अपराजिता -31
अखंड उस तालाब के पास से उठ कर घर चला आया था.. लेकिन वो पुरानी यादें उस कदर उसके दिमाग पर कब्ज़ा जमाये बैठी थी कि वो उनसे बाहर ही नहीं आ पा रहा था…
वो घर पहुंचा तब तक यज्ञ पहुँच कर कुसुम के घर पर हुई सारी बातचीत बता चुका था..।
घर का माहौल खुशनुमा सा था, अखंड की मां और चाची इसी बात पर बेहद खुश थी कि घर का एक लड़का तो शादी के लिए तैयार हो गया… ।
घर पर गोश्त पकाने की तैयारी चल रही थी। अखंड की मां कामवाली बाई को सिलबट्टी में खड़े मसाले पिसवाते हुए अपने हाथों की जादूगरी का बखान कर रही थी, कि कैसे जब वह गोश्त पकाती है तो हर कोई उंगलियां चाटते रह जाता है।
वह अपने मन की बात बता रही थी कि उसी वक्त दरवाजे को खोलकर अखंड अंदर चला आया।
उसने एक उड़ती सी नजर अपनी मां पर डाली और सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाने लगा। खुले दलान में लगी सीढ़ियां ऊपर की तरफ जाती थी, जहां एक पंक्ति में अखंड यज्ञ और वीर तीनों भाइयों के कमरे थे। दालान में ही अखंड की चाची दादी के साथ बातचीत करते हुए रात के खाने की तैयारी भी कर रही थी। अखंड की मां शचिरूपा ने अखंड को टोक दिया।
” चाय भेजें?”
अखंड ने अपनी मां को एक नज़र देखा और हां में गर्दन हिला कर चला गया। वह अपने कमरे की तरफ बढ़ रहा था कि उसी वक्त वीर का कमरा खुला और उसके कमरे की सफाई करता हुआ नौकर हाथ में ढेर सारा कचरा लिए बाहर आ गया। उसके हाथ की बड़ी सी ट्रे में सिर्फ ढेर सारी विस्की की बोतले थी। इतनी सारी बोतलों को देखकर अखंड ने नौकर को देखा और उससे पूछ लिया
“कितने दिन में एक बार आकर सफाई करते हो बाबू?”
“साहब सफाई तो रोज ही होती है।”
” तब भी इतनी सारी बोतलें?”
” कल की ही है ।”
नौकर ने धीरे से जमीन की तरफ देखते हुए अपनी गर्दन हिला दी। अखंड ने एक बार फिर अविश्वसनीय नजरों से बोतलों की तरफ देखा और वापस नौकर की तरफ देखने लगा।
” है कहां वीर बाबू?”
नौकर ने धीरे से ना में गर्दन हिला दी।
अखंड गलियारे की रेलिंग तक मुड़कर चला आया उसने वहीं से अपनी काकी को आवाज़ लगा दी..
” काकी वीर कहां है?”
उन्होंने अखंड को देखा और बड़े गर्व से कंधा उचका दिया..
“हमें क्या पता ? इस घर के लड़के कौन सा बड़ों से पूछ कर घर के बाहर जाते हैं ?”
अखंड एक गहरी सांस छोड़ कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया..
कमरे की तरफ बढ़ते हुए अखंड ने वीर के फोन पर कॉल कर लिया..
वीर होटल के कमरे में किसी लड़की के साथ था..
मोबाइल पर अखंड का नाम देख वीर खीझ कर उठ बैठा..
“अब ये क्यूँ फोन कर रहें इस वक्त.. ?”
“कौन है बेबी ?”..
लड़की ने बड़ी अदा से पूछा, और वीर ने झुंझला कर लड़की का मुहँ दूसरी तरफ फेर कर मोबाइल उठा लिया..
“भाई बोलिये.. !”.
“कहाँ हो वीर ?”..
“बस भाई एक टेंडर के लिए आया हुआ था !”
“हम्म.. घर आओ तो मिलना आकर !”
“जी भाई !”
“ज़रूर आना… भूलना मत, तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है !”
“जी.. !”
वीर ने फोन रख कर मुंह बना लिया, वह दिल ही दिल में अखंड से डरता था और अक्सर उससे दूर भागा करता था.. आज अखंड का ऐसे बेमौके अचानक उसे फोन करना वीर को वापस अंदर तक दहला गया!
उसे वह वक्त याद आ गया, जब अपने स्कूल की पढाई के दौरान वह अपनी कक्षा में फेल हो गया था और घर वालों को दिखाने के लिए नकली मार्कशीट बनाकर ले आया था..
तब घर पर उस मार्कशीट को देखकर सभी बहुत खुश हुए थे! उसकी माँ और ताई उस पर वारी जा रहीं थी..उसके मुहँ में मिठाई पर मिठाई ठूंसी जा रहीं थी..
