अपराजिता -57

अपराजिता -57

कुसुम भावना को खींच कर अपने साथ ले गयी..
कुसुम बहुत खुश थी.. उसे अपनी भावी शादी नजर आ रही थी.. उसकी आंखों में खुशी का एक सपना तैर रहा था जिस सपने में उसके डाक साहब दूल्हा बाबू बनाकर उसके सामने खड़े थे और वह अपने हाथों से उन्हें वरमाला पहना रही थी…
कुसुम की आंखों में पल रहा यह सपना बहुत मीठा था.. लेकिन उसे मालूम नहीं था कि खुली आंखों से देखे सपने हर बार सच हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं होता। कहीं ना कहीं कुसुम का अति आत्मविश्वास भावना को भी डरा रहा था।

   भावना उसूलों वाली लड़की थी। वह अपना हर काम इमानदारी से करती थी। वह अपने प्रयासों में कभी कोताही नहीं बरतती थी, बावजूद वह परिणाम को लेकर हमेशा संशय में रहा करती थी। जबकि कुसुम भावना से इस मामले में उलट थी।

    कुसुम पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने प्रयास करती थी,और अपने परिणामों के लिए भी वह 100 फीसदी आश्वस्त हुआ करती थी। कॉलेज की पढ़ाई इम्तिहान और परिणाम तक की बात अलग थी, लेकिन अब जो होना था वह उनके जीवन की कथा थी।

    कहीं ना कहीं भावना भी इस बात को समझती थी कि, अगर कुसुम और राजेंद्र की शादी पर सरकारी ठप्पा लग जाता है तब उन दोनों को अलग करना चंद्रा भाई के लिए भी इतना आसान नहीं होगा। इसके साथ ही भावना यह भी समझती थी कि, चंद्रा भाई और ठाकुर साहब कितने भी कठोर हो, लेकिन ठाकुर परिवार की औरतें बहुत स्नेहिल थी। और कहीं ना कहीं कुसुम की मां और उसकी भाभी कुसुम के साथ अत्याचार नहीं देख पाएंगी। जब तक कुसुम और राजेंद्र की शादी नहीं हुई है तब तक भले ही राजेंद्र उनके लिए एक गैर जात का लड़का होगा, लेकिन जिस दिन कुसुम शादी करके राजेंद्र का हाथ पड़कर इस हवेली में दाखिल होगी, उस दिन भले ही अपने आंसुओं को पीकर ही सही लेकिन कुसुम की मां अपने जमाई का स्वागत जरूर करेगी।
   और उस पल में ठाकुर साहब और चंद्रा भैया का दिल भी अपनी बहन के लिए पिघल ही जाएगा। यही सोचकर भावना के चेहरे पर भी हल्की सी मुस्कान आ गई..

” देख रहे हैं आजकल मुस्कुराती बड़ा कम हो.. ? ऐसा क्या हो गया है, हमारी लाडली भावी को?”

” तुम मुस्कुराने का कोई मौका दो तब तो मुस्कुराए। तुम तो हर पल कोई ना कोई ऐसा कांड करके रखती हो कि हमारी जान सांसत में पड़ी रहती है.. !’

” क्यों अब क्या कर दिया हमने.. ?”

“कुछ नहीं महारानी जी.. ! अच्छा सुनो कुसुम, तुम्हे कुछ बताना है !”

“हम्म बोलो ना ! हम सुन रहे हैं !”

कुसुम मोबाइल पर ऑनलाइन लड़को की शेरवानियों की तस्वीर पलटती हुई बोल पड़ी..

भावना का ध्यान भी उन तस्वीरों पर चला गया.. कोई ड्रेस तीस हज़ार की थी तो कोई बाइस की..
उनकी कीमतों पर ध्यान दिए बिना कुसुम उन्हें पसंद करती जा रही थी। भावना कुछ पल के लिए मोबाइल की स्क्रीन देखती रह गई।
    
        क्या किसी के कपड़ों की कीमत किसी दूसरे के घर के महीने भर के राशन से भी ज्यादा हो सकती है? हाँ हो तो सकती है…
   क्या यही संसार है ? क्यों इतना अंतर् है ? बनाने वाले ने तो सबको बराबर सब कुछ दिया है ?

बताओ कुसुम कुमारी का दूल्हा यानी डॉक्टर साहब ये तीस हज़ार का कपडा ही भर पहन लेंगे, जितने में उसके घर का छः महीने का राशन आ जायेगा..
जाने क्यों ये सोच कर भावना की आंख भर आयी..

