अपराजिता -64

अपराजिता -64

निनाद और भावना की माँ साथ बैठे थे.. निनाद अपनी आदत से मजबूर शांत ही था, लेकिन भावना की माँ उसके घऱ परिवार नौकरी चाकरी के बारे में पूछताछ कर रही थी..
आखिर उन्हें भी समझ आ गया था कि उनकी लाड़ली इस सलोने लड़के को अपने लिए पसंद कर चुकी है..

उनके सवालों का निनाद शांति से जवाब देकर वापस चुप्पी साध लेता था.. हाँ बीच बीच में वो रसोई के दरवाज़े की तरफ ज़रूर झांक लेता था..।

निनाद ने भावना को उसके पिता की खबर उसकी मां को नहीं बताने के लिए कहा था और यह भी कहा था कि जब वह दोनों एक साथ मिलेंगे तब अपनी शादी की खुशखबरी के बाद ही भावना के पिता की खबर भी सुना देंगे, जिससे उसकी मां को एकाएक थक्का न लगे। और इसीलिए अब तक वह चुप बैठा था।

    भावना की मां भावना के पिता के बारे में भी पूछताछ कर रही थी। और निनाद अपने हिसाब से चुने हुए जवाब देता जा रहा था।

   उसी समय उन दोनों को ही रसोई से कुछ आहट सी सुनाई दी, बाहर तक कोई स्पष्ट आवाज नहीं आई। लेकिन रसोई से लगे बाहर की तरफ के दरवाजे के खुलने और बंद होने की आवाज़ आई, निनाद ने चौक कर रसोई की तरफ देखा..।

“कुछ नहीं.. वो कभी कभी बिल्ली आ जाती है !”

निनाद ने हाँ में गर्दन हिला दी..

कुछ और वक्त बीत गया लेकिन भावना चाय लेकर बाहर नहीं आई अब निनाद को जरा परेशानी से लगने लग गई थी क्योंकि ऐसा कैसे संभव था जब निनाद इतनी देर भावना को देखे बिना बैठ नहीं पा रहा था तो भावना कैसे रसोई में चुपचाप चाय बनाने में लगी थी।

आधा घंटा तो चाय बनाने में नहीं लगता उसने भावना की मां की तरफ देखा और धीरे से पूछ लिया.. अंदर से कुछ जलने की बू बाहर तक आने लगी थी

“बावना ठीक तो है ना.. चाय बनाने में ज़्यादा ही वक्त ले लिया ?”

“अहह हम्म.. हम देख कर आते है.. !” भावना की मां उठकर रसोई में चली गई लेकिन रसोई में चाय के पतीले को गैस पर चढ़ा देख उनकी आंखें फटी की फटी रह गई चाय पतीले से लगकर जलने लगी थी और बाहर की तरफ का दरवाजा खुला हुआ था। वह तुरंत उस दरवाजे से बाहर निकली, पिछले आंगन का जालीदार गेट भी खुला हुआ था..।

“भावना… !” उन्होंने एक जोर की आवाज लगाई और उनकी आवाज सुनकर निनाद  भागता हुआ रसोई में चला आया।
     जाने क्यों उसे पहले ही यह आशंका थी कि रसोई में कुछ खटर-पटर हो रही है। काश वह आवाज के समय ही वहां चला आता लेकिन उसे समझ नहीं आया कि पीछे से अचानक भावना कहां चली गई..?

भावना की माँ आंगन के पिछले दरवाजे से बाहर निकल आई और उनके पीछे ही निनाद भी बाहर चला आया।

पीछे की सुनसान अंधियारी गली में कहीं कुछ नजर नहीं आ रहा था। एक परिंदा भी वहां पंख नहीं मार रहा था। निनाद ध्यान से चारों तरफ देखने लगा। उसका ध्यान जमीन की गीली मिट्टी पर गया, जिस पर जीप के चलने के निशान नजर आ रहे थे..।

पर निनाद के लिए यह समझना इस वक्त बेहद मुश्किल था कि भावना को कोई उठाकर ले जा सकता है।
  वह इस गांव से वाकिफ नहीं था। उसे लगा पता नहीं भावना कहां चली गई है ?

