अपराजिता -61
कुछ देर में कुसुम ने अपनी एक सहेली की तरफ देखा और उसे अपने पास बुला लिया..
“ऐ डिंकी सुनो.. हमारे लिए कुछ खाने का तो ले आओ.. बहुत भूख लग रही है.. !”
“हाँ, हम तुम्हारी अम्मा से पूछ कर कुछ फल या जूस ले आते हैं। क्यूंकि कुसुम हमें लगता है आज तुम्हें उपवास रखना होगा.. !”
“अरे यार.. हम पहले ही अम्मा से बोले थे कि ये उपवास वुपवास हमसे नहीं होता। पर अम्मा हमारी सुने तब ना ! रहने दो फिर, हमसे कंदमूल भी नहीं खाएं जाते.. !”
“कुसुम.. ये तुम लहंगा के नीचे स्पोर्ट्स शूज़ काहे पहनी हो.. ?”
“आजकल फैशन है… देखी नहीं हो क्या… पिस्ताग्राम में हर एक दुल्हन ऐसे ही लहंगा के नीचे बूट्स पहन कर स्टेज पर आ रहीं है.. !”
“तुम और तुम्हारा फेसन ! आग लगे इस फेसन को।”
उसी समय बारात आ गयी का शोरगुल मचा और कुसुम की सखियाँ दूल्हा बाबू को देखने बेकरार हो उठी..
“कुसुम.. हम लोग दूल्हा बाबू को देख आये?”
“देखने भर से क्या होगा, तुम चूम के आ जाओ !”
“छी बेसरम ! कुछ भी बोल देती हो ! सच्ची बताओ, जाएँ ?”
कुसुम ने पलकें झपक कर हाँ में गर्दन हिला दी…
कुसुम ने तुरंत भावना को फ़ोन घुमा दिया
“भावना कहाँ हो यार ? तुम अब तक पहुँची क्यों नहीं.. हमारा घर से भागने का समय हो गया है.. !”
“आ रहे है कुसुम.. बस तुम्हारी ही कुछ तैयारी बाकी है.. !”
कह कर भावना ने फ़ोन काट दिया….
भावना का दिल इस वक्त शताब्दी से होड लेता धड़क रहा था।
क्योंकि कुसुम के फोन आने के ठीक 1 मिनट पहले उसने निनाद का फोन रखा था। निनाद बस स्टैंड पर पहुंच चुका था। अपनी टैक्सी से उतरकर उसने भावना को सीधे वीडियो कॉल किया था, और दुर्गागंज के बस स्टैंड पर अपने पहले प्यार को खड़े देख भावना कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह गई थी।
उसके दिल दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया था। उसे लगने लगा कि कहीं पल भर के उत्साह में, क्षण भर की उत्तेजना में, उसने कोई गलत निर्णय तो नहीं ले लिया…।
बहरीन में रहने वाला लड़का उसके परिवेश, उसके धर्म जाति से बिल्कुल अलग लड़का, कहीं उसे साथ ले जाकर वहां अरब देश में किसी अरब के हाथों बेच तो नहीं देगा?
पता नहीं ऐसे कितने किस्से कहानियां वह अखबारों में पढ़ चुकी थी। टीवी चैनल में इस तरह की खबरें देख चुकी थी। बावजूद उसने कैसे बिना कुछ ज्यादा पूछे परखे बिना निनाद को साथ चलने के लिए हामी भर दी थी। बल्कि शादी के लिए तो उसी ने आगे से निनाद से पूछा था।
लेकिन तभी भावना को निनाद की आंखे याद आ गयी…।
वो सजल निर्मल स्वच्छ निष्पाप आंखे!!
कभी उससे क्या किसी भी लड़की से बेईमानी नहीं कर सकती।
और वह लड़का जो पिछले 5 सालों से उसका और उसके परिवार का बिना किसी शर्त के भरण पोषण कर रहा था, वह आखिर उसे ले जाकर क्यों किसी अरब के हाथों बेचेगा?