ईश्वर भले कुछ भी ना दे लेकिन रुपया ज़रूर सबको ज़रूरत भर का देकर भेजे..
क्यूंकि रुपया ही है जिसके कारण कभी अच्छे खासे इंसान को भी अपना स्वाभिमान झुकाना पड़ता है…
भावना का गला भर आया..
वो अंदर से जुझारू और स्वाभिमानी लड़की थी और अब सच्चाई जानने के बाद निनाद से कुछ भी लेना उसे गवारा ना था..
वो निनाद के बारे में सब कुछ कुसुम को बता देना चाहती थी, और साथ ही कुसुम से वह यह भी कहना चाहती थी कि निनाद पिछले कई सालों से उसके पिता के बदले उन्हें महीने का खर्च भेज रहा था। लेकिन कुसुम का उत्साह और उसके चेहरे की दमक देखकर भावना ने अपने मन को समझ लिया। उसने खुद को कुसुम को कुछ भी बताने से रोक लिया।

क्योंकि कहीं ना कहीं यह सब सुनकर कुसुम दुखी हो जाती, और फिर वह अपनी स्वाभिमानी सखी को अच्छे से जानती थी। इसलिए वह जरूर भावना को अब निनाद से कुछ भी लेने से रोक देती, लेकिन उसके बाद वह उसका सारा खर्च स्वतः अपने कंधों पर डाल लेती और अपने पिता से लड़ झगड़कर भावना का खर्च खुद उठाने लगती, लेकिन यह भी तो भावना को गवारा न था.. ।

हे महादेव जिंदगी के कैसे अजीब से मोड पर खड़ा कर दिया है तुमने, कि जहां पहुंचकर ना अपनी मां से कुछ कह सकती हूं और ना अपनी परम प्रिय सखी से..
अभी अगर कुछ कह सकती हूं तो सिर्फ उस आदमी से जिससे पूरी तरह अनजान हूं..
अब तक बस इतना ही पता है कि इतने सालों से वह बिना किसी शर्त के, बिना किसी स्वार्थ के, मेरा बोझ उठा रहा था। यहां तक कि मेरी शादी के लिए भी रुपए जोड़ रहा था..
ईश्वर, क्या तुम स्वयं निनाद का रूप लेकर पैदा हो गए हो, या अब भी निनाद जैसी रचनाएं रचते हो…. जिससे लोगो का तुम पर विश्वास अटल रहे..।

भावना अपने विचारों में खोई थी कि कुसुम ने हाथ पकड़ कर उसे झिंझोड़ दिया..

“क्या सोच रही हो भावी ? अच्छा यह बताओ इन दोनों में से कौन सा कुर्ता अच्छा लग रहा है.. ?”

जब मन स्वस्थ ना हो तो बाक़ी इन्द्रियां भी अवस्थित हो जाती हैं.. दृष्टि सही देख नहीं पाती, क्षोत्र सुन नहीं पाते, त्वचा स्पर्श नहीं कर पाती और रसना स्वाद नहीं ले पाती, नासिक को गंध का अनुभव नहीं होता..।

     यह पांचो इंद्रियां तभी अपना कार्य कर सकती हैं जब मन स्वस्थ हो..।

यही भावना के साथ भी हुआ। उसके मन में जैसी हलचल मची थी, उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। कुसुम ने 5- 6 कुर्तो में से दो कुर्ते चुनकर निकाले थे.. एक हल्का आसमानी था और एक बादामी रंग का..
भावना ने एक उड़ती से नजर दोनों कुर्तों पर डाली और बादामी कुर्ते पर ऊँगली रख दी..

“हम्म सच्ची.. ? भावी तुम्हे बादामी कुरता पसंद आ रहा.. हमे तो आसमानी पसंद आया था.. पर चलो छोड़ो, तुम भी क्या याद रखोगी कि हमने हमारी शादी में अपनी बेस्ट फ्रेंड यानी पक्की सहेली की पसंद का कुर्ता अपने पतिदेव को पहनाया था। आखिर तुम दोनों ही तो हमें सबसे ज्यादा अजीज हो ।
   हमारे दिल के दो टुकड़े कर दो तो, एक में तुम बैठ जाती हो और एक में हमारे डाक साहब.. !”

भावना फीका सा मुस्कुरा कर रह गयी..

