अपराजिता -56
अथर्व इधर कुछ समय से अस्पताल में काफी व्यस्त हो गया था, इसी बीच उसे किसी कॉन्फ्रेंस के सिलसिले में बाहर भी जाना पड़ गया था.. वैसे वो खुद भी कहीं ना कहीं ये चाह रहा था कि रेशम को अकेले में सोचने का वक्त मिल जाये..
वो रेशम की तकलीफ समझ पा रहा था…
ऐसे अचानक जब किसी लड़की की शादी हो और उसे अपना घर, अपने लोग छोड़ कर आना पड़े, तब नए घर परिवार में वैसे भी सहज होने में समय लगता है। और इस सबके साथ ही लड़कियों पर आई यह नई जिम्मेदारी कि उन्हें अपने पति की भी हर तरह से सेवा करनी है। उन्हें खुश रखना है।
उन्हें शायद कुछ ज्यादा ही स्ट्रेस में डाल जाती होगी। और शायद इसीलिए रेशम भी अथर्व के साथ सहज नहीं हो पा रही। यही सब सोच कर अथर्व ने खुद को मना लिया था और अपनी तरफ से अब उसने पहल करनी छोड़ दी थी।
हालांकि रेशम भी इस बात को समझ रही थी कि अथर्व काम से आने के बाद खाना खाकर कुछ देर उसके साथ बैठकर टीवी देखता है, और फिर करवट बदल कर चुपचाप सो जाता है।
मन ही मन उसे यह बात कचोट रही थी, लेकिन खुद से होकर पहल करने की भी रेशम की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। और इस सबके बीच उसका रिजल्ट और पोस्टिंग लिस्ट आ गई। पोस्टिंग की जगह सुनकर उसका मन खट्टा हो गया था। क्योंकि शहर से लगभग 220 किलोमीटर दूर उसकी पोस्टिंग हुई थी। इसका मतलब वह अथर्व के साथ रहते हुए अपना काम जारी नहीं रख पाएगी, और उसे उस गांव में ही जाकर रहने की जगह ढूंढनी पड़ेगी…।
इन्हीं सब सोच विचारों में दिन बीते जा रहे थे। और रेशम अपनी जाने की तैयारी में लग गई थी। इसी के साथ अथर्व को किसी कॉन्फ्रेंस में दिल्ली जाना पड़ गया और रेशम कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली आई…!
अब मायके में भी कोई भी उसके दुखद पास्ट को उसे याद नहीं दिलाता था..
उसके घर में हर किसी को यह लगने लगा था कि इन पांच सालों में रेशम अपना अतीत पूरी तरह से भूल चुकी है। यहां तक की रेशम को खुद भी अपने सुहागरात से पहले तक नहीं लग रहा था कि वह लगभग सब कुछ भूल चुकी है।
लेकिन ऐसा नहीं था। उसका अतीत अब भी अंधेरा होते ही उसके सामने चला आता था, और उसके कान में धीरे से कह जाता था” बस इतने में ही घबरा गई डॉक्टर, अभी तो मैंने कुछ किया भी नहीं!”
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उस वक्त अखंड को पुलिस ने पकड़ लिया था, और कोर्ट में उसकी पेशी भी हुई थी। लगभग 6 महीने अखंड को जेल में रहना पड़ा था। लेकिन अखंड के पिता ने शहर के सबसे महंगे वकील को खरीद लिया था, और शायद उस महंगे वकील ने जज साहब को खरीद लिया।
इसीलिए तो वह निर्लज गुंडा बेगुनाह कोर्ट से छूट गया था। हालांकि उसके छूटने के बाद भी वह कभी लौट कर यूनिवर्सिटी नहीं आया।
रेशम को उसके जेल से छूटने के बाद बस इसी एक बात की चिंता थी कि कहीं वह वापस उससे बदला लेने ना चला आए, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। और फर्स्ट ईयर के बाद रेशम के बाकी सारे साल कॉलेज में बड़े आराम से निकल गए।
अखंड नाम का साया उसकी जिंदगी से हमेशा हमेशा के लिए चला गया था, कभी वापस नहीं लौटने के लिए…..
