अपराजिता -32
मैं अधूरा, तू अधूरी जी रही है…
ऐ अजनबी तू भी कभी …
रेशम तेज़ी से गेट के अंदर दाखिल हो गयी…
अपने कमरे में पहुँच कर वो अपने पलंग पर कटे पेड़ सी ढह गयी..
उसे बहुत रोना आ रहा था, कमरे में भी उस वक्त और कोई नहीं था और इसलिए वो तकिये में मुहँ छुपाये रोने लगी..
मन भर कर रोने के बाद वो उठी और मुहँ धो कर अपने लिए चाय बना ली..
चाय लेकर वो अपने कमरे की बालकनी में आ बैठी.. वहाँ उसने दो छोटे गमले रखें थे.. ये उसके भाई मानव के दिये हुए थे.. एक गमले का नाम उसने मानव रखा था और एक का नाम रेशम था..
वो उन्हीं पौधों पर हाथ फेरती कुर्सी पर बैठी चाय पी रही थी और रास्ते के उस पार चाय की टपरी पर बैठा अखंड उसे ही देख रहा था..
रेशम का ध्यान इस बात पर नहीं गया था कि अखंड दूर टपरी पर बैठा उसे देख रहा है..
रेशम को उन पौधों के साथ अच्छा लग रहा था, इसी वक्त उसका फ़ोन बजने लगा..
फ़ोन पूर्वा का था..
“कहाँ है रेशम ?”
“कमरे में हूँ ! क्यूँ क्या हुआ ?”
“किसके साथ ?”
“क्या मतलब ? अपने कमरे में हूँ हॉस्टल के !”..
पूर्वा की बेसर पैर की बात सुन रेशम को गुस्सा आ गया, इस तरह के मजाक उन लोगों में सामान्य थे, लेकिन आज पूर्वा का ये मजाक रेशम को बुरी तरह से चुभ गया..
“अच्छा सुन रेशु, ये पंकज के साथ तेरा क्या सीन चल रहा.. मतलब तूने कभी बताया नहीं कि तेरे और पंकज के बीच.. !”
“अरे थम जा पूर्वा.. कुछ नहीं चल रहा मेरे और पंकज के बीच.. तुझे किसने कहा ?”
“किसी ने कुछ नहीं कहा, अभी मैं दीपा, कोमल, आरती के साथ बैठी थी ना तो बस ऐसे ही बात चली..
“क्या बात चली ?”
