अपराजिता -59
मानौर सर से पांव तक हर गली से बरगद की छाँव तक दुल्हन की तरह सजा दिया गया था, आखिर गांव के बड़े ठाकुर के लड़के की शादी थी…
मानौर गांव अपने ठाकुरों को मानता था!
ऐसा नहीं था किबड़े ठाकुर कोई बहुत बड़े धर्मप्रिय सज्जन व्यक्ति थे, वो भी गरीबी अमीरी ऊंच नीच का भेदभाव किया करते थे क्यूंकि ये उनके खून में था.. उन्हें बचपन से यही सिखाया गया था कि वो समाज का सबसे मजबूत स्तम्भ है, और उनके कंधो पर ही समस्त संसार की रक्षा का भार है.. उनके अलावा बाकी सारे लोग नीर क्षीर विहीन है…
जन्म से ही उन्होंने अपने पुरखों को जैसा देखा था, उसी रंग में ढले हुए थे..
कर्कश,क्रोधी और अंकुशविहीन…।
लेकिन उनके स्वभाव का यही रूखापन किसी दीन हीन को देख प्रायः विलुप्त हो जाता था.. और उसकी सहायता को वो तत्परता से तैयार हो जाते थे…
सहायता करने में उन्होंने कभी कृपणता नहीं दिखाई बल्कि इस मामले में उन सा उदारमना कोई ना था..
और बस इसीलिए सारा गांव किसी भी तरह की विपत्ति आने पर बड़े ठाकुर की शरण लेता था..
बस जातपात के मामले में वो थोड़े ज्यादा संकुचित विचारधारा के थे, लेकिन उस छोटे से गांव के लोगो के लिए अभी अपनी जाति के लिए आवाज़ उठाना बड़ी बात थी… वो सब भी आंख कान बंद किये बड़े ठाकुर के संरक्षण में स्वयं को सुरक्षित पाते थे..।
बड़े ठाकुर की राजसी हवेली फूलों और बिजली के लट्टुओं से लकदक चमक रही थी.. एक तरफ धूमधड़ाके वाले गाने चल रहे थे..
आज सुबह से ही अखंड अपने प्रचार कार्य में नहीं जा पाया था…
आज शाम बारात जो निकलनी थी..
आज उसके छोटे भाई की बारात थी, और यज्ञ सुबह सुबह ही उसके कमरे में आकर उसके पैरो से लिपट गया था कि आज अखंड उसे छोड़ कर कहीं नहीं जायेगा..
अखंड अब तक शादी की हर रस्म से खुद को दूर रखे हुए था, लेकिन आज यज्ञ की ज़िद के कारण वो हर जग़ह यज्ञ के साथ मौजूद था..
यज्ञ की हल्दी हो चुकी थी, परम्परागत तरीके से उसका लेडीज़ संगीत भी एक शाम पहले उनके बड़े से आंगन में घर की बड़ी बुज़ुर्ग औरतों ने ढोलक बजा बजा कर बन्ना बन्नी गाकर सम्पन्न करवा दिया था…
इन सब में यज्ञ भी अपने गिने चुने दोस्तों के साथ मौजूद था…. उसकी जान पहचान सैकड़ों से थी, जिन्हे शादी का निमंत्रण भी गया था। पर घऱ में हो रही रस्मों में बस गिने चुने दोस्त मौजूद थे..
यज्ञ की जान पहचान का दायरा असीमित था..।
वो जमीन का काम करने वाला लड़का था, उसका रोज़ का पटवारी कार्यालय से लेकर कलेक्ट्रेट परिसर आना जाना बना रहता था..