लेकिन जाने क्यों भावना की मां का दिल किसी अनहोनी को सोचकर कांपने लगा। वह रोते हुए वहीं आंगन पर ढेर हो गई…

“ले गया, वो दुष्ट हमारी बिटिया को ले गया..। हम पहले ही भावना से कहते थे कि यह बड़े लोगों की दोस्ती अच्छी नहीं है।
   कुसुम का किया धरा जरूर हमारी बिटिया को भोगना पड़ रहा है..।”

भावना की मां का करुण विलाप निनाद के दिल को भी दहला गया।
वह भाग कर रसोई में गया और पानी निकाल कर भावना की मां के लिए ले आया। उसने उन्हें सहारा देकर उठाया और पानी का गिलास थमा दिया ।

दो घूंट पानी का भरने के बाद भावना की मां एक बार फिर वही बातें दोहराने लगी..

“आपको क्या डाउट है ?” निनाद ने पूछा और भावना की माँ ने चंद्रा की दुष्टता का सारा वृतांत कह सुनाया..

“अगर आपको ऐसा लग रहा की चंद्रा ने बावना के साथ कुछ गलत किया है तो, हमे तुरंत पोलिस के पास जाना चाहिए.. वो ही हमारी मदद करेंगे.. !”

“कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है समझे? आपकी बिटिया को जैसे लेकर गए है, वैसे ही वापस भी ले आएंगे !”

निनाद की बात पूरी होते ही बाहर वाले कमरे के बाहर से दो गुंडे अंदर चले आये..

निनाद एक शांत दिमाग का लड़का था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है?
उसने अपने चेहरे पर नाराजगी आए बिना उन लोगों से जानना चाहा कि क्या बात है लेकिन चंद्रा के गुंडे दिमाग के पैदल थे।
उन लोगों ने कुछ बोलने बताने की जगह अपनी जेब से गन निकाल ली।
वैसे भी कहा जाता है ना छोटे-मोटे गुंडों में दिखावा ज्यादा होता है..।

   किसी भी नेता नेता मंत्री के चाटुकार खुद को ज्यादा बड़ा नेता समझते हैं। वैसे ही चंद्रा के गुंडे खुद को ज्यादा बड़ा चंद्रभान समझ बैठे थे, उन्होंने अपनी गन निकाल ली..

गन देख कर भावना की माँ घबरा गई।
वह कुछ बोलती उसके पहले निनाद ने उन्हें शांत रहने का इशारा किया और उनके साथ चुपचाप बैठ गया..

” आप लोग बावना के साथ कुछ बुरा तो नहीं कर रहे क्योंकि याद रखिएगा कानून किसी को भी उसकी गलती के लिए छोड़ता नहीं है..!”

निनाद की हिंदी अच्छी तो थी, लेकिन उच्चारण ठेठ दक्षिण भारतीय होने से अंग्रेज़ियत का आभास मिलता था..

“अबे नहीं अंग्रेज़ की औलाद… बावना के साथ कुछ बुरा नहीं कर रहे.. आधा घंटा में यहाँ मौजूद रहेगी आपकी बावना..।”

भावना की अम्मा का रो रोकर बुरा हाल था..

लेकिन चंद्रा के गुर्गे उन दोनों को उनके स्थान से हिलने  नहीं दे रहे थे…

उधर भावना के बेहोश होकर गिरने के बाद राजेंद्र ने उसे सहारा देकर एक तरफ बैठाया और जब भावना चलने फिरने की हालत में आई, वह उसे लेकर वहां से निकलने लगा। लेकिन चंद्र भैया के गुंडो ने उन दोनों को वापस रोक कर अपनी ही गाड़ी में सवार कर लिया..

” भैया जी का आदेश था के नये नवेले जोड़े को पहले दुल्हन के घर वालों से मिलवा दिया जाए। फिर वहीं से उनकी विदाई होगी। और वहां जाने पर आप दोनों में से कोई भी कुछ नाटक नहीं करेगा। वरना भैया जी को बोलने की देर है..

और उन गुंडों ने राजेंद्र और भावना को साथ लिया और भावना के घऱ की तरफ बढ़ गए..

भावना का रो रोकर बुरा हाल था….