“अब चलते हैं कुसुम.. हमे भी तो तैयारी करनी है ?”

“तुम्हे किस चीज़ की तैयारी करनी है? उल्टा तुम्हें तो हमारी तैयारी करवानी है। हम तो कहते हैं, अब हमारी शादी तक तुम यही हमारे साथ रुक जाओ। कितना मजा आएगा यार, हमारे कमरे में हम दोनों रहेंगे। रात भर गप्पे मारेंगे..।”

” रात भर तुम क्या गप्पे मारोगी, हम अच्छे से जानते हैं। हमारी पूरी रात अपने डाक साहब की तारीफ कर करके हमें पकाओगी बस, इसलिए हमें नहीं ठहरना। हम जा रहे हैं। वैसे भी शाम के बाद माँ को अकेले छोड़ना अच्छा नहीं लगता ना!”
.
” अच्छा जी, अगर तुम्हारी शादी हो गई तब? तब क्या करोगी?”

“तब… तब अपने पतिदेव से कह कर अम्मा को अपने साथ ले जायेंगे.. !”

भावना का चेहरा स्वाभिमान से खिंच गया। उसके माथे पर तनाव की रेखाएं पड़ने लगी। और चेहरा रक्तिम पङ गया। उसकी बंधी हुई मुट्ठियाँ और कसा हुआ माथा,भिंचे  होंठ देखकर कुसुम भी पल भर के लिए ठहर कर रह गई और उसके बाद आगे बढ़कर उसने भावना को अपने गले से लगा लिया..

“हम जानते हैं, तुम ऐसा ही करोगी। और अपने भगवान से मानते भी हैं कि तुम्हें ऐसा दूल्हा मिले जो तुम्हारी इच्छा को पूरा कर दे, और चाची जी हमेशा तुम्हारे पास रह सके। सुनो, हम बुलेट पर तुम्हें छोड़ आये क्या?”

“नहीं.. अब तुम्हारी शादी के दिन करीब आ रहे हैं.. तुम्हारा ऐसे निकलना चंद्रा भैया को पसंद नहीं आएगा.. समझ रही हो ना.. !”
. हां मे गरदन हिलाकर कुसुम भावना का हाथ पकड़े उसके साथ बाहर निकल गई। दरवाजे तक भावना को छोड़कर कुसुम पलट गई, और भावना अपने घर के लिए निकल गई। रास्ते में पड़ने वाले तालाब के पास से गुजरते हुए उसे पिछले दिन की सारी बातें याद आ गई। जब निनाद ने उसे उसके पिता के बारे में बताया था।
    वहां से गुजरते हुए वह एक बार फिर भावुक हो रही थी कि निनाद का फोन आ गया..

भावना के फोन उठाते ही बिना किसी औपचारिक हाय हेलो के निनाद ने अपनी बात रख दी….

“तुम यहाँ बहरीन में जॉब करना चाहती हो ?”

“हम्म.. !”

“क्यों ?”

” क्योंकि हम यह गांव हमेशा हमेशा के लिए छोड़ देना चाहते हैं। यहां रहते हुए हम कुछ नहीं कर पाएंगे अपने और अपनी अम्मा के लिए ।
    और आखिर कब तक आप हमारा घर पालते रहेंगे? मतलब आज तक हमें पता नहीं था, तब तक आपने जितना किया, जो किया, वह बहुत था। लेकिन अब … आपको, हमारे लिए यह सब करने की जरूरत नहीं है..।”

“यू मीन..

“यस… हम यही कहना चाहते हैं कि आपने आज तक जो भी किया, उसका एहसान हम जिंदगी भर नहीं चुका सकते। इसलिए हम चाहते हैं कि अगर वहां हमारी नौकरी लग जाए, तो हम मेहनत करके रात दिन एक करके आपकी पाई पाई वापस लौटा देंगे।
   देखिए हम समझते हैं कि आप भी किसी मजबूरी के कारण ही अपने घर वालों से इतना दूर विदेश में काम कर रहे हैं। और ऐसे में आप सिर्फ अपने घर वालों का नहीं हमारा भी बोझ उठा रहे थे..।

“वेट…. बावना.. !”

निनाद भावना को बावना ही बुलाता था..

” तुम्हें यह क्यों लग रहा कि तुम को मेरा पैसा वापस लौटाना है..?”

“आपको ये क्यों लग रहा कि हमें नहीं लौटाना है.. !”