अब वो ज़मीन के काम से आगे बढ़ कर सरकारी कामों के टेंडर भी डालने लगा था..।
इसी से बड़े बड़े सरकारी अधिकारीयों से उसकी जान पहचान थी…
और इन सभी को उसने स्वयं अपने हाथो से अपनी शादी का निमंत्रण पत्र दिया था…
वैसे तो बड़े ठाकुर जानते थे कि यज्ञ का रिश्ता जिस घर में जुड़ा था, वह घर परिवार भी किसी तरीके से भी उनसे कम नहीं था, बावजूद अपनी गरिमा में मेहमानों की सुविधा में कहीं कोई कमी ना रह जाए, इसलिए बड़े ठाकुर साहब ने चंद्रभान से स्वयं इस बारे में बात-चीत कर ली थी कि उनके बड़े-बड़े मेहमानों के लिए स्वागत भी इस तरीके का होना चाहिए।
अगर चंद्रभान किसी तरीके से भी अक्षमता महसूस करता है तो बड़े ठाकुर स्वयं उसकी मदद कर देंगे। लेकिन चंद्रभान ने बड़ी विनम्रता से उनके इस प्रस्ताव को वापस भेज दिया था। वह खुद अपनी बहन की शादी बड़े धूमधाम से करना चाहता था। और सीना ठोक कर उसने बड़े ठाकुर से कहा था कि आप चाहे जितने मेहमान बुला लीजिए किसी के स्वागत और सम्मान में कोई कमी नहीं आएगी।
दुर्गागंज को भी दुल्हन की तरह सजा दिया गया था। वैसे तो चंद्रभान की हवेली भी किसी राजमहल से कम नहीं थी, लेकिन हवेली के अंदर इतने मेहमानों का प्रबंध करना जरा मुश्किल था।
लेकिन हवेली के ठीक बाहर उन लोगों के बड़े से उद्यान में सारी व्यवस्था सुचारू रूप से कर दी गई थी…
एक सौ एक तरह की तो सिर्फ मिठाइयां ही बनवा दी थी ठाकुरों ने..
सामिष वालों के लिए अलग व्यवस्था थी, वहीँ निरमिषो के लिए अलग…
हर तरफ धूम मची थी.. लग नहीं रहा था कि ठाकुरों की बिटिया ब्याही जा रही है, ऐसा लग रहा था पूरे दूर्वागंज की बेटी का ब्याह होना है..।
हवेली के कामगार तो काम में लगे ही थे, गांव के और लोग भी आज खुद को झोंके जा रहे थे…
हर तरफ आनंद और उल्लास का माहौल था…. और इन सब से अलग अपने कमरे में बैठी कुसुम अपने पैक कर चुके सामान में से कुछ सामान इधर उधर कर रही थी…
सुबह का तेल हल्दी उसे चढ़ चुका था और अब कुछ समय बाद उसे नहलाने ले जाया जाना था, उसके पहले ही वो अपना काम कर लेना चाहती थी..
उसके साथ जाने के लिए लगभग आठ दस बड़े सूटकेस सजे खड़े थे..
उनमे से एक सूटकेस को उसने बड़े आराम से अपनी तरफ खिंचा और पलंग पर खोल कर फैला दिया..
उसके अंदर उसकी चार पांच साड़ियां थी..
“अब इसे काहे खोल कर पसारे दे रही हो कुसुम ?”
भावना ने पूछ लिया..
“क्यूंकि यही बस एक तो हमारे साथ जाने वाला है..।”
“मतलब ?”, भावना आश्चर्य से उसे देखने लगी..
“इस सूटकेस में हम अपना कुछ ज़रूरी सामान रख कर इसे अभी ही डॉक्टर साहब तक पहुंचवा देंगे… क्यूंकि रात में भागते समय हम इतना बड़ा बक्सा उठा कर कहाँ भाग पाएंगे !”
भावना ने अपने माथे पर हाथ मार लिया..
“तुम्हारा हम क्या करे कुसुम ? एकदम जान हथेली पर लिए फिरती हो.. आज से चार दिन पहले ही ये सामान भेज देना था ना, अब आज कौन लेकर निकलेगा !”
“तुम.. ! अच्छा वो सब छोड़ो, देखो हमने कितनी सुंदर सी नाईटी मंगवाई है.. !”
झीनी सी घुटनो तक लम्बाई की गुलाबी रेशमी नाइटी कुसुम ने भावना के हाथ में थमा दी और उस नाइटी को देख कर ही भावना शर्म से पानी पानी हो गयी..
“तुम तो ऐसे शरमा गयीं जैसे हम तुम्हे पहनने बोल रहे हैं ? अरे बुद्धू राम, ऐसे ही तो अपने पति को रिझाया जाता है ! समझी ! वैसे तुम्हे ना हमें ट्रेनिंग देनी पड़ेगी, तुम्हारी शादी के पहले।
वरना तुम तो ऐसे ही लाल बुझक्क्ड़ बनी चली जाओगी,अपने पतिदेव के सामने ! और वो बेचारा तुम्हे देख सोचता रह जायेगा किस बौड़म से ब्याह दिया घरवालों ने !”
कुसुम ने हँस कर भावना को गले से लगा लिया, और कुसुम की बात सुन भावना के दिमाग में निनाद घूम गया…
सुबह सुबह दिल्ली पहुँच कर उसने भावना को फ़ोन पर अपने सकुशल पहुंचने की सूचना दे दी थी…
भावना भी रात उसके फ्लाइट में बैठने के बाद से उसकी कुशलता की कामना करती रात भर चैन से सो भी नहीं पायी थी….
