अपराजिता -46

अपराजिता -46

   अनिर्वान के पेट्रोलिंग के लिए निकलने के बाद थाना में सिर्फ दो कांस्टेबल रह गए थे…!

उसी वक्त तीन-चार लड़के जिन्होंने अपने चेहरों को गमछा से ढक रखा था, धड़ाधड़ाते हुए थाने में दाखिल हुए! एक ने एक कॉन्स्टेबल को पीछे से गर्दन से दबोच लिया और दूसरे ने दूसरे कॉन्स्टेबल के सर पर गन तान दी। और उससे सलाखों पर लगे ताले की चाबी पूछने लगा…

सलाखों के ठीक पास बैठा अखंड उन लोगों को आए देख अचानक अपनी जगह पर खड़ा हो गया। उसे समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है?  वह उन तीनों चारों लड़कों को पहचानता नहीं था। उनमें से एक ने बाहर से ही अखंड को आवाज लगा दी।

” घबराइए मत अखंड भैया जी! आप को आजाद करवाने के लिए हम लोग चले आए हैं…।”

उनमें से एक लड़के ने एक लंबे चौड़े लकड़ी के गुटके से एक कॉन्स्टेबल के सर पर वार किया और दूसरे के पेट पर।
दोनों ही अपना सिर और पेट थामे जमीन पर लोटने लगे..।

उसके बाद अखंड को जब तक कुछ समझ में आ पाता, तब तक उनमें से एक लड़के ने कॉन्स्टेबल की दिखाई जगह पर से जाकर चाबी निकाली और सलाखों पर पड़ा ताला खोलकर अखंड को बाहर निकाल लिया..।

अखंड पर अब तक केस फाइल नहीं हो पाया था. इसलिए उसे जेल दाखिल करने की जगह थाने में ही रखा गया था। सुबह उस पर केस फाइल होने के पहले पहले ही चार लड़कों ने आकर उसे थाने से बाहर निकाल लिया..।
बाहर निकलने से पहले उन लोगों ने जमीन पर पड़े कॉन्स्टेबल पर एक बार फिर वार किया और थाने में एक हवाई फायर करके बाहर निकल गए..

जमीन पर पड़े वह दोनों ही कॉन्स्टेबल अपने आप को संभालने की कोशिश कर रहे थे। कुछ देर बाद वह दोनों उठे, वहां रखा पानी पिया और अपने आप को संयत करने के बाद थाने में लगे फोन से अनिर्वान को फोन करने वाले थे कि उसके पहले अनिर्वान की पेट्रोलिंग गाड़ी आकर थाने के बाहर रुकी, और तेज तेज कदमों से चलते हुए अनिर्वान अंदर चला आया।

अंदर आते ही उसे पता चल गया कि अखंड परिहार जेल से भाग चुका है। अपने आप में हैरान-परेशान अनिर्वान, भाटी साहब को लेकर निकलने वाला था कि वापस पुलिस थाने की घंटी बजने लगी।

फोन उठाने पर भाटी को यह पता चला कि अस्पताल में भर्ती किया गया लड़का पंकज अब नहीं रहा।
यह बात पता चलते ही अनिर्वान के चेहरे पर और भी ज्यादा परेशानी के भाव तैरने लगे।
वह भाटी को साथ ले तुरंत मेडिकल हॉस्पिटल की तरफ निकल गया। भाटी ने अनिर्वान के चेहरे की परेशानी देखी और पूछ बैठा..

“के बात हो गयी हुज़ूर… आपको पहले तो कभी इतना परेशान नहीं देखा ?”

“ये लड़का बेवकूफी पर बेवकूफी कर रहा है। जानते हो भाटी जो कोई भी अखंड परिहार के पीछे पड़ा है,उसके जाल में यह लड़का बुरी तरह से उलझता चला जा रहा है। पहले अखंड पर एक लड़की के रेप करने की कोशिश का गलत इल्जाम लगाया गया, पर अब जो वह थाने में बंद था उस वक्त अस्पताल में एक ऐसे लड़के का मर्डर हुआ है, जिसे सरेआम अखंड परिहार ने धमकी दी थी। और उसी वक्त अखंड परिहार थाने से भागकर निकल गया। अब जब तक उसकी मौत का समय और अखंड के भागने का समय मिलाकर यह नहीं देख लिया जाता कि अखंड पंकज के मरने के बाद भागा है, तब तक शक की सुई अखंड परिहार पर ही आकर अटकेगी । और जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि पंकज के साथ रहने वाले लोग अखंड परिहार पर ही उसके मर्डर का इल्जाम लगाएंगे…!”