इसी बीच भावना के घऱ पर मौजूद लड़को से इन गुंडों की कुछ बातचीत हो गयी..
और अब इन लोगों ने भावना को उसकी माँ को जान से मार देने की नयी धमकी देनी शुरू कर दी…

भावना चुप थी.. बिलकुल चुप..

कुछ देर में ही वो लोग भावना के घऱ पहुँच गए..

जीप से उतर कर चार कदम पर मौजूद अपने घर के दरवाज़े तक जाने में मानो भावना को सदियां लग रही थी..
उसके पैर मनों भारी हो गए थे, यूँ लग रहा था एक एक पैर में क्विंटल क्विंटल भर का पत्थर किसी ने बांध दिया हो..

राजेंद्र ने जीप से उतर कर चुप खड़ी भावना की तरफ देखा और अपने बढ़ते कदमो को भी रोक लिया..

उसकी समझ से बाहर था कि भावना अपने घऱ के अंदर जाने में क्यों संकोच कर रही है ?

राजेंद्र भावना की मां से परिचित था। एक बार पहले भी भावना के बुलाने पर वह उसके घर उसकी मां की जांच करने के लिए आ चुका था। बहुत पहले एक बार भावना की मां की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई थी। और उस वक्त भावना को कुछ नहीं सूझ रहा था। तब उसने राजेंद्र को ही फोन करके घर पर बुला लिया था। राजेंद्र ने थोड़ी जांच परख करने के बाद कुछ दवाइयां भावना को दी और वापस लौट गया था।

वह भावना की मां के मीठे स्वभाव से भली-भांति परिचित था। इस घर में सिर्फ वही दोनों औरतें रहा करते थे। और मां बेटी का आपस में जुड़ाव बहुत गहरा था। इसलिए राजेंद्र की समझ से परे था कि आज भावना अपने घर की तरफ क्यों नहीं बढ़ पा रही है। धीरे-धीरे भावना घर की तरफ बढ़ गई और दरवाजे को अंदर की तरफ धक्का देकर दाखिल हो गई।

उसके पीछे ही राजेंद्र भी अंदर दाखिल हो गया। भावना की मां की कुर्सी के बगल में बैठे लड़के पर नजर पड़ते ही राजेंद्र चौक गया।
उसने इसके पहले इस लड़के को इस गांव में कभी नहीं देखा था। उसने आश्चर्य से भावना की तरफ देखा, भावना निनाद को ही देख रही थी

अपलक निर्निमेष…!!

निनाद ने भावना के गले में वरमाला देखी और अचानक जैसे उसे सब कुछ समझ में आ गया। वह अपनी जगह से चौंक कर खड़ा हो गया। उसने भावना की तरफ देखा और उसकी तरफ बढ़ने लगा कि तभी वहां मौजूद गुंडो ने उसे चुपचाप अपनी जगह पर खड़े रहने का इशारा कर दिया।

बाहर के उन चार-पांच लड़कों के बीच आपस में रिश्तो की झीनी सी डोर से बंधे यह चार लोग किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े थे।

निनाद ने भावना को देखने के बाद उसके बगल में खड़े राजेंद्र की तरफ देखा और उतनी देर में भावना की मां को भी सारी बातें समझ में आ गई..

” हमें नहीं पता था भावना की तुम डॉक्टर साहब से शादी करना चाहती हो? हम तो कुछ और ही सोच रहे थे।”

भावना की मां ने अपने बगल में खड़े निनाद की तरफ देखते हुए भावना से सवाल कर दिया ।

भावना ने चुपचाप सर झुका लिया..

” यह सब क्या हो रहा है कोई मुझे बतायेगा ? “

निनाद ने परेशान होकर उन लड़कों की तरफ देखा..