उसके दिल्ली उतरने का मेसेज आते ही उसने चैन की साँस ली थी..
कुसुम के इस बैग में चार पांच साड़ियों के आलावा ज्यादातर आधुनिक तरीकों के नाईट सूट ही थे.. जिन्हे अच्छे से बंद कर उसने भावना को थमा दिया..
“भावी इस बैग को तुम सरना तक पहुंचा दो.. वो डाक साहब के कमरे तक ले जायेगा.. !”
“लेकिन नीचे किसी ने देख लिया तो ? और बैग का साइज तो देखो, इतना बड़ा बैग तो सबको दिखेगा ही दिखेगा.. !”
“हाँ तो हम छिपा कर ले जाने थोड़े ना बोल रहे.. हम भाभी को बुला कर कह देंगे कि ये तुम्हे हम दे रहे हैं, तोहफे के तौर पर.. अपनी शादी का तोहफा !”
भावना को तोहफे के नाम पर अचानक कुछ याद आ गया..
“अरे हाँ कुसुम… हम तुम्हारे लिए कुछ लेकर आये थे !”
भावना ने सकुचा कर कहा..
कुसुम ने भावना के गले में बाहें डाल दी.. -“क्या लेकर आयी हो.. दिखाओ !”
“वैसे तो तुम्हे बड़े बड़े तोहफे मिलेंगे, हम जानते हैं लेकिन हमारे पास इससे ज्यादा कुछ नहीं था… पता नहीं तुम्हे पसंद आएगा या नहीं…।
चाहो तो पहनना वरना नहीं भी पहनोगी तो कोई दिक्कत नहीं..।”
कुसुम ने घूर कर भावना को देखा और उसके होंठो पर अपनी ऊँगली रख दी..
“तुम आजकल कुछ ज्यादा ही बकवास करने लगी हो… चलो निकालो क्या लायी हो.. !”
भावना ने अपने बैग से एक छोटा सा डिब्बा निकाला और कुसुम की तरफ बढ़ा दिया..
कुसुम ने झट से वो डिब्बा लिया और खोल लिया..
अंदर एक बारीक सी छोटी सी सोने की चेन जगमगा रही थी…
भावना ने अपने ट्यूशन के बचाये पैसो और इधर उधर से जोड़ जाड कर अपनी प्रिय सखी के लिए ये तोहफा खरीदा था..
कुसुम ने उस चेन को देखा और उसे निकाल कर तुरंत अपनी गर्दन में डाल लिया..
कुसुम की पतली सी गर्दन पर सोने की वो चेन जगमगा उठी… इस वक्त कुसुम ने गले में सिर्फ वही पहना था..
“बहुत प्यारी चेन है भावी !” कुसुम भावुक हो उठी और भावना की भी आंखे भर आयी..
दोनों सखियाँ एक दूसरे के गले से लगी सिसक उठी..
आजतक दोनों ने एक दिन के लिए भी एक दूसरे से मुलाकात ना की हो ऐसा कोई दिन नहीं गया था। लेकिन आज के बाद दोनों को ही पता नहीं था कि कब उनकी मुलाकात होगी…
कुसुम भाग कर यहाँ से दूर चली जाने वाली थी.. उम्मीद दोनों को ही थी कि कुसुम की शादी के बाद सब कुछ सामान्य हो जायेगा, लेकिन फिर भी गजदलपुर से दूर्वागंज रोज़ रोज़ तो आया नहीं जा सकता ना..?
अब पता नहीं,दोनों की भेंट मुलाकात कब होगी.. ?
कुसुम तो फिर भी यही सोच रही थी लेकिन भावना का तो प्लान ही अलग था, निनाद और उसने तय कर लिया था कि आज रात ही वो दोनों भावना की माँ को साथ लिए यहाँ से सीधे आंध्र प्रदेश चले जायेंगे..
क्यूंकि भावना को मालूम था कुसुम के भागने के बाद चंद्रा भैया की गाज उस पर और उसकी माँ पर ही गिरनी थी।
और इसलिए उसने और निनाद ने मिल कर पहले ही तय कर लिया था कि इधर कुसुम अपने घर से निकलेगी, उधर भावना निनाद के साथ निकल जाएगी..
निनाद ने अपने घर पर बात कर ली थी.. निनाद की माँ से भावना की बात भी निनाद ने करवाई थी, हालाँकि उस सारी बातचीत में निनाद ही मध्यस्थ की भूमिका निभाता चला था..