“हुज़ूर ये कैसे पता चला की पंकज का मर्डर हुआ है ?”

“भाटी साहब, पंकज की उम्र नेचुरल मृत्यु वाली नहीं थी.. कल ही उसे देख कर वापस लौटा हूँ, उसे इतनी भी चोटें नहीं थी कि जिनके कारण उसकी मौत हो जायें..। इसलिए उसका मर्डर ही किया गया है !”

“हुज़ूर आत्महत्या भी तो हो सकती है ?”

“नहीं भाटी साहब… अमूमन कोई बंदा अस्पताल में आत्महत्या नहीं करता… अगर उसे आत्महत्या करनी होती तो वहाँ से निकल चुका होता, दूसरी बात आपके पास जो फ़ोन आया उसमें फ़ोन करने वाले ने आत्महत्या का जिक्र भी नहीं किया !”

“आपका दिमाग तो कंप्यूटर से भी तेज चले हैं!”

“बात तो आपकी सच है भाटी साहब! लेकिन अगर उस लड़के को बचा नहीं पाया तो खुद को कभी माफ़ भी नहीं कर पाउँगा.. ।
जानते हैं भाटी साहब, हमारा संविधान इस बात पर जोर देता है कि हमें जितना हो सके मामलों को अहिंसा से सुलझाना चाहिए।
और इसीलिए हमारे संविधान के अनुसार 100 गुनहगार भले ही छूट जाए लेकिन एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए।
उस लड़के की आंखें देखी है मैंने, और जितना मैं समझ रहा हूं अखंड परिहार 100% बेगुनाह है। एक बात और कहता हूं भाटी साहब, अगर यह लड़का वाकई उस लड़की का गुनहगार हुआ तो मैं उसी वक्त अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दूंगा..!”

“हुज़ूर आपको उतना विश्वास है। मतलब वो लड़का वाकई बेकसूर है.. ! अब तो मने भी भरोसा हो रखा है !”

” एक काम करो भाटी, सबसे पहले तुम अपने मुखबीरों को काम पर लगा दो कि अखंड परिहार का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है ? और उसके जेल जाने से सबसे बड़ा फायदा किसको होने वाला है?
मुझे लगता कहीं ना कहीं धीरेंद्र प्रजापति का नाम इस सब में आना चाहिए, और अगर धीरेंद्र का नाम आता है तो  अपने लड़कों को उसके पीछे लगा दो। देखे आखिर इसका कच्चा चिट्ठा है क्या ?
दूसरी बात अखंड को खोजने के लिए भी एक टीम भेज दो..!”

“जी हुज़ूर !”

बातचीत के दौरान ही मेडिकल हॉस्पिटल आ गया और अनिर्वान एक छलांग में जीप से उतरकर तेज तेज कदमों से चलता हुआ अस्पताल के अंदर दाखिल हो गया..  वह तेजी से आगे बढ़ रहा था कि विद्यार्थियों का समूह एकदम से उसकी तरफ बढ़ने लगा…

“अखंड परिहार हाय हाय !”

‘पंकज को इंसाफ दिलवाओ!”

के नारों से अस्पताल परिसर गूंज रहा था। वहां मौजूद अस्पताल का स्टाफ और अस्पताल का प्रशासन विद्यार्थियों को शांत करवाने में लगा हुआ था।
    लेकिन यह विद्यार्थी उनकी कोई भी बात नहीं सुन रहे थे। बल्कि आसपास पड़ी कुर्सी टेबल को भी उठा उठा कर पटक रहे थे। अनिर्वान ने धीरे से भाटी की तरफ देखा, उसकी बात समझ कर भाटी एक तरफ से होकर अंदर की तरफ चला गया।
अनिर्वान ने उन विद्यार्थियों को एक नजर देखा। उसे देखकर यह विद्यार्थी और भी जोर जोर से चिल्लाने लगे। सबसे सामने खड़ा लड़का कुछ ज्यादा ही जोश में अखंड परिहार हाय हाय के नारे लगा रहा था। इसके साथ ही उसने पुलिस प्रशासन हाय-हाय का नारा भी लगाना शुरू कर दिया।
उसे ज्यादा उछलते कूदते देख अनिर्वान ने इधर-उधर देखा और खींचकर एक तमाचा उसके गाल पर जङ दिया। वह लड़का लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही वहां मौजूद सारे विद्यार्थी एकदम से शांत हो गए। उनके शांत होते ही अनिर्वान ने बोलना शुरू कर दिया…

