अपराजिता -100
दोनों के इस हंसी मजाक में ढेर सारी प्यारी प्यारी रंगीन झाग भरी यादें राजेंद्र के मोबाइल पर कैद हो गई….
आज दोनों हँस रहे थे, साथ साथ खुश नजर आ रहे थे, लेकिन ये नजारा ऐसा नहीं होता अगर उस शाम अपने मन को कड़ा कर राजेंद्र ने सही निर्णय न लिया होता.. !!
भावना की माँ के जाने के बाद सारे कारज निपटने के बाद उसके चाचाजी भी अपने गुरुदेव के दर्शनों के लिए जा चुके थे..।
और घर पर अकेली रह गई भावना पर जब दीपक ने हमला किया और उसके बाद राजेंद्र के आने पर पकड़ा गया तब राजेंद्र ने उसी क्षण यह निर्णय ले लिया था कि अब वह भावना को अकेले नहीं छोड़ेगा।
भावना जहां भी रहेगी राजेंद्र उसके साथ रहेगा।
अगर भावना अपनी मां के घर रहना चाहेगी तो वह भी यहीं से शहर आना जाना कर लेगा।
लेकिन जब भावना के थक कर सो जाने के बाद उसके कमरे के दरवाजे के पास जमीन पर पड़ा हुआ निनाद का खत राजेंद्र के हाथ आया तो, राजेंद्र उस खत को पढ़कर अपनी सुध बुध गंवा बैठा था। वह पहले भी निनाद से एक बार मिल चुका था। लेकिन तब वह यह नहीं जानता था कि निनाद, भावना से कितना प्रेम करता है, राजेंद्र के अंतरतम को छू गया था।
इस चिट्ठी के अनुसार तो भावना भी निनाद को पसंद करने लगी थी।
राजेंद्र की समझ के बाहर था कि अब वह क्या निर्णय ले? उसने तो भावना को अपनी किस्मत मानकर स्वीकार कर लिया था। लेकिन अब उसे ऐसा लग रहा था की भावना ने उसे स्वीकार नहीं किया था।
और शायद इसीलिए कुसुम के हर अत्याचार को भी भावना बड़ी सहजता से स्वीकार जाती थी।
क्योंकि कहीं ना कहीं भावना के दिमाग में या दिल में यह बात चल रही थी कि कुसुम अगर राजेंद्र के जीवन में वापस आ जाती है, तो उसकी भी वापसी का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।
राजेंद्र अपने कमरे में बैठा बैठा अपने ख्यालों में डूबा हुआ था।
‘ अरे पागल लड़की , अगर तुम्हें मुझसे नहीं निभाना है, तो मुझे बोल कर चली जाओ। मैं तुम्हें कभी नहीं रोकूंगा।’
मन ही मन यह सोचते हुए राजेंद्र ने तय कर लिया कि वह भावना और निनाद के बीच से दूर चला जाएगा। हालांकि यह सोचते हुए भी उसे बहुत ज्यादा तकलीफ हो रही थी, और वह खुद अपनी इस तकलीफ की कोई कैफियत ढूंढ नहीं पा रहा था।
क्या बस इतने कम दिनों में उसे भावना से लगाव हो गया था?
क्यों उसे एक कम पढ़ी-लिखी लड़की को अपने लिटररी सर्कल से मिलवाने में शर्म महसूस नहीं हुई ?
क्यों वह भावना की बांह पकड़ कर अपने ग्रुप के सामने पूरे गर्व के साथ जा पाया था.. ?
क्यों आधी रात के वक्त घर पर खाना खत्म हो जाने पर वह उसके लिए खाने की तलाश में बाहर निकल गया था?
क्यों कुसुम के आने पर वह कुसुम के सामने तन कर खड़ा हो गया था, भावना के सुरक्षा के लिए?
क्यों उसने अपनी पड़ोसन आंटी के सामने भी भावना को पत्नी का पूरा दर्जा दे रखा था?