अगर वह इतना ही बड़ा व्यापारी होता तो किस स्वार्थ की वजह से वह उसके मरे हुए पिता की जिम्मेदारियां को इतनी शिद्दत से निभाता चला रहा था?
पल भर में ही भावना को अपनी सोच पर शर्म आने लगी।
निनाद जैसा लड़का मिलना उसकी खुशकिस्मती थी। निनाद के तो वह जिंदगी भर पैर धोकर भी पिये तब भी उसका एहसान नहीं चुका पाएगी।
वह लड़का दिल का ऐसा सच्चा था कि लगता था सांसारिक बुराइयां उसे छू भी नहीं गई। और सच ही तो था।
जब जब उससे बात हुई थी, उसने कभी कोई दुराव छुपाव अपने और भावना के बीच नहीं रखा।
अपनी मां से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में बात करवाते वक्त भी उसने कुछ भी ऐसा बढ़ा चढ़ा कर नहीं बताया कि जिससे भावना उससे प्रभावित हो जाए ।
वह तो बेचारा शुरू से ही जैसा था, अपने उसी रूप में भावना के सामने आया, लेकिन वह नहीं जानता था कि उसकी यही सादगी भावना को ले डूबी थी…।
निनाद को अपने गांव के बस स्टैण्ड में देख भावना के दिल की धड़कने तेज़ होती जा रही थी…।
अब इन्हे संभाल भी वही सकता था जो इन्हे बढ़ाने का जिम्मेदार था..।
“माँ हम आ रहे हैं.. !”
“कहाँ जा रही हो ? कुसुम के यहाँ ना ? ठहरो हम भी चलते हैं !”
“नहीं माँ… तुम रुको, तुमसे हमे किसी को मिलवाना है.. हम उन्हें लेकर यहीं आ रहे.. बस हम यूँ गए और यूँ आये.. !”
और अपना लहंगा संभाले भावना दौड़ पड़ी..
उधर भावना के ना पहुंचने पर कुसुम का धैर्य चूकने लगा था..
उसकी सहेलियां कमरे से निकल गयी थी..
उसने खिड़की से झांक कर देखा और डिंकी और गुड़ी बालकनी से वापस अंदर चली आयी..
“चलो अपने सजीले बन्ने को देख लो कुसुम कुमारी जी.. !”
” अब जिंदगी भर उन्हें ही तो देखना है,इसलिए अभी नहीं देखेंगे हम! जाओ तुम लोग देख लो..!”
“अरे चलो.. तुम्हारी भाभी ने यह फूल और अक्षत हम लोगों को दिए थे कि जैसे ही बारात दरवाजे लगेगी ऊपर से तुम्हारे हाथ से दूल्हे पर यह सब डलवाना है।चलो चलो नेग करो, और हमारी छुट्टी करो।
जिससे हम नीचे जाएं, दूल्हा बाबू को करीब से देखने..!”
कुसुम समझ गई कि इन लड़कियों से अगर बचना है तो उसे इनका कहना मानना ही पड़ेगा। इन लोगों के कमरे से बाहर गए बिना उसका पीछे वाली दालान में उतरना मुश्किल था।
इसलिए वह अपनी उन दोनों सखियों के साथ बालकनी में चली आई।
ठीक उसी वक्त घर के मुख्य द्वार पर दूल्हा और उसके भाई खड़े थे। दरवाजे पर ही कुसुम की मां आरती का थाल लिए खड़ी थी। उन्होंने बड़े प्यार और सम्मान से अपने होने वाले दामाद की आरती उतारी, और थल में से उठाकर कुमकुम का लंबा सा तिलक यज्ञ के प्रशस्त ललाट पर खींच दिया।
थोड़े से भीगे अक्षत उस तिलक पर चिपकाने के बाद उन्होंने ऊपर तोरण पर लगे नारियल की ओर इशारा कर दिया..