” शायद आप नहीं जानते कि बिना पुलिस की अनुमति लिए इस तरह से धरना प्रदर्शन करना अनैतिक होता है। आप अगर किसी के बारे में सारी सच्चाई नहीं जानते हैं, तो उसके बारे में इस तरीके से नारे लगाना संविधान के खिलाफ है।

अखंड परिहार के ऊपर अब तक लगे इल्जामो में से कोई भी इल्जाम साबित नहीं हुआ है। आप लोगों ने खुद यह सोच लिया कि पंकज के मौत के पीछे अखंड का हाथ है। और आप अखंड के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। लेकिन इस तरह का काम करना अनैतिक और और असंवैधानिक माना जाता है।
कल को अगर यह साबित हो जाता है कि इस सब में अखंड परिहार का कोई हाथ नहीं है तो, वह चाहे तो आप सब पर मानहानि का दावा दायर कर सकता है। और अपनी मानहानि के बदले में जितना चाहे रुपया आप सब से वसूल सकता है… ।
आप लोगों में से कोई एक भी ये बता सकता है।

आपमे से विधि विषय का विद्यार्थी कौन है? मेरे ख्याल से तो शायद ही यहां पर कोई मौजूद हो, जिसने भारत के विधि और संविधान के बारे में पढ़ा होगा। क्योंकि आजकल लोग बातों में भी संविधान को ले तो आते हैं, भले ही जानते कुछ ना हो।
तो तुम सबको मैं कड़े शब्दों में चेतावनी दे रहा हूं कि अगर सच्चाई पता नहीं है तो किसी का नाम लेकर इस तरह से अपशब्द बोलना या नारेबाजी करना विधि विरोधी है।
और अगर तुम लोग बाज नहीं आए तो मैं अभी सब के सब को उठा कर सीधे थाने में डाल दूंगा…”

अनिर्वान की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि पीछे से धीरेंद्र प्रजापति लोगों को हटाते हुए सामने चला आया..

” काहे इंस्पेक्टर तुम काहे फुदक रहे हो बे ?अखंड परिहार से रिश्ता है क्या तुम्हारा?”

अनिर्वान ने घूर कर धीरेंद्र प्रजापति को देखा और एक के ऊपर एक तीन तमाचे उसे लगा दिये।

  अनिर्वान का हाथ इतना तगड़ा था कि धीरेंद्र प्रजापति के लिए उसका एक ही तमाचा काफी था। लेकिन उसने तीन लगाए थे।
   धीरेंद्र प्रजापति के सारे कलपुर्जे मानो हिल गए। कुछ देर के लिए उसे अपनी आंखों के सामने तारे नजर आने लगे। अपने सिर को पकड़कर उसने स्थिर करने की कोशिश की। आंखों को झटक कर जो धुंधलापन आंखों में आ गया था, उसे ठीक करने की कोशिश की और फिर आंखें खोलकर अनिर्वान को देखने लगा..

“अबे.. हमें काहे बजा रहें हो ?”

” पहला थप्पड़ इसलिए, क्योंकि तुमने मेरी डेसिग्नेशन गलत बोली ।
  मैं इंस्पेक्टर नहीं एसीपी यानी कि असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस हूं।
     दूसरा इसलिए कि मैं कोई तुम्हारा यार दोस्त नही हूं जो तुम मुझे बे,अबे जैसे शब्दों से नवाज रहे हो।
और तीसरा थप्पड़ बस ऐसे ही लगा दिया, क्योंकि तुम्हारी शक्ल पसंद नहीं है मुझे..।”

अनिर्वान विद्यार्थियों की भीड़ हटाते हुए आगे बढ़ने लगा। पलट कर उसने एक बार सब पर गहरी सी नजर डाली और एक बार फिर सब को चेतावनी दे डाली।

