अपराजिता -52
सबसे छुपाते छुपाते तेजी से आगे बढ़ती कुसुम ने अपनी बाइक नहीं निकाली, बल्कि मुख्य द्वार से बाहर निकाल कर वह तेजी से एक तरफ बढ़ने लगी। इसके साथ ही उसने भावना को फोन भी मिला लिया..
” कहां हो भावना?”
” घर पर ही है, क्या हुआ?”
” कुछ नहीं, हमें डॉक्टर साहब से मिलने जाना था। हम उनकी डिस्पेंसरी की तरफ जा रहे हैं, तुम आ पाओगी क्या?”
भावना ने अपने माथे पर अपना हाथ मार लिया।
” तुम पगला गई हो क्या कुसुम? इस वक्त तुम्हारा घर से निकलना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है यार, समझा करो। अपने घर पर ही रहो।”
” भावना! डॉक्टर साहब ने जैसी आवाज में हमें बुलाया है ना, हमसे उनकी बात काटते नहीं बना। घर पर वैसे भी बुआ जी और कुछ मेहमान आ गए थे। घर के लोग उन्हीं सब में व्यस्त हैं। हम सिर्फ 10 मिनट में डॉक्टर साहब से मिलकर आ जाएंगे।”
” तुम्हारा 10 मिनट हम अच्छे से जानते हैं कुसुम। तुम ना एक दिन हमारी जान लेकर रहोगी।”
” आ रही हो ना?” कुसुम ने मुस्कुरा कर पूछा
” तुम मरो वहां जाकर।” भावना बिलख पड़ी
“मतलब नहीं आ रही हो?”
” नहीं आएंगे तो जाएंगे कहां? तुम भी मरोगी और हम भी तुम्हारे साथ ही मरेंगे, आ रहे हैं रुको..।”
कुसुम मुस्कुरा कर झील तक पहुंच गई और वहां रुक कर भावना का इंतजार करने लगी। झील का रास्ता सीधा डिस्पेंसरी की तरफ जाता था, और झील के दूसरे तरफ से एक तरफ भावना और दूसरी तरफ कुसुम का घर था..
पलक झपकते दौड़ती भागती भावना भी अपने दुपट्टे को संभालती हुई कुसुम के पास पहुंच गई। कुसुम के पास आकर खड़े होने के बाद वह उसका हाथ पकड़ कर हांफने लगी। उसके माथे से पसीना बह रहा था। कुसुम ने उसके माथे को प्यार से पोछ कर उसे अपने गले से लगा लिया…
“हम जानते थे, तुम जरूर आओगी!”
भावना ने कुसुम को घूर कर देखा।
” हमें समझ नहीं आता कि तुम हमारी दोस्त हो या दुश्मन? अरे अगर हमारी जान ही लेना चाहती हो तो साफ-साफ हमें जहर दे दो ना यार, क्यों ऐसे बात बात पर हमारा दिल धड़का कर हार्ट फेल करने पर तूली हुई हो।
तुम्हारे चंद्र भैया ने, देखा नहीं उस दिन कैसे हमारी बेइज्जती की थी.. ।”
“माफ कर दो ना भावी, उस बात के लिए हम कान पड़कर तुमसे माफी मांगते हैं।”
“चलो चलो अब ज्यादा नौटंकी मत करो। किसी ने रास्ते में खड़े देख लिया ना, तब भी बवाल हो जाएगा। और अपने इस नूरानी चेहरे को दुपट्टे से ढक लो वरना कोई कहीं पहचान न जाए।”
वह दोनों लड़कियां अपने चेहरे को दुपट्टे से अच्छे से बांधकर झील के किनारे किनारे चलती हुई आगे बढ़ने लगी..
कुछ ही देर में डॉक्टर साहब की डिस्पेंसरी नजर आने लगी। डिस्पेंसरी देखते ही कुसुम के चेहरे पर मुस्कान छा गई। वह तेजी से भागती हुई डिस्पेंसरी तक पहुंच गई। डिस्पेंसरी का दरवाजा लगा हुआ था, उसने धीरे से दरवाजे पर अपना हाथ रखा और दरवाजा खुल गया।
वह दरवाजे से भीतर चली गई कुछ ही देर में भावना भी वहाँ पहुंच गई।
उसने देखा डिस्पेंसरी से दूर हट कर ट्यूबवेल लगा हुआ था। उसी ट्यूबवेल की मुंडेर के पास सरना बैठा किसी सींक के छोटे छोटे टुकड़े कर रहा था। भावना सरना को वहां बैठे देखकर समझ गई कि अंदर राजेंद्र मौजूद है।
इधर कमरे के दरवाजे से जैसे ही कुसुम अंदर दाखिल हुई, किन्हीं दो मजबूत बाहों ने उसे खींचकर अपनी आगोश में ले लिया।
दो तड़पते दिल जैसे बरसों बाद एक दूसरे के सीने से लगे सांस ले रहे थे।
एक दूसरे की सांसों की आवाज भी कानो में रागिनी घोल रही थी..
