अपराजिता -66

अपराजिता -66

कमरा खाली होते ही सिम्मी अपनी भाभी को बुला लायी..
और फिर उन दोनों ने कुछ और लड़कियों की मदद से आजकल के तामझाम को ध्यान में रखते हुए नए नवेले जोड़े की सुहागरात के लिए कमरे को सजाना शुरू कर दिया…

लम्बे चौड़े से पलंग पर ऊपर से फूलों की लड़ी लटकाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी.. 
सिम्मी और उसकी भाभी ने ढेर सारे जोड़ तोड़ के साथ पलंग पर ऊपर से फूलों की लड़ियाँ लटका दी…
बहुत सारे जुगाड़ के साथ जैसे तैसे उन लोगो ने कमरा सजा दिया..
रूम फ्रेशनर की धुंआधार बारिश के बाद भी सिम्मी की भाभी को संतुष्टि नहीं मिल रही थी..

उन्हें अपने काम में परफेक्शन चाहिए था, जबकि वो बुरी तरह से इम्पर्फेक्ट थी हर काम में..!
उन्होंने कमरे का नाईट बल्ब भी बदलवा कर नीली रोशनी वाला बल्ब डाल दिया..
कमरे में पलंग के साथ रखी टेबल पर खाने पीने का थोड़ा सामान रखवा दिया..
कमरे के बीचोबीच खड़ी वो चारों तरफ अपनी पारखी नजरो से देखती खड़ी थी, कि और क्या कमी रह गयी है..।

“हो गया न भाभी ?  कमरा बहुत अच्छा दिख रहा है.. अब चलो ! भैया कहीं बीच में चले न आये.. भाभी को भी लाकर पलंग पर बैठाना है, जैसे फिल्मो में दुल्हन बैठ कर इंतज़ार करती है.. !”

“हम्म हो गया बस.. रुक ज़रा ! बालूशाही रख दी है न, और सुन नमकीन पिस्ते बादाम रखे की भूल गयी.. ?”

तभी सिम्मी की एक थोड़ी आधुनिक सी शहर की पढ़ी लिखी सहेली बोल पड़ी..

“भाभी कमरा कुछ ज्यादा ही सजा दिया है, ऐसा नहीं लगा रहा ?
  एकदम ओवरलोडेड है.. ऐसा लग रहा नयी दुल्हन की भड़कीली साड़ी के साथ ही उसे जितने जेवर मिले सब उस पर लाद कर उसे एकदम गंवार बना दिया है.. अरे थोड़ा क्लासी सजाओ न !”

“जे देखो.. जिन्हे गुलाबजामुन का स्वाद नहीं पता, वो उसे बनाने का नुस्खा बता रही… ।
अरे राशि जी आपका ब्याह तो भया नहीं अब तक, फिर आपको कैसे पता कि कमरा कैसे सजाना होता है ?”

“अरे भाभी अजीब बात करती है आप भी.. ?
क्या आपका जब तक ब्याह नहीं हुआ था, आपको सुहागरात के कमरे की साजसज्जा के बारे में मालूम नहीं था ? या फिर आप पचहत्तर बार ब्याह कर चुकी जो अब आपको सजावट का खासा अनुभव हो गया है.. कुछ भी बोलती है आप..?
मैं सच कहूं तो आप लोगो की ये साज सज्जा गज़ब फूहड़ लग रही.. !”

अपनी हंसी दबाये वो कमरे से बाहर निकल गयी..

“जलती है हमसे.. !” भाभी ने सिम्मी से कहा और सिम्मी ने हामी भर दी..
फूल पत्तो से लबालब भरे उस कमरे में राशि को क्या पसंद नहीं आया ये ढूंढने की कोशिश में सिम्मी और भाभी ने कुछ फूलो की पंखुड़ियां पलंग पर और बिखेर दी….

कमरे को खूब सजा कर वो लोग अपना तामझाम समेट कर बाहर निकल गयी..
कुछ देर में ही सिम्मी कुसुम को साथ लिए कमरे में चली आयी..