ढेर सारी ऐसी बातें थी, जो राजेंद्र के दिल दिमाग को काबू में किए जा रही थी।
उसके माथे की नसें चटकने लगी थी।
सर दर्द से परेशान होकर उसने दराज से गोली निकाली और निगल ली।
हे भगवान!! किसी ठौर शांति नहीं है। यह प्यार जो ना करवाए। अगर पहले मालूम होता कि यह मुहब्बत इतनी तकलीफ देती है, तो वह कभी इस सब में पड़ता ही नहीं।
लेकिन क्या वह पहले जानता था कि उसका मन इतनी आसानी से एक सामान्य सी लड़की के पीछे इस कदर बावरा हो जाएगा कि वो अपनी सुध बुध गंवा बैठेगा…
उसका और भावना का रिश्ता बेशक उन दोनों की मर्जी के खिलाफ जुड़ा था, लेकिन वह कभी भावना से नफरत नहीं कर पाया।
पता नहीं क्यों उसकी बोलती आंखें देख कर उसने जैसे खुद-ब-खुद हथियार डाल दिए थे।
वैसे भी चंद्रभान के किये इस कृत्य में भावना का क्या दोष था वह बेचारी तो उसी की तरह विक्टिम बन गई थी..
लेकिन उसे नहीं मालूम था कि बिना मर्जी के जुङा उन दोनों का रिश्ता कभी अचानक उसके दिल में ऐसे घर कर जाएगा…।
भावना उसके जीवन में अचानक चली आई थी, और उसके बाद उसके घर में, उसकी गृहस्थी में वह ऐसे बस गई थी जैसे वह हमेशा से उसके घर का, उसकी गृहस्थी का एक हिस्सा थी।
राजेंद्र ने इन सब बातों को बहुत सामान्य तरीके से लिया था।
सुबह सवेरे उसके उठने पर उसे गर्म पानी देना, चाय देना, भावना ने जैसे सब कुछ स्वयं अपने कंधों पर ले लिया था।
उसके खाने पीने का ख्याल रखना, उसके कपड़ों का ख्याल रखना, जूते मोजे का ध्यान रखना, उसके कागज, काम की चीज, हर छोटी बड़ी चीजों का ध्यान रखने में भावना इतनी माहिर थी कि जब भावना के बिना कुछ दिन उसे अपने घर पर रहना पड़ा तो वही घर उसे काटने को दौड़ने लगा था।
अपने ही घर में वह उबने लगा था,बिना भावना के।।
लेकिन तब भी उसे समझ में नहीं आया था कि वह भावना से प्यार करने लगा है।
लेकिन आज सिर्फ एक नाम, तीन अक्षर का निनाद सामने आया, और ऐसा लगा उसके दिल दिमाग की नसें हिला कर चला गया।
उसके साथ इतने सलीके से सुघङता से रहने वाली, सीधी सरल सी लड़की भावना के दिल पर भी किसी और ने कब्जा कर रखा था।।
ऐसी अजब उदासी राजेंद्र को घेरने लगी थी कि वह इस उदासी से बचने के लिए घर से बाहर निकल गया। उसे लगा आज उसे वाकई अपना गम भुलाने के लिए शराब का सहारा लेना पड़ेगा। उसने शराब के बारे में यह पढ़ रखा था कि उसका सेवन वाकई दिमाग की तकलीफों को भुलाने में मदद करता है। उसके कदम अपने आप उस तरफ बढ़ते चले जा रहे थे…।
अपने आप को खोए हुए सा वह रास्ते पर चला जा रहा था।
कि तभी किसी की जोर की आवाज उसके कानों में पड़ी।
” भावना रुक जा बेटा!” और वह चौंक कर रास्ते को देखने लगा।
एक छोटी सी बच्ची रोड क्रॉस करने के लिए अकेले ही रास्ते पर भागने लगी थी, और शायद उसकी मां उसे ही आवाज देती उसके पीछे भाग रही थी।
‘भावना’ यह एक नाम सुनकर ही जैसे वह वापस होश में आ गया था कि वह जो करने जा रहा था, वह गलत था। वह उसी समय वापस लौट गया।
वह अपने घर पहुंचा ही था कि उसे भावना कहीं जाती हुई नजर आई।
