अपराजिता -63

अपराजिता -63

चंद्रा ने गन को अपनी दूसरी तरफ जरा हिफाजत से रखा और जीप को मोड़कर हवेली की तरफ घुमा लिया, इसके साथ ही वह दूसरी जीप मुड़कर शहर की तरफ बढ़ने लगी…

दोनों ही गाड़ियां एक दूसरे की विपरीत दिशा में आगे बढ़ गयी..

इधर मंडप में पंडित जी ने तीसरी बार कन्या को बुला लाने की पुकार मचा दी..
सुजाता के हाथ पैर ठन्डे पड़ रहे थे..
हालाँकि वो पहले से जानती थी कि बारात के समय कुसुम कुमारी घऱ से भाग जाने वाली है, और कुसुम के भागने में सुजाता का भी योगदान था..।

जाने क्यों लेकिन कुसुम का प्यार सुजाता को सच्चा लगने लगा था, और वह यह भी जानती थी कि घर वाले कभी भी राजेंद्र के साथ कुसुम की शादी की बात नहीं मानेंगे। और इसीलिए एक शाम जब भावना और कुसुम एक साथ बैठे बातें कर रहे थे, वह तीनों लोगों की चाय लिए वही चली आई।
    और बातों ही बातों में उसी ने बात शुरू की और फिर कुसुम ने भावनाओं में आकर अपनी भाभी को तीन दिन बाद बरात के समय अपना भगाने का सारा प्लान कह  सुनाया।
 
     भावना को पहले सुजाता भाभी पर विश्वास नहीं हो रहा था। लेकिन जिस ढंग से सुजाता ने कुसुम के भागने की रूपरेखा तैयार की, उससे भावना को भी सुजाता पर विश्वास होने लगा। और फिर शादी वाले दिन सुबह से सारी तैयारी में इधर से उधर व्यस्त दिखती सुजाता ने हीं घर में किसी को भी शक की कोई गुंजाइश न होने दी।

    काका से कहकर उसने कुसुम की बाइक भी पिछले दरवाजे के बाहर खड़ी करवा दी।
      और जिस वक्त कुसुम को घर से निकल कर भागना था ठीक उसी वक्त पीछे के आंगन में मौजूद हर एक नौकर नौकरानी को भी सुजाता ने कुछ ना कुछ काम बता कर बाहर की तरफ भेज दिया। इस तरह कुसुम के लिए वह रास्ता खाली और सुनसान कर दिया था..।

इतना सब करने के बाद जब कुसुम निकल गई तब सुजाता ने जरूर चैन के सांस ली। लेकिन जैसे ही उसका ध्यान इस बात पर गया कि उसका पति कहीं नजर नहीं आ रहा है, उसकी धुकधुकी सी लग गई थी।

    उसे लगा था कि अगर उसका पति वहीं मौजूद होगा तो वह उसके सामने जाकर ढेर सारे आंसुओं के साथ ऐसा दृश्य उपस्थित कर देगी कि लोग इस बात पर ध्यान ही नहीं दे पाएंगे कि सुजाता ने हीं कुसुम को भगाने में मदद की है।

   उसे लोगों का नहीं सिर्फ अपने पति का डर था। और उसका डर सही साबित हो गया।

पंडित जी की तीसरी पुकार पर जब सुजाता वापस मुड़कर कुसुम के कमरे की तरफ बढ़ने लगी, तभी उसे आंगन के पीछे तरफ के कमरे के बाहर खड़ा अपना पति दिखाई दे गया।

         न जाने किस बुरी खबर की आशंका से त्रस्त सुजाता धीरे-धीरे चंद्रभान की तरफ बढ़ गई। पिछले दालान में बने उस छोटे से कमरे के बंद दरवाजे के सामने खड़ा चंद्रभान अपनी तरफ आती सुजाता को खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था।

    सुजाता उस तक पहुंची कि तभी दरवाजा एक झटके से खुला और अंदर से कुसुम अपने शादी के लहंगे में बाहर चली आई। कुसुम को देखते ही सुजाता को सब समझ में आ गया।

   दोनों औरतों ने एक दूसरे की आंखें पढ़ ली।

सुजाता ने धीरे से बढ़कर कुसुम का हाथ थामा और उसे ले जाने को थी कि चंद्रा ने बहुत कठोरता से सुजाता को कुसुम से दूर कर दिया।

चंद्रा ने सुजाता को इतनी जोर से झटका दिया कि सुजाता जमीन पर गिर पड़ी…

“एक बार ब्याह निपट जाने दो, फिर तुम्हारी खबर तो हम लेंगे.. !”

