अपराजिता -49
एक बार को दिमाग में ये बात आयी कि कहीं मोबाइल नंबर ट्रेक कर ये मेरी हरकतों पर नज़र रखने की साज़िश तो नहीं। लेकिन फिर उस आदमी का रंग रूप देख कर लगा नहीं कि वो इतना टेक्नोफ्रेंडली होगा..। और वैसे भी अब कोई कुछ भी कर ले..।
मैंने ठान लिया है, शादी तो अब मैं कुसुम से ही करूँगा.. चाहे जान ही क्यूँ ना चली जाये.. !”
सीढ़ियों पर उसी समय पायल की रुनझुन सुनाई पड़ी, और सरना और राजेंद्र उस तरफ देखने लगे..
हाथ में खाने की थाली लिए गेंदा ऊपर चली आई..
उसने आकर उन दोनों के बीच एक ही थाली रख दी।
थाली में चार मोटी मोटी घी लगी रोटियां थी। गुड था, हरी मिर्च और प्याज था, और साथ ही मेथी का साग रखा था।
खाने की थाली देखते ही राजेंद्र को अपनी सोई हुई भूख याद आ गई।
पिछले जाने कितने दिनों से उसने ढंग से कुछ खाया नहीं था। लेकिन आज उसने मन ही मन जब से यह तय कर लिया था कि अब वह कुसुम कुमारी से ही शादी करेगा, उसकी भूख भी जाग गई थी।
उसने बड़े प्यार से थाली अपनी तरफ सरका ली और खाने लगा।
सरना भी उसी थाली में से खाने लग गया।
सरना ने गेंदा की तरफ देखा। गेंदा उसका इशारा समझ गई, और वापस लौट कर नीचे से दो लोटे भर कर पानी और छांछ ऊपर ले आई..
“तू भी बैठ जा.. कब तक खड़ी रहेगी।
सरना ने गेंदा से कहा और गेंदा चुपचाप अपने दुपट्टे से हाथ पोछती उन दोनों को देखने लगी।
” आप लोगों के लिए और रोटी ले आए?”
राजेंद्र ने गेंदा की तरफ देखकर ना में गर्दन हिला दी..
और वो वहीँ ज़मीन पर अपने पैर मोड़े उन पर बाजू लपेटे बैठ गयी….
गेंदा राजेंद्र से लगभग 5 साल छोटी थी। उसे आज भी अपना बचपन अच्छे से याद था।
जब छोटी सी थी, तब अक्सर राजेंद्र के दादाजी प्यार प्यार में उसे अपने घर की बहू कहा करते थे। और कोई इस बात को गंभीरता से ले या ना ले लेकिन उस बालिका के मन में यह बात बहुत गहरे कहीं पैठ गई थी कि वह राजेंद्र की दुल्हन है, और बड़ा होने के बाद राजेंद्र उसी से शादी करेगा।
इसलिए जब भी राजेंद्र कॉलेज के दिनों में अपनी छुट्टियों में अपने घर आया करता था, वह अपनी मां के बनाए व्यंजन उसके लिए पहुंचाने से पीछे नहीं चूकती थी।
किसी ना किसी बहाने वो राजेंद्र के घर जाती रहती थी। जब उसके दादाजी जरा ज्यादा बुजुर्ग हो गए और बीमार रहने लगे तब उसने स्वयं ही बिना किसी के बोले उनकी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी।
दोनों वक्त उनके घर आकर घर को झाड़ना बुहारना, साफ सफाई करना और उनके लिए खाना बनाकर उन्हें खिलाकर जाना, यह काम वह स्वयं अपनी मर्जी से करने लगी थी..।
गेंदा की मां उसकी इन हरकतों को देख कर मुस्कुरा उठती थी।
वह भी समझती थी कि उसकी बेटी के मन में क्या चल रहा है ?
राजेंद्र जैसा लड़का वैसे भी किस मां को नापसंद होगा?
उनकी जात बिरादरी में इतना पढ़ा-लिखा लड़का मिलना भी परम सौभाग्य की बात थी ,और राजेंद्र सिर्फ पढ़ा लिखा ही नहीं बल्कि सुंदर और सुशील भी था…
लेकिन आज दीपक और राजेंद्र के बीच चलती सारी बातें गेंदा ने सीढ़ियों पर खड़े खड़े सुन ली थी..