” तुम सब देख कर चुके हो कि तुम्हारे नेता जी का क्या हाल किया मैंने। अगर तुम में से किसी ने भी यहां पर अब मजमा लगाया तो न जाने कौन-कौन सी धाराएं लगाकर सब को कम से कम 7 दिन के लिए तो अंदर करवा ही दूंगा।
मैं जो बोलता हूं वह करके रहता हूं। और जो सोचता हूं और नहीं बोलता वह तो तुम लोगों के सोचने से पहले ही कर बैठता हूं।
इसलिए मैं तुम सब के लिए कुछ और सोचूं, उसके पहले तुम सब ये जगह खाली करके अपने घर निकल लो..।”

अनिर्वान की धमकी में इतना जोर था कि सारे विद्यार्थी धीरेन्द्र प्रजापति से नजर चुराते हुए वहां से एक-एक कर बाहर निकल गये ।

धीरेंद्र प्रजापति अपने पैर पटक कर अपने 2-4 पंटरों के साथ दूसरी तरफ चला गया। पंकज के कमरे में डॉक्टर फिलहाल उसकी बॉडी को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाह रहे थे। लेकिन पंकज का बड़ा भाई दीपक बॉडी देने को तैयार नहीं था। उसका रो-रोकर बुरा हाल था। और वह बीच-बीच में अखंड परिहार के नाम पर बहुत ही ज्यादा जहर उगल रहा था।
  खैर उसकी हालत अनिर्वान समझ सकता था, क्योंकि दीपक ने अपना सगा भाई खो दिया था। वही भाई जिससे दीपक को काफी उम्मीदें थी, और जिसके लिए उसने अपनी सीमाओं से आगे जाकर प्रयास किए थे। जिसे डॉक्टर देखने के लिए उसकी आंखें तरस रही थी। आज वही भाई उसके सामने मृत पड़ा था। हालांकि दीपक इस बात से पूरी तरह अनजान था कि कहीं ना कहीं पंकज के किए का फल ही पंकज को भोगना पड़ा था ।
लेकिन दीपक की नजर में यह काम अखंड परिहार ने किया था और दीपक ने वहीं खड़े खड़े एक प्रतिज्ञा ले ली थी..

” अखंड परिहार तूने जीते जी हमें जिस तरह के खून के आंसू रुलाया है ना, ऐसे ही आंसू तुझे भी रोने पड़ेंगे। तेरे साथ भी ऐसा कुछ कर जाएंगे हम कि तू जिंदा होकर भी जिंदा नहीं रहेगा। फिर जिंदगी ऐसी हो जाएगी कि तू बार-बार मौत की भीख मांग कर भी, ना मरने वालों में से रहेगा और मैं जीने वालों में से..!”

वहां मौजूद डॉक्टर और बाकी स्टाफ से मिलकर अनिर्वान ने पंचनामा तैयार किया और वापस अपने थाने के लिए निकल गया…

***

अखंड को अपने साथ लेकर जाने वाले लड़कों ने कुछ दूर बढ़ने पर जीप एक तरफ रोक दी। अखंड ने उन लोगों को देखकर उनसे सवाल कर लिया..

” तुम चारों हो कौन? और हमारे लिए इतना बड़ा रिस्क उठाया क्यों? मतलब हमें थाने से इस तरह भगाने की क्या जरूरत थी? हमने यज्ञ को फोन कर दिया था और कल वह हमारा वकील लेकर थाने में आने ही वाला था…!”

” भैया जी हम सब आपके जबरा फैन हैं। आपने कभी ना कभी किसी ना किसी तरीके से हम सबकी मदद की है। इसलिए हम लोगों की बुद्धि में जितना आया, हमने आपकी मदद कर दी।
    अब ये जीप रखिए और जाकर उस लड़की को अपनी बेगुनाही की बात बता दीजिए…।”

उनमें से एक लड़के ने यह कहा और जीप को वहीं खड़ा कर दिया उसके बाद वह चारों ही जीप से उतर गए और

        वो लोग, अखंड को उस अंधेरे सुनसान रास्ते पर उस जीप के साथ अकेले छोड़कर एक तरफ की झाड़ियों में गायब हो गए। अखंड उन लोगों को आवाज लगाता रहा, लेकिन ना उन लड़कों ने पलटकर अखंड की तरफ देखा, और ना उसे अपनी शक्ल दिखाई। यहां तक कि उन चारों में से किसी का भी नाम तक अखंड को पता नहीं चल पाया।
बस उनके हुलिये को देखकर इतना ही उसे समझ में आ रहा था कि 20- 22 साल के चार लड़के थे जो पता नहीं उसकी कैसी मदद करने आए थे ? और क्यों मदद करने आए थे?