उठती गिरती धड़कने जैसे एक दूसरे की तड़प को समझ कर उसे और बढ़ा रही थी…
दोनों के दिलो की प्यास एक सी थी, और जिसे बाहर का कोई समझ भी नहीं सकता था..
दोनों की ज़बान बंद थी लेकिन उनके शरीर का रोआँ रोआँ एक दूसरे से अपना हाल कह रहा था..
कुसुम के आंसू से भीगे चेहरे को राजेंद्र ने अपनी हथेली में लेकर चूम लिया..
“अब रोने के दिन नहीं है कुसुम… हमारे सुरक्षित भविष्य की नींव खोद आया हूं। जिला चिकित्सालय में अपनी नौकरी की भी बात कर ली है, और शहर में रहने की जगह भी देख ली है। 10- 12 दिन बाद मुझे ज्वाइन करने जाना है। बस फिर मैं इस गांव को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ जाऊंगा। और उसके बाद हमारी शादी के दिन पर सीधा तुम्हें लेने आऊंगा। और उसके बाद हम कभी नहीं बिछड़ने के लिए एक हो जाएंगे..! मेरा साथ देने को तैयार हो ना ?”
” यह भी कोई पूछने की बात है डाक साहब?”
“तुम्हारा घर परिवार, तुम्हारी आन बान के सामने मैं बहुत छोटा हूँ.. कहीं आगे जाकर कभी तुम्हे अफ़सोस तो नहीं होगा ना… मुझ पर भरोसा करती हो ना ?”
“आप पर तो खुद से ज्यादा भरोसा है डाक साब,जभी ना अपना घर दुवार अम्मा बाबू सब को छोड़ने को तैयार हो गए हैं… अब बस दिन गिनने है कि कब हम, सब कुछ छोड़ कर आपके हो जायेंगे !”
दोनों ही एक दूसरे की बाँहों में खोये अपने स्वर्णिम भविष्य के ताने बाने बुनने में व्यस्त थे और उधर चंद्रा भैया के कानो तक कुसुम के घर से निकलने की बात पहुँच गयी..
गुस्से में चंद्रा ने अपनी गाड़ी निकली और राजेंद्र की डिस्पेंसरी की तरफ बढ़ा दी..
दरवाज़े के ठीक बाहर खड़ी भावना को दूर से ही चंद्रा भैया की गाडी नजर आ गयी और वो धड़धड़ा कर दरवाज़ा खोल कर अंदर घुस गयी..
सरना को अचानक कुछ समझ नहीं आया..
वो जब तक में कुछ समझ पाता, तब तक में चंद्रा भैया की गाडी वहाँ पहुँच गयी..।
चंद्रा भैया के गुर्गे ने गाडी से उतर कर सरना की कॉलर पकड़ी और उसे खींच कर चंद्रा भैया तक ले आया….
चंद्रा ने सरना को खा जाने वाली नजर से देखा..
“डॉक्टर अंदर है ?”
सरना ने आंखे चौड़ी कर चंद्रा को ऐसे देखा जैसे उसे नहीं पता कि राजेंद्र अंदर है या नहीं..
“क्या हुआ ? हम क्या बोल रहे, नहीं समझ आया क्या ?”
सरना ने ना में गर्दन हिला दी…
और चंद्रा एक छलांग लगा कर जीप से कूद कर बाहर आ गया… तेज़ तेज़ कदम बढ़ाते हुए वो डिस्पेंसरी के दरवाज़े तक पहुँच गया..
सरना की सांस गले में कहीं अटक कर रह गयी थी..
उसे ऐसी घबराहट होने लगी जैसे कोई उसके सीने में हाथ डाल कर उसका कलेजा मरोड़े दे रहा हो.. माथे पर पसीना छलक आया..
उसे खींच कर पीछे करता चंद्रा का गुर्गा खुद आगे बढ़ गया…
चंद्रा दरवाज़े पर पहुंचा और तेज़ी से दरवाज़े को अंदर धकेल कर खुद दाखिल हो गया..
अंदर पहुँच कर चंद्रा की आंखे फ़ैल गयी..
क्रमशः
aparna..
