अपराजिता -27

अपराजिता -27

दिल क्या करे जब किसी से किसी को प्यार हो जायें  जाने कहाँ कब किसी को किसी से प्यार हो जायें…

अखंड के कमरे से गाने की धुन बाहर तक जा रही थी..
उधर से गुज़रते हुए धीरेन्द्र के कान में ये आवाज़ पड़ी..

“क्या बात है.. ये इस गब्बर के कमरे में बसंती काहे गा रहीं है भाई.. ?”

धीरेन्द्र का पिछलग्गू चमन चहक उठा..

“आजकल यहीं सब सुन रहा है वो परिहार.. !”

“काहे ?”

धीरेन्द्र के माथे पर बल पड़ गए..

“ये अचानक रंग काहे बदल दिया बे ? कल तक तो चुनाव की तैयारी में लगा था, आज अचानक लता मंगेशकर सुन रहा… क्या चक्कर है ?”

“इनका का चक्कर होगा ? लड़कियों से तो दूर भागते हैं परिहार बाबू, खुद को बाल ब्रह्मचारी कहते हैं  ?”

“उसी बात का फ़ायदा उठाना है !”

तिरछी सी मुस्कान के साथ धीरेन्द्र ने कहा और तभी उसके दो पंटर भागते हुए उसके पास चले आये..

“भैया जी गज़ब हो गया.. बचा लीजिये !”

“का कांड कर आये हो बे ?”

धीरेन्द्र ने कड़क कर पूछा..

उन दोनों में से एक धीरे से बोलने लगा..

“कुछ नहीं धीरू भैया.. बस बाइक में जा रहें थे, सामने सामने एक लड़की स्कूटी में जा रहीं थी.. थोड़ा हल्का मस्ती मजाक में उसका दुपट्टा को पकड़ लिए..
गाड़ी तेज़ थी, भैय्या जी.. हमको नहीं पता था लड़की ने चुन्नी को अपने कुर्ते से पिन लगा रखा था.. चुन्नी के चक्कर में लड़की स्कूटी से गिर गयी.. भैया जी.. कुछ दूर तक चुन्नी के साथ घिसट गयी.. हम तुरंत छोड़ कर भागे.. !’

“साले हरामखोर…!!
बस यही टाइमपास रह गया है तुम लोगों के पास.. !”

.धीरेन्द्र ने उस लड़के के एक तमाचा जड़ दिया..

वो गाल पकड़ सहलाने लगा..

“लड़की कहाँ है अभी.. ? अस्पताल में या घर में ?”

“अस्पताल में है भैया जी… लेकिन बात तो सुनिए !”

“का हुआ.. जिन्दा नई बची का ?”

“ज़िंदा है, पूरा होश हवास में है…

“फिर.. ?”

“वो लड़की कमिश्नर की बिटिया है.. !”

धीरेन्द्र ने अपने माथे पर हाथ मार लिया… ” ए स्साला!”

“कमीनो तुम्ही लोगों के कारण हमारा राजनैतिक कैरियर साला ध्वस्त हुआ पड़ा है.. अब कहीं वो परिहार को पता चला ना, बैंड बजा लेकर आएगा और तुम लोगों की बारात  निकाल ले जायेगा.. सड़ते रहना फिर अपनी ससुराल में.. !”

“ससुराल ?” चमन टहूका

“अबे जेल की बात कर रहे.. यूँ सड़क चलते लड़की छेड़ोगे वो भी साक्षात् कमिश्नर की तो और क्या होगा बे बुड़बक ? चलो देखते हैं क्या होता है.. पहले यहाँ से तो निकलो.. क्यूंकि पुलिस तुम दोनों को धरने सबसे पहले हॉस्टल ही आएगी.. !”

धीरेन्द्र के कहने पर वो दोनों लड़के वहाँ से भाग खड़े हुए..

धीरेन्द्र भी उन लोगों को बचाने के लिए इधर उधर इंतज़ाम में लग गया….

शाम में धीरेन्द्र का एक पंटर वापस भागता हुआ चला आया..

“भैया जी कांड हुई गवा ?”

“अब का कर बैठे तुम लोग ?”