“बट आई डोंट नीड !”

” हमें पता है कि आपको जरूरत नहीं है। लेकिन हमें जरूरत है। हम अपने सर पर किसी का बोझ नहीं रख सकते। अगर आप बहरीन में हमारे लिए नौकरी नहीं तलाश सकते तो कोई बात नहीं, हम गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़कर और यहां स्कूल में नौकरी करके किसी तरह से आपका कर्ज चुका देंगे..।
आप खुद सोचिए, आप हमारी जगह होते तो क्या किसी गैर की मदद के बदले उसका एहसान चुकाने की जगह एहसान फरामोशी करते आप?”

“इसका मतलब ये कहना चाहती हो कि मैं गैर हूँ…. ।”

“अपने भी तो नहीं है.. !”भावना बोल तो गई,लेकिन अपने बड़बोलेपन पर अपनी जीभ काट कर रह गयी..

“हम्म…. !”  वही गूढ़ शांत गंभीर सा हम्म हवा में तैर गया..

निनाद वैसे भी कम बोलता था लेकिन जब कुछ और ना कह कर सिर्फ हम्म कहता, तब जाने क्यों भावना उसके मन की हर बात समझ जाती थी।
    अभी भी वैसा ही हुआ। पता नहीं कैसे लेकिन भावना को समझ में आ गया कि उसका यह सब बोलना निनाद को बिल्कुल पसंद नहीं आया है। शायद वह बहुत गुस्से में आ गया था…।
भावना जब तक यह सब समझ कर और कुछ बोल पाती, निनाद ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।

भावना समझ गई की निनाद को बहुत ज्यादा बुरा लग गया है।
एक ठंडी सी आह भर कर अपने आंसुओं को फिर जप्त करके भावना अपने घर की तरफ बढ़ गई…

अपनी माँ से बिना कुछ बोले वो अपने कमरे में चली गयी..
पलंग पर ढेर होकर वो अपने मन में उमड़ते सैलाब को रोकने की कोशिश करने लगी, लेकिन रोक नहीं पायी और भरभरा कर रो पड़ी…
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसका कलेजा कौन मसले दे रहा है..?

कुछ देर पहले मोबाइल पर दिखा पचास हज़ार का बादामी कुरता, उसकी गरीबी का मजाक उडाता उसे कचोट रहा था या,
     फिर निनाद का अचानक बिना कुछ बोले फ़ोन काट जाना उसे यूँ डंक मार रहा था..

हाय कैसी किस्मत थी उसकी..।
आजतक उसने कब अपनी ख़ुशी मांगी थी.. आज तक उसे जो मिला उसी में खुश हो लेती थी। लेकिन आज वो अपने भगवान से वाकई नाराज़ थी..
क्या दिया उसे..
उसके जन्म के कुछ सालों बाद ही उसके पिता चले गए.. बस उनके भेजे रुपयों और तोहफों से ही उन्हें जाना उसने.. और जब उन्हें वाकई जानने समझने का वक्त आया, तब उस पर उनके ना रहने की खबर का वज्रपात हो गया..

वो अपनी सखी कुसुम की तरह क्यों किसी पैसे वाले घर में पैदा नहीं हुई..?
कुसुम के पास क्या नहीं है.. रूपयों से भरा महल जैसा घर! इतना प्यार करने वाली मां, उस पर जान लुटाने वाला भाई, संरक्षण देते पिता और उसके आगे पीछे डोलती उसकी भाभी।
        पचास नौकर चाकर !!
    कुसुम जो चाहती है, उसके करताल में धर दिया जाता है!
         बहुत बार वह कई ऐसी वस्तुओं को भी ठोकर मार कर चली जाती है, जिन्हें सपने में भी पा लेने की ख्वाहिश भावना नहीं कर पाती।
    भगवान क्यों इतना नाइंसाफी करते हैं? वह यह सब पाने के लायक है। आखिर उसमें किस चीज की कमी है?
    ना रूप में, ना बुद्धि में, वह कुसुम से कम है।
गुण में भी वह उसे दो कदम आगे ही है। बावजूद भगवान ने किस्मत का खजाना लुटाने में उसे पर कृपणता ही दिखाई है।
    आज भी कुसुम के पास सब कुछ होते हुए भी वह एक अच्छे घर-वर को ठुकरा कर अपने मन का करने जा रही है।
     क्या वह स्वयं कुसुम की जगह होती तो ऐसे अपनी शादी के दिन अपने घर से भाग कर किसी दूसरे लड़के का हाथ पकड़ने की हिम्मत कर पाती?