वो अपनी सोच में गुम थी कि तभी उसकी मां उसके पास चली आई।
मुस्कुरा कर वह उसके पलंग में उसके सामने बैठ गई..
” क्या सोच रही है लाडो..?
“कुछ नहीं माँ ! तुम बताओ कैसे आना हुआ, मेरे कमरे में? यह वक्त तुम्हारा चाय बनाने का होता है, मानव ऑफिस से आने वाला होगा ना ?”
“हम्म… लेकिन तुझे कुछ खास बात बतानी थी.. !”
“हाँ बोलो ना !”
रेशम की माँ ने अपने आंचल में छुपा कर रखी एक तस्वीर रेशम के सामने पलंग पर रख दी। रेशम ने उस तस्वीर को देखा और उठाकर अपने पास ले लिया..
वह ध्यान से उस तस्वीर में खड़ी लड़की को निहारने लगी। दुबली पतली गोरी गुलाबी सी लड़की बिल्कुल शांत भाव से खड़ी थी, ना उसके चेहरे पर मुस्कान थी और ना ही आंखों में किसी प्रकार का डर संकोच या घबराहट।
अमूमन लड़कियां शादी के लिए जैसी तस्वीर भेजा करती हैं, वह लाज भारी चितवन भी उस लड़की के चेहरे पर नहीं नजर आ रही थी। लेकिन कुछ भी हो उस चेहरे में आत्मविश्वास कूट-कूट कर नजर आ रहा था। पहली झलक में ही रेशम को वह तस्वीर बहुत भा गयी…
” यह कौन है मां?”
” पहले यह बता, कि तुझे कैसी लगी?”
“लड़की तो अच्छी लग रही है ! पर है कौन ? मानव के लिए किसी ने रिश्ता भेजा है क्या?”
“हाँ.. ! तुझे मेरी सहेली मंजू याद है..?”
“हाँ मंजू मौसी मुझे याद है.. लेकिन वो तो इंदौर रहती है ना ?”
” मंजू तो इंदौर रहती है, लेकिन उसकी बुआ की एक लड़की थी..
जब बचपन में मैं मंजू के घर जाया करती थी, तब गर्मी की छुट्टियों में अक्सर उसकी बुआ की वह लड़की मंजू के घर आया करती थी। तब मैं उससे मिली हूं।
कमला नाम है उसका। बहुत भली सी लड़की थी। बहुत सीधी-सादी आठवीं तक पढ़ पाई थी, और उसके बाद ही उसके पिता ने उसकी शादी कर दी थी। मंजू और मंजू के माता-पिता ने बहुत विरोध किया, लेकिन उसकी बुआ और फूफा जी नहीं माने। उसके फूफा जी की तबीयत सही नहीं रहा करती थी, और इसीलिए शायद वह अपनी बेटी की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहते थे। और मुक्ति भी कैसे हुई कि सिर्फ उच्च कुल का ब्राह्मण लड़का देखा और हाथ पीले कर दिए।
लड़के के पास ना नौकरी थी, ना रुपया पैसा। खेत थे, लेकिन खेत बेचकर कोई अनाज तो नहीं खाता ना। अब कुछ बीघा जमीन का कोई क्या ही कर लेगा।
खैर मंजू की उस बहन ने बहुत बुद्धिमानी से अपनी गृहस्थी चलाई…
उसकी एक ही बेटी हुई। उसके बाद उसके ससुराल मायके सब ने कहा कि एक बेटा कर लो, लेकिन कमला ने किसी की नहीं मानी। उसने कहा बेटा बेटी सब यही है मेरे लिए। मैं इसे ही अच्छी परवरिश दे दूं, वही बहुत है। सुना है उसके पति बहरीन चले गए थे, काम करने के लिए। और फिर अच्छा कमाने लग गए ।
लेकिन कमला और उसकी बेटी कभी दुबई नहीं गए। दोनों गांव में ही रहते हैं। कमला की बेटी बहुत होशियार है। पढ़ना भी चाहती है, लेकिन गांव में अपनी मां को छोड़कर शहर जाकर अकेले पढ़ना नहीं चाहती। मुझे फोन पर मंजू ने यह सब बताया, और उसी ने लड़की की तस्वीर भेजी। लड़की अभी सेकंड ईयर में है ।मुझे तो एक झलक में ही बहुत पसंद आ गई ।