“ओ मंतोष और जतिन पकडे गए भैया जी.. ?”

“कहाँ ? पुलिस पकड़ कर ले गयी क्या ? हम तो उन लोगों को पुराने फार्म हॉउस भेजे थे ?”

धीरेंद्र की बात पूरी होने के पहले अखंड की आवाज गरज उठी

“हम उन लोगों को पकड़ लाये प्रजापति.. !”

अखंड की गहरी सी आवाज़ वहाँ गूंज गयी.. और अपने सामने खड़े अखंड परिहार को देखते ही धीरेंद्र के चेहरे पर नाराजगी झलकने लगी। वह गुस्से में अखंड के ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया ।

“तुमको क्या जरूरत है हमारे मैटर में बोलने का!”

“यह तुम्हारा मैटर नहीं है ना! अगर तुम्हारे लौंडे सिर्फ लौंडिया बाजी करते होते तो हम बीच में नहीं पड़ते। लेकिन अगर ऐसे किसी लड़की की इज्जत को खेल बना कर खेलेंगे, तो अखंड परिहार चुप नही बैठेगा।
       वैसे भी चुप बैठने वालों में से नहीं है हम। हम भी समझते हैं कॉलेज के लड़के हैं, जवान उम्र है खून उबल रहा है। लेकिन उसके लिए रोड पर चुन्नी खींचने का क्या जरूरत है? और वह भी जब लड़की भी गाड़ी चला रही है।
और खुद भी गवार लोग गाङी पर है।अगर लड़की मर मुरा जाती तो..?

” तुम काहे इतना चौधरी बन रहे हो बे ? लड़की मरी तो नहीं ना..?”

” तो लड़की के मरने का इंतजार करें ?और उसके बाद कैंडल जलाकर चौक पर उसका लड़की का फोटो रखकर श्रद्धा सुमन अर्पित करें? हम इन सब चीजों में नहीं पड़ते प्रजापति। हम साफ और सीधी बात बता रहे है, अगर कोई लड़की पसंद है उससे बोल दो..
प्यार मोहब्बत करना अलग बात होती है। लेकिन सरेआम लड़की का दुपट्टा खींचने वाले को हम माफ नहीं करते..। “

” तुम होते कौन हो बे माफ करने और ना करने वाले.. !!

” विश्वविद्यालय के स्टूडेंट लीग के अध्यक्ष हैं, और इस बार का चुनाव भी जीत गए तो शानदार तीसरी बार अध्यक्ष बनेंगे.. और अगर तुम्हारे लड़के ऐसे ही कांड करते रहे ना तो इस बार के चुनाव में भी तुम्हारे टीम का कोई सदस्य कुछ भी नहीं बन पाएगा..!
देखो प्रजापति हमारी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है, हम कभी तुम्हारे रास्ते पर नहीं आए। तुम खुद ब खुद हमारी सफलता से जलते हो।
हम तो शांति से अपना काम करते और निकल लेते हैं। तुम जबरदस्ती में हमको काड़ी करते रहते हो, और उसके बाद जब कुछ नहीं कर पाते हो तो अपने कुत्तों को भड़का भड़का कर हमारे खिलाफ इधर-उधर जहर उगलते हो।
हम जानते हैं कि तुम अंदरूनी तौर पर हमारे खिलाफ जगह जगह जहर घोल रहे हो, लोगों के दिमाग में।
   लेकिन एक बात याद रखो, झूठ कितना भी लंबा चल ले, लेकिन एक न एक दिन सच के सामने घुटने टेक ही देता है।
     तो उङ लो जब तक उड़ सकते हो, लेकिन जिस दिन तुम्हारी पतंग की डोर कटी ना इतनी बुरी तरह से नीचे गिरोगे की हड्डी पसली नहीं बचेगी। अभी तुम्हारे पास वक्त है, तुम्हारे दिमाग में जो हमारे खिलाफ जहर है ना उसे एक तरफ निकाल दो।

हमें तुमसे कोई शिकायत नहीं है, लेकिन तुम्हारे अंधभक्त चमचे कमीनाई करते घूमते है, और ये बात हमको पसंद नहीं आती।
और जिस दिन हमारा दिमाग खराब हुआ ना, उस दिन हम झाड़ू पकड़कर तुम्हारे चमचों को समेटना शुरू कर देंगे। और उस दिन फिर तुम कहीं के नहीं रहोगे बेटा..।”

” अखंड सिंह परिहार तुम हमारे मामलों से दूर ही रहो तो अच्छा है..!”