कमरा देख कर कुसुम के मन में आवाज़ हुई “सत्यानाश! अभी ये एक सर्कस और बचा है !”

पर एक गहरी सी साँस लिए वो सिम्मी के बताये अनुसार चुपचाप जाकर पलंग पर बैठ गयी.. !

“हम जाये भाभी ?”

सिम्मी ने जैसे ही पूछा, कुसुम ने हाँ में गर्दन हिला दी…..

“आपको डर तो नहीं लगेगा ?” आगे का वाक्य पूरा कर   वहाँ से जाने की जग़ह सिम्मी वहीँ धरना देकर बैठ गयी और कुसुम को अपने कॉलेज के हद फ़िज़ूल किस्से सुनाने लगी…

कुसुम को सिम्मी की बातों में कोई रस नहीं मिल रहा था.. वो सिम्मी के वहाँ से जाने का इंतज़ार कर रही थी..!

उसकी शादी को लगभग चौबीस घंटे बीत रहे थे, और अब उसका दिमाग थोड़ा स्थिर होकर सोच पा रहा था..।
उसका मन भावना का हाल जानने के लिए तड़प उठा था..

जाने क्यों लेकिन उसे अपने भैया की दिखाई तस्वीर पर भरोसा नहीं था..।
उसे लग रहा था भैया ने ज़रूर कुछ तो गड़बड की है..।
उसके डाक साहब और भावना क्यों एक दूसरे से शादी करेंगे भला..? सवाल ही नहीं उठता.. ?

ये चंद्रा भैया भैया की कोई चाल है, और वो इस चाल को विफल कर के रहेगी.. !
चंद्रा भैया ऐसे उसके जीवन का मजाक नहीं बना सकते..।

“है न भाभी ?” सिम्मी इतनी देर से जो सुना रही थी, उसके बाबत उसने सवाल पूछ लिया..
कुसुम का ध्यान ही नहीं था..

“हम्म.. हाँ !”

“अच्छा जी तो अब तक कहा क्यों नहीं ?”  सिम्मी एकबार फिर उसे छेड़ने लगी.. कुसुम को सिम्मी की बात का ओर छोर समझ आता तब तो कुछ बोलती.. वो वैसे ही सपाट बैठी रही…

“चलिए ठीक है.. जब आपने हमारे पूछने पर कह ही दिया कि आपको भैया की खूब याद आ रही तो  अब आपको ज्यादा परेशान नहीं करेंगे.. हम जाकर भैया को भेजते हैं..।”

कुसुम ने हाँ में गर्दन हिला दी..

लेकिन हम जा रहे, जा रहे कर के भी सिम्मी ने जाने में आधा घंटा लगा दिया..
उसके जाते ही राहत की साँस लेकर कुसुम पंलग से नीचे उतर गयी.. अपने सर से दुपट्टा निकाल कर उसने एक तरफ फेंका और खुल कर साँस लेने खिड़की पर आ गयी…

उसे लगा भावना को फ़ोन कर लेना चाहिए, लेकिन उसका फ़ोन था कहाँ..
सुबह से अब उसे होश आया था..।

उसने अपने आसपास देखा, उसे कहीं नहीं दिखा.. उसने अपने पर्स में हाथ डाला, वहाँ थोड़ी खोजबीन के बाद उसे अपना फ़ोन मिल गया..
फ़ोन लेकर वो वापस खिड़की पे चली आयी..।
उसने भावना का नंबर डायल कर दिया..।
पर भावना का नंबर बंद बता रहा था..।
उसने राजेंद्र का नंबर लगा दिया..।
इत्तेफाक से उसका भी नंबर बंद बताने लगा..। अब कुसुम के पास कोई चारा नहीं रह गया था.. अब क्या करे ? कैसे जाने उन दोनों के बारे में..।

यहाँ इस हवेली में भी वो कैद सी पड़ी थी.. यहाँ से निकलने का कोई रास्ता उसे मालूम नहीं था..।
वो खिड़की पर खड़ी अपनी सोच में ग़ुम थी कि कमरे का दरवाज़ा खोल कर यज्ञ भीतर चला आया…

यज्ञ इतने धीमे से अंदर दाखिल हुआ कि कुसुम जान ही नहीं पायी…
वो अपने ख़यालो में खोयी बाहर देखती रही..

