अपराजिता -19

और शायद वो भी कहीं ना कहीं ये चाहता था कि रेशम इसी बहाने सही उससे और घर वालों से जुड़ जायें..
रेशम रसोई में पहुंची तब तक उसकी सासु माँ नाश्ता बनाने में लग चुकी थी, उसे देखते ही उन्होंने फटाफट उसे दो तीन काम बता दिये..

अथर्व के नाश्ते की टेबल पर आते तक में उसकी सासु माँ ने उससे फल कटवा कर टेबल पर सजवाने के साथ ही लस्सी भी तैयार करवा ली..।

रेशम के गले तक आकर बात अटक जा रहीं थी कि सुबह सुबह लस्सी कौन पीता है, लेकिन उसकी पूछने की हिम्मत नहीं हुई..
उसकी सास गज़ब की फुर्तीली थी..
उसके देखते देखते उन्होंने अथर्व और उसके पिता की प्लेट्स लगा भी दी और उसके हाथ में थमा दी..
वो बाहर टेबल पर नाश्ते की प्लेट रख आई..

गर्मागर्म आलू के पराठों की खुशबू से उसकी खुद की सोई भूख जाग गयी थी.. पिछले हफ्ते भर से लगभग इडली दोसा बड़ा उपमा खा खा कर उसका उत्तर भारतीय पेट रो पड़ा था..।
उसका मन तो डोंगेे में रखें आलू पराठो पर ही टिका हुआ था..

तब तक में अथर्व की माँ ने चाय भी चढ़ा ली.. अथर्व ने अपना नाश्ता खत्म किया और वहीँ से अपनी माँ को आवाज़ लगा दी..

“मैं निकल रहा हूँ माँ !”

रेशम रसोई में ही खड़ी थी, वो अथर्व की आवाज़ सुन चौंक कर अपनी सास की तरफ देखने लगी..

“जाओ जाओ, तुम्हें ही बता रहा है कि वो जाने वाला है.. जाओ बाहर दरवाज़े तक चली जाओ.. !”

रेशम ने धीमे से मुस्कुरा कर अपनी झेंप मिटाई और बाहर निकल गयी…
ससुर जी भी टेबल पर बैठे नाश्ता खा रहें थे, काम वाली बाई एक तरफ पोंछा लगा रहीं थी, देवर उसी वक्त अपने कमरे से निकल कर उबासी लेता वहाँ आया था, उन सब की नज़रों को पार कर उसे अथर्व तक जाने में लाज सी लग रहीं थी.

फिर भी खुद को समेट कर वो बाहर चली आई…
दरवाज़े से निकल कर अथर्व ने उसे देखा, वो भी दरवाज़े के बाहर चली आई..
उसे लगा शायद अब अथर्व उसके माथे को चूम कर उसे बाई बोलेगा और तब जायेगा, लेकिन अथर्व ने मुस्कुरा कर हाथ हिलाया और निकल गया…

तो क्या इसका मतलब इन्होने अब तक मुझे माफ़ नहीं किया… बातचीत तो अच्छे से कर रहें, लेकिन वो पहले वाला चुलबुलापन अब नजर नहीं आ रहा.. पहले तो ना जगह देखते थे ना समय बस चिपकने का बहाना चाहिए होता था, और आज माथा तक चूमना गंवारा नहीं किया..

रेशम अपने ख्यालों में खोयी अथर्व को जाते देखती रही और उसकी गाड़ी धूल उड़ाती नज़रों से ओझल हो गयी….

वो शायद और देर वहाँ खड़ी रह जाती लेकिन तभी उसका देवर बाहर निकल आया..

“क्या हुआ भाभी.. ? भैया तो निकल गए ? आप अब तक खड़ी क्या कर रहीं हैं ? आइये मम्मी आपको नाश्ता करने बुला रहीं !”

हाँ में सर हिलाती वो अंदर चली गयी..

अब तक उसके ससुर जी भी ऑफ़िस के लिए तैयार हो चुके थे.. उनके निकलने के बाद आरव को उसकी प्लेट पकड़ा कर रेशम की सास उसकी और अपनी प्लेट लें आई..

“नहीं मम्मी जी मैं सिर्फ एक ही पराठा लूंगी, वैसे भी बहुत बड़ा है !”..

उसकी सास ने हामी भर कर दूसरा परांठा निकाल कर डोंगे में डाल दिया…

“साथ में लस्सी छांछ या चाय क्या लोगी.. ?”

“चाय !”

“मैं भी पराठों के साथ चाय ही लेती हूँ, ये अथर्व को ही पता नहीं कैसे पराठों के साथ लस्सी पसंद आती है.. !”

इसके बाद रेशम की सास अथर्व की तारीफों में लग गयी और अपने पति के बारे में ढ़ेर सारी बातें सुनना रेशम को भी बड़ा अच्छा लग रहा था..

नहा धोकर वो वापस रसोई में अपनी सास का हाथ बंटाने चली आई..
खाना तो पूरा उसकी सास ने ही बनाया, बीच बीच में वो रेशम को कुकिंग टिप्स भी देती जा रही थी, लेकिन उनके खाना बनाने में असिस्टेंट बनी रेशम को ढ़ेर सारी भागदौड़ करनी पड़ रहीं थी…
कभी ये लाओ कभी वो लाओ, रेशम को लगा इससे तो ज्यादा आसान होता वो खुद खाना बना लेती…
इतने सब के बीच उसने भी कुछ एक डिश खुद बनाने की इच्छा ज़ाहिर कर दी और उसकी सास ने उसे गोभी पकड़ा दी..।

रेशम को खाना बनाना आता था, भले ही उसने अपने घर पर बनाया नहीं था, लेकिन मानव के कुकिंग के शौक के कारण वो भी सब सीख गयी थी..
अक्सर मानव खाना बनाया करता था और वो वहीँ रसोई में बैठी उससे बातें करती उसकी मदद भी किया करती थी.. इसलिए उसे भी रसोई का अच्छा ज्ञान था..
उसने अपने हिसाब से गोभी आलू बना ली..
हालाँकि उसके बनाते में उसकी सास ने उसे दो तीन बार टोक दिया..

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