अपराजिता -48
भावना और कुसुम की बातचीत के बीच ही कुसुम की अम्मा एक थाली भर कर मिठाईयां लिए ऊपर चली आयी..
उनके मन की ख़ुशी उनके हर ओर छोर से बह रही थी.. चेहरा उल्लास से उद्भासित था..
आते ही उन्होंने शुद्ध घी की बनी बालूशाही उठा कर भावना के मुहँ में ठूंस दी..
“वही हम कहें, बामन कन्या का पांव हमारे घर पड़े
और शुभ कारज ना हो ऐसा कैसे संभव है ?
कुसुम.. तुम्हारे ब्याह का दिन पक्का हो गया है बिटिया… अब अपने सासरे जाकर भी ऐसे ही राज करना..
ख़ूब खुसी रहो !”
कुसुम ने अजीब सी नज़रों से अपनी माँ की तरफ देखा, जैसे अपने मन की हर व्यथा, हर पीड़ा कह देना चाहती हो….
लेकिन उसकी अम्मा की बगल में खड़ी भावना ने ना में गर्दन हिला कर उसे दुबारा किसी भी तरह की बेवकूफी करने से रोक दिया…
“कैसी रीत है संसार की, पैदा करने का दर्द माँ सहती है, अपना पेट काट कर भी अपनी बिटिया का पेट पालती है, और एक दिन जब उसकी चिरैया के पंख फैलते हैं वो अपनी ही माँ का घर छोड़ कर सदा सदा के लिए चली जाती हैं… क्यूँ बनी है ऐसी रीत.. ?”
कुसुम भी अपनी माँ की बात सुन भावुक हुई जा रही थी….
“जब कुसुम पैदा हुई हमारी सास का कलेजा फट गया था कि बिटिया भयी है.. इसके बाबूजी को भी कोई खास खुसी ना हुई लेकिन हम खुस थे, बहुत खुस..।
उस समय लगा जो कुछ हम अपने जीवन में ना कर पाए, सब अपनी लङ्कोर के लिए करेंगे… अच्छे से अच्छा खिलाएंगे, अच्छे से अच्छा पहनाएंगे..।
अपने सारे सपने इसी पर सज़ा लेंगे..।
जानती हो भावना, जब चंद्रा और कुसी छोटे थे, अम्मा जी यानी हमारी सास दोनों बच्चों के लिए दूध नहीं निकालने देती थी.. ।
दूध पियेगा तो सिर्फ चंद्रा.. कहती थी लड़कियां मोटा जाती है दूध मलाई खा कर..।
सच कहें तो इत्ता गुस्सा आता था सुन कर के क्या बोले..?
और हम उनके सामने सिर्फ चंद्रा को ही दूध देकर अपनी लाड़ो को छिपा कर दूध पिला दिया करते थे।
और ज्यादा पिस्ता बादाम केसर मिला कर….
तभी तो हमरी कुसुम ऐसी राजकुमारियों सी दिखती है.. !”
“कहाँ की राजकुमारी दिखते हैं..? इतना छिपा छिपा के केसर वाला दूध पिलाई हो फिर भी हम सांवले ही रह गए.. भैया को देखो कैसे बलबला के गोरे चमकते रखें हैं… !”
कुसुम ने अपनी माँ की भावुकता को संभालने हल्का सा मजाक कर दिया और उन्होने मुस्कुरा कर उसे अपने आंचल में समेट लिया…
उनके आँसू बहने लगे और खुद को लाख रोकने पर भी कुसुम भी रो पड़ी..
उसी समय नाश्ते की तश्तरी थामे सुजाता ऊपर चली आई…
“अब हो गया हो माँ बेटी का करुन विलाप तो ज़रा खा पीकर पेट की क्षुधा शांत कर लीजिये आप लोग..।
आओ भावना तुम भी बैठो… अभी गर्मागर्म आलूबंड़े बनायें हैं, आओ खा लो !”
भावना भी वहीं बैठ गयी..
“वैसे राजकुमारी जी आप कितनी भी सामल हो आपके होने वाले पतिदेव घुर्राट गोरे हैं.. ।
एकदम सफेदी की चमकार.. ।
इसलिए चिंतित होने का ज़रूरत नहीं है.. बाल बच्चे गोरे ही पैदा होंगे.. !”
सुजाता ने माहौल हल्का करने की कोशिश की और वहीँ बैठ गयी…
भावना भी उन सब के साथ बैठी थी, की उसका फ़ोन बजने लगा..
उसने देखा दुबई से फ़ोन आ रहा था..
उसने झट से फ़ोन उठाया और कुसुम की बालकनी में निकल गयी..
“कहाँ हो भावना ?”
“बस यही कुसुम के घर पर थे ? आप कैसे हैं बाबूजी !”
