेकिन यज्ञ का चुलबुलापन याद कर बरबस ही हल्की सी मुस्कान चली आ रही थी..।
और उस मुस्कान के चेहरे पर आते ही वो खुद ही खुद को लानत दे पड़ती थी..।
जिसका आदमी अंदर ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा वो यहां बैठी मुस्कुरा कैसे सकती है..?
कितनी बड़ी पापिन थी वो..।

हे भगवान !! उसे माफ़ कर देना..
बचपन से अपने घर में उसने उसके पिता के द्वारा मां पर किए अत्याचारों को बहुत करीब से देखा था। वैसा ही कुछ हाल उसके भैया और भाभी का भी था।
    हां उम्र और समय का अंतर आ चुका था, इसलिए उसके पिता की तरह क्रूरता उसका भाई नहीं दिखाता था। लेकिन अपनी पत्नी को वह पिंजरे में बंद परकटे पक्षी सरीखे रखता आया था।

इतना सब देख कर भी पता नहीं क्यों कभी उसके अंदर यह भावना ही नहीं आई कि उसे भी इन औरतों की तरह अपने पति से दबकर रहना होगा।
हो सकता है अगर उसकी जिंदगी में डॉक्टर साहब नहीं आते और वह भी अपनी भाभी और अपनी मां की तरह अपने मायके वालों के लाए रिश्ते को सर माथे लगा लेती तो शायद इन्हीं औरतों की तरह उसका भी जीवन घर गृहस्थी और रसोई में ही व्यतीत हो जाता।

लेकिन उसके जीवन का रास्ता कुछ समय के लिए बदल गया था, और शायद इस लय में बैठे-बैठे वह यह भूल गई थी कि वह किस खानदान की बेटी है? और किस खानदान की बहू बनने जा रही है?

हालांकि उसके पति और ससुराल ने उसे पग पग पर आश्चर्यचकित ही किया था। उसका पति बिल्कुल भी उसके भाई की तरह या उसके पिता की तरह नहीं था। उसने हमेशा कुसुम को अपनी बराबरी पर रखा था। उसने कभी कुसुम को अनुगामिनी नहीं बनाया, वह तो सहगामिनी ही बनाना चाहता था।
उसका हाथ अपने हाथों में थाम कर जिंदगी के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता था।
लेकिन वह मूर्ख उसके उसी हाथ पर चाकू से वार करने लगी थी, बिल्कुल किसी जिद्दी बच्ची की तरह।

और तब भी वह संयमी पुरुष उन छोटे-मोटे वारों से अपने आप को बचाता हर बार उसकी तरफ बाहें फैलाये चला आता था।

क्या यह सब वह सिर्फ शादी के एक रिश्ते को निभाने के लिए कर रहा था?
क्या यह सब कुछ वो सिर्फ अपने संस्कारों के लिए कर रहा था?
क्या सच में यज्ञ को उससे प्यार नहीं था…?

” वह आपसे बहुत प्यार करते हैं नंदरानी, आपकी किस्मत है जो इतना अच्छा घर वर आपको मिला है..!”

अपने ख्यालों में डूबी बैठी कुसुम के कंधे पर उसकी भाभी ने हाथ रख दिया। उनकी बात सुनते ही वह लरज कर रह गई।
उसने पलट कर देखा कुसुम की भाभी और उसके पिता दोनों अखंड के साथ वहां चले आए थे।
अखंड ने घर से निकलते समय कुसुम की भाभी को फोन करके बता दिया था। अखंड को अकेले देखकर कुसुम की आंखें फैल गई..।

अपने घर के रीति रिवाज को एक तरफ ठेल कर कुसुम अपने जेठ के सामने पल्ला नहीं करती थी। इसलिए आज भी वैसे ही खड़ी थी, और इस बात से ना ही अखंड को कोई तकलीफ थी और ना यज्ञ को।

उन दोनों भाइयों के सामने उनके घर में कोई कुछ नहीं बोल सकता था। इसलिए कुसुम की सास ने भी उसे टोकना छोड़ दिया था।

लेकिन आज पता नहीं क्यों अखंड की लाल लाल रोई हुई आंखें देखकर कुसुम ने धीरे से आंखें झुका ली।