    शायद नहीं। कभी नहीं। क्योंकि उस समय वह अपने दिल की बजाय दिमाग से सोच विचार कर निर्णय करती और अपने पिता की नाक कटने नहीं देती। वह इतनी समझदार है, शायद इसीलिए उसके जीवन में कोई डाक साहब अब तक नहीं आए, और शायद आएंगे भी नहीं। कभी नहीं।

    उसका जीवन शायद ऐसे ही बीत जाएगा। अपनी मां को सुबह सांझ की दिया बाती करते देख।
     थोड़ा बहुत पढ़ लिख कर वह पास के किसी सरकारी स्कूल में अध्यापिका हो जाएगी और धीरे-धीरे सूट पहनना छोड़कर साङियों पर आ जाएगी, और एक दिन सिंथेटिक साड़ियों को छोड़कर खादी और सूती साड़ियों को खुद पर लपेटने लगेगी।

    बालों में चांदी के तार उभरने लगेंगे और उम्र के उस मोड पर जब उसे थकान होने लगेगी, तब उसके पास उससे भी कहीं अधिक बूढी मां की जिम्मेदारी के अलावा और कुछ नहीं बचेगा?

    पता नहीं क्यों अपने विचारों में उलझी भावना सिर्फ खुद पर तरस खाती जा रही थी, और रोती जा रही थी। उसे नहीं मालूम था कि दरवाजे पर खड़ी उसकी मां उसे ही देख रही है।

     भावना रोने में इतनी व्यस्त थी कि दो बार उसका फोन पूरी तरह बज कर बंद हो गया। एक बार फिर फोन बजना शुरू हुआ और उसकी मां ने आगे बढ़कर फोन उठा लिया..

उन्होने आगे बढ़ कर उसके कंधे पर हाथ रख दिया..
भावना चौंक कर पीछे देखने लगी.. अपनी माँ को खड़ा देख वो अचकचा गयी..

“माँ तुम ?”.

“बिटिया.. क्या हुआ.. ऐसे काहे रो रही.. कुसुम से झगड़ा हो गया क्या ? चंद्रा ने फिर कुछ बोल दिया.. ?”

ना में गर्दन हिला कर भावना अपनी मां के सीने से लग गई। कुछ देर तक उनके सीने से लगी लगी रोती रही और जब रो-धो कर छुट्टी पा ली, तब अपनी मां को छोड़कर अलग हुई और अपना हाथ मुंह धोकर वापस चली आई। उसकी मां भी उसकी पीड़ा समझती थी। उन्हें भी मालूम था कि उनकी बेटी गुणो की खान है।
      16 कलाओं से युक्त उनकी कन्या में किसी बात की कमी नहीं थी..।

बचपन से कुशाग्र उनकी बेटी उच्च शिक्षा ग्रहण करना चाहती थी, लेकिन उनकी किस्मत में उसे पढ़ाना लिखाना ही नहीं था.. वरना बारहवीं तक जीवविज्ञान की छात्रा रही भावना को साइंस कॉलेज के अभाव में आर्ट्स लेना नहीं पड़ता..

वो मन ही मन भावना की तकलीफ समझ रही थी, लेकिन इस वक्त भावना की असली तकलीफ क्या थी वो भावना खुद नहीं समझ पा रही थी..।

भावना के आते ही उसके सर पर प्यार से हाथ फेर कर वो चली गयी..

“तुम्हारे लिए अच्छी सी चाय बना लाते हैं, फिर सारा मन का क्लेश बह जायेगा.. !”

भावना ने धीरे से गर्दन हिला दी..

माँ के कमरे से बाहर जाते ही एक बार फिर फ़ोन बजने  लगा.. भावना को अब होश आया कि पिछली तीन बार फोन पूरी रिंग बजकर उसके ना उठाने के कारण बंद हो गया था। इस बार भावना ने फोन उठा लिया। फोन निनाद का था..

“फ़ोन क्यों नहीं उठा रही थी बावना.. ? कोई प्रॉब्लम हुआ क्या ?”

हे भगवान इस नादान को क्या समझाएं और कैसे समझाएं? इसे हमारी कोई बात समझ में भी तो नहीं आएगी… मन ही मन सोचती भावना ने कुछ नहीं कहा और उसकी खामोशी निनाद को बुरी तरह से खल गई..