इसका नाम भावना है। अगर कमला राजी हो जाती है, और मानव और तेरे पापा को भी कोई एतराज नहीं होता तो इस लड़की को अपनी बहू बनाना चाहती हूं। गरीब घर की सीधी साधी सी लड़की है ।
पढ़ने लिखने वाली बच्ची है, हमारे घर आ जाएगी तो तेरी जगह भर जाएगी। तेरे जाने के बाद पता नहीं क्यों कुछ अच्छा ही नहीं लगता रेशु।
घर काटने को दौड़ता है। खाना तक बनाने का मन नहीं करता। कभी-कभी शाम हो जाती है,और मैं लाइट जलाना भूल जाती हूं। मानव आता है, और तब वह खाना बनाता है।
यह आ जाएगी तो मेरा मन लग जाएगा..।”
” अभी सेकंड ईयर कर रही है, तब तो छोटी है मां। इतनी जल्दी क्या है शादी की..!”
” शादी की कोई जल्दी नहीं है रेशम, लेकिन अगर दोनों घर परिवार मंजूर कर लेंगे तो सगाई करके छोड़ देंगे। फिर अगर वह चाहेगी तो यहां शहर में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर लेगी। जितना और जो जो पढ़ना चाहेगी सब कर लेगी। उसके बाद ही शादी करके अपने घर लाऊंगी। समझी! जब बेटी को इतना पढ़ाया है, तो बहू अनपढ़ कैसे ले आऊंगी भला..?”
रेशम ने प्यार से अपनी मां के गले में बाहें डाल दी..
” कभी-कभी मुझे लगता है मुझे कितने प्यारे पैरेंट्स मिले हैं..!
रेशम ने अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि मानव वहाँ चला आया..
“काश, मैं भी यह बात अपनी बहन के लिए कह पाता..!”
“अच्छा.. ? मतलब ?”
“मतलब चुड़ैलों का इस बात से कोई संबंध नहीं है.. !”
रेशम बनावटी गुस्सा दिखाते हुए मानव को मारने के लिए झपटी और उन दोनों को हंसते खिलखिलाते छोड़ रेशम की मां नीचे चाय चढ़ाने चली गई…
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अखंड ने सरपंच पद के लिए आवेदन भर दिया था..
वैसे तो फॉर्म भरने के बाद लगभग 2 से 3 महीने का समय चुनाव प्रचार के लिए मिल ही जाया करता था लेकिन कुछ अपरिहार्य कारणों से चुनाव पन्द्रह दिन बाद ही होने थे..
अखंड का चुनाव में खड़ा होने का मन ही नहीं था.. इसलिए वह किसी तरह से भी चुनाव प्रचार में भाग नहीं लेना चाहता था। लेकिन उसके पिता चाहते थे कि, इस बार गांव का सरपंच अखंड परिहार बने। और बस इसीलिए उसे चुनाव में खड़ा होना पड़ा था।
घर में छोटे भाई की शादी भी थी। उसकी भी तैयारी करनी थी। लेकिन अखंड का किसी काम में मन लगता तब तो वह कुछ करता ।इसीलिए वह हर एक काम से अपने आप को अलग ही रखा करता था। लेकिन उसकी यही तटस्थता देखकर शायद उसके पिता उसे सक्रिय करने के लिए ही सरपंच का चुनाव लड़ा रहे थे। और उसके पीछे पड़ पङ कर उन्होंने उसकी रैलियां भी शुरू करवा दी थी।
अखंड बोलने में तो शुरू से ही ओजस्वी था, बुद्धि पराक्रम शौर्य किसी में भी वह पीछे नहीं था। एक जमाना था जब वह पूरी यूनिवर्सिटी का राजा हुआ करता था।
उसकी दबंगई के किस्से मशहूर थे। लेकिन एक घटना ने उसे बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया था।लेकिन उसके पिता उसे वापस एक बार फिर वही 5 साल पहले का अखंड परिहार देखना चाहते थे।
और शायद इसीलिए उन्होंने उसे वापस पहले जैसा बनाने के लिए अपना पहला कदम बढ़ा लिया था…
दूर्वागंज और मानौर जुड़े हुए गांव थे.. इसी से मानौर के सरपंच के अधीन ही दूर्वागंज और बाक़ी के आठ दस गांव आते थे….