बाहर वाले गेट के ठीक बाहर एक बहुत बड़ा नीम का पेड़ लगा था। शाम ढलने लगी थी। वह उस पेड़ की ओट में छिप कर खड़ा हो गया। भावना उसे नहीं देख पाई और सीधे निकल गई।
राजेंद्र ने ठंडी सी सांस भरी और अंदर जाने को था कि तभी उसके दिमाग ने उसे अंदर जाने की जगह भावना के पीछे जाने को उत्तेजित करना शुरू कर दिया।
उसके कदम खुद ब खुद भावना के पीछे बढ़ने लगे। भावना के हाथ में एक बड़ा सा बैग भी था, जिसे टांगे वह चलती चली जा रही थी। पता नहीं उसके दिमाग में उस वक्त क्या चल रहा था….।
*****
इस सब के कुछ देर पहले, जब भावना घर पर अकेली थी तब अचानक उसके दिमाग में यह बात आई कि उसने भले ही यह तय कर लिया था कि उसे निनाद से नहीं मिलना, लेकिन निनाद फिर वहां जाकर इंतजार तो करेगा ही।
आज वह एक रिश्ते में जुड़ने के बाद निनाद से मिलना नहीं चाहती, लेकिन निनाद इतने साल उसके पिता के बदले उसकी और उसकी मां की रोजमर्रा की जरूरत के लिए बिना किसी स्वार्थ के पैसे भेजता रहा। ऐसे निस्वार्थ सरल सज्जन व्यक्ति को बिना कोई जवाब दिए लौटा देना कहां तक सही है?
अगर निनाद उससे प्यार करने लगा तो इसमें निनाद की क्या गलती? कहीं ना कहीं वह भी तो निनाद से प्यार करने लगी थी। और शायद अब भी करती है, थोड़ा सा ही सही। लेकिन अब भी निनाद की मीठी यादें उसके दिल में जिंदा तो है।
भले ही अब डॉक्टर साहब उसके दिल की खाली जगह को भरने लगे हैं। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि वह निनाद से बिल्कुल ही मुंह मोड़ ले।
कम से कम उसके इतने सारे अहसानो के बदले एक बार उससे मिल तो सकती है। यही सोच कर भावना ने निनाद का दिया सारा सामान उठाया और घर से निकल गई।
उसने जाने के पहले एक बार वक्त देखा, डॉक्टर साहब शाम आठ के पहले घर नहीं लौटते थे।
उनके लौटने के पहले वापस लौट आऊंगी, यह सोचकर भावना निकल गई ।
उसे नहीं मालूम था कि उसके दरवाजे के ठीक बाहर लगे नीम के पेड़ के पीछे खड़े डॉक्टर साहब उसे देख रहे थे..
क्रमशः
aparna…
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ohh ये क्या जादू हो गया , राजी सच में अपने दिल की बात सुन पाया की वो आम सी दिखने वाली , कम पढ़ी लिखी लड़की उसे पसंद आ गई है , पसंद क्या प्यार करने लगा है , ये तो गजब हो गया ,अच्छा सोचा भावना ने , की निनाद उस से प्यार करने लगा है तो उसने निनाद की कोई गलती भी नही है , क्यों की वो भी तो करने लगी थी निनाद से प्यार , पर उनकी मजिल एक न हो पाई , रास्ते अलग हो गए थे , तो आज तक जो एहसान निनाद करता जा रहा था , बिना कोई स्वार्थ के तो ऐसे बिना जवाब उसे लौटना अच्छी बात भी नही और उसके कंगन और पैसे भी अपने पास रखना भी ठीक बात नही ।अब न राजी ये पूरा किस्सा अपनी आंखो से देख ले तो अच्छी बात है कुछ आधा , अधूरा देख के भावना के लिए कोई गलत राय अपने मन में पाले !!बाकी झाग वाली गेम देखकर तो ऐसा लगता नही की राजी ने कुछ उल्टा पुल्टा देखा हो ,आगे के इंतज़ार में …