” बावना तुमसे एक बात कहना चाहता हूं, पता नहीं तुम मेरी बात को कैसे लोगी.. आई मीन समझोगी.. !”

“कहिये.. !”

भावना की आवाज में अब भी तरावट थी और उस तरावट को, नमी को, निनाद ने इतनी दूर बैठे होकर भी महसूस कर लिया..

“बावना आई लव यू.. ! मैं सच में तुमको प्यार करने लगा हूँ.. मुझे नहीं पता, तुम मेरे बारे में क्या सोचती होंगी.. लेकिन अभी से नहीं, एक्साक्ट्ली मुझे भी मालूम नहीं कभी से मैं तुम्हे पसंद करने लगा..
तुम्हारा पढाई के लिए लगाव, तुम्हारा नेचर, तुम्हारा सब कुछ पसंद है मुझे.. इसलिए ये मत सोचना कि मैं कोई गैर है.. ।
मैं हमेशा तुम्हें भी अपना फैमिली माना है। लेकिन मेरी तरफ से तुम्हारे लिए कोई बाउंडेशन नहीं है। तुम किसी और को प्यार करती है तो, वह भी चलेगा। लेकिन मैं तुम्हारे नाना को प्रॉमिस किया था, तुम्हारी शादी अच्छे से करवाने का।
    तो अगर तुम किसी और को पसंद करती हो तो तुम उसी से शादी कर लेना। मुझे कोई टेंशन नहीं। लेकिन तुम्हारी और तुम्हारी मां की जिम्मेदारी मुझे उठाने से मत रोको, प्लीज..।”

ये लड़का एक के बाद एक हार्ट अटेक दिए जा रहा था.. ।

भावना के दिल दिमाग में अब तक गहरे काले बादल छाए हुए थे। ऐसी गजब की मनहूसियत चारों तरफ फैली थी कि उसके पास रोने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था और अब निनाद के उन तीन जादू भरे शब्दों ने वाकई कमाल कर दिया था ।
    यूं लग रहा था जैसे उन बादलों को चीर कर निनाद ने सूरज आसमान पर चमका दिया था।
    
      हे भगवान क्या वाकई प्यार जैसी चीज कुछ होती है? और अगर होती है तो क्या उसमें इतनी ताकत होती है कि, सिर्फ पल भर में इंसान के आंसू सुखाकर उसके चेहरे पर मुस्कान बिखेर सकती है।
    इस छोटे से पल में, भावना के अंदर जैसे सारे संसार की शक्ति भर गई थी। उसे लग रहा था अपने पलंग से कूद कर नाच उठे। उसकी खुशी संभल नहीं रही थी। बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ पल पहले उसके आंसू नहीं संभल रहे थे।

    तो यह बात थी, और यह कारण था ,उसकी उदासी का।
     उसे लगा तो था की थोड़ी देर के लिए शायद वह कुसुम के रुतबे, उसके रुपए पैसे से जल भूनकर खाक हो गई थी। लेकिन नहीं, सच्चाई इससे बहुत अलग थी। उसका दिल डूबा डूबा सा इसलिए महसूस हो रहा था क्योंकि उसे लगने लगा था निनाद उससे नाराज हो गया है। और जैसे ही निनाद ने अपने दिल की बात उससे कही, उसके मन का सारा मैल धुल गया। वह कुछ देर के लिए कुछ कह ही नहीं पाई।

कैसा बावला लड़का था, एक तरफ तो उसे अपने प्यार की बात कह रहा है। और उसके बाद यह भी फरियाद कर रहा है कि अगर तुम्हें किसी और से प्यार है तो मैं तुम्हारी शादी भी करवा दूंगा।
     अरे बुद्धू राम इतना महान बनने की जरूरत नहीं है। अगर प्यार करते हो तो बेधड़क स्वीकार करो और पूरे हक़ से कहो की भावना आओ मुझसे प्यार कर लो..।

भावना ने एक ठंडी सी आह भारी और उसी समय दरवाज़े पर दस्तक देते उसके फूफा जी चले आये….

“सुनो निनाद.. कोई मेहमान आए हैं, हम आपसे रात में बात करते हैं..।”

“पक्का ? बात करोगी ना ? मेरी बात सुन कर नाराज़ तो नहीं हो ?”

“नहीं.. बिलकुल नहीं.. अब बाद में बात करेंगे !”