घर की औरतें, नौकर चाकर जहां यज्ञ की शादी की तैयारी में जुट गए थे, वही अखंड अपने पिता और बाकी कार्यकर्ताओं के साथ चुनावी तैयारी में लग गया था..
ऐसा लग रहा था, पूरा मानौर अपने बड़े ठाकुर के लड़के की शादी की ख़ुशी में मग्न हो गया है.. बड़े ठाकुर खुद अपने छोटे बेटे की शादी से खुश थे, लेकिन कहीं ना कहीं उनका लाडला अखंड बैरागी हुआ फिर रहा था, और यही बात उन्हें अंदर से दुखी किये दे रही थी।
अपने बाबूजी की इच्छा का मान रखने के लिए हार थक कर अखंड और उसके लड़के चुनावी रैली में लग गए थे..
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कुसुम के घर पर भी तैयारियां चल रही थी..
वो अपने कमरे में लेटी किसी पत्रिका के पन्ने पलट रही थी कि उसकी भाभी उसके कमरे में चली आई राजकुमारी जी अब इन किताबों पर से अपना ध्यान हटा लीजिए। अब आपका ध्यान अपने ब्याह की तैयारी पर जाना चाहिए, ज्यादा वक्त नहीं बचा है। अब आपको अपनी शादी का जोड़ा पसंद कर ही लेना चाहिए..।”
” आप कर लीजिए ना भाभी, आपके पसंद पर हमें पूरा भरोसा है.. आप जो जोड़ा हमें चुन कर देंगी, हम आंख मूंदकर उसे पहन लेंगे..!”
” सच में? कहीं बाद में बिदक तो नहीं जाएंगी कि हमें यह रंग नहीं भाता, हमें वह रंग नहीं भाता। ऐसा तो नहीं करेंगी ना..?”
“नहीं बिलकुल नहीं.. आप हम पर पूरा भरोसा कर सकती हैं..!”
” लाडो रानी हमें तो आपका पूरा भरोसा है। चलिए नीचे बनारसी साड़ी की दुकान वाले को बुलाकर अम्मा जी ने बैठाया हुआ है। और हमें आपको लेकर आने के लिए भेजा है। चलकर देख लीजिए कौन सी साड़ी आपको रखनी है, कौन सी नहीं..।”
” अरे भाभी इस सब जोड़-तोड़ की क्या जरूरत? हम कौन सा साड़ी पहनने वाले हैं ब्याह के बाद..!”
” काहे ? ठाकुरों के यहां तो अब भी साड़ी ही पहनी जाती है.. फिर आप क्या अपना यही भेस भूषा पहन कर घूमेंगी अपने हवेली में..!”
“हाँ फिर ? हम भी ठकुराइन हैं। आखिर हम भी देखेंगे किसकी हिम्मत है जो हमें हमारी पसंद के कपड़े पहनने से रोक सके..!”
” वह जबकि जब देखिएगा, चलिए अभी अपना बनारसी लहंगा दुपट्टा पसंद कर लीजिए। फिर टेलर बाबू को भी बुला कर बैठा रखा है। उन्हें नाप दे दीजिएगा। घर के घर में ही सिलाई करके कपड़ा लत्ता छोड़ जाएगा। आपको 51 साड़ियां चढ़नी है तो, 51 ब्लाउज भी तो उसे सिलना होगा। अब ज्यादा वक्त नहीं बचा..!”
