अपराजिता -65

अपराजिता -65

जैसे जैसे भँवर पड़े ,मन अँगना को छोड़े
एक-एक भाँवर नाता अनजानों से जोड़े,
मन घर अँगना को छोड़े,
अनजानों से नाता जोड़े
सुख की बदरी आँसू की बरसात ….
जब तक पूरे ना हों फेरे सात,
तब तक दुलहिन नहीं दुलहा की
रे तब तक बबुनी नहीं बबुवा की…..
ना….

   कुसुम की विदाई हो गयी…
ढेर सारी गाड़ियों के साथ मानौर गांव के ठाकुरों की बारात घऱ की तरफ निकल गयी..
सब पिछली रात के जगे हुए थके थके से थे, लेकिन बारात के उत्साह में अब भी कोई कमी नहीं थी..

बारात घऱ के दरवाज़े पर लगी और घऱ की औरते परछन करने आरती का थाल और चावलों का कलश लिए बाहर चली आयी..

दूल्हा दुल्हन को दरवाज़े पर खड़ा कर के यज्ञ के पिता और अखंड अंदर चले गए..
अब जो रस्मे होनी थी उनमे वैसे भी औरतो का ही काम था..
कुसुम के चेहरे के सामने घूंघट खिंचा हुआ था.. यज्ञ की माँ ने अपने बेटे बहु के सर से जल का कलश घुमा कर उनकी नजर उतारने के बाद दोनों की आरती उतार कर तिलक लगा दिया..
कुसुम के माथे पर तिलक लगाने के बाद उन्होंने झुक कर कलश नीचे रख दिया..

“अपने दाहिने पैर से इसे अंदर की तरफ लुढ़का कर अंदर आ जाओ बहु !”

कुसुम ने सुना और अपने पैर से कलश को ठोकर मार कर वो अंदर दाखिल हो गयी..
नयी बहु की तरह उसे साथ पकड़ कर कोई अंदर ले जाये इसकी उसने परवाह तक नहीं की और सीधे अंदर चली गयी..

उसे इस तरह बढ़ते देख पल भर को वही खड़ा यज्ञ अचरज में डूब गया, फिर अपने पटवस्त्र से बंधी उसकी चुन्नी का ध्यान आते ही वो खुद भी तेज़ी से कुसुम के पीछे बढ़ गया..

“बस बहु रुको.. यहाँ इस तरफ आओ.. !”

शचीरूपा कुसुम को लिए बड़े से हॉल में एक तरफ ले गयी.. पूरा हॉल महिलाओं और लड़कियों से भरा हुआ था.. सभी नयी बहु को देखने उत्सुक थे..
शची ने अपनी बहु को वहीँ एक नीचे बिछे गद्दे पर बैठा दिया..

“जिज्जी मुहं दिखाई अबही करवा दोगी क्या ?”

“हाँ तो करवा ना लेते है ! अभी सब हैं भी !”

“लेकिन अडोसन पड़ोसन सब तो शाम को आयेंगी..!”

“तब दुबारा करा लेंगे !”

देवरानी जेठानी की बातो के बीच कुसुम बोल पड़ी..

“सुनिए अम्मा जी अभी हम बहुत थक गए हैं हमे कमरा बता दीजिये.. नहा कर आराम करना चाह्ते हैं हम !”

नयी बहु का एकदम से ऐसा फरमान सुन कर यज्ञ की माँ का मुहं खुला का खुला रह गया…

उसने अपनी देवरानी की तरफ देखा, वो भी बड़े आश्चर्य से नयी बहु को देख रही थी..

तभी वही एक तरफ दीवान पर बैठी दादी बोल पड़ी..

“अरे ठीक ही तो कह रही है, रात भर जाग कर ब्याह भया है इनका, कल सुबह भी आराम करने तो मिला नहीं होगा.. थक तो गयी ही होगी ना.. ले जाओ उसे यज्ञ के कमरे में छोड़ दो.. नहा धोकर कुछ खा पीकर आराम कर लेने दो.. अब ये मुहं दिखाई सब साँझ को ही करना.. !”