और मुस्कुरा कर भावना ने फोन काट दिया। लेकिन फोन की स्क्रीन को चूम लिया।

   मुस्कुरा कर वह बाहर निकल आई। सिर्फ पल भर में ही जैसे उसकी दुनिया बदल गई थी।
   उसे लग रहा था सब कुछ कितना सुहाना है। उसकी मां ,सामने बैठे फूफा जी, रसोई से उठती चाय की खुशबू, उसकी प्यारी सहेली कुसुम, सब कुछ तो अच्छा है।
    हां इस सबके साथ अगर उसके बाबूजी भी होते तो और अच्छा होता। लेकिन हर किसी को सब कुछ तो नहीं मिल जाता ना।

    उसकी मां फूफा जी को धोक देकर वहीं खड़ी थी।  उन्होंने भावना को इशारे से रसोई से चाय लेने भेज दिया, और भावना मुस्कुरा कर चाय छानने चली गई।
उसकी मन एक बार फिर कुसुम के पास दौड़ने लगा। उसे लगा कुसुम को फोन करके निनाद से हुई सारी बातें बता दे।

    लेकिन फिर धैर्य रखकर वह चाय छानने लगी। इस बात से बेखबर कि बाहर बैठे उसके फूफा जी उसकी मां के पास उसके लिए एक रिश्ता लेकर आए थे।

    वही रिश्ता जो भावना की मां कमला की दूर की बहन ने अपनी सहेली से चर्चा की थी। उन्होंने अपनी सहेली से चर्चा करने के बाद इन पंडित जी से चर्चा करके उनके हाथ से मानव की तस्वीर भावना की मां के पास पहुंचवा दी थी..

“सुनीता का फ़ोन तो आया होगा ना बहु ?”

“जी पंडित जी ! सुनीता हमारे मामा की लड़की होती है रिश्ते में !”

“ये लड़का उन्ही का जाना चीन्हा है.. सच कहें तो लड़का गुना की खान है। उस समय याद है, महीना भर पहले हम भावना की तस्वीर लेकर गए थे। उस समय गलती से  बङे ठाकुर के यहां पहुंच गए थे। मानौर वाले ठाकुर जी। और देखो भावना बिटिया की सहेली कुसुम का रिश्ता वहाँ तय हो गया। उस समय लगा था कि हम अपनी बिटिया का रिश्ता करवाने निकले थे और किसी और की बिटिया का भला हो गया। पर चलो भगवान ने लाज रख ली ।
  भगवान का आशीर्वाद कभी खाली नहीं जाता। एक बिटिया का भला किया तो हमारी बिटिया को और भी अच्छा रिश्ता मिल गया..।

बहु, लड़का हीरा है हीरा। इकलौता लड़का है। एक छोटी बहन है। जिसकी शादी हो गई है ।
   बहन डॉक्टर है, और भाई इंजीनियर है। अच्छी नौकरी कर रहा है। मां-बाप बस है, कोई जिम्मेदारी नहीं। परिवार इतना अच्छा है कि वह लोग भावना को आगे पढ़ाने के लिए भी तैयार है।
   तुम्हारी बिटिया राज करेगी और बुढ़ापे में तुम भी चैन से गंगा नहा लोगी.. “

“बस पंडित जी.. हमारा सपना तो था कि हमारी बिटिया पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाती। कम से कम हमारे जैसा जीवन तो नहीं जीना पड़ता उसे। लेकिन अब क्या करें, रहते भी इतनी छोटी जगह में है कि पढ़ाई का भी कोई साधन नहीं है। इसीलिए यह चाहते थे कि ऐसे घर में ब्याह हो जहां लोगों को पढ़ाई का महत्व मालूम हो और वह लोग अपनी बहू को भी पढ़ा सके। अगर सच में उन लोगों ने हमारी बिटिया को शादी के बाद भी पढ़ा लिखा दिया और भावना भी कोई नौकरी कर पाई, तब जरूर हम हरिद्वार जाकर गंगा नहा लेंगे।

    सोच रहे हैं उसके बाद वही शांतिकुंज में बसेरा डाल लेंगे। उसके बाद यहां गांव में हमारा क्या काम ? भावी के बाबूजी से भी कहेंगे कि आप वापस चले आईए। हरिद्वार में एक झोपड़ी बनाकर..
गंगा किनारे रह लेंगे..।

“हा हा इतना आसान नहीं है, गृहस्थी के चक्रव्यूह से निकलना। अच्छे-अच्छे अभिमन्यु इसमें घुसते जरूर है, पर चाह कर भी इस जंजाल को काटकर निकल नहीं पाते।

ईश्वर सबका भला करेंगे, सबका कल्याण करेंगे। यह लड़के की तस्वीर रख लो संभाल के।
    भावना के बाबूजी को भी दिखा देना। अगर उन्हें भी लड़का पसंद आता है तो कोई शुभ मुहूर्त देखकर दोनों परिवारों के मिलने का समय ठीक करवा लेंगे।  ठीक है बहु ?”