यज्ञ के पास खड़े उसके फूफा ने उसे रिवाज समझाया और यज्ञ ने अपनी कमर में खोंस रखी तलवार निकाल कर उसी तलवार से नारियल को छूने के लिए हाथ ऊपर कर दिया..
इस रिवाज में नारियल को जरा ऊंचा बांधा जाता है। यह देखने के लिए कि होने वाला जमाई कितनी कार्य कुशलता से अपने राजपूत होने का धर्म निभा सकता है। यज्ञ पहले ही लंबा चौड़ा था उसने बड़ी आसानी से अपनी तलवार की नोक से नारियल को छू लिया।
लेकिन इस समय उसकी नजर ऊपर छज्जे पर खड़ी कुसुम कुमारी पर पड़ गई। कुसुम भी उस वक्त नीचे उसी की तरफ देख रही थी। दोनों की नजरे मिली और बाजू में खड़ी डिंकी ने कुसुम के हाथ में रखे फूल और अक्षत दूल्हे पर गिरवा दिए।
उन फूलों और अक्षत के अपने ऊपर गिरते ही यज्ञ नीचे सर करके उन्हें झाड़ने लगा और कुसुम मुंह फेर कर अंदर चली गई..।
जाने क्यों उसका दिल कसमसा कर रह गया।
ठीक है वह किसी से घबराने वालों में से नहीं थी, लेकिन वह जो कदम उठाने जा रही थी उसमें यज्ञ का क्या कसूर था? आखिर बिना गलती के वह समाज के सामने गलत साबित हो जाएगा।
कल को जब लोगों को पता चलेगा कि यज्ञ सिंह परिहार की बारात बिना शादी, बिना दुल्हन के वापस लौट गई, तो उनके समाज में कितनी थू होगी।
बड़ा भाई पहले ही शादी के नाम से मुंह बनाए खड़ा है। और दूसरे की बारात लौट गई। उस घर के लड़कों के शादी के ग्रह पर जैसे शनि कुंडली मारे बैठे हैं ।
इन सब उमड़ते घुमङते विचारों को झटक कर कुसुम ने एक तरफ किया और गुड़ी और डिंकी की तरफ देखने लगी..
“जाओ तुम लोग भी कुछ खा पी लो.. !”
“नहीं हमारा तो दूल्हा बाबू को देख कर मन नहीं भरा, जायें उन्हें देख ले.. ?”
“हमने तो पहले ही कहा था, चाहो तो चूम भी लो.. !”
“चूमने लायक तो है ही, लेकिन अब उन्हें चूमने का काम तुम्हारा हुआ, हम सब का नाम ले ले कर मन भर के चूम लेना कुसुम कुमारी अपने ठाकुर को.. !”
हंस-हंसकर दोहरी होती,एक दूसरे पर गिरती पड़ती डिंकी और गुड़ी सीढ़ियां उतरकर नीचे चले गए। उन दोनों के जाते ही कुसुम ने फ़ोन निकाला और वापस भावना को फ़ोन लगा दिया..
“कहाँ हो यार भावना ? कहीं हमारी जगह तुम ही तो नहीं चली गई डॉक्टर साहब के साथ..!”
“पगला गयी हो क्या कुसुम.. बस आ रहे हैं ! तुम फ़ोन रखो तब तो आये.. !”
और झल्ला कर भावना ने फ़ोन रख दिया…
और तेज़ी से भागती हुई बस स्टैण्ड की तरफ बढ़ गयी..!
उसका लहंगा पैरो में फंस रहा था, लेकिन निनाद से पहली बार मिलने की ख़ुशी में वो भागती चली जा रही थी..
बेसुध, बेपरवाह, बेलौस…
आज उसके और उसकी खुशियों के बीच कोई नहीं आ सकता था, स्वयं ब्रम्हा भी नहीं..।
भावना की उत्तेजना अपने चरम पर थी…
उसका दिल खुशियों से इस कदर भरा हुआ था कि उसकी आंखें बहने लगी थी..