अपनी सास की बात काटने की सामर्थ्य शचीरूपा में अब भी नहीं थी.. उसने हामी भरी और अपनी ननन्द की
बेटी को आवाज़ लगा दी..

“सिम्मी जा बेटा भाभी को उनका कमरा दिखा दे.. उसके बाद उसके लिए चाय भी वही कमरे में पहुंचा देना.. !”

उनके इतना कहते ही कुसुम झटके से खड़ी हो गयी.. बिना किसी संकोच के वो उस लड़की के साथ आगे बढ़ गयी..

उसे यज्ञ के कमरे में पहुंचा कर सिम्मी भी वही बैठ गयी.. कुसुम के ठीक सामने बैठी सिम्मी मुस्कुराती हुई कुसुम के चेहरे को देख रही थी…
लेकिन इस वक्त कुसुम को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था..

“बाथरूम कहाँ है ?” कुसुम के सवाल पर सिम्मी ने एक तरफ इशारा कर दिया..
और कुसुम उठ कर बाथरूम में दाखिल हो गयी..
अपने चेहरे पर ढेर सारा पानी डाल कर कुसुम ने आइने में खुद को देखा,उसकी नाक से माथे तक सिंदूर की गहरी रेखा खींची हुई थी… पूरा माथा जैसे सिंदूर से रंग गया था..
आधा चेहरा सिंदूरी हुआ पड़ा था..
उसने गुस्से में सारा सिंदूर धोना शुरू कर दिया, लेकिन वो छूटने की जग़ह और भी फैला चला जा रहा था..
ढेर सारा साबुन हाथ में लेकर उसने अपना चेहरा साफ़ कर लिया..
फिर भी माथे पर बालों के पास खूब सारा सिंदूर फैला हुआ था..
चेहरा और आंखे धोने के बाद वो बाहर चली आयी..
सिम्मी अब भी उसके पलंग पर बैठी थी..

“अरे तुम अब तक यहाँ हो ? गयी नहीं ?”

नयी नवेली भाभी के पास लड़कियों को बैठे रहने में अलग ही सुख मिलता है, लेकिन कुसुम का ऐसा सवाल सुन सिम्मी हड़बड़ा गयी..
वो फ़ौरन उठ कर खड़ी हो गयी..

“ठीक है हम जाते है भाभी, आपके लिए चाय नाश्ता ले आते हैं.. !” सिम्मी अभी ग्यारहवीं की छात्रा थी, इतनी बड़ी भी नहीं थी कि बाहर जाकर इन बातों का बवाल बनाये..
वो चुपचाप चली गयी और उसके जाने के बाद कुसुम पलंग पर ढह गयी..

खुली आँखों से छत की तरफ देखती कुसुम की पीड़ा अथाह थी..
उसका दर्द समझने वाला यहाँ कोई ना था..
इन अंजानो बेगानो की भीड़ में वो किससे अपना दर्द साझा करती ?
वो चुपचाप छत को ताक रही थी कि सिम्मी उसके लिए चाय नाश्ता ले आयी.. कुसुम ने सिम्मी को अंदर आते देख आंखे मूँद ली..

सिम्मी ने पलंग के किनारे रखी टेबल पर चाय धर दी,  और धीरे से कुसुम के कंधे पर छू लिया..

“भाभी आपकी चाय रखे हैं, पी लीजियेगा.. !”

कुसुम ने कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया और सिम्मी चली गयी..

एक बार फिर कुसुम अपने विचारो में खो गयी..
चाय यूँ ही पड़े पड़े ठंडी हो गयी..
दोपहर उसका खाना भी सिम्मी ऊपर ही ले आयी, वो भी वैसे ही टेबल पर रखा रह गया..

शाम ढल गयी लेकिन कुसुम उस पलंग से उठी नहीं..
यज्ञ अब तक अपने कमरे में नहीं आया था..
उसका शहर की कचहरी में कुछ काम निकल आया था, और इसी से सुबह ही नाश्ता करने के बाद वो काम पर निकल गया था..