उसे कुसुम को देख कर खटका सा हुआ तो था, लेकिन उसने अपने मन को ये समझा लिया था की राजेंद्र समझदार है।
और वो कभी भी चंद्रभान जैसे खूंखार आदमी की बहन के बारे में नहीं सोचेगा।
उसे मालूम था कि राजेंद्र जितना पढ़ा लिखा है, उतना ही तेज दिमाग वाला है। कुसुम को देखकर तो वह पहली नजर में भांप गई थी कि कुसुम राजेंद्र के प्यार में बुरी तरह से पागल है।
आखिर वह भी तो एक औरत थी, और दूसरी औरत के दिल का हाल उससे कैसे छुपा रहता भला।
आखिर वह दोनों एक ही मर्ज की मरीज जो थी।
लेकिन आज जब उसने राजेंद्र के मुंह से यह बात सुनी कि वह भी कुसुम से ही शादी करेगा, उसकी आस टूट गई थी। उसका वो सपना जो बचपन से उसने जागती आंखों से रात दिन देखा था कि वह 1 दिन राजेंद्र की दुल्हन बनेगी, टूट गया था।
और टूटा भी तो ऐसी बुरी तरह से कि उसके टुकड़े बिन कर सहेजने का भी वक्त उसके पास नहीं बचा था..।
उन दोनों ही लड़कियों ने राजेंद्र से प्यार किया था, टूट कर प्यार किया था…
और शिद्दत से प्यार किया था!
लेकिन दोनों के प्यार में एक अंतर था! कुसुम ने डॉक्टर राजेंद्र कुमार से प्यार किया था! एक ऐसे युवक से जिसका भविष्य पूरी तरह सुरक्षित था। जिसके संग जीवन आसान और सुखमय था। लेकिन वह तो राजेंद्र से तब से प्यार करती थी, जब वह सिर्फ दस साल का बालक था।
जो उसकी मां की कपड़ों के अंदर रूई भर भर कर सिल कर बनाई हुई बॉल से फुटबॉल खेला करता था।
भूख लगने पर भागकर उसके घर के पास चला आता था रोटी मांगने।
उसकी थाली में उसकी जूठी रोटी उठा कर भाग जाता था।
उस समय उस बालक का न कोई भविष्य था और ना ही कोई वर्तमान।
फिर भी गेंदा ने उसी से अपना दिल लगा लिया था। और ऐसे लगाया था कि अपना सारा जीवन उसी के साथ देखती चली आई थी।
आज उसका बचपन का सपना टूट गया था। बचपन का प्यार उस से छूट गया था, लेकिन कितने आश्चर्य की बात थी कि उस की आंखों से एक बूंद राजेंद्र और सरना के सामने नहीं गिरा। अपने प्यार को कमजोर नहीं होने देना चाहती थी वह।
वह चुपचाप खड़ी थी। राजेंद्र का खाना समाप्त हो गया और सरना ने थाली एक तरफ सरका दी।
गेंदा थाली को उठाने के लिए झुकी और राजेंद्र ने उसके हाथ से थाली ले ली..
“मैं रख दूंगा गेंदा.. !”
“नहीं.. हम करेंगे! अब यह हक कम से कम हमसे मत छीनिये।”
और गेंदा राजेंद्र की थाली उठाकर नीचे चली गई। राजेंद्र उसकी बात का अर्थ समझ नहीं पाया।
वैसे भी इस वक्त वह अपनी मुश्किलों में इस कदर उलझा हुआ था कि उसके पास किसी और की जटिलताओं को समझने का समय भी नहीं था। उसने सरना की तरफ देखा और चुपचाप लेट गया….
वो अभी कुछ और ज्यादा सोचना नहीं चाहता था…
******
भावना वीडियो कॉल पर थी..
वीडियो कॉल अचानक स्विच हुआ था, वो ध्यान से देख रहीं थी कि तभी उसे किसी की शक्ल वहाँ नज़र आने लगी लेकिन…
वो बड़े ध्यान से देखने लगी..
नहीं ये उसके पिता तो नहीं थे… ये तो कोई उसी की उम्र का लड़का नज़र आ रहा था..
ज्यादा से ज्यादा दो चार साल बड़ा होगा..
वो भी बड़े ध्यान से उसे ही देख रहा था..
लड़का सांवला था, बड़े से माथे पर उसके बाल बिखरे पड़े थे.. लम्बी सी गर्दन पर उसकी स्पोर्ट्स टीशर्ट का कॉलर नज़र आ रहा था…
लड़के की आंखें कुछ ज्यादा बड़ी थी जिन पर उसने चश्मा लगा रखा था..
चेहरें में बाकी कुछ ख़ास नहीं था..
लेकिन उसकी आंखें बोलती हुई सी लग रही थी..