” हम दूर ही रहते हैं, और तुम्हारे मामले में कभी पड़ते भी नहीं। लेकिन तुम्हारे उन कर्मकांडी लड़कों की कारस्तानी है जो हमको तुम्हारे सामने उतरना पड़ता है.. ! सच कहें तो हमको तो तुम बात करने लायक भी नहीं लगते हो यार..।
परिचित नहीं हो क्या हमसे ? हमारा एक स्टैंडर्ड है, जिससे तुम मैच ही नहीं करते..!”

” बहुत ज्यादा बोल रहे हो परिहार..!”

” बोल तो हम बिल्कुल बराबर रहे हैं, हमारे शब्दों के वजन के सामने तुम बहुत कम हो..!”

उन दोनों की बातों के बीच धीरेंद्र के एक पंटर ने धीरेंद्र की बांह पकड़ी और उसके कान के पास कहने लगा।

” इसे छोड़िए भैया जी, थाने चलिए । थाने का इंचार्ज जतिन और मंतोष को कूट-कूट कर उनका चटनी बनाई दे रहा है। सुनने में आया है कमिश्नर की लड़की थी वह। और उस लड़की की शादी जिस लड़के से तय हुई है वही उस थाने का एस एच ओ है।
  उसी के थाने में इन दोनों को पकड़कर ले जाया गया है, अब आप सोच लीजिए लड़की का होने वाला पति क्या हाल करेगा इन दोनों का..?”

अपने गुर्गे की बात सुनकर धीरेंद्र ने परेशानी से एक गहरी से सांस छोड़ी और अपने बालों पर हाथ फेरते हुए अखंड को घूरते हुए वहां से निकल गया..

” जाओ प्रजापति कोशिश कर लो, लेकिन तुम्हारे लड़के इतनी जल्दी नहीं छूटने वाले…!”

धीरेंद्र परेशान सा वहाँ से निकल गया.. वो और भी ज्यादा परेशान जतिन के कारण था.. जतिन उसके चाचा का लड़का था..
जतिन के पिता का उनके घर में रौब था, उनका कोयले का काम था.. पैसा और सम्पत्ति अकूत थी और धीरेन्द्र इसीलिए उनसे दबता था..
अब अगर जतिन को थाने में बैठना पड़ा तो उसके चाचा उसकी ईंट से ईंट बजा देंगे..

जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से चिढ़ता या जलता है वह अपने साथ हुए हर बुरे काम का ठीकरा उसी दूसरे व्यक्ति पर फोड़ता है।
इसलिए धीरेंद्र को इन सब बातों में सबसे ज्यादा नाराजगी अखंड परिहार पर थी, क्योंकि मन ही मन वो अखंड से बहुत ज्यादा जलता था..

धीरेंद्र अपनी टोली के साथ थाने पहुंच तो गया लेकिन मंतोष और जतिन को वहां से निकालना इतना आसान नहीं था। अगर वह लड़की कोई आम लड़की होती तो शायद पैसे ले देकर मामला दबा दिया जाता और पुलिस भी फाइल बंद करके बैठ जाती। लेकिन लड़की भी कोई साधारण लड़की नहीं बल्कि कमिश्नर की बेटी थी और कमिश्नर स्वयं इस केस में रुचि ले रहे थे। उस पर तुर्रा यह हुआ कि लड़की का होने वाला पति उस थाने का एस एच ओ था..
वह किसी कीमत पर उन दोनों लड़कों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था! धीरेंद्र थाने पहुंचा और उसे देखते ही वह दोनों लड़के उसे पुकारने लगे! उन दोनों की हालत देखकर धीरेंद्र के रोंगटे खड़े हो गए दोनों के शरीर पर सरकारी बेल्ट से मार पड़ने के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। यहां तक कि चेहरे पर भी बेल्ट का निशान उभर  आया था.. जतिन की तकलीफ सोचकर ही धीरेंद्र का पारा उबलने लगा। अब उसे समझ में आ गया था कि यह बात कमिश्नर लेवल के ऊपर तक की है और अब उसे अपने अगुआ दद्दा जी से ही बात करनी पड़ेगी..