“आपको ज्यादा कुछ सोचने समझने का ज़रूरत नहीं है..अम्मा जी आपकी बिटिया का आज डॉक्टर राजेंद्र बाबू से कोरट मैरिज हुई गवा है.. ।
बस बात ख़त्म..।
अब आप लोगन को जो पूछना, जैसा पूछना आप लोग अपनी बिटिया से पूछते रहिएगा। हम लोगों को चंद्रा भैया ने इतना ही काम सौंपा था।

उनका कहना था आप लोगों से मिलने के बाद हम चंद्रा भैया के कहे अनुसार डॉक्टर साहब और उनकी नई दुल्हन को उनके शहर वाले घर में पहुंचा देंगे, तो अब इजाजत लेते हैं।
सुबह से हम लोग भी सिपाही बने पूरे गांव में पहरेदारी कर रहे थे। चलते हैं, अम्मा जी, और विदेशी बाबू आपसे भी आज्ञा लेते हैं।

आप लोग कल चाहे तो अपनी बिटिया से मिलने उनके नए घर चले जाएगा।”

इतना कह कर उसे लड़के ने भावना और राजेंद्र को बाहर निकलने का इशारा किया और खुद बाहर निकल गया।
राजेंद्र ने भावना की मां की तरफ अपने हाथ जोड़े और वह भी घर से बाहर निकलने को मुड़ गया।
लेकिन उसकी नजर भावना पर जाकर ठहर गई।
भावना अब भी सिर्फ निनाद को देख रही थी।
और निनाद भावना को।

राजेंद्र को अचानक सब कुछ समझ में आ गया। और उसके मुंह से एक गहरी सी आह निकल गई। वह गहरी सी सांस भरकर बाहर निकल गया, और उसके पीछे भावना भी बुझे बुझे से मन बाहर चली गई ।

जाने से पहले उसने अपनी अम्मा और निनाद दोनों की तरफ देखकर अपने हाथ जोड़ दिए। उसकी अम्मा भावना को जाते देखकर कलप उठी।

ऐसा लगा जैसे किसी ने उनका कलेजा चीर कर रख दिया हो।
भले ही एक ही लड़की थी तो क्या, कैसे-कैसे अरमान थे अपनी बिटिया को डोली में बिठाने के।
अपनी बेटी की खुशी के लिए उस औरत ने अपने ऊंची जाति और धर्म तक को किनारे रख दिया था। अपनी बेटी की पसंद में ही स्वयं प्रसन्नता महसूस करने वाली उस औरत ने आज अपनी बेटी की आंखों में जो लाचारगी देखी थी, उसका मन किया चंद्रा का जाकर सर फोड़ दे।

   भावना के पीछे ही चीखती चिल्लाती सी वह भी घर से बाहर निकलने लगी कि चंद्रा के गुंडो ने उन्हें पकड़ लिया।

” आप क्या सोच रही है माताजी, चंद्रा भैया को पता नहीं था कि आप ऐसा बवाल करेंगी।
उन्हें सब पहले से मालूम था। जभी ना उन्होंने हम लोगों को यहां तैनात कर रखा था कि आप कुसुम जीज्जी की शादी में जाकर कोई बवाल ना खड़ा कर दे।”

उसे लड़के की बात सुनकर भावना की मां ने उसे घूर कर देखा।

” अच्छा!! तो तुम्हारी कुसुम जीज्जी के ब्याह में खटास न पड़ जाए इसलिए तुम लोगों को हमारे चौकीदारी करने बैठा दिया चंद्रा ने, लेकिन हमें यह कोई बता दो कि हमारी बेटी का ब्याह उसकी मर्जी के खिलाफ क्यों करवाया है?”

भावना की माँ चीख उठी और उनमें से एक गुर्गा जोर से हंसने लगा।

” आप तो बड़ी मासूम बन रही है माताजी। आप ही के घर में ना दोनों लुका छिपी खेलते थे।
    कुसुम जीज्जी अपना घर परिवार का नाक कटा कर डाक्टर साहब के साथ जाने को तैयार थी और इसमें सबसे बड़ा हाथ आपकी बिटिया भावना का था। जभी ना चंद्रा भैया तीनों को सजा दिए हैं।

    कुसुम जीज्जी की तो मानौर वाले ठाकुरों से ब्याह कर दिया,और आपकी बिटिया को डाक्टर के गले बांध दिया, जिससे अगर कुसुम जीज्जी अपने ससुराल से भाग कर आए भी तो डाक्टर उन्हें अपनाने से मना कर दें। आखिर उनका भी तो ब्याह हो चुका है ,अब वह भी कुंवारे थोड़ी ना रहे।  हमारे चंद्रा भैया का दिमाग ना बहुत तेज चलता है । माताजी एक बात और यह सारी बातें न सिर्फ हमको पता है क्योंकि हम चंद्रा भैया के खास है। बाकी यह बाहर जितने लड़के खड़े हैं ना, इनको इसमें से कुछो नहीं पता तो आप भी ज्यादा बोलबचन ना कीजिएगा।”