“थोड़ी कम नहीं है साड़ियां ?” कुसुम खिलखिला कर हंस पड़ी..
इस पूरे घर में सिर्फ उसे ही मालूम था कि वह यज्ञ की हवेली में दुल्हन बनकर नहीं पहुंचने वाली है, बल्कि उसका निवास गजदलपुर की डॉक्टर्स कॉलोनी होने वाला है।
और जहां वह अपनी मर्जी की मालिक होगी। ना उसे किसी कायदे में बंधना होगा ना कोई कानून उसे रोक पाएगा।
अपने सपनों के आशियाने में वह अपने डॉक्टर बाबू के साथ मिलकर प्यार भरे रंग भरेगी..।”
” क्या सोच सोच कर मुस्किया रही हैं, चलिए नीचे..!”
“चलिए भाभी.. आप हमे बिना संग लिए नहीं टरने वाली !”
कुसुम मुस्कुरा कर सुजाता के कंधों पर झूल गई। और दोनों नंद भाभी एक साथ सीढ़ियां उतरकर नीचे चली आई।
सामने फैले साड़ियों के अंबार में से बिना मन के ही कुछ एक साड़ियां कुसुम ने पसंद करके एक तरफ रख दी। इसी वक्त भावना भी वहां चली आई।
भावना को देखते ही कुसुम के साथ-साथ सुजाता और कुसुम की अम्मा भी खुश हो गई ।
कुसुम की अम्मा ने उनमें से निकाल कर चार साड़ियां भावना को भी थमा दी।
भावना के लाख मना करने के बावजूद कुसुम की माँ नहीं मानी और एक बनारसी और तीन शिफॉन की नाजुक सुंदर रंगों वाली साड़ियां उन्होंने भावना को बतौर भेंट सौंप दिया..
उन चारों साड़ियों में से एक धानी रंग की साड़ी खुद भावना को भी बहुत पसंद आ गई थी। ऊपर धाणी साड़ी में नीचे थोड़ा सा नारंगी रंग मिला हुआ था और उन दोनों रंगों का कलात्मक संयोजन साड़ी को अपूर्व छटा से सुशोभित कर रहा था।
साड़ी को अपने गाल से लगाकर भावना खुद को उस साड़ी में देखने लगी थी। उसका मन किया कि घर जाकर एक बार इस साड़ी को खुद से लपेट कर देख ले कि वह कैसी दिख रही है और तभी अचानक उसके मन में यह विचार आया कि इस साड़ी को पहनकर एक तस्वीर खींचकर वह निनाद को भी भेजेगी, और उससे पूछेगी कि वह कैसी लग रही है?
मन में यह विचार आते ही भावना का चेहरा लाज से गुलाबी हो गया, और उसके चेहरे की यह रंगत उसकी सखी कुसुम से छिप नहीं पाई ।
कुसुम उसकी ठीक बगल में ही बैठी थी। उसने भावना की तरफ देखा और धीरे से उसे कोहनी मार दी। भावना कुसुम की तरफ देखने लगी..
“क्या हुआ ?”
“यही तो हम पूछ रहे, क्या हुआ ?” भावना के सवाल पर कुसुम ने पलटवार कर दिया और भावना के जवाब में ना में गर्दन हिलाने पर कुसुम उसे साथ लेकर अपने कमरे की तरफ निकल गई..
” अम्मा अब बाकी की खरीदारी तुम और भाभी मिलकर देख लो। हम भावना के साथ अपने कमरे में जा रहे हैं..!”
“ठीक है.. तुम दोनों के लाने चाय नाश्ता भिजवाते हैं.. !”
कुसुम ने मुस्कुरा कर हामी भरी और भावना को साथ लिए सीढ़ियां चढ़ गयी…
क्रमशः
aparna..