उसके घर से बस स्टैंड का रास्ता मुश्किल से 10 मिनट का था और उसे वह 10 मिनट भी 10 घंटे के बराबर लग रहे थे।
एक-एक उठता हुआ कदम उसे निनाद की तरफ बढ़ा रहा था।उसके सुनहरे भविष्य की तरफ।
और भागते-भागते वह बस स्टैंड में दाखिल हो गई।
टिकट काउंटर की तरफ बढ़ते हुए वह चारों तरफ आंखें फाड़े अपने प्रेमी को ढूंढ रही थी, और तभी उस की नजर दूर एक टैक्सी से लगकर खड़े उस साँवले सलोने लड़के पर पड़ गयी..
वीडियो कॉल में जैसा दिखता था, उससे थोड़ा सा अलग लग रहा था निनाद।
वीडियो में इतना पतला नजर नहीं आता था, लेकिन अभी थोड़ा दुबला और कुछ ज्यादा ही लंबा लग रहा था वह ।
बाल घूमे घूमे से गोल-गोल थे और आंखें वैसे ही बड़ी-बड़ी रेशमी पलकों में छुपी हुई।
निनाद के सामने पहुंच कर खड़ी हो गई वह।
वीडियो में जिसे देख कर वह अक्सर झेंप कर नीचे देखने लगती थी, आज उसके चेहरे को सामने से देख कर उस पर से नजर हटाने का मन नहीं कर रहा था भावना का।
कहां वह भावना को गॉर्जियस, क्वीन, सुंदर कह कह कर चने के झाड़ पर चढ़ाता था, लेकिन वह खुद साक्षात कान्हा जी जैसा लग रहा था।
जिसकी मनोहारी छवि को देखकर आंखें बंद होना भूल गई थी।
भावना वाकई कुछ पलों को सांस रोके खड़ी रह गई। निनाद भावना को खुद को इस तरह देखते पाकर लजा गया, और जमीन पर देखते हुए अपने जूते की नोक से जमीन पर कुछ लिखने लगा।
उसके ऐसा करते ही भावना भी झेंप कर नीचे देखने लगी…
“बहुत ज्यादा इंतज़ार तो नहीं करना पड़ा ना ?”
“नो नो.. नॉट एट आल !”
इसके बाद दोनों को कुछ सूझ ही नहीं रहा था..
दोनों एक दूसरे को देखते और फिर झेंप कर इधर-उधर देखने लगते..।
फोन पर लंबी-लंबी रसीली बातें करने वाला भावना का रसिक प्रेमी अपने सारे वादे जैसे भूल बैठा था..
जाने कैसी कैसी बेशर्मी भरी बातें कर करके उसने भावना के कान गरमा दिए थे, और अब सामने आने पर ऐसा शर्मीला बना खड़ा था, जैसे उससे सुथरा कोई नहीं..।
और भावना अपने इस सजीले प्रेमी पर दिलो जान से फ़िदा हुई जा रही थी..।
उसका दिल कर रहा था निनाद एक बार बांहे खोले और वो उन में समा जाये…
बस इसके बाद उसे किसी बात की चाह नहीं थी..
निनाद अचानक इधर उधर देखने लगा..
“क्या ढूंढ़ रहे आप ?”
“वो पानी.. कहाँ मिलेगा ?”..
भावना भी निनाद के साथ पानी ढूंढने लगी.. ज़रा दूर अँधेरे में उन दोनों को पानी का नल दिखने लगा… निनाद उस तरफ बढ़ने लगा, भावना भी उसके पीछे हो ली..
वहाँ पहुँच कर निनाद थम कर खड़ा हो गया..
भावना भी रुक गयी..
पानी के उस नल के पास घना अँधेरा था.. वैसे बस स्टैंड पूरा ही अँधियारा सा था.. कही कहीं स्ट्रीट लाइट जल रही थी, पर प्रकाश पर्याप्त नहीं था..
ये जगह तो बिलकुल ही सुनसान थी..