बड़ी मुश्किल से गले में फंसी जा रही सांस को निगल कर सुजाता जमीन से उठी और अपनी साड़ी को झाड़ती हुई कुसुम के पीछे-पीछे चलने लगी।

    चंद्रा धीमे कदमों से अपनी बहन को लेकर मंडप पर पहुंच गया। पंडित जी के पास पहुंचकर उसके चेहरे पर मुस्कान चमकने लगी।

   वहाँ मौजूद किसी मेहमान को इस बात का आभास तक नहीं हुआ कि आधे घंटे पहले घर छोड़कर भाग चुके दुल्हन को उसके भाई ने आधे रास्ते से कैसे वापस लौटा लिया।
कुसुम को ले जाकर यज्ञ के ठीक सामने की तरफ बैठा दिया गया। जैसे ही कुसुम यज्ञ वेदी के दूसरी तरफ बैठी यज्ञ ने अपनी नजरें उठाकर अपनी होने वाली पत्नी को देखा और उसकी आंखें मुस्कुरा उठी।
हालांकि कुसुम ने एक बार भी नजर उठाकर यज्ञ की तरफ नहीं देखा…।

पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया और एक के बाद एक रस्मों को पूरी करते हुए कुछ देर पहले के वर और वधू ,सात जन्मों के लिए एक दूसरे के बंधन में बंध कर एक दूसरे के पति पत्नी हो गए।

   दोनों को सात फेरों के लिए पंडित जी ने खड़े करवाया और उनकी सप्तपदी शुरू हो गई।
   हर एक फेरे का मतलब समझाते हुए पंडित जी उन दोनों से ही कुछ कसमें बुलवाते भी जा रहे थे।

जहां यज्ञ पूरे उत्साह से हर एक कसम बोलकर खुश हो रहा था, वहीं कुसुम सिर्फ औपचारिकता का निर्वहन कर रही थी ।
  उसके चेहरे पर की उदासी, उसका दुख, देखकर वहां मौजूद लोग यही सोच रहे थे कि बिटिया अपने घर से विदा होने के समय ऐसे ही मुरझा जाती है। लेकिन सुजाता जानती थी कि असल में कुसुम के अंदर क्या चल रहा है…?
देखते ही देखते फेरे निपट गए और पंडित जी ने नये नवेले जोड़े को भोर का तारा दिखा कर सप्तपदी संपन्न करवा दी।

    इसके बाद सुजाता और बाकी की औरतें दूल्हा दुल्हन को अपने साथ कोहबर में ले चली।
    रस्मों के मुताबिक दूल्हा और दुल्हन दोनों की ही माँऐं अपने-अपने बच्चों को कभी भी फेरे लेते हुए नहीं देखती, इसीलिए कन्यादान के बाद से ही कुसुम की अम्मा अंदर चली गई थी।

   कोहबर में बैठी वह अपनी बिटिया के दुल्हन बनकर लौटने का इंतजार कर रही थी। दूल्हा दुल्हन के पहुंचते ही दिया मिलाई की रस्म के साथ ही ढेर सारी रस्मे वहां भी शुरू हो गई, और इस सबके निपटने के बाद यज्ञ को घेर कर गांव भर की औरतें कुंवर कलेवा के लिए बैठ गई.. ।

तरह-तरह के पकवान यज्ञ के सामने सजे थे। लेकिन इस वक्त उसे बिल्कुल भी भूख नहीं थी। वह अपने बड़े भाई को ढूंढ रहा था। लेकिन खिड़की के पार उसे अखंड नजर नहीं आ रहा था। उसे इस तरह बाहर की तरफ झांकते देख कुसुम की रिश्ते की बहन ने उसे छेड़ दिया..