शाम ढलने पर एक बार फिर औरते इकठ्ठा होने लगी.. यज्ञ की मां ने सिम्मी को ऊपर कुसुम को लाने के लिए भेज दिया। दरवाजे को हल्का सा अंदर की तरफ ठेल कर अंदर दाखिल हो गई।

दरवाजा कुसुम ने अंदर से बंद नहीं किया था.. ।

सिम्मी अंदर गई और उसने देखा जैसा वह कुसुम को सुबह छोड़कर गई थी  कुसुम अब तक वैसे ही लेटी हुई थी। उसकी आंखें खुली थी  और वह अब भी छत को निहार रही थी। सिम्मी को इस बार थोड़ा अजीब लगा क्योंकि उसका सुबह का सारा सामान जस का तस पड़ा था। चाय के कप में चाय के ऊपर मोटी मलाई जम गई थी। वहीं नाश्ता भी सूखा पड़ा हुआ था।

   खाने की थाली भी वैसी की वैसी रखी थी।

सिम्मी को यह सब बड़ा अजीब लगा। वह धीरे से कुसुम के पास गई और उसके कंधे पर हाथ रखकर धीरे से हिला दिया।

कुसुम ने पलकें झपका कर सिम्मी की तरफ देखा, और सिम्मी ने अपने मन की बात कह दी।

” भाभी हम समझ सकते हैं, आप अपना घर छोड़कर आई हैं। अभी आपको बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा होगा ना। लेकिन आपने तो चाय तक नहीं पी। खाना भी नहीं खाया। अच्छा सुनिए, हमें मामी ने ऊपर भेजा है। नीचे सब औरतें आ गई है ,आपकी मुंह दिखाई के लिए। चलिए आपको नीचे लेकर जाना है।”

कुसुम ने धीरे से हामी भरी और उठकर बैठ गई। उसने किनारे रखी चुन्नी से अपना चेहरा ढका और सिम्मी के साथ जाने लगी, कि सिम्मी ने हीं उसे टोक दिया।

” अरे नहीं भाभी, ऐसे नहीं।
थोड़ा तो तैयार हो जाइए,आपने सुबह मुंह धोया था, तब से आपके चेहरे पर बिंदी भी नहीं लगी है..

कुसुम ने हामी भरी और इधर-उधर अपना सामान ढूंढने लगी।

कुसुम को ऊपर छोड़ने के बाद सिम्मी उसके बैग और सूटकेस भी ऊपर यज्ञ के कमरे में ले आई थी।
सब एक तरफ पड़ा हुआ था। उसमें से सिम्मी ने हीं कुसुम से पूछ कर एक बैग खोलकर अंदर से मेकअप का सामान निकाल कर ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया।

” भाभी लिजीए आप बैठिए, हम आपको तैयार कर देते हैं।”

कुसुम यंत्रचालित से जाकर आईने के सामने बैठ गई। कुसुम को ऐसा लग रहा था, इस वक्त उसके शरीर में रक्त की एक बूंद तक नहीं बची है।

जैसे किसी ने सब कुछ सोख लिया है।

वह चुपचाप बैठ गई। उसका जूड़ा खोलकर सिम्मी धीरे-धीरे उसके बालों पर कंघी फिराने लगी..
सिम्मी से जैसा बन पड़ा, उसने कुसुम को तैयार कर दिया।
  लेकिन कुसुम अच्छी दिख रही थी।

नई दुल्हन के चेहरे पर मेकअप की परत ना हो, तब भी उसका चेहरा खिले गुलाब सा नजर आता है। कुसुम भी गुलाब तो लग रही थी, लेकिन हल्का मुरझाया हुआ सा।

उसके होठों पर लिपस्टिक लगाने के बाद सिम्मी ने उसकी आंखों में काजल भी आंज दिया। माथे पर थोड़ा फैले सिंदूर को रूई से समेट कर उसने सोने की भारी सी बिंदिया वापस कुसुम के माथे पर सजा दी।