निनाद पलटा उसने भावना की तरफ देखा..
भावना ने निनाद की आँखों की बोली पढ़ ली..
निनाद एकटक भावना को देख रहा था, वो थोड़ा और निनाद के करीब चली आयी.. उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ा कर निनाद के सीने पर रखा और निनाद ने उसे खींच कर बाँहों में भर लिया…
दो तड़पते, तरसते दिल एक हो गए… कुछ देर तक दोनों यूँ ही एक दूसरे से लिपटे खड़े रहे…
फिर भावना ही पहले कसमसाई..
“चलिए.. घऱ भी जाना है.. आपको अम्मा से मिलवा कर फिर हम कुसुम के घऱ जायेंगे..।
वहाँ से लौट कर हम तीनो यहाँ से निकल जायेंगे.. हमेशा के लिए.. !”
“हम्म.. !”
अपने चिरपरिचित हम्म के बावजूद निनाद ने भावना को अपनी बांहों से आज़ाद नहीं किया..
“चलिए ना निनाद.. !”.. “
“हम्म.. व्हाट…? कम अगेन..!”
“क्या.. ?”
“मेरा नाम..! बोलो ना.. कितना प्यारा लगा जब तुमने निनाद बुलाया !”
“निनाद !.. चले !”
निनाद ने हाँ में गर्दन हिलायी और भावना को धीरे से खुद से अलग कर लिया, लेकिन साफ ज़ाहिर हो रहा था की उस उतावले को भावना को छोड़ने का मन नहीं कर रहा..
भावना पलट कर आगे बढ़ाने को हुई कि निनाद ने उसकी बाँह थाम ली। भावना जैसे ही पलटी निनाद ने भावना के चेहरे को अपनी हथेलियां में थामा और उसके होठों पर अपने होंठ रख दिए…
*****
भावना ने कुसुम का फ़ोन जल्दबाज़ी में रख दिया..
कुसुम ने अपने फ़ोन को एक तरफ रखा और कमरे की खिड़की बंद कर दी..
कमरे में कुसुम और उसके बड़े भाई की पांच साल की बेटी बस रह गयी..
कुसुम फटाफट अपनी जगह से उठी…
उसने सबसे पहले अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और अपना लहंगा उतारने लगी, लहंगे के नीचे उसने जींस पहन रखी थी…
अपने सर से चुन्नी उतार कर उसने नीचे रखी और अलमारी से निकाल कर एक लम्बा सा ओवरकोट ऊपर से डाल लिया…
एक छोटी सी कैप से अपने जुड़े और गजरे को ढंकने के बाद उसने अलमारी में रखा एक बैग निकाला…
अपने लहंगे और चुन्नी को उस बैग में डाल कर उसने फटाफट ज़िप लगायी, और अपना मोबाइल, लॉकर से कुछ पैसे लेकर उस बैग को अपनी पीठ पर लाद कर कमरे के पिछले दरवाज़े की तरफ बढ़ गयी..
“फुआ…. कहाँ जा रहीं हो.. ?”
पांच साल की गिट्टू ने प्यार से उसे पुकारा और वो वापस पलट कर उसके पास चली आयी..
“हम जा रहें अपनी लाइफ की सबसे मनोरंजक जर्नी में गिट्टू रानी.. ! हमारे और तुम्हारे पापा ने चाहा तो एक दिन तुम्हारे फूफा जी के साथ वापस आएंगे.. !”
गिट्टू को प्यार से चूम कर पिछले दरवाज़े को खोल वो पिछली तरफ की सीढियों से घर के दालान में उतर गयी..
पीछे का आंगन सूना पड़ा था..
वहीं से पिछला दरवाज़ा खोल वो बाहर निकली और वहाँ पहले से खड़ी बुलेट पर चाबी घूमा कर उसने एक झटके में बाइक आगे बढ़ा दी…
ढ़ेर सारा धुंआ उगलती बाइक कुछ पलों में हवा से बातें करने लगी…
अपनी बाइक में गाँव के बाहर पहुँच कर कुसुम राजेंद्र को इधर उधर ढूँढ रहीं थी कि वो भागता हुआ उस तक पहुँच गया….