यज्ञ धीरे से आकर कुसुम के पीछे खड़ा हो गया..

थोड़ा वक्त बीत चुका था, इसलिए कुसुम ने फिर खिड़की पर रखा अपना मोबाइल उठा लिया और भावना का नंबर लगाने लगी, लेकिन इस बार नंबर लगा ही नहीं..।
कुसुम को लगा, शायद नेटवर्क में कोई दिक्कत है.. उसने एक बार फिर से नंबर लगा दिया..
पर नंबर नहीं लगा..

“हमारे फ़ोन से लगा लीजिये.. कभी कभी यहाँ नेटवर्क की समस्या हो जाती है !”

यज्ञ की आवाज़ सुन कुसुम चौंक कर पलटी और उसे अपने करीब खड़ा देख वापस घूम गयी..
उसने न में गर्दन हिला दी..

“अरे लगा लीजिये न.. अच्छा लाइए हमें नंबर बताये, हम ही लगा देते है…।

यज्ञ ने बड़े हक़ से कुसुम के हाथ से उसका मोबाइल ले  लिया और उसमे से भावना का नंबर देखने ही जा रहा था कि कुसुम ने अपना फ़ोन वापस छीन लिया…

“नहीं ऐसी भी कोई जल्दबाज़ी नहीं है !”

“ठीक है फिर ! ” यज्ञ ज़रा एक तरफ को हट गया.. फिर कुछ सोच कर वो अपनी अलमारी की तरफ बढ़ गया..
अपने रात में पहनने वाले कपड़े निकाल कर उसने पलंग पर रखे और अपना कुरता उतारने लगा.. उसी समय कुसुम खिड़की की तरफ से घूम कर कमरे में अंदर की तरफ हुई और यज्ञ को अपना कुरता उतारते देख झेंप कर वापस मुड़ गयी..

“आप यही कपड़े बदल लेंगे ?”

“हाँ… हमारा कमरा है, यही तो बदलेंगे न !”

“नहीं.. हमारा मतलब था, बाथरूम में चले जाते !”

“हमे सफोकेशन होता है बाथरूम में.. !”

और वो बड़े आराम से कपडे बदल कर हाथ मुहं धोने चला गया..

उसके वहाँ से जाते ही कुसुम पीछे पलटी और पलंग पर आकर बैठ गयी..
उसके दिमाग में इस वक्त सिर्फ उसके डॉक्टर साहब और भावना घूम रहे थे..
और आखिर उसने यज्ञ को सब कुछ सच सच बता देने की ठान ली..

अब तक वो चंद्रा भैया के घऱ में थी, उसने तो उन्हें भी बताना चाहा था, लेकिन उन्होंने उसकी सुनी नहीं। लेकिन अब वो उनके घऱ की सदस्य नहीं रह गयी थी..।

उन्ही के अनुसार उस पर अब सबसे ज्यादा हक उसके पति का था तो, जाहिर है यज्ञ से बात करके ही इस मसले को सुलझाया जा सकता है।

अगर यज्ञ उसकी बात समझ कर, उसकी तकलीफ को देखकर, उसकी बात मान लेता है और उसे डॉक्टर साहब के पास छोड़ देता है, तब तो उसकी जिंदगी की सारी परेशानियां एक बार में खत्म हो जाएँगी..।

लेकिन चंद्रा भैया ने जो भावना और डॉक्टर साहब की तस्वीर दिखाई थी, अगर उन दोनों की सच में शादी हो गई होगी, तब उसका क्या होगा..।