“जी पंडित जी !”

अपनी बात पूरी करके पंडित जी उठकर खड़े हो गए इस वक्त भावना चाय लिए चली आई..

” नहीं बिटिया आज चाय नहीं पियेंगे आज एकादशी हमारी..!”

“चाय तो व्रत में ले सकते हैं पंडित जी !”

” एकादशी के दिन सिर्फ अपनी बामणी के हाथ का ही पकाया खाता हूं।वह भी एक बार।
    चाय सुबह एक बार ले लेता हूं। उसके बाद पूरे दिन जल भी नहीं लेता ।
   शाम को चंद्रमा को अर्ध्य देकर पूजा करने के बाद पारण करता हूं बहु.।
आज क्षमा करो.. फिर कभी बिटिया के हाथ की चाय अवश्य पियूँगा.. !”

“जी जैसा भला करे !”

पंडित जी ने भावना के सर पर हाथ रखा और वहां से अपना काम-धाम समेट कर निकल गए। भावना अपनी खुशी में इतनी मग्न थी कि टेबल पर हवा से हिलती तस्वीर पर भी उसका ध्यान नहीं गया। वह अपनी मां के गले से लगे झूल गई। उसने धीरे से अपनी मां के कान में खाने की फरमाइश कर दी..

“आज क्या बनाओगी खाने में ?”
. आश्चर्य से आंखें फाड़े भावना की मां उसे देखने लगी।

” आज हो क्या गया है तुम्हें? अभी कुछ देर पहले तो सावन भादो बनी हुई थी, हां अब अचानक भूख लग आयी.. ।”

“हाँ फिर.. दस दिन बाद हमारी सखी बिदा होकर मानौर चली जाएगी.. रोना नहीं आएगा क्या?”

    “हम तो पहले ही समझ गए थे कि तुम्हारा रोना कुसुम के लिए ही है। चलो अच्छा हुआ रो-धो कर छुट्टी पा ली। अब बताओ क्या खाओगी ?कचौड़ी बना दे?”

” हां!”
      गर्दन हां में हिला कर भावना ने चाय का एक प्याला अपनी मां के हाथ में थमाया और दूसरा प्याला लेकर खुद आंगन पर की सीढ़ियों पर बैठ गई। आंगन में खिला पारिजात का पेड़ फूलों की खुशबू बिखेर रहा था।

    कुछ फूल नीचे हरी घास पर उल्टे गिरे हुए थे। जिनका सफेद हिस्सा नीचे और नारंगी डंठल ऊपर की तरफ थे। हरी-भरी घास में गिरे वह सुंदर से फूल भावना के मन को मोह रहे थे और उनसे आती खुशबू उसे अपने आप में बांधे दे रही थी। उसने अपना फोन ऑन किया..।
अभी-अभी निनाद का फोन आया था, इसलिए उसका नाम सबसे ऊपर नजर आ रहा था। उसके नाम को देखकर एक बार भावना ने प्यार से उन शब्दों पर उंगली फेरी और पारिजात की खुशबू अपने अंदर भरकर चाय का प्याला अपने होठों से लगा लिया। आज से पहले कभी चाय ने उसे इतना सुकून नहीं दिया था जैसा आज उसे मिल रहा था…

क्रमशः

aparna…

  “भावना कहाँ हो यार ? तुम अब तक पहुँची क्यों नहीं.. हमारा घर से भागने का समय हो गया है.. !”

“आ रहे है कुसुम.. बस तुम्हारी ही कुछ तैयारी बाकी है.. !”

कह कर भावना ने फ़ोन काट दिया और तेज़ी से भागती हुई बस स्टेण्ड की तरफ बढ़ गयी..
उसका लहंगा पैरो में फंस रहा था, लेकिन निनाद से पहली बार मिलने की ख़ुशी में वो भागती चली जा रही थी..

….
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