वो अपनी बड़ी बड़ी पलकों को बीच बीच में झपकते हुए भावना को देख रहा था..
“तुम कौन हो ?”
भावना ने सवाल कर दिया..
वो लड़का अचानक पूछे गए सवाल का जवाब नहीं दे पाया..
शायद भावना के चेहरें की मासूमियत देख कर वो जो कहना चाहता था वही भूल बैठा था..
भावना नहीं जानती थी की वो लड़का उससे बात करने के लिए कितने दिनों से तैयारी कर रहा था, लेकिन उसे एक झलक देखने के बाद वो सब भूल भाल गया था..
“ओह्ह हेलो… हो कौन तुम ?”
“जी मैं.. वो….. सॉरी.. !”
“क्यूँ… सॉरी क्यूँ बोल रहें हो.. गलत नंबर लगा बैठे हो क्या.. ? हमारे बाबूजी कहाँ है ?”
“अशर्फी लाल जी की बेटी हैं ना आप ?”
“हाँ… लेकिन बाबूजी हैं कहाँ.. ?”
“अअअहहह… हम्म.. वो हैं, यहीं हैं… दरसअल मैं और आपके फादर साथ ही काम करते हैं….
हम दोनों रहते भी साथ हैं… !”
“अब तक आप हमसे बात कर रहें थे.. ?”
“नहीं… आपके फादर ही बात करते हैं आपसे.. वो तो अचानक उन्हें मैनेजर ने बुला लिया इसलिए वो फ़ोन मुझे पकड़ा कर गए और आपका वीडियो खुल गया..
बस.. !”
“आपका नाम ?”
“पी निनाद !”
“दक्षिण भारत से हैं ?”
“हम्म.. आंध्रा से.. अमलापुरम !”
“कब से हैं आप वहाँ ? आप बाबूजी के साथ रहते हैं ?”
“हम्म… मैं पांच साल से हूँ.. जबसे आया अशर्फी जी के साथ ही..
“हम्म… ठीक है, बाद में बात करती हूँ… अभी सहेली के घर पर हूँ !”
“ओके… टेक केयर ! अपना ध्यान रखना !”
.
भावना ने हामी भरी और फ़ोन काट कर कुसुम के पास चली आई..
अभी उसके दिमाग में कोर्ट कचहरी ही घूम रहा था.. उस पर ये लड़का जाने कहाँ से आ टपका..
निनाद… ! पता नहीं कौन है ? बाबूजी क्यूँ इसके साथ रह रहें.. ? क्या ज़रूरत किसी अनजान के साथ रहने की ?
अगली बार बाबूजी से ही पूछूँगी..
सोच कर भावना कुसुम से विदा लेकर अपने घर चली गयी…
अगली सुबह उसे राजेंद्र के पास जाना था..
उसने सरना को फ़ोन कर के बता दिया कि राजेंद्र को लेकर उसे कहाँ पहुंचना है..?
भावना बुद्धिमती थी, उसे शक था कि कहीं चंद्रा भैया उस पर नज़र ना रख रहें हो इसलिए उसने सीधे राजेंद्र के घर जाना सही नहीं समझा और अगली सुबह अपने कॉलेज के लिए निकल गयी….
भावना का अंदाज़ा सही ही था.. रास्ते में उसे चंद्रा भैया के गुर्गे दिख भी गए.. पर उसके बगल से होकर वो लोग सीधा निकल गए और वो कॉलेज में दाखिल हो गयी..
कॉलेज के पिछले गेट से अपना चेहरा अच्छी तरह से ढांक कर वो बाहर निकल गयी..
उसे शहर जाने की बस तुरंत ही मिल गयी… और बस पकड़ कर वो सीधे मजिस्ट्रेट कार्यालय पहुँच गयी..
उसने खुद को भली प्रकार छुपा रखा था..
वो बाहर वेटिंग लाउंज में बैठ गयी…
और कुछ देर बाद ही सरना के साथ राजेंद्र वहाँ पहुँच गया..
दोनों अंदर दाखिल हो गए..
मजिस्ट्रेट सर के पास उन दोनों ने आवेदन दे दिया..
लेकिन चूंकि ये आवेदन ही ऐसे का ऐसा अख़बार में छापना था, इसलिए कुसुम राजेंद्र और भावना ने यही सोचा की नाम भावना का लिखवा देंगे..
इसलिए वहाँ आवेदन में कुसुम कुमारी जो भावना नाम से जानी जाती है ने राजेंद्र पिता चरण दास के साथ विवाह प्रस्तावित किया है…
ऐसा आवेदन डाल दिया!!!
क्रमशः
aparna