भावना की मां से रहा नहीं गया और उन्होंने खींचकर एक चांटा उस गुंडे के चेहरे पर जङ दिया।

उस गुंडे ने तुरंत अपनी जेब से चाकू निकाला और भावना की मां के गले पर लगा दिया।

लेकिन तभी निनाद दौड़ कर आया और उसने उस गुंडे को एक जोर का घूंसा मारा।
गुंडा पलट कर गिर गया। तभी दूसरे गुंडे ने अपनी गन निनाद के माथे पर तान दी।

उसी वक्त बाहर कहीं फायर की आवाज हुई और वह गुंडे चौंक कर बाहर की तरफ देखने लगे। बाहर वाले छोटे लोहे के गेट को खोलकर एक लंबा चौड़ा पुलिस वाला सरना के साथ भीतर दाखिल होता दिखाई दिया….

” क्या उत्पात मचाए हो बे यहाँ?
   तुम लोग भी ठाकुर के कुत्ते हो ?”

अनिर्वान ने उन गुंडो को देखकर अपना सवाल कर दिया। उनमें से एक गुंडा बौखला गया। उसने अनिर्वान की तरफ अपनी गन दिखाई और जवाब देने आगे बढ़ गया।
अभी वह अनिर्वान से परिचित जो नहीं था ।

“कुत्ता किसको बोला बे, है?”

” तुम ही को बोला और कुत्ता बोलकर तुम लोगों को इज्जत ही बक्श रहा हूं।क्योंकि जिस ढंग से तुम लोग ठाकुर की वफादारी निभा रहे हो, इतना वफादार तो कुत्ता ही होता है। हां यह और बात है कि अब इस गांव के सारे कुत्ते मुझसे नाराज हो जाएंगे कि मैं तुम जैसे फटीचर लोगों को कुत्ता बोल रहा हूँ..।

गन बड़ी शान से लिए घूम रहे हो? इसका लाइसेंस तो है ना? “

        अनिर्वान के सवाल पर वह दोनों गुंडे एक दूसरे को देखने लगे। अब तक निनाद और भावना की मां भी आगे बढ़कर अनिर्वान के पास पहुंच गए थे। अनिर्वान के शरीर पर मौजूद वर्दी देखकर निनाद ने राहत की सांस ली और एक बार में उसे भावना और राजेंद्र से जुड़ी सारी बातें बता दी।

निनाद जितना जानता था, उतना ही बता पाया। बाकी कुछ बातें भावना की मां ने बता दी। और सारी बातें सुनकर समझ आते ही अनिर्वान की त्यौरियां चढ़ गई।

” अच्छा तो यह बात है। अपनी बहन की शादी तो उसकी मर्जी के बिना की ही लेकिन कहीं वह अपने ससुराल से भाग कर वापस यहां ना चली आए, इसलिए यह इंतजाम भी कर दिया कि लड़का कुंवारा ना रह जाए। वाह दिमाग की तो दाद देनी पड़ेगी चंद्रभान ठाकुर की…।”

” एसीपी साहब प्लीज हम लोगों की मदद कीजिए।”

निनाद ने अनिर्वान के सामने अपने हाथ जोड़ दिए। अनिर्वान ने धीरे से निनाद के कंधे पर हाथ रखकर थपथपा दिया।

” देखिए इस मामले में मैं बहुत ज्यादा आपकी मदद नहीं कर सकता। क्योंकि यह उन ठाकुरों का अपना व्यक्तिगत मामला है। दो परिवारों के बीच शादी विवाह का बंधन जुड़ा है। हां अगर कुसुम के साथ बहुत ज्यादती या जोर  जबरदस्ती करके, या उसे किसी तरह से दबाव में डालकर यह शादी करवाई गई है।
   और वह इस बात को मेरे सामने स्वीकार कर लेती है, उसी सूरत में मैं उनकी कोई मदद कर पाऊंगा। रही बात राजेंद्र और भावना की, उन्होंने मैरिज रजिस्ट्रार के सामने अपनी मर्जी से दस्तखत किए हैं।
   और अब कम से कम छह महीने उनकी शादी तोड़ी नहीं जा सकती।
    क्योंकि कोर्ट कचहरी का भी यही मानना है कि पति-पत्नी को एक दूसरे के साथ रहकर एक दूसरे में ढलने के लिए वक्त चाहिए होता है। इसलिए अगर दोनों साथ नहीं रहना चाहते तो परिवार के बड़ों की उपस्थिति में आपसी सलाम मशविरा करके अलग हो सकते हैं। लेकिन कोर्ट इस मामले में इतनी जल्दी हस्तक्षेप नहीं करता। और जहां कोर्ट या लॉ हस्तक्षेप नहीं करता, वहां हम वर्दी धारी भी कुछ नहीं कर सकते ।