अपने जेठ की आंखों में आंखें डालकर प्रश्न पूछने का दुस्साहस आज वह शेरनी नहीं कर पाई।

लेकिन उसके मन के सवाल को कि घर के बाकी लोग कहां हैं? का अखंड जवाब देने सामने चला आया।

” हमने घर पर अभी किसी को नहीं बताया है। बाबूजी वैसे भी हार्ट पेशेंट है, दादी भी यह झटका सह नहीं पाएंगी।
   अम्मा और काकी को पता चला तो घर के बाकी लोगों से छुपाना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए तुम्हारा फोन आते ही हम चुपचाप घर से निकल गए थे।
बस तुम्हारी भाभी को ही बताया है। और उन्हें भी कहा था कि अगर हो सके तो ज्यादा किसी से चर्चा ना करें..।”

“कुसुम हमने भी घर में अम्मा जी से कुछ नहीं कहा। वह पहले ही अपने बेटे के बिस्तर पर पड़े रहने से दुखी हैं। दिन-रात अपने जवान बेटे को बीमार पड़े देखना बहुत कष्ट की बात है। उस पर अपने जमाई बाबू के बारे में ऐसा सुनकर पता नहीं, वह सहन कर पाएंगी या नहीं..।”

“ठीक किया भाभी.
रिरियाती सी आवाज में कुसुम ने कहा और उसकी गीली आवाज सुनकर सुजाता का दिल मरोड़ उठा। उसने कुसुम को अपने सीने से लगा लिया..।

“हमने कभी नहीं सोचा था कि जो दुख अभी हमने कुछ दिनों पहले झेला है, वह दुख इतनी जल्दी हमारी नंद रानी के हिस्से भी आ जाएगा।
भगवान पर विश्वास रखो, वह ऊपर बैठा है सब की रक्षा करता है..।”

“बस भाभी यही चाहते हैं कि हमारे हिस्से की सांस उन्हें मिल जाए, उन्हें कुछ हो गया तो हम जी नहीं पाएंगे..।”

कुसुम बोलते बोलते रो पड़ी और सुजाता धीरे-धीरे उसके बालों पर हाथ फेरने लगी। उस समय अंदर से डॉक्टर बाहर चले आए..

“मरीज़ कि हालत सही नहीं है… आप इन कागजों पर दस्तखत कर दीजिए, और खून का भी इंतजाम कीजिए बहुत ज्यादा खून बह गया उनका..।”

अखंड ने तुरंत वह कागज लेकर उन पर दस्तखत किए और खून का इंतजाम करने वहां से बाहर चला गया…।

क्रमशः

aparna..

5 6 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

6 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Dhara kundaliya
Dhara kundaliya
11 months ago

Akhand ka character superb…. bahut bahut bahut bahut bahut bahut hi khubsurat story ❤️

नमिता झा
नमिता झा
2 years ago

वापस अपराजिता से जुड़ कर बहुत अच्छा लग रहा है। बहुत ही सुंदर भाग♥️♥️♥️

Jaimini
2 years ago

👌👌👌👌

poorna sharma
poorna sharma
2 years ago

bahut acchha kiya yahan likhan start kar diya…we love you aprna..kahin bhi likho bas likhti raho..hum sabhi wahan pahunch hi jayenge.

Meera Patel
Meera Patel
2 years ago

आज कुछ सुकून आया इसे वापिस पढ कर , अब कुसुम को तो यज्ञ k घायल होने पर ही उसकी सारी बात , उसका सारा केयर नजर आने लगा है , हां पर ये भी बात है की वो ये सब बाते यज्ञ को बता n पाई , अगर यज्ञ , कुसुम का कन्फेशन सुन लेता तो खुद ही ठीक होकर लौट आता OT से , देखते है कुसुम ये कमाल कैसे कर पाती है ।

और इस दौरान वो अखंड को भी अच्छे से जान पाएगी की वो ऐसे क्यों है । शायद अखंड खुद ही अपनी आपबीती सुनादे कुसुम को !!

थैंक यू सो मच dr साहिबा यह आने k लिए और अब से ये जगह हम सब की है 😘🥰