भावना की अब तक अपने बाबू जी से बहुत ज्यादा बातचीत नहीं होती थी। एक दूसरे का हालचाल पूछने के अलावा और किसी तरह की कोई बात उनके बीच नहीं होती थी। लेकिन जिस दिन से भावना को चंद्रा भैया के लड़कों ने मारा था, उस दिन से दुबई से लगभग रोज मैसेज आने लगा था। उसका हाल चाल जानने के बाद ही उसके बाबूजी को चैन मिलता था।
आज भी उनका फोन आ गया। उन्होंने कुछ दिन पहले भावना से कहा था कि वह कोई जरूरी बात भावना को बताना चाहते हैं। भावना भी जानना चाहती थी, कि आखिर वह जरूरी बात क्या है..?
“ठीक हूँ…! भावना.. तुमसे कुछ बहुत ज़रूरी बात कहनी है… पता नहीं तुम उस बात को कैसे लोगी ? लेकिन जो सच है वह तुम्हें पता होना चाहिए, तुमसे छिपाने का अब कोई मतलब नहीं..!”
भावना के चेहरे पर पसीने की बूंदें छलक उठी। उसे घबराहट सी होने लगी कहीं ऐसा तो नहीं कि दुबई जाकर उसके बाबूजी ने दूसरी शादी कर ली है। और शायद इसीलिए इतने सालों से यहां वापस नहीं लौटे। लेकिन अपनी जिम्मेदारी समझकर उसके और उसकी मां के लिए पैसे बराबर भेज दिया करते हैं..।
अगर ऐसा हुआ तो वह इस मनहूस खबर को अपनी मां से कैसे कह पायेगी वो.. !”
वो यही सोच रही थी कि, सामने उसकी सोच से बेखबर वो फिर बोल पड़े…
“आज तक तुम से फ़ोन पर कुल दो दफा ही बात हुई है.. !”
उनकी बात सुनकर भावना सोच में पड़ गई थी। क्या आज तक उसने सिर्फ दो बार ही फोन पर बात की है? तब उसे ध्यान आया कि हां अक्सर तो उसकी मैसेज पर ही बात होती थी। दुबई फोन लगाने में मोबाइल पर उसके पैसे कट जाते थे। इसलिए वह लगाती नहीं थी। और शायद वहां से भी बाबूजी को पैसे ज्यादा लगते होंगे इसलिए अक्सर उसकी सिर्फ मैसेज के द्वारा ही बात होती थी..।
अभी पिछले दिनों हुए हादसे के बाद उसने नाराजगी में अपनी एक तस्वीर अपने बाबूजी को भेजी थी कि उसे कितनी चोटें आई है, और वह और उसकी मां यहां अकेले कितना परेशान हो रहे हैं। और वह किसी भी कीमत पर उनके पास जाना चाहती है..।
उसकी तस्वीर भेजने के बाद से ही यह हुआ था कि रोज सुबह और शाम दो मर्तबा उनका मैसेज जरूर आया करता था। जिसमें भावना और उसकी मां के हाल-चाल के अलावा उन्होंने ठीक से खाना खाया या नहीं इन सवालों का भी जिक्र होता था। भावना को अब इन मैसेज की आदत हो गई थी और उसे एकाएक लगने लगा था कि उसकी अब लगातार दुबई में बातें होने लगी है जबकि असल में ऐसा नहीं था..
” हां फोन पर बातें तो दो-चार बार ही हुई है..!”
“ज्यादातर मर्तबा हमारी सिर्फ मैसेज में ही बात हुई है लेकिन अब लगभग रोज तुम्हारी खैर खबर मिल जाती है तो ऐसा लगता है तुम लोग ठीक हो।
सुनो भावना तुमसे यह कहना था कि,
मेरी बात ध्यान से सुनना…
सुनो… भावना… सुन रहीं हो ना..
मैं इस कॉल को वीडियो कॉल में बदल रहा हूं…मेरा कॉल एक्सेप्ट कर लेना!!”
भावना ने हाँ कहाँ और मोबाइल स्क्रीन को ज़रा खुद से दूर कर देखने लगी…
कुछ देर नेट को जुड़नेे में लगा और फिर सामने वाले की स्क्रीन अचानक से भावना के सामने खुल गगी….