कम से कम छह महीने के लिए राजेंद्र और भावना को एक साथ रहना ही पड़ेगा, और वैसे भी अब आप लोग इस सच को स्वीकार कर लीजिए ।

    आपकी बेटी को घर बैठे अच्छा रिश्ता मिल गया है। लेकिन अब अगर दोनों एक दूसरे के साथ खुश नहीं रहते और अलग होना चाहते हैं तो, 6 महीने बाद मैं जरूर उन दोनों की मदद करूंगा।

अनिर्वान ने अपने मन की बात उन लोगों के सामने रख दी थी। और अनिर्वान ने जो कहा था वह विधिपरक नजरिए से बिल्कुल सही कहा था।

उसकी बातों में किसी तरह का कोई झोल नहीं था।

राजेंद्र और भावना की शादी भले ही जोर जबरदस्ती से हुई थी। लेकिन रजिस्ट्रार के सामने यह बात खुल नहीं पाई थी कि राजेंद्र और भावना ने बिना मर्जी के दस्तखत किए हैं। और जिन पेपर्स पर उन लोगों के दस्तखत थे उसमें साफ लिखा था कि साल भर के पहले उनकी शादी किसी भी तरीके से न्यायिक रूप से तोड़ी नहीं जा सकती है। बस न्याय की इसी प्रक्रिया को ध्यान में रखकर अनिर्वान ने जो सही लगा, वह कह दिया था। उसने अपनी बात पूरी करने के बाद सरना की तरफ देखा और उसे साथ लिए वहां से बाहर निकल गया।

सरना अनिर्वान को लेकर इसीलिए भावना के घर आया था क्योंकि उसे यही लगा था की भावना के घर से उसे कोई ना कोई जानकारी जरूर मिल जाएगी। लेकिन यहां पहुंचने के बाद उसे मालूम चला था कि उसके दोस्त राजेंद्र की शादी भावना से हो गई थी। और कुसुम कुमारी की यज्ञ से।

अपने माथे को पीट-पीट कर सरना रोने लगा था। लेकिन अनिर्वान ने उसे समझाया बुझाया और अपनी जीप में अपने साथ बैठा कर वहां से निकल गया। अनिर्वान के बाहर निकलते ही गुर्गे भी बाहर चले गए थे।

   भावना की मां ने उन लोगों के चेहरे पर दरवाजा बंद कर दिया था। उनका रो-रोकर बुरा हाल हो रहा था। निनाद की समझ से बाहर था कि अब वह क्या करें।

उसने चुपचाप अपना बैग उठाया और वहां से वापस निकल गया। उसके पास एक हफ्ते का समय था, इंडिया में रुकने का।

उसकी टैक्सी बस स्टैंड पर उसका इंतजार कर रही थी। यहां पहुंचने के पहले तक वह कितने रंगीन सपनों में खोया हुआ था ।उसे लग रहा था कि भावना आज उसकी हो जाएगी। और वह अपनी सुंदर सी भावना को उसकी मां के साथ ही लेकर अपने घर अमलापुरम चला जाएगा। लेकिन उसका वह सपना टूट चुका था। वह अपनी टैक्सी में बैठा और स्टेशन के लिए निकल गया।

   अपने सूने से घर में बैठी भावना की मां आंसू बहाती रही।

रात का आखिरी पहर बीत गया और भोर की लाली कुछ नई आशाओं के साथ एक बार फिर हर किसी पर सुख संतोष की चादर डालने चली आई…

क्रमशः

aparna..

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