अखंड जब बाहर कहीं से लौट कर घर आया और उसकी मां ने उसे वीर की मार्कशीट दिखाइ तब मार्कशीट देखते ही अखंड के माथे पर बल पड़ गए…
उसने अलट पलट कर मार्कशीट को देखा.. और वीर से उस बारे में सवाल करने लगा..
वीर जब कोई जवाब नहीं दे पाया, तब अखंड ने वीर के एक शिक्षक को फ़ोन लगा दिया..
और जब उनसे मालूम चला की वीर तो पास ही नहीं हो पाया है तब अखंड ने वीर को एक ज़ोर का थप्पड़ लगा दिया..
घर वाले आश्चर्य से उन दोनों को देख रहे थे, और वीर ने जब तक अपने मुहँ से अपनी नकली मार्कशीट की सच्चाई नहीं कबूल ली तब तक अखंड उसे थप्पड़ लगाता रहा..
हालाँकि उसके बाद वीर कभी वापस स्कूल नहीं गया, और आज भी जब कभी मौका मिलता वो अखंड को ही अपने ना पढ़ पाने का दोषी ठहरा दिया करता है, लेकिन असल में देखा जाये तो दोषी अखंड नहीं बल्कि वीर के पिता थे..
जिन्होंने अपने बच्चे को उस वक्त गलत सही में अंतर करना नहीं सिखाया और जब वो स्कूल ना जाने की ज़िद पर अड़ गया तब उसके सर पर हाथ रख दिया कि अगर वो नहीं जाना चाहता तो ना जाये..
अखंड उस वक्त कॉलेज के दूसरे साल में ही था, और इसी घटना के बाद वो शहर चला गया था..
आज वीर को अचानक सब कुछ अपनी आँखों के सामने घटता नज़र आ गया था.. अखंड उससे पांच साल बड़ा था लेकिन उसे लगता था जैसे अखंड उस पर कुछ ज्यादा ही रौब गांठता है..
जबकि अखंड के लिए जैसे यज्ञ था वैसा ही वीर था.. उसने अपने दोनों भाइयों में कभी अंतर नहीं किया था..
अखंड अपने कमरे की खिड़की पर खड़ा वीर के बारे में सोच रहा था कि नौकर ने दरवाज़े पर दस्तक दी और भीतर चला आया…
नौकर ने चाय का प्याला अखंड से पूछ कर वहीँ एक किनारे टेबल पर रखा और बाहर चला गया..
अखंड ने पलट कर देखा चाय के साथ एक प्लेट में कुछ नमकीन पिस्ते रखे थे..
उसने एक उठा कर उसे छीला और उसका छिलका देखते हुए वो एक बार फिर अपनी यादों में खो गया..
मेडिकल वालों का यूथ फेस्टिवल चल रहा था..
एक दिन क्राफ्ट प्रतियोगिता थी, वो तो हर रोज़ किसी ना किसी बहाने से जा ही रहा था..
उस सीन भी पहुँच गया, उस दिन रेशम ने खुद ने भाग लिया हुआ था..
कॉलेज प्रोफेसर और डीन से अनुमति के बाद ही ये प्रतियोगिता की गयी थी जिसमे कॉलेज के कोरिडोर को अपने क्राफ्ट से सजाना था..
एक स्विच बोर्ड को रेशम ने सजाया था..
उस बोर्ड पर पिस्ते के रंगीन छिलको को चिपकाया था और उनकी चोंच और पूँछ बना दी थी.. इसके अलावा काले रंग से अलग अलग डगाल और छोटे छोटे पत्ते बना दिये थे..
ऐसा लग रहा था पंछियों से भरा कोई पेड़ था..
अखंड रेशम की कारीगरी मंत्रमुग्ध होकर देख रहा था..
इसके बाद के वक्त अंताक्षरी प्रतियोगिता होनी थी.. जिसमे विद्यार्थियों के साथ प्रोफेसर भी भाग ले सकते थे, भाग लेने की एक ही शर्त थी कि आपको गाना आना चाहिए..
रेशम अंताक्षरी करवाने वाली टीम में थी..
एक एक कर के पांच टीम तैयार हो गयी जिसमे चार चार लोग मौजूद थे..
अखंड भी वहीँ मौजूद था और अपने चेलों के चक्कर में वो भी अपने लड़कों के साथ भाग ले बैठा था..
उसे गाना आता था लेकिन जबसे वो छात्र राजनीती में कूद पड़ा था उसका गाना बजाना सब बंद हो गया था..
प्रोफेसर्स भी वहीं बैठे थे, हालाँकि उन लोगों ने खेल में भाग नहीं लिया था लेकिन एक प्रोफेसर साहब के गाने से ही खेल की शुरुआत की गयी थी..