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इधर राजेंद्र के पास दीपक पहुंच चुका था! दीपक ने जाने कैसे ढूंढ कर पता लगा लिया था कि राजेंद्र सरना के घर पर छिपा हुआ है…
और वह बिना किसी डर के उसके घर पहुन्च गया! सरना के घर की छत पर लेटा राजेंद्र आसमान में तारों को देखता हुआ अपने ख्यालों में गुम था कि दीपक और उसके साथ उसका एक लड़का वहां पहुंच गए।
दीपक राजेंद्र के पास पहुंचकर उसके बगल में लगी दूसरी खाट पर बैठ गया।
राजेंद्र यूं दीपक को अचानक आया हुआ देखकर सकपका गया। और खुद भी उठ कर बैठ गया।
राजेंद्र के चेहरे पर पल भर के लिए आई घबराहट देखकर दीपक ने मुस्कुरा कर उसके कंधे पर अपना हाथ रख दिया।
” अरे डरिए नहीं डॉक्टर साहब! हम तो आपका बहुत आदर सम्मान करते हैं। हमें डॉक्टरों से बड़ा लगाव है। हम तो चाहते थे कि हमारे घर में भी डॉक्टर …….
खैर छोड़िये…..
…लेकिन हर किसी की किस्मत आपके जैसी नहीं होती ना। एक तो आप कुशल और विद्वान डॉक्टर है। और दूसरा बड़े अच्छे और भोले स्वभाव के भी हैं। लेकिन आपका हाथ गलत जगह पर अटक गया है।”
राजेंद्र ने दीपक की तरफ देखा। जाने क्यों उसे दीपक को देखकर अच्छी अनुभूति नहीं हो रही थी।
उसकी आंखों में उभरता सवाल देखकर दीपक अपना परिचय देने लगा ।
“हम जानते हैं, आप हम को पहचानते नहीं हैं। और इसीलिए आप यूं सवालिया नजरों से हमें घूर रहे हैं। लेकिन सच कहें तो हमारा ऐसा कोई खास परिचय भी नहीं, जो आपको दे सकें।
बस यह बात है कि ऊंची जाति वालों के गांव में आपकी तरह ही हम भी परेशान हैं।”
राजेंद्र की माथे की सलवटे अब जरा कम रह गई थी। उसने दीपक की तरफ देखा,
” वैसे आप हैं कौन?” और अपना सवाल पूछ लिया
” कुसुम कुमारी जी को जानते हैं ना?” दीपक ने पूछ लिया।
राजेंद्र के दिमाग में तुरंत घंटी बजने लगी और दीपक अपनी बात पूरी करने लगा।
” उनके जो बड़े भाई हैं ना, ठाकुर चंद्रभान सिंह तोमर। उन्हीं के साथ काम करते हैं दीपक सिंह नाम है हमारा। कहने को हम भी ऊंची जाति के हैं। लेकिन ऊंची जाति वालों के अत्याचारों से त्रस्त हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि हम यह जाति बिरादरी धर्म जैसी छोटी बातों पर विश्वास ही नहीं करते।
हमारा मानना है आदमी का कर्म ही उसकी जाति का निर्धारण करता है।
डॉक्टर साहब आप इतना पुण्य का काम करते हैं, आप दूसरों को जीवन देते हैं। दूसरों की बीमारियों को दूर करते हैं।
देवता तुल्य हैं आप तो हमारे लिए।
तो आप सबसे ऊंची जाति के हो गए।
बल्कि हम कहे तो हमें आपके पैर छूने में भी कोई परेशानी नहीं है। लेकिन ये ही सामान्य शिष्टाचार की बातें हमारे चंद्र भैया को समझ में नहीं आती। अब क्या कर सकते हैं? उनकी परवरिश कुछ ऐसी है, उनके दिमाग को उनके बाप दादा ने जाति और धर्म की बातें भर-भर कर ऐसे पलट दिया है कि वह उससे आगे बढ़कर कुछ सोच ही नहीं पाते हैं। देख ही नहीं पाते हैं।
कहने को तो हम भी ठाकुर हैं । लेकिन हमारा मन साफ है। और हम इन सारे परपंचों में पङते भी नहीं है।”
राजेंद्र ने दीपक की तरफ देखा और फिर दूसरी तरफ देखने लगा।
” यह सब मुझसे कहने का क्या मतलब है आपका?”
उसने दीपक से सवाल कर दिया।
” आपसे कहने का बस इतना तात्पर्य है कि आप बहुत अच्छे आदमी हैं। हम नहीं चाहते कि आप बेवजह यहां रहते हुए मारे जाएं ।हम हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि आप जैसे बुद्धिमान और निर्भीक युवक को यहां से भाग जाना चाहिए।
आप आज के आज अपना सारा सामान समेटकर यहां से निकलकर शहर चले जाइए।
आपके लिए वही सही रहेगा।”
” लेकिन आप क्यों मेरी इतनी परवाह कर रहे हैं ?मुझे समझ नहीं आया!” राजेंद्र ने कहा
“कहा ना कि हम खुद अच्छे हैं, और अच्छे लोगों की परवाह भी करते हैं..!”
“और अगर मैं कहूं कि अब मैं डर कर भागूंगा नहीं, तो ?”