गले में लटके हारों को सही तरीके से लगाकर सिम्मी ने पीछे से उन्हें जरा सा कस दिया, और गले से लग कर पेट तक एक के बाद एक हार कुसुम की शोभा बढ़ाने लगे।

इतना सब करने के बाद सिम्मी ने कुसुम के बालों को हल्का सा पिन करके खुला ही छोड़ दिया।

थोड़े से बाल कंधे से आगे ले आई और इसके बाद उसने कुसुम के माथे पर उसकी चुनरी रख दी।

कुसुम का चेहरा बहुत प्यारा लग रहा था, लेकिन उसकी बड़ी-बड़ी काजल भरी आंखों की उदासी इतने मेकअप के बाद भी छुपाई नहीं जा सक रही थी।

कुसुम सिम्मी के साथ नीचे जाने के लिए खड़ी हो गई। दोनों एक साथ कमरे से बाहर निकल गए। वह दोनों सीढ़ियां उतरकर आंगन को पार करने ही वाले थे कि सिम्मी की मां दौड़ती हुई चली आई।

    वह यज्ञ की बुआ लगती थी। उन्होंने कुसुम को ऐसे खुला चेहरा किए औरतों की महफिल में जाते देखा तो तुरंत उसे टोक दिया और उसकी चुन्नी को खींचकर कुसुम का पूरा चेहरा ढांक दिया।

” अरे नहीं… नयी दुलहिन हो, ऐसे नंगे सर, खुल्ले मुंह कहां घूम रही हो ?
घर भर में सब तरफ आदमी भी तो घूम रहे हैं! तुम्हारा जेठ है, तुम्हारे ससुर, तुम्हारा काका ससुर, फूफा ससुर, हर कोई घर में मौजूद है…
लिहाज करो दुलहिन…!”

और इसके साथ ही दूसरी तरफ से कुसुम का हाथ पकड़ कर वह चलने लगी!
उन्होंने ऐसे हाय तौबा मचा दी थी जैसे हाइली सिक्योर्ड आर्मी बेस कैम्प में कुसुम नाम का आतंकवादी घुस आया हो.. !

कुसुम को उनका अपना हाथ पकड़ कर चलना पसंद तो नहीं आया, लेकिन उसने सबर कर लिया!

     ढेर सारी औरतों के बीच ले जाकर कुसुम को बैठा दिया गया, और उसके बाद एक-एक कर औरतें अपनी पारी से आती गई, और कुसुम का आंचल उठाकर, उसका चेहरा देखकर उसकी गोद में कुछ ना कुछ उपहार या रुपए डालकर दूसरी तरफ चली गई।

इस औपचारिकता के निभाने के साथ ही ढोलक मंजीरा लाकर उन औरतों ने भजन गाना शुरू कर दिया।
कुसुम ने सुबह से पानी की एक बूंद भी नहीं पी थी उसका सिर भारी होने लगा था।
अब तक अपने शोक में डूबी कुसुम की सोई पड़ी भूख भी रसोई से आती लजीज व्यंजनों की खुशबु से जागने लगी थी..
    सूरन की रसीली सब्जी और हींग मेथी से छौंकी कढ़ी की मारक खुशबु वहाँ मौजूद हर किसी के पेट में चूहों की कबड्डी करवाने में सक्षम थी..
उस पर कुसुम तो एक दिन पहले की भूखी थी….

पर इन औरतों की भीड़ में किसी से कुछ कहने का उसका मन नहीं हुआ!