गाने के बीच के किसी शब्द को पकड़ कर गाना गाया जाना था..
उन प्रोफेसर साहब के गाने से शब्द पकड़ कर किसी ने गाया और उसके गाने से अखंड ने शब्द पकड़ लिया.. और गाने लगा..
ऐ अजनबी, तू भी कभी आवाज़ दे कहीं से
मैं यहाँ टुकड़ों में जी रहा हूँ, तू कहीं टुकड़ों में जी रही है
ऐ अजनबी तू भी कभी …
उसके शब्द को पकड़ कर जैसे ही दूसरी टीम के लोगों ने गाना शुरू किया प्रोफेसर शर्मा ने उस टीम को रोक दिया..
“बहुत बढ़िया गाते हो अखंड, कम से कम एक अंतरा तो सुना दो !”
प्रोफेसर साहब के कहने पर वो वापस गाने लगा..
रोज़ रोज़ रेशम सी हवा, आते जाते कहती है बता
रेशम सी हवा कहती है बता
वो जो दूध धुली, मासूम कली, वो है कहाँ कहाँ है
वो रोशनी कहाँ है?
वो जान सी कहाँ है ?
मैं अधूरा, तू अधूरी जी रही है
ऐ अजनबी तू भी कभी …
जैसे ही अखंड ने आगे गाना शुरू किया, रेशम के साथ खड़ी पूर्वा और बाकी लड़कियां रेशम की बाँह पर चिमटी काट कर उसका ध्यान इस बात पर दिलवाने लगी कि अखंड ने जानबूझ कर इस गाने का चुनाव किया है..
रेशम को अच्छा तो नहीं लगा लेकिन ऐसे कार्यक्रम को बीच में छोड़ कर वो नहीं जा सकती थी…
अब रेशम का भी ध्यान इस बात पर जाने लगा था कि उसकी नज़र जब भी अखंड पर पड़ती वो उसे ही ताकता मिल जाता..
रेशम उससे बचने की कोशिश में कभी किसी सहेली की ओट में खड़ी हो जाती तो कभी किसी खम्बे की ओट में, लेकिन जैसे ही कुछ समय बाद उसका काम होता और वो सामने आती वो पूरी निर्लज्जता से उसे ही घूरता मिल जाता..
अपने सामने रखी टेबल पर अपनी बाँह टिकाये वो बड़े आराम से एक के बाद एक राउंड जीतता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, और अपनी हथेली पर अपना चेहरा टिकाये बड़े आराम से रेशम को आँखों ही आँखों में पीता भी जा रहा था और जब से रेशम का इस बात पर ध्यान गया था उसका वहाँ से मन उचाट हो गया था..
अंताक्षरी सम्पन्न हुई और निर्विवाद रूप से अखंड की टीम विजेता घोषित कर दी गयी..
रेशम को उन लोगों की टेबल पर जाकर टीम के सभी सदस्यों के नाम डायरी में नोट करने थे.. लेकिन उसकी अखंड के टेबल पर जाने की हिम्मत नहीं थी, उसने जबरन पूर्वा को ठेल दिया..
पूर्वा अखंड की टेबल पर खड़ी उन अब का नाम नोट कर रहीं थी और अखंड एक तरफ से झांक कर रेशम को देख रहा था…
रेशम की नज़र अखंड पर पड़ी और वो अपना बैग और डायरी संभाले वहाँ से बाहर निकल गयी…
उसके साथ के बाकी लोग वहीं मौजूद रह कर बाकी लोगों के नाम वगैरह लिखते रहे..
रेशम को आज अखंड की आंखें देख, उसका गाना सुन घबराहट सी हो रहीं थी…
आजतक अखंड ने उससे कभी कुछ कहा नहीं था, लेकिन जैसी प्यासी आँखों से उसे देखा करता था वो उसकी आँखों के ताप से झुलसने लगी थी..
शाम हो चुकी थी, प्रतियोगिता का परिणाम तैयार करना था लेकिन उसके सर में ऐसा दर्द उठ रहा था कि वहाँ रुकने का उसका मन नहीं कर रहा था.. उसके साथ के लड़के पंकज ने उसे चाय पीने के लिए कैंटीन चलने कहा और बाकी टीम मेंबर्स को फ़ोन घूमाता रेशम को साथ लिए कैंटीन की तरफ चला गया..
कैंटीन में आमने सामने बैठे वो लोग अपने बाकी दोस्तों के आने का इंतज़ार कर रहें थे, तब तक में पंकज ने उन दोनों के लिए चाय मंगवा ली..
चुपचाप चाय पीती बैठी रेशम का ध्यान बस अपनी चाय पर था, आज उसका मन कसैला सा हो गया था..