राजेंद्र को देखते ही कुसुम बाइक से उतरी और उसके सीने से लग गयी…।
राजेंद्र ने भी उसे खुद में भींच लिया…।
“कैसे लग रहे हम ?” बड़ी अदा से कुसुम ने अपने होने वाले पति की आँखों में झांक कर पूछ लिया…
“इस दुनिया की सबसे खूबसूरत दुल्हन.. जिसे देख चाँद भी रश्क करता है वो आज मेरी होने जा रही है !”
“क्या बात है डाक सब.. मेडिकल के साथ साथ साहित्य भी पढ़ रखा है आपने ?”
“शादी हो जाने दो, और क्या क्या पढ़ रखा है सब बता दूंगा, एक ही रात में.. !”
और राजेंद्र ने कुसुम को वापस अपने सीने से लगा लिया..
“अब तुम दोनों निकलो यहाँ से ! अब तक वहाँ भौकाल मच गया होगा कि दुल्हन भाग गयी है !”
राजेंद्र के दोस्त सरना ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया..
राजेंद्र ने हाँ में गर्दन हिलायी और बाइक स्टार्ट कर ली..
राजेंद्र के पीछे कुसुम बैठ गयी..
राजेंद्र गाड़ी आगे बढ़ाने को था की सरना ने अपनी शर्ट से निकाल कर रुमाल में बंधा एक बंडल उसकी तरफ बढ़ा दिया..
” राजी, ये तुम लोगों के काम आएगा… !”
“अबे यार.. इसका क्या ज़रूरत था…? और इतना रुपया तुम लाये कहाँ से बाबू ?”
“अब वो सब तुम छोडो, फ़िलहाल ये कुसुम को लेकर तुम निकलों यहाँ से.. कहीं इसके लठैत भाई बंधु चले आये ना तो छोड़ेंगे नहीं तुमको… !”
“पहले सच बताओ बे… ये रुपल्ली लाये कहाँ से हो.. !अपना खेती खार बेच तो नहीं दिये ?”
“नहीं.. खेती बाबूजी का निसानी है, कैसे बेच देंगे ? अम्मा बेचने भी नहीं देगी !”
“हम्म, मतलब बैल बेचे हो ?”
“अबे जाओ ना यार… तुम यहाँ काहे टाइम वेस्ट कर रहें… जाओ…!
बाइक बेचे हैं अपना…! हमको काम भी नहीं था, और अब हम खुद ट्रेन पकड़ कर शहर निकल रहे हैं.. !”
राजेंद्र ने बाइक पर बैठे बैठे ही सरना को गले से लगा लिया…
“सरना… अपना ख्याल रखना !”
“तुमको हमसे ज्यादा ज़रूरत है ये दुआ की… जाओ तुम दोनों भी अपना ख्याल रखना !”
राजेंद्र ने गाड़ी आगे बढ़ा दी… और सरना अपने गमछे से अपना चेहरा ढंकते हुए रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ गया…
दूर हवेली में बारातियों के स्वागत में बजते गीत की स्वरलहरी यहाँ तक भी चली आ रही थी…
ओ लुक छिप ना जाओ जी, मने दीद कराओ जी
रे क्यूं तरसावे हो, मने शक्ल दिखाओ जी
थरी शरारत सब जानू हैं चौधरी..
हारे से लेओ ना पंगा जी मैं कह लगी…
महारे हिवड़े में जागी घोकणी
रे चंदा में थारी चाँदनी..
माने दासण में बाँधी खुशी
रे झूम झूम झूम झूम वा झूम
महारे हिवड़े में जागी घोकणी
रे चंदा में थारी चाँदनी..
क्रमशः
aparna…

Haye ram kuch bura na ho bus.yajyn ke sath to bura ho hi gaya hai