निनाद की माँ को तेलुगु के अलावा कुछ समझ नहीं आता था, और भावना को तेलुगु समझ नहीं आ रही थी.. बावजूद भावी सास बहु ने एक दूसरे के मन के तार पढ़ और समझ लिए थे..
निनाद की माँ तो अपनी होने वाली बहु के मक्खन मलाई जैसे रंग पर ही बुरी तरह रीझ गयी थी और अपनी सास की सौम्यता पर बहु रीझि बैठी थी…
भावना और कुसुम एक दूसरे के गले से लगी रो रही थी की तेज़ी से सुजाता उनके कमरे में दाखिल हो गयी..
“अरे बस बस, राजकुमारी जी, थोड़े आंसू अपनी बिदाई के लिए बचा रखना। कहीं ऐसा ना हो कि चारदीवारी से छुट्टी मिलने की ख़ुशी में आंसू ही ना टपका और जगहंसाई हो गयी.. !”
सुजाता ने दोनों को अलग किया और कुसुम का चेहरा हाथो में ले अपनी बात बोल दी..
कुसुम बिना कुछ बोले रह गयी..
“चलिए चलिए, सब सुहागने जोड़ आयी हूँ, आपको नहलाने का समय आ गया है.. !”
“हम खुद नहा लेंगे, बच्ची थोड़े ना है हम !”
कुसुम के ऐसा बोलते ही सुजाता ने उसे हाथ पकड़ कर खड़ा कर दिया..
“चलिए जल्दी, वरना पानी ठंडा हो जायेगा, और फिर कुछ देर में आपकी पार्लर वाली भी तो आ जाएगी.. !”
कुसुम के नानुकुर करने के बावजूद सुजाता उसे अपने साथ ले गयी..
भावना भी सूटकेस संभाले नीचे उतर गयी..
नीचे के बड़े आंगन के पीछे तीन तरफ दीवार से घिरा आंगन का ही एक हिस्सा था, वहाँ एक बहुत बड़े से धातु के बने कुण्ड में गरम पानी भरा गया था.. उसमे गुलाब की पंखुड़ियां तैर रही थी..
खस चंदन डाल कर उबाले गए पानी से भीनी भीनी खुशबु उठ रही थी..
उस कुण्ड के चारों तरफ घऱ परिवार की सुहागन औरते खड़ी थी..
वैसे ही तीन दिन से तेल हल्दी चढ़ा चढ़ा कर उन लोगो ने कुसुम को भयानक रूप से पीला कर दिया था..।
उस कुण्ड के बाहर बिछे पटले पर बिठा कर एक बार फिर कुसुम को तेल चढ़ा कर मंगल गीत गाते हुए उन सुहागिनों ने हाथ पकड़ कर कुसुम को उस कुण्ड में उतर दिया और उसका स्नान करवाने लगी..।
इन मंगल गीतों की मार्मिक ध्वनि सुन कर भावना की आंखे फिर भर आयी….
उसकी प्राणप्रिय सखी अब उससे हमेशा के लिए अलग होने वाली थी..।
कैसा अजीब सा मन हुआ जा रहा था..
एक तरफ कुसुम की ख़ुशी के लिए खुश भी था, दूसरी तरफ उसके बिछोह को सोच सोच कर दुःख में मरा भी जा रहा था…।
हाय रे मन…
सोचती खड़ी भावना को कुसुम ने जाने का इशारा कर दिया..
भावना ने हामी भरी और सुजाता को बता कर निकलने लगी कि कुसुम की बुआ ने टोक दिया..
“भारी बक्सा कहाँ लिए जा रही हो.. ?”
भावना कुछ कह पाती उसके पहले कुसुम बोल पड़ी..
“हमारी तरफ से भावना के लिए तोहफा है बुआ जी !”
“बक्सा भर के ? इतना तोहफा कौन देता है बिटिया ?”
“अरे वो कुछ नए कुर्ते थे, जो हमने बस दो एक बार पहने थे, तो वहीँ सब.. हम दोनों में इतना सब चलता है बुआ जी !”
“अच्छा.. अपनी उतरन दे रही हो… फिर ठीक है ! जाओ जाओ बिटिया ले जाओ.. तुम भी क्या याद रखोगी कि कितनी रईस सहेली मिली थी तुम्हे !”