” किसे ढूंढ रहे हैं जीजा जी, आपकी घरवाली तो आपके साथ बैठी है..!”

“हम तो आप ही को ढूंढ़ रहे थे, लेकिन इत्तेफाक से आपकी जिज्जी पहले मिल गयी..!”

“अच्छा वरना क्या होता ?”

“वरना यहाँ अपनी जिज्जी की जग़ह आप भी हो सकती थी.. !”

अपने हैंडसम जीजू से अपने लिए ऐसा गुलाबी सा मजाक सुन कुसुम की बहन शरमा कर रह गयी..

कुछ देर में ही बिदाई का वक्त चला आया..

कुसुम को उसके कमरे में नहला कर तैयार किया जा चुका था..
उसके सामने नाश्ते की तश्तरी रखी थी, जिसे उसने देखा तक नही और मुहं फेर लिया..

सुजाता उसे जेवर पहना रही थी..

सुजाता इस वक्त कुसुम से बहुत कुछ कहना चाहती थी, लेकिन कमरे में मौजूद बाकी औरतों और लड़कियों के कारण सुजाता अपने मन की कोई बात कह नहीं पा रही थी। उसी वक्त कमरे में चंद्रा चला आया। उसके आते ही हंसी ठिठोली करती औरतें एकदम से शांत हो गई।औरतों की इस बातचीत के बीच एक मर्द का क्या काम भला?

“अरे ला रहे हैं बेटा.. तुम्हारी बहन को तैयार कर के ला ही रहे !”

“जी ताई जी.. आप सब लोग जरा कमरे से बाहर जाएंगे, हमें अपनी बहन से कुछ जरूरी बात करनी है..!” बिना किसी लाग लपेट के चंद्रा ने अपने मन की बात कह दी

वहां मौजूद औरतों को अजीब तो लगा लेकिन हर कोई चंद्रा के गुस्से से वाकिफ था और इसीलिए वह सब लोग उठकर बाहर चले गए।

कमरे में सिर्फ कुसुम सुजाता और चंद्रभान ही रह गए। चंद्रा के चेहरे पर अब तक जो मुस्कुराहट मौजूद थी, पल भर में गायब हो गई।

उसके चेहरे पर पथरीले से भाव चले आए। उसने घूर कर एक नजर सुजाता को देखा और वापस कुसुम की तरफ देखने लगा..

” एक बात याद रखना कुसुम, अगर अपने ससुराल जाने के बाद तुमने कोई भी ऐसी हरकत की, जिससे हमारा या बाबूजी का नाम खराब होता है, तो कसम से तुम्हारे डॉक्टर साहब को खड़े-खड़े गोली मार देंगे..!
तुम क्या सोचती हो, हम उन्हें उस समय मार नहीं सकते थे? अरे पागल लड़की, उस लड़के को जिंदा रखने का एकमात्र कारण यही है कि हम उसके नाम पर तुम्हें अपनी मर्जी से चला सके।
       क्योंकि हम जानते हैं ना, तुम्हारे दिमाग का फितूर इतनी जल्दी उतरने वाला नहीं है। लेकिन याद रखना, अगर तुमने एक कदम भी गलत उठाया तो तुम्हारे डॉक्टर साहब का सिर धड़ से अलग करके तुम्हारे पास राखी का तोहफा लेकर आएंगे समझी…?”

सुजाता सांस रोक दीवार से लगी खड़ी थी। उसकी चंद्रा से कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। उसने कुसुम की तरफ देखा और उसके आंसू बहने लगे।

    लेकिन कुसुम बिल्कुल ही जड़ बनी बैठी थी। यूं लग रहा था जैसे उसकी आंखों के सारे आंसू सूख चुके हैं। उसके चेहरे पर किसी तरह के कोई भाव नहीं थे। चंद्रा ने कुसुम से अपने मन की बात कही और वहां से निकल कर बाहर जाने लगा।
    दरवाजे तक पहुंच कर वह वापस लौट कर आया और उसने अपनी जेब से अपना मोबाइल निकाला और उसकी गैलरी खोल कर एक तस्वीर कुसुम के सामने रख दी..