उन लोगों में से एक लड़के ने जाते-जाते जो कहा था फिलहाल वही बात अखंड के दिमाग में घूमने लगी। उसके दिमाग में उस वक्त यह बात नहीं आई कि अपने घर पर फोन करके अपने छोटे भाई यज्ञ से बात कर ले। और घर की तरफ निकल जाए।

उसकी जगह उसके दिमाग में एक बार फिर रेशम घूमने लगी। और उसे याद आने लगा कि रेशम ने कैसे चीख चीख कर उस पर इल्जाम लगाया था। अखंड ने जीप में चाबी लगाई और उसे रेशम की घर की तरफ मोड़ दिया। लगभग डेढ़ 2 घंटे का फासला तय कर वह आधी रात के वक्त रेशम के घर पहुंच गया। उसके गेट पर ताला लगा हुआ था। घर पर सभी लोग गहरी नींद सो रहे थे। अखंड के दिमाग में इस वक्त जैसा पागलपन समाया हुआ था, उसे ना वक्त नजर आ रहा था ना और कोई बात।
उसने जाकर गेट पर लगी कॉल बेल बजा दी। एक बार के बाद दूसरी बार तीसरी बार वह कॉल बेल बजाता रहा। बाहर तेज बारिश होने लगी थी। बारिश में भीगता खड़ा अखंड दरवाजा खुलने का इंतजार कर रहा था। लगभग 10 मिनट बाद दरवाजा खुल गया। दरवाजे पर रेशम के पिता नजर आ रहे थे। उन्होंने बगीचे की तरफ की बत्ती जला दी। उन्हें गार्डन के ठीक बाहर के गेट के बाहर खड़ा भीगता हुआ युवक नजर आने लगा। रेशम के पिता के ठीक पीछे मानव खड़ा था। वह अखंड को पहचानता था, और इस वक्त भी पहचान गया ।
गुस्से में मानव की मुट्ठियाँ भींच गयीं..

“इसकी इतनी हिम्मत.. घर तक चला आया ?”

मानव के ऐसा कहते ही रेशम के पिता मानव को पलट कर देखने लगे..

“कौन है ये ? क्या किया इसने ?”

रेशम के पिता को अब भी अखंड के बारे में सारी बातें मालूम नहीं थी। रेशम और मानव ने अपने माता-पिता को सिर्फ उतनी ही बातें बताई थी, जिसमें वह लोग बहुत ज्यादा परेशान ना हो। मानव ने आगे बढ़कर दरवाजा खोला और पानी में भीगते हुए गेट की तरफ बढ़ गया..।

” अच्छा हुआ, तू खुद यहां चला आया। तू नहीं भी आता ना तो मैं तुझे ढूंढते हुए तेरे पास चला आता..।”

” हमारी बात सुन लो एक बार प्लीज। हमने कुछ भी गलत नहीं किया है। रेशम को हमारे बारे में बहुत बड़ी गलतफहमी हुई है। एक बार हमें रेशम से मिलवा दो..।”

मानव गेट खोलकर बाहर निकला और उसने एक ज़ोर का घूंसा अखंड के गाल पर जड़ दिया..।

अखंड पलट कर गिर पड़ा..

वो उठा और वापस मानव से मिन्नतें करने लगा….

” देखो बिना सच्चाई जाने हम पर हाथ उठाकर ना तुम्हें कुछ  मिलने वाला और ना हमें कुछ मिलने वाला।
हम सच कह रहे हैं। अपनी अम्मा की कसम खाकर कहते हैं कि हमने रेशम के साथ कुछ भी गलत नहीं किया। तुम एक बार रेशम को बुला दो। हम उसके सामने साबित कर देंगे कि हम वहाँ मौजूद नहीं थे..।”

मानव ने अखंड की बात पूरी भी नहीं होने दी और उसके दूसरे गांल पर जोर का घूंसा मार दिया।

अखंड का होंठ कट गया और उसके होठों से बलबलाकर खून बाहर बहने लगा। अखंड उठा, उसने अपने मुंह से निकल रहे खून को पोछा और एक बार फिर मानव को समझाने की कोशिश करने लगा। इस सबके बीच में ऊपर अपने कमरे से निकलकर बालकनी में खड़ी रेशम ने अखंड और मानव को आपस में उलझे हुए देखा और उसके आंसू बहने लगे…