दद्दा जी शहर के पुराने राजनीतिज्ञ थे और फ़िलहाल महापौर थे.. छात्र राजनीती में भी उनका गज़ब का दखल था..
दद्दा जी धीरेन्द्र के गाँव के रहने वाले थे, उनकी राजनीतिक पार्टी को धीरेन्द्र के काका रुपयों पैसो से सपोर्ट किया करते थे और इन्हीं सब कारणों से दद्दा जी धीरेन्द्र को अखंड के ऊपर जितवाना चाहते थे….

धीरेन्द्र ने दद्दा जी को फ़ोन लगा दिया..
दद्दा जी ने सारी बात सुनी और फिर थाने में फ़ोन खडका दिया…..
वहां का एस एच ओ भरा बैठा था लेकिन दद्दा जी के सामने उसकी भी एक ना चली..

“ऐसे तो नहीं छोड़ पाएंगे.. कॉलेज का कोई चर्चित चेहरा आकर बोल दे तो छात्रों का दबाव दिखाते हुए लड़कों को छोड़ा जा सकता है.. !”
थाने के इंस्पेक्टर ने दद्दा जी के कान में गुरुमंत्र फूँक दिया और यहीं गुरुमंत्र दद्दा जी ने धीरेन्द्र को सुना दिया..
धीरेन्द्र के पास अखंड के पास जाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था..

मन मसोस कर उसे अखंड के पास जाना ही पड़ा..

****

कुसुम कुमारी फर्राटे से गाड़ी भगाती जा रहीं थी.. कि बीच रास्ते में सामने से आते राजेंद्र की गाडी उसे दिखी और उसने इतनी ज़ोर से ब्रेक लगाया की गाडी गोल घूम कर खड़ी हो गयी..
भावना की जान सांसत में थी..
ये लड़की हर पल उसकी जान लिए रहती है…

राजेंद्र ने भी गाड़ी रोक दी..

किसी महान इंसान ने कहा है ना, जिस चीज को शिद्दत से पाना चाहो फिर सारी कायनात उसे मिलाने की कोशिश करने लगती है… वैसा कुछ तो नहीं हुआ  लेकिन हां एक परिवर्तन हुआ था!
सुबह से जो चिलचिलाती धूप थी, पता नहीं कैसे उन दो पागल प्रेमियों के आमने सामने आते ही वह धूप भी उन से लजा कर उड़ गयी थी, और उसे उड़ाने वाले काले धूसर से बादल चले आये थे..

सुहावनी हवा बहने लगी थी और दोनों के दिलों में सावन की बुँदे बरसने लगी थी….

कुसुम ने राजेंद्र की तरफ देखा और उसकी तरफ बढ़ गयी….
राजेंद्र भी कुसुम की तरफ बढ़ा और कुसुम उस तक पहुँच पाती उसके पहले उसने अपनी अभिसारिका को खींच कर अपने सीने से लगा लिया..

दो तप्त हृदय स्नेह की अमृत वर्षा में भीगने लगे….
और उनके इस मधुर मिलना का साक्षी बनता अंबर भी उन पर अपनी बुँदे बरसा कर उन्हें आशीर्वाद देने लगा…

भावना भी एक तरफ खड़ी उन दो पागल प्रेमियों को बीच सड़क पर एक दूसरे के गले से लगे देख कर भावुक हो उठी थी..
भीगती खड़ी भावना की ऑंखें बहने लगी थी…

कुसुम और राजेंद्र की आंखें भी बह रहीं थी लेकिन उन दोनों की धड़कने आपस में जुड़ कर जो संगीत पैदा कर रहीं थी उससे वो सारा मार्ग उज्वल हो उठा था..

क्रमशः

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