तस्वीर में गले में गुलाबों की माला डाले राजेंद्र और भावना नजर आ रहे थे..

कुसुम ने उस तस्वीर को देखा और इतनी देर में उसकी आंख से दो बून्द आंसू ढुलक पड़े..

“तुम्हारी पक्की सहेली और डॉक्टर बाबू.. दोनों का अब ब्याह हो गया है।
   और इतना तो जानती ही हो कि एक शादीशुदा मर्द के बारे में अपने दिमाग में कुछ भी सोचना तुम्हारे लिए पाप है।
   कुसुम अब तुम किसी और की धर्मपत्नी हो। अपने धर्म को संकट में डाले बिना अपनी शादीशुदा गृहस्थ जीवन का शुभ आरंभ करो ।और खुशी-खुशी अपने ससुराल वालों को और अपने पति को अपनाकर उन्हें भी खुश रखो।
    अब इसी में तुम्हारा, तुम्हारे ससुराल वालों का और तुम्हारी सहेली के परिवार का भला है…आयी बात समझ में!”

चंद्रा ने फोन बंद करके अपनी जेब में डाला और दरवाजा खोलकर तेज कदमों से बाहर निकल गया। कुसुम सूनी सूनी आंखों से खुले दरवाजे की तरफ देखती रह गई।

   चंद्रा के जाते ही बाहर खड़ी औरतें जो बंद दरवाजे पर कान लगाए अंदर क्या चल रहा है, सुनने की कोशिश कर रही थी, हड़बड़ा कर अंदर चली आई।

   एक बार फिर शादी वाले घर की भागम भाग में सब कुछ होता चला गया ।
  कुसुम की विदाई का वक्त चला आया। कुसुम को लिए उसकी सखियां सहेलियां उसके पति की कार तक चली आई।

अपने आंचल से अपने आंसू पोंछती कुसुम की अम्मा ने सूपे में रखे चावलों को कुसुम की साड़ी के आंचल में मुट्ठी भर भर के डालना शुरू कर दिया।

कुसुम की ओली भरने के बाद उन्होंने अपने दोनों हाथों को अपनी बेटी के सर पर रखकर उसे आशीर्वाद दिया और उसके माथे पर रोली चंदन का तिलक खींच दिया। कुसुम की मां के बाद कुसुम की ताई काकी,फुआ और उसकी भाभी यानी सुजाता ने एक-एक कर कुसुम की ओली भरी और उसकी नजर उतार ली..

” बिटिया अब इस सूप के चावल को अपने दोनों हाथों में लेकर पीछे की तरफ उछाल दो। ऐसा करते हुए जब लड़की विदा होती है तो उसका यह मतलब होता है कि मैं भले ही अपना मायका छोड़कर जा रही हूं, लेकिन मेरा लक्ष्मी स्वरुप यह चावल इस घर में भी मौजूद रहेगा। मेरे जाने के बाद भी यहां सुख और संपन्नता की कमी नहीं होगी। इन्हीं भावों को अपने मन में रखकर चावल पीछे की तरफ फेंक देना..!”

पंडित जी की पत्नी जो इस शादी में शुरू से मौजूद थी, ने कुसुम को चावल बिखेरने का नियम बताया और इसके साथ ही कुसुम की मां और सुजाता पीछे अपना आंचल फैलाए खड़ी हो गई। कुसुम ने चावल पीछे की तरफ उछाले, लेकिन मन में वह अपने घर परिवार क्या किसी के लिए भी कोई शुभ बात नहीं ला पाई।
    भरे भरे कदमों से वह आगे बढ़कर अपनी विदाई की गाड़ी में बैठ गई…।
कुसुम की माँ, ताई,काकी,फुआ, सबका रो रो कर बुरा हाल था। सब कुसुम को अपने कलेजे से लगाकर खुद में समेट लेना चाहते थे।लेकिन कुसुम की आंख में एक आंसू नहीं था।

   ऐसा लग रहा था वह महज विदाई की औपचारिकता पूरी कर रही है। और उसे इस घर से कोई लेना देना नहीं है। एक-एक कर सबसे गले मिलने के बाद वह सुजाता के पास पहुंची। सुजाता ने उसके चेहरे को अपनी हथेलियां में भरकर उसकी आंखों में ध्यान से देखा और धीरे से अपने मन की बात कह दी..