कुसुम की जैसी हालत हो रही थी, इस वक्त उसे सही गलत कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। उसे लग रहा था बस किसी भी तरह एक बार वह अपने डॉक्टर साहब से मिल ले…।

उसी समय यज्ञ बाथरूम से बाहर चला आया..
पानी से मुहं धोने के बाद उसका खुला हुआ रंग और भी साफ सफ़ेद लग रहा था..।

पानी से भीगी उसकी जुल्फें माथे पर इधर-उधर चिपकी हुई थी।
    जिन्हें अपनी उंगलियों से झाड़ते हुए वह कुसुम के पास पहुंच गया।
   कुसुम का दुपट्टा अब भी पलंग पर पड़ा हुआ था। और इस बात का कुसुम को जरा भी ध्यान नहीं था।
    यज्ञ कुसुम के जैसे ही पास आया, कुसुम हड़बड़ा कर अपनी जगह खड़ी हो गई। यज्ञ ने अपने बालों में मौजूद पानी की बूंद को एक बार फिर उंगलियों से झटका, और कुछ बंदे कुसुम के खुले हुए कंधों पर आकर अटक गई।

     यज्ञ की नजर कुसुम के चेहरे से फिसलते हुए उसके कंधों पर चली गई। कुसुम के गहरे गले के डिजाइनर ब्लाउज के कारण कंधे पर का काफी हिस्सा खुला हुआ था, जिन पर यज्ञ के बालों से गिरी हुई पानी की बूंदे मोतियों की तरह चमक रही थी।

यज्ञ ने धीरे से अपनी उंगली वहां रखी और उसे बूंद को उंगली पर उठाने की कोशिश करने लगा।  कुसुम की सांस रुक गई, उसने आंखें बंद कर ली, और अपनी मुट्ठियां भींच ली।
    उसे ऐसे देख यज्ञ को हंसी आने लगी, वह एक झटके में कुसुम से दूर चला..

“घबराएं नहीं, हम कुछ नहीं कर रहे..।”

“आप कुछ कर भी नहीं सकते हमारे साथ।” मन ही मन सोच कर बिना कुछ बोले कुसुम घायल शेरनी की तरह यज्ञ की तरफ से दूसरी तरफ घूम गयी..

“क्या हुआ ? कुछ परेशान है आप ?”, यज्ञ ने पूछा

“परेशानिया तो अब हमारे साथ ही ऊपर जाएँगी !”, कुसुम ने बहुत धीमे से कह दिया

“मतलब.. हम समझे नहीं.. आप कहना क्या चाहती है..?”

कुसुम अपनी सारी हिम्मत जोड़ने लगी..
बोल दूँ या रुक जाऊं..
बोलना ही पड़ेगा ? इस आदमी को सच्चाई बताये बिना गुज़ारा मुश्किल है ? एक बार फिर भाग भी तो नहीं सकती ?
बता दूँ… ?.
या नहीं.. ? एक पति अपनी पत्नी के प्रेमी के बारे में सुनने का कितना सहस रखता है ?
क्या यज्ञ उतना साहसी होगा ? या यहाँ भी उसके घऱ की तरह ही बवंडर ही मचेगा ?
भाड़ में जाये सब… इसे तो बताना ही पड़ेगा..
बोल ही देती हूँ, जो भी होगा देखा जायेगा..

बस इसी द्वन्द में उसके होंठ फड़फड़ा कर रह गए..