कुछ पलों के लिए दीपक उसे देखता रह गया.. असल में वो शायद यही सुनना चाहता था.. उसके होंठ व्यंग में तिरछे मुड़ गए….
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“आप कुसुम कुमारी से प्यार करते हैं ना ?” उसने राजेंद्र से सीधा सवाल कर दिया
“तुमसे मतलब ?”
“डॉक्टर साहब अगर आप सच में कुसुम कुमारी से ब्याह करना चाहते हैं तो, उन्हें लेकर भाग जाइये..!
हम चंद्रा भैया को अच्छे से जानते है…! वो अपनी ही बहन का गला फरसा से काट कर दो भाग में कर देंगे लेकिन अपने जीते जी आप दुनो का ब्याह नहीं होने देंगे..!
या तो कुसुम को भूल कर अपने शहर लौट जाइये और अगर अपने नाम के आदमी है, तो उसका हाथ पकड़िए और उसे उस सोने के पिंजरे से बाहर निकाल ले जाइये.. !”
दीपक अपनी जगह से खड़ा हुआ और वापसी के लिए आगे बढ़ गया..!
अचानक वो थमा और वापस आया..
उसने अपने पैंट्स की जेब में हाथ डाला और एक मोबाइल निकाल कर राजेंद्र के हाथ में रख दिया..
“अब तक या तो आपका मोबाइल टूट फूट चुका होगा और या फिर तोड़ दिया जायेगा..।
ये मोबाइल रख लीजिये.. इससे आप अपनी कुसुम से बात कर पाएंगे..
और सुन रे सरना… डाक्टर साहब का अच्छा सेवा जतन करना.. हमारे गाँव के मेहमान बाबू है, रुष्ट ना होने पाए.. !”
अपने हाथ जोड़ डॉक्टर साहब को प्रणाम कर वो वहाँ से निकल गया..
वहीँ खड़ा सरना बौराया हुआ सा दीपक को जाते हुए देख रहा था..
“ये काहे आया था यहाँ.. इसे तुमसे काहे हमदर्दी हो गयी बे ?”
उसने राजेंद्र की तरफ देख कर पूछा..
“मुझे क्या पता.. मैं तो इसे आज पहली बार देख रहा हूँ !मैं तो जानता तक नहीं कि ये है कौन ?”
“अच्छा ही है.. इसे ना जानो उसी में भलाई है… इसके साले के पेट में दाँत हैं…।
चंद्रा भैया का घनघोर चमचा है..। उन्हीं के आगे पीछे घूमता है..।
आज ये उनकी बहन को भगाने की बात तुमसे कहने काहे चला आया..?
बस वही समझ नहीं आ रहा है.. !”
“खैर.. छोड़ो यार उसे
ये बताओ इस मोबाइल का क्या करें ?” राजेंद्र ने पूछा
“रख लो.. तुम्हारा मोबाइल भी तो टूट गया है..
एक बार कुसुम से बात कर के देख लो… !”
“वही मैं भी सोच रहा था..!
एक बार को दिमाग में ये बात आयी कि कहीं मोबाइल नंबर ट्रेक कर ये मेरी हरकतों पर नज़र रखने की साज़िश तो नहीं। लेकिन फिर उस आदमी का रंग रूप देख कर लगा नहीं कि वो इतना टेक्नोफ्रेंडली होगा..। और वैसे भी अब कोई कुछ भी कर ले..।
मैंने ठान लिया है, शादी तो अब मैं कुसुम से ही करूँगा.. चाहे जान ही क्यूँ ना चली जाये.. !”
सीढ़ियों पर उसी समय पायल की रुनझुन सुनाई पड़ी, और सरना और राजेंद्र उस तरफ देखने लगे..
क्रमशः
.
aparna…
दिल से…
आज के भाग में लिखी बातें ना किसी जाति विशेष के विरोध में लिखी गयी है ना धर्म के..
कहानी का उद्देश्य किसी भी जाति उपजाति या सम्प्रदाय को नीचा दिखाना नहीं है..।
कहानी का प्लॉट ही racial discrimination है और इसलिए कहानी में ऐसा हिस्सा लिखना ज़रूरी हो जाता है..।
आजकल नस्लीय भेदभाव कम ज़रूर हुआ है पर अब भी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है..।
दूसरी बात ये भेदभाव भी हर कोई नहीं करता..।
हर समुदाय में सभी तरह के लोग पाए जाते हैं….।
कहानी का उद्देश्य किसी जाति विशेष का अपमान करना नहीं है।
इसलिए कहानी को सिर्फ मनोरंजन के नज़रिये से पढ़ें.. और विवादस्पद टिप्पणी करने से बचे…
और एक और ज़रूरी बात…
मुस्कुराइए की आप aparna की प्रोफाइल पर है..
धन्यवाद….

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