” दो-तीन दिन बाद तुमको पगफेरे के लिए हम लेने आ जाएंगे। तब तक अपना ध्यान रखना लाडो..!”

कुसुम के चेहरे पर इस वक्त भी कोई भाव नहीं आए। वही सपाट सा चेहरा लिए, अपने आंचल को संभालती वह कार में जा बैठी। उसके ठीक बगल में यज्ञ बैठा हुआ था। कुसुम की तरफ का कांच नीचे झुका हुआ था..

चंद्रा ने उस कांच से झांक लगा दी। और पानी का गिलास कुसुम की तरफ बढ़ा दिया। लेकिन अपने में खोई कुसुम का ध्यान ना चंद्रा पर था और ना उसके बढाये पानी के गिलास पर।
    यज्ञ ने आगे बढ़ाकर उस पानी के गिलास को थाम लिया, और कुसुम की तरफ बढ़ा दिया। कुसुम ने धीरे से उस गिलास को देखा और यज्ञ को देखने के बाद ना में गर्दन हिला दी..

“पीना पड़ता है.. रस्म है ! विदाई के समय भाई अपनी बहन को पानी पिलाता है..!”

यज्ञ के ऐसा कहने पर बिना उसकी तरफ देखे कुसुम ने जवाब दे दिया..

“हमे प्यास नहीं है !”

चंद्रा अपनी बहन का जिद्दी स्वभाव जानता था। इसलिए उसने चुपचाप गिलास वापस ले लिया। गिलास वापस लेने के बाद एक सजे संवरे नारियल को गाड़ी के चक्के के नीचे रखकर चंद्रा गाड़ी के पीछे चला आया।

बहुत भारी मन से उसने धीरे-धीरे अपनी बहन की डोली यानी कार को धक्का देना शुरू किया और नारियल को चक्के से दबाकर गाड़ी आगे बढ़ गई..

गाड़ी के आगे बढ़ते हैं चंद्रा का रहा सहा धैर्य भी चूक गया ।
   अब तक अपने आप को कठोरता के पिंजरे में कैद कर रखे चंद्रा का साहस चूक गया और वह रोते-रोते वहीं जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपने चेहरे को अपनी हथेलियों से छिपा लिया..।

आज तक उस गुस्सैल और अड़ियल ठाकुर को किसी ने रोते नहीं देखा था..।
आज उसका ऐसे बिलख कर रोना वहाँ मौजूद हर किसी की आंखे भीगा गया..।

सुजाता भाग कर अपने पति के पास जा बैठी..
एक बहन का बिछोह भाई को कैसे तोड़ देता है इसका प्रत्यक्ष वो देख और महसूस कर पा रही थी..।
उसने धीरे से चंद्रा के कंधे पर हाथ रख दिया..

“चलिए अंदर चलिए.. सब देख रहे हैं !”

चंद्रा ने भारी मन से अपने आंसू पोंछे और तुरंत अंदर की तरफ निकल गया..

इधर कार में बैठी कुसुम के दिमाग में रह रह कर चंद्रा के मोबाइल स्क्रीन पर चमकता फोटो खलबली मचाये हुये था।
   क्या उसके चंद्रा भैया ने उसी की पक्की सहेली को डॉक्टर साहब के साथ बांध दिया था। लेकिन ऐसा हुआ कब और कैसे?