दो ढाई घंटे बीत चुके थे, और औरतें गाने बजाने में लगी हुई थी! बीच-बीच में नौकर चाकर उन औरतों के लिए खाने पीने की वस्तुएं रखते चले जा रहे थे।

      कभी शरबत के साथ गुलाब वाले ड्राई फ्रूट लड्डू तो कभी चाय और सोंठ के साथ कचौड़ियां तो कभी दही भल्ले खाती औरतें गाने बजाने में मगन थी..
रात के खाने का वक्त हो चला था।। सभी औरतों को पिछले आंगन में खाने के लिए जाने का बोलने के बाद यज्ञ की मां खाने पीने की व्यवस्था देखने खुद भी पिछले आंगन की तरफ बढ़ गई। घर के पुरुष सदस्य भी वहीं खाना खा रहे थे।

एक तरफ कड़ाहे पर बैठे महाराज गर्मागर्म मिर्च के बड़े और पूरियाँ निकालने में व्यस्त थे..
उनके पास आकर उन्हें और करारी पूरियाँ उतारने की सलाह देकर यज्ञ की माँ भीतर चली गयी..

सबका खाना पीना देखने के बाद वह वापस अंदर लौट आई, तब तक कुसुम दोनों घुटनों को अपनी बाहों के घेरे में लिए चुपचाप बैठी जमीन पर बिछा कारपेट देख रही थी…
    वह जब से वहां आई थी, तब से इसी स्थिति में बैठी थी..!

“सिम्मी जा बेटा अपनी भाभी को भी कुछ खिला दे..।”

“भाभी ने तो सुबह से कुछ नहीं खाया” यह बोलते बोलते सिम्मी रह गई..

अपनी मामी की बात पर हामी भर कर वह कुसुम को उठाकर उसके कमरे में ले गई।
नौकरों को बुलाकर उसने पहले वाले बर्तन वहां से उठवा कर नीचे भिजवा दिए थे। कुसुम को कमरे में बैठाकर वह उसकी थाली लेकर चली आई..

“अब तो भाभी हम आपको खिला कर ही नीचे जाएंगे। आपके लिए लाकर छोड़ो तो, आप बिना खाए थाली सरका  देती हैं।
हम समझ रहे हैं, मायके से दूर आने का दुख क्या होता है। लेकिन ऐसे कोई खाना पीना थोड़ी ना छोड़ देता है..?”

कुसुम को भी अब कस के भूख लग आई थी, उसने चुपचाप उस थाली को पकड़ा और खाने लग गई..

उसी समय दरवाज़े पर आहट सी हुई और यज्ञ भीतर चला आया..

यज्ञ की नजर कुसुम पर और कुसुम की यज्ञ पर नजर पड़ी और दोनों ही अचकचा गए.. यज्ञ पलटने को था कि सिम्मी ने उसे टोक दिया..

“अरे भैया कहाँ जा रहे हो ?आप ही का कमरा है !”

“हाँ.. वो हम… बस आ रहे.. !”

झेंप कर यज्ञ अंदर चला आया.. कुसुम ने दुबारा उस की तरफ नहीं देखा..
लेकिन यज्ञ के अंदर आने के बाद उससे फिर कुछ नहीं खाया गया..।
उसने थाली एक तरफ रखी और हाथ धोने बाथरूम में घुस गयी.. उसके निकलने तक सिम्मी उसकी थाली लेकर चली गयी…

अब कमरे में बस यज्ञ और कुसुम रह गए थे..
यज्ञ नजर नजर बचा बचा कर कुसुम को देख लेता था, लेकिन कुसुम कुर्सी पर बैठी ज़मीन ताक रही थी..

उसी समय सिम्मी वापस आ गयी..

“भाभी आपको बाहर बुला रहे हैं.. !”

कुसुम का सुबह से चल रहे इस सर्कस से दिमाग ख़राब हो रहा था। लेकिन बिना कुछ बोले वो सिम्मी के साथ बाहर चली गयी..

बगल वाले कमरे में औरतों और बच्चो का जमावडा था। वहाँ कुसुम को बैठा कर सिम्मी वापस लौटी और यज्ञ को भी बहाने से कमरे से बाहर भेज दिया..
कमरा खाली होते ही सिम्मी अपनी भाभी को बुला लायी..
और फिर उन दोनों ने कुछ और लड़कियों की मदद से आजकल के तामझाम को ध्यान में रखते हुए नए नवेले जोड़े की सुहागरात के लिए कमरे को सजना शुरू कर दिया..

क्रमशः

aparna…

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