बुआ जी की बात सुन अपमान से भावना की कान की लोरियां गर्म हो गयी, लेकिन उन बौड़म घुटना बुद्धि औरतों के मुहं लगना व्यर्थ था, यही सोच कर वो वहाँ से बाहर निकल गयी..।
अच्छा हुआ और किसी का ध्यान उसके चमचमाते नए बैग पर नहीं पड़ा.. उस पीले रंग के ट्रॉली बैग को खींचती वो चली जा रही थी…
धीरे धीरे कदम बढाती वो आगे निकल गयी और छूटते छूटते हवेली पीछे छूट गयी…
राहत की साँस लेकर उसने अपने कदम तेज़ी से बढ़ाने शुरू कर दिए..
चलते चलते ही उसने सरना को फ़ोन लगा दिया…
सरना से बात होने के पांच मिनट के भीतर वो लड़का तत्परता से भावना के सामने पहुँच चुका था.. बिना भावना से कुछ बोले उसने वो बैग उठाया और अपनी बाइक पर सामने रख निकल गया..
अब वो सीधे गजदलपुर के सरकारी डॉक्टर्स की कॉलोनी में ही जाकर रुकने वाला था..।
बैग के सरना द्वारा लेकर जाते ही राहत महसूस करती भावना अपने घर की तरफ बढ़ गयी…..
घऱ पहुँच कर कुर्सी पर ढह गयी वो.. उसकी अम्मा उसके शादी में पहनने वाले लहंगे का ब्लाउज तैयार कर रही थी..।
ब्लाउज पूरा तैयार हो चुका था, बस पीठ की तरफ लगने वाली डोरियाँ बाकी थी..।
उनकी भी सिलाई हो चुकी थी, लेकिन आपस में गांठ लगाने पर वो उलझ रही थी, उसी को सही करने में वो लगी थी..
हल्का पीच और सुनहरा लहंगा वाकई भावना के रंग से मिल कर उस पर बहुत खिल रहा था..
उस पर बारीक मोती के काम ने लहंगे की सुंदरता और बढ़ा दी थी..
ये लहंगा कुसुम ने ही भावना के लिए पसंद किया था..
बादामी सुनहरा मोतियों से सजा लहंगा भावना पर बहुत जंचने वाला था…
लहंगे को एक तरफ समेट कर उसकी माँ उसके लिए चाय बना लायी..
चाय का प्याला पकड़ कर उसकी घूंट भर कर भावना ने आंखे बंद कर ली..
बस कुछ घंटो में निनाद वहाँ पहुंचने वाला था और फिर भावना हमेशा हमेशा के लिए अपनी माँ को साथ लिए निनाद के साथ चली जाने वाली थी..।
इस एक ख्याल में ही कितना सुकून था..।
उसी समय भावना का फ़ोन बजने लगा..
उसने बिना देखे ही फ़ोन उठा कर बड़े प्यार से हेलो बोला.. उसे लगा निनाद का फ़ोन है.. लेकिन फ़ोन राजेंद्र का था..
“हैलो भावना.. !”
“आह.. हाँ.. डॉक्टर साहब.. आप ?”
“हाँ.. सुनो.. ये पीच कलर का कुरता तुम्हारी सहेली ने भेजा है क्या मुझे.. आज ही पार्सल मिला है, पर भेजने वाली का नाम नदारद है !”
“हाँ.. जी उसी ने भेजा है.. शादी के वक्त यही पहनना है आपको !”
राजेंद्र मुस्कुर कर रह गया…
“उनकी और मेरी पसंद बहुत मिलती है… ठीक है, सरना ने तुम्हारा भेजा बैग भी पहुंचा दिया है.. मैं आज शाम ठीक सात बजे..
” हाँ ठीक है.. हम फ़ोन रखते हैं.. !” भावना राजेंद्र और सरना तीनो को ही डर था कि चंद्रा भैया फ़ोन ना टैप करा रहे हो।
इसलिए ये लोग डर डर कर फ़ोन में बात करते थे, बस वो एक शेरनी ही निडर निशंक अपने डाक साहब को फ़ोन घुमा दिया करती थी..
लेकिन उसे भी कसम दे देकर राजेंद्र ने रोक रखा था..
हर किसी को अब शाम का इंतज़ार था…
आईने के सामने अपनी सलीक़े से ट्रिम करी दाढ़ी पर कंघी फिराते हुए खुद को देख देख कर मुस्कुराते यज्ञ को…!!
अपने कमरे में औरतो से घिरी बैठी तैयार होती कुसम को… !!
अपनी बालकनी में खड़े विचारो में खोये राजेंद्र को और
अपने घऱ के आंगन की सीढ़ियों में चाय का प्याला पीती निनाद की यादो में खोयी भावना को…!!
आज की शाम इन सब की ज़िन्दगी का नया अध्याय लिखने वाली थी….
क्रमशः
aparna…