दूसरी तरफ जिस वक्त चंद्रा भैया कुसुम को लेकर अपने घर की तरफ रवाना हुए थे। उनके आदेश पर उनके गुंडे भावना और राजेंद्र को लेकर रजिस्ट्रार ऑफिस की तरफ निकल गए थे।

   इन्हीं सबके बीच सरना स्टेशन पहुंच चुका था। जहां चंद्रा के ही कुछ गुंडे सरना को पकड़ने पहुंच गए।

चंद्रा को इस बात का शक तो पहले ही था कि कुसुम राजेंद्र के साथ भाग सकती है, इसलिए उसने अपने लोगों को अलग-अलग जगह पहले ही मौजूद कर दिया था। उसके कुछ गुंडे रेलवे स्टेशन पर मौजूद थे तो कुछ गांव से बाहर की तरफ निकलने वाले रास्ते पर।

     चंद्रा खुद इत्तेफाक से बाहर की तरफ जाने वाले रास्ते पर मौजूद था। इसलिए उसने राजेंद्र और कुसुम को पकड़ लिया ।

वहीं स्टेशन पर मौजूद सरना को पकड़ने के लिए वह गुंडे पहुंच चुके थे, जिन्हें यह नहीं मालूम था कि चंद्रा भैया के हाथ कुसुम और राजेंद्र लग चुके हैं। इसलिए वह सरना से कुसुम के बारे में जानना चाहते थे…

और दूसरी तरफ चंद्रा भैया के कुछ और लोग राजेंद्र और भावना को अपने साथ रजिस्ट्रार ऑफिस ले गए.. ।

रास्ते में वही काम इन गुर्गों ने राजेंद्र और भावना के साथ किया जो चंद्रा भैया ने कुसुम के साथ किया था। राजेंद्र और भावना को भी कुसुम को जान से मार देने की धमकी देकर रजिस्ट्रार ऑफिस ले जाया गया, और रजिस्ट्रार के सामने उन दोनों को ही बिना मर्जी के अपनी शादी के कागजों पर दस्तखत करने पड़े। राजेंद्र और भावना एक दूसरे को देखकर भाव शून्य हो गए थे। भावना का दिमाग काम नहीं कर रहा था।

उसके दिल दिमाग में इस वक्त इतनी बातें घूम रही थी कि उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कैसे करें? उसकी मां का चेहरा, भोले से निनाद का चेहरा, उसकी सहेली कुसुम का चेहरा और अब डॉक्टर साहब का चेहरा ।
    इन इतने सारे लोगों के बीच घिरा हुआ उसका छोटा सा दिमाग जैसे फट पङने को आतुर हो चुका था।

राजेंद्र ने अपने दस्तखत किए और रजिस्ट्रार ने जैसे ही भावना की तरफ कागज बढ़ाया, अपनी कांपती उंगलियों में पेन थाम कर अपनी सहेली के जीवन को बचाए रखने के लिए भावना ने भी अपने दस्तखत कर दिये।

और इसके साथ ही वह चक्कर खाकर गिर पड़ी।

जमीन पर गिरती, इसके पहले ही उसे राजेंद्र ने थाम लिया और वहीं किनारे रखी कुर्सी को पैर से आगे बढ़ाकर भावना को उस कुर्सी का सहारा देकर बैठा दिया। बेसुध सी भावना की आंखें बंद हो गई थी। परेशान हाल राजेंद्र इधर-उधर पानी के लिए देखने लगा कि रजिस्ट्रार ने अपने पास रखे कांच के गिलास को उठाकर राजेंद्र की तरफ बढ़ा दिया ।

राजेंद्र ने धीरे से पानी की कुछ बूंदे भावना के चेहरे पर छिड़की, लेकिन भावना को होश नहीं आया। उसने भावना की कलाई थाम ली और उसकी नब्स टटोलने लगा..

“क्या हुआ डॉक्टर साहब, सब ठीक तो है ?”

चंद्रा के एक गुर्गे ने मूंछों ही मूंछों में हंसते हुए राजेंद्र से सवाल किया। और राजेंद्र ने उसे घूर कर कोई जवाब नहीं दिया। उसने रजिस्ट्रार की तरफ देखा..

“टेंशन की वजह से शायद इनका बीपी डाउन हो गया है.. क्या मैं इन्हे घऱ लेकर जा सकता हूँ.. ?”

रजिस्ट्रार ने हामी भार दी..

और राजेंद्र भावना को सहारा देकर वहाँ से बाहर निकल गया..

क्रमशः

aparna..

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Nisha
Nisha
1 year ago

Ho gayi gadbad bus isi ka darr tha