****

भावना राजेंद्र के साथ जा चुकी थी! भावना की मां रोती-रोती उदास बैठी रह गई थी।

निनाद भी अपना बक्सा लिए, वहां से चला गया था। इंसान भी कितना अजीब होता है।

भगवान ने जाने कितनी रचनाएं रची, लेकिन इंसान जैसा धैर्य किसी को नहीं दिया।
धैर्य और ताकत के पुतले को इंसान के रूप में धरती में भेजा है भगवान ने। जिससे भगवान अपने मनोरंजन के लिए बार-बार इंसानों की परीक्षा लेते रहे और इंसान गिर गिरकर बार-बार संभलता रहे।
भावना की मां भी रोते-रोते थक गई, और भोर की लाली के साथ किसी ऐसी बात की उम्मीद में, आस में जो कभी पूरी नहीं हो सकती थी, एक बार फिर उठकर खड़ी हो गई।

मन ही मन उन्होंने यह विचार किया कि पुलिस के पास जाकर चंद्रा भैया की ज्यादती का सारा किस्सा रपट के तौर पर लिखवा देंगी, और राजेंद्र और भावना से कहकर उनका तलाक करवा देंगी।

यह बात सोचने के बाद उन्हें थोड़ी राहत महसूस होने लगी। अपने चेहरे पर ढेर सारा पानी डालने के बाद वह रसोई में अपने लिए चाय चढ़ाने चली आई।

चाय के कप में भी कितनी बड़ी ताकत होती है।

कभी तो किसी का कोई बहुत प्रिय व्यक्ति भी जब उसे हमेशा के लिए छोड़ कर चला जाता है, तब उस वक्त भी आने जाने वाले, मिलने जुलने वाले, उस इंसान को ढांढस बंधाते हुए यही पूछते हैं, ‘चाय पी ली’ या ‘चाय पियोगे’?
      किसी के घर कोई गमी हो जाए तो अड़ोसी पड़ोसी सबसे पहले चाय ही बना कर ले जाते हैं। शायद उनका चाय लेकर आना ही उनकी सहानुभूति दिखाने का तरीका होता है।
चाय असल में चाय नहीं होती, भावनाओं का वह अद्भुत संगम होता है, जो इंसान के दुख और परेशानियों में उसके गले लग कर उसे ढांढस बंधा जाता है। आज भी चाय का यह प्याला भावना की मां को ढांढस बंधा रहा था।

      कल के जले हुए बर्तन को उन्होंने बाहर आंगन में निकाल दिया था। अपना चाय का प्याला लिए वह बाहर कमरे में चली आई। कमरे में आते ही उनका ध्यान टेबल पर रखे एक लाल रंग के बड़े से बैग पर चला गया। उन्होंने आगे बढ़कर उस बैग को खोल कर देखा।
      उसके अंदर एक रेशमी गुलाबी कपड़ा था। जिसके अंदर कुछ लिपटा हुआ था। और साथ ही एक चिट्ठी रखी थी।
   उन्होंने उस गुलाबी रेशमी कपड़े को खोल दिया, अंदर लगभग दस लाख रुपये थे…और साथ में खालिस दुबई के सोने के बने जालीदार मोटे जड़ाऊ कंगन रखे थी..

इतने रुपए देखकर भावना की मां आश्चर्य में डूब गई..
वही साथ में एक चिट्ठी रखी थी..!
   चिट्ठी टूटी फूटी हिंदी में लिखी गई थी! भावना के माँ ने पढ़ना शुरू किया, चिट्ठी निनाद की थी!

आंटी जी आपको प्रणाम करता हूं!
    अंकल ने जब से बहरीन में काम करना शुरू किया तब से थोड़ा-थोड़ा पैसा अपनी बेटी की शादी के लिए जोड़ रहे थे। अभी भी वह खुद आना चाहते थे, लेकिन किन्हीं काम से वह नहीं आ पाए, और मैं आ ही रहा था तो उन्होंने मेरे हाथ से आपकी बेटी की शादी के लिए जोड़ रखें रुपए और कंगन भेज दिए। बावना की शादी कैसे और क्यों अचानक हो गई, अब इन बातों के पीछे कुछ नहीं रखा है। उन्होंने मुझे जो पैसे दिए थे, वह आप तक पहुंचाना मेरा फर्ज था। मैं इन पैसों को आपके पास छोड़कर जा रहा हूं।
    आपका मन करे तो बावना को दे दीजिएगा, या फिर आप अपने बैंक अकाउंट में डालकर भी रख सकती हैं। अब ये पैसे पूरी तरह से आपके हैं..।