अखंड समझाने की कोशिश कर रहा था और मानव उसकी बात सुने बिना सिर्फ उसे मार रहा था।

आखिर अखंड का भी राजपूती खून खौलने लगा और अबकी बार मानव का घूंसा जैसे ही अखंड के गाल पर आया,अखंड अपनी हथेली बढ़ाकर उसके घूसे को पकड़ा और उसके हाथों को पीछे की तरफ जोर से मोड़ दिया।
मानव कसमसा कर रह गया। उसके हाथ को पीछे मोड़कर अपने दूसरे हाथ से अखंड ने मानव की गर्दन को दबोच लिया..

” यह मत सोचना कि हमें हाथ पैर चलाना नहीं आता है। हम अब तक चुपचाप तुम्हें समझाने की कोशिश कर रहे थे कि हमारी गलती नहीं है। लेकिन तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़े हुए हैं जो, तुम हमारी बात को समझने की जगह हमें मारने पर तुले हुए हो…।”

अखंड अपनी बात पूरी कर पाता उसके पहले ही मानव ने अपने दूसरे हाथ की कोहनी से अखंड के पेट पर जोर से वार किया।
अखंड अपना पेट पकड़कर नीचे झुक गया। दोनों ही मजबूत कद काठी के युवा लड़के थे। दोनों के ही सर पर इस वक्त गुस्सा सवार था। मानव को अखंड सिर्फ और सिर्फ उसकी बहन को परेशान करने वाला एक छिछोरा नजर आ रहा था ।
वही अखंड मानव से पिटने के बाद उस पिटाई की तकलीफ में मानव को पीट रहा था। दोनों का झगड़ा घटने की जगह बढ़ता जा रहा था कि सबके बीच रेशम के पिता ने जाकर पुलिस थाने में फोन कर दिया। और कुछ देर बाद ही पुलिस की सायरन बजती हुई गाड़ी वहां चली आई।

अखंड के वहां आने का कोई फल नहीं निकल पाया।

पुलिस के आते ही मानव ने अखंड को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया और वहां मौजूद पुलिस को अखंड के बारे में हर एक बात बता दी।
पुलिस विभाग के लोगों ने तुरंत अनिर्वान के थाने में फोन करके अखंड के बारे में जांच पड़ताल की और मानव की बताई सारी बातों के सच साबित होते ही अखंड को पुलिस जीप में डालकर अपने साथ वापस उसी थाने की तरफ बढ़ गए, जिधर से अखंड भाग कर निकला था…।

अखंड के वहां से जाते ही मानव ने उस तरफ घ्रृणा से थूक दिया और अपने चेहरे पर छलक आई खून की बूंदे पोछते हुए अंदर चला गया।

गेट बंद करके वह घर में दाखिल हुआ कि रेशम के पिता ने गुस्से में उससे सवाल कर दिया..

” कोई मुझे भी बताएगा कि क्या हो रहा है इस घर में? कौन था वह लड़का ? जिससे तुम इस तरह उलझ पड़े थे। और मानव मैंने नहीं सोचा था कि तुम शोहदों की तरह गुंडागर्दी पर उतर आओगे.. ?”

मानव सर झुका कर बैठ गया..
रेशम भी अब तक नीचे चली आई थी.. उसने रोते हुए अखंड की सारी ज्यादती कह सुनाई..

“वो तो पुलिस आ गयी वरना मैंने इस लड़के की आज जान ले लेनी थी.. !”

मानव के मुहँ से इतना ही निकला और रेशम के पिता वहीँ सोफे पर अपने सीने में हाथ रखें ढ़ेर हो गए..
उनकी हालत देख रेशम और मानव घबरा कर उनकी तरफ तेज़ी से लपक लिए..

इन सब परेशानियों में रेशम के पिता के सीने में दर्द उठने लगा था..
दर्द की लहर ऐसी तेज़ हुई कि वो सोफे पर निढाल हो गए.. ।

मानव ने तुरंत गाड़ी निकाली और रेशम और उसकी माँ की सहायता से उन्हें लेकर अस्पताल की तरफ निकल गया…

क्रमशः

aparna…

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