अखंड के लिए उसकी सहेलियों ने पहले ही इतना कुछ उसके दिमाग में भर दिया था, उस पर अंताक्षरी के दौरान उसके नाम वाला गाना, और फिर सारा वक्त उसे घूरती उसकी आंखें..
अखंड अच्छा था या बुरा था, वो क्या करता था, उसका घर परिवार क्या था, वो कुछ नहीं जानती थी और ना जानना चाहती थी..
उसे बस वो छुटभैय्ये नेता टाइप का लड़का पसंद नहीं आया था.. उसका कारण जो भी रहा हो.. !
वो खुद में खोयी चाय पी रहीं थी और सामने बैठा पंकज उसे देखते हुए मुस्कुरा रहा था..
पंकज ने धीरे से अपने फ़ोन से रेशम के साथ अपनी दो तीन सेल्फी निकाल ली..
रेशम का सर कप पर झुका हुआ था, उसका ध्यान इस बात पर नहीं गया.. और वो नहीं जान पायी कि पंकज ने उसके साथ सेल्फी ली है..
कुछ देर में ही उनके बाकी साथी भी वहाँ चले आये.. अगले दिन की तैयारियां, आज के दिन की रंगीनियां इन्हीं सब चर्चाओं में वो सारे लोग लग गए..
रेशम को थकान सी लगने लगी थी.. दो कप चाय पीकर भी उसके सर का दर्द ठीक नहीं हुआ था..
उसका अपने घर जाने का मन कर रहा था…
उसके कॉलेज से उसका शहर सिर्फ दो घंटे की दूरी पर था, लेकिन रोज़ यात्रा में चार घंटे बर्बाद करने से बचने वो हॉस्टल में ही रहने लगी थी….
उसका मन अपने कमरे में जाकर आराम करने का था और इसलिए वो उन सब से विदा लेकर उठ गयी.. पूर्वा ने अभी साथ जाने से मना कर दिया..
इसलिए वो अकेली ही चल दी..
कॉलेज कैंटीन से उसका हॉस्टल दस मिनट के रास्ते पर था..
वो अपना बैग अपने सामने की ओर रख कर उसे कस कर पकड़े हुए नीचे देखती चली जा रहीं थी कि उसके ठीक पास आकर एक जीप रुक गयी..
“काय हो भौजी… हॉस्टल तक छोड़ दे.. ?”
एक तीखी सी आवाज़ उसका कान चीर गयी और बोलने वाले के बोलते ही पीछे बैठे लड़को का वीभत्स ठहाका रेशम को सर से पांव तक कंपा कर रह गया…
ये धीरेन्द्र और उसका गैंग था..
नौ दस लड़कों से भरी जीप में अगर उस सुनसान रास्ते में कोई उसे पकड़ कर अंदर खींच ले तो वो कुछ कर भी ना पायेगी..
वो डर से कांपने लगी लेकिन अपने डर को उसने ज़ाहिर नहीं होने दिया..
अपने बैग को और कस कर पकड़ लिया और नीचे देखती तेज़ कदमो से हॉस्टल की तरफ बढ़ने लगी.. जीप उसके साथ साथ चलती रहीं..
रेशम का डर उस पर काबिज़ हो रहा था, उसके माथे पर पसीने की बूँदे छलकने लगी थी….
और उसी समय वही लड़का जो पहले बोला था वापस रिरियाने लगा..
“अखंड भैया को तो जानती है ना आप, अब उनसे नाम जुड़ गया है तो आप हम सब की भौजाई ये ना बन गयी है.. काहे चरण, सही बोले की नहीं ?”
“जी भैया जी.. !”
“एक बार पलट कर देखिये तो सही, आपके सैंया जी खुस हो जायेंगे… वैसे जोड़ी मानने लायक सुंदर है.. !”
एक बार फिर अपनी बात पर वो ज़ोर से हॅंस पड़ा… और रेशम दम साधे तेज़ क़दमों से चलती रहीं..
उसके हॉस्टल का गेट दिखाई दिया और उसे हल्की सी राहत मिली..
वो तेज़ी से गेट खोल अंदर दाखिल हो गयी और पीछे से वो लड़के वीभत्स ठहाके लगाते हुए गाने की धज्जियां उड़ाने में लगे रहें..
तू तो नहीं है लेकिन, तेरी मुस्कुराहट है
चेहरा कहीं नहीं है पर, तेरी आहट है
तू है कहाँ कहाँ है, तेरा निशाँ कहाँ है
मेरा जहाँ कहाँ है
मैं अधूरा, तू अधूरी जी रही है…
ऐ अजनबी तू भी कभी …
क्रमशः

लाजबाब भाग 👌👌👌👌👌👌👌👌👌♥️♥️♥️♥️♥️♥️