6 दिन बाद मैं वापस लौट जाऊंगा। जाने से पहले कोशिश करूंगा कि एक बार आपसे मिलने आ सकूं। क्योंकि आपसे मुझे कुछ बहुत जरूरी बात भी करनी है। निनाद के इस छोटे से खत को पढ़कर भावना की मां की आंखें एक बार फिर बहने लगी।
कैसा प्यारा सा लड़का था। बिल्कुल सीधा सादा ।
आंखे कैसी गोल गोल थी..
बिलकुल रामरतन पंचांग में छपी श्रीराम की तस्वीर सा लगता था..।

भावना भी तो कहीं से कम नहीं थी। गोरी गुलाबों सी दिखने वाली उनकी बेटी साक्षात महालक्ष्मी लगती थी। दोनों साथ में खड़े होते तो वाकई रघुवर और सिया की सी जोड़ी हो जाती।

    लेकिन अब तो जो होना था हो चुका। लेकिन जो भी हुआ, वह भावना की मर्जी से नहीं हुआ।
    अगर भावना ने राजेंद्र को पसंद किया होता, तब भी शायद वो जाति बिरादरी की दीवार को ढहा कर एक बार फिर भावना की इच्छा का सम्मान करते हुए इस शादी के लिए रजामंदी दे देती। लेकिन उस चंद्रा नाम के नीच आदमी ने जो किया था, उसे यूं ही माफ कर देना सही नहीं था।

   वह अपनी बहन को उसकी मर्जी के खिलाफ शादी से रोकना चाहता था, यह उनका पारिवारिक मामला था। वह अपनी बहन के साथ जो जी में आए करें, लेकिन भावना से उसका कोई लेना देना नहीं था।
    फिर भावना की जिंदगी का इतना बड़ा निर्णय लेने वाला चांडाल आखिर वह होता कौन था?

    भावना की मां की गुस्से में मुट्ठियाँ भिंच गई। आंखों में क्रोध के अंगारे बरसने लगे।
नहीं इतनी आसानी से वह चंद्रा को माफ नहीं करेंगी..

उन्हें राजेंद्र से कोई शिकायत नहीं थी। ना उसकी जाति से ना, उसकी किसी और बात से।
    राजेंद्र वाकई एक अच्छा लड़का था। लेकिन अगर राजेंद्र भावना अपनी खुशी से यह शादी करते तो वह उनका पूरा साथ देती।
   पर चंद्रा बीच में था और इसी बात का सबसे ज्यादा मलाल था..।

कुसुम के चक्कर में जाने कितनी बार वह उनके घर आ चुका था, और जब भी आता था उनके पैर छुआ करता था।
  तो क्या उसका पैर छूना सिर्फ एक औपचारिकता मात्र थी? आज जब उसकी बहन के ब्याह की बारी आई, उसके घर के मान सम्मान की बारी आई तो उसने उठा कर भावना की बलि दे दी।
     इसीलिए ना भावना के फेरे करवा दिए की उसकी कुसुम के पास वापसी का कोई रास्ता ना बचे। लेकिन चंद्रा तुमने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल कर दी जो भावना को अपना गुलाम समझ बैठा।
     अरे मेरी बेटी ने तेरी बहन से दोस्ती की थी, उसका मन देखकर।
उसका धन देखकर नहीं।
और तूने जो यह काम किया है, तूने मेरी बेटी को अपनी बहन की सहेली नहीं उसकी नौकरानी मान लिया जो उसके जीवन को भी अपने हिसाब से चलने लगा….

एक माँ के दिल से निकली आह है चंद्रा तू इतना सब कर के भी चैन की नींद नहीं सो पायेगा..

क्रमशः

aparna…

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