” कैसे मतलब यहां आने के लिए कोई नियम बनाए कि सिर्फ इसी दिन आ सकते हैं, या सिर्फ इसी वक्त आ सकते हैं? क्या हम जब हमारा मन करे तब यहां नहीं आ सकते? आखिर डॉक्टर साब हमारे भी तो दोस्त हैं..।”
कुसुम की बात का जवाब दिए ही बिना ही सरना उसके साथ खड़ी भावना की तरफ देखने लगा… सरना के चेहरे पर भी वही भाव थे जो भावना के..।
वह दोनों कुसुम के मन की दुर्बलता को अच्छे से समझ रहें थे..।
लेकिन इसका अंजाम भी बखूबी समझते थे..।
कुसुम राजेंद्र के सरहाने बैठी पट्टियां बदलने लगी…
थोड़ा सर पर चढ़ी गर्मी कम हुई तो राजेंद्र ने आंखें खोल दी….
कुछ दवा का भी असर था जो राजेंद्र अब हल्का महसूस कर रहा था, वो धीरे से टेक लगा कर बैठ गया..
उसने सामने कुसुम को देखा, लेकिन इस वक्त की कमज़ोरी के कारण उसे कुछ कह नहीं पाया..
“आपके लिए मालपुआ लेकर आये थे, लेकिन आपको इतना बुखार हो रखा है, ऐसे में अम्मा कहती है हल्का फुल्का खाना ही लेना चाहिए… !”
राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा…चुप बैठा रहा, शाम ढलने लगी थी, उसी समय एक भगोने को हाथ में लिए गेंदा चली आई..
“अम्मा दलिया भेजी है डाकटर बाबू… !”
गेंदा को पहले मालूम नही था की अंदर कुसुम मौजूद है, इसलिए उस पर नज़र पड़ते ही वो थोड़ा चौंक गयी, लेकिन फिर खुद को संभालते हुए उसने दलिया का डोंगा रसोई वाले हिस्से में रखे टेबल पर धर दिया…
कुसुम की बाँह में भावना ने धीरे से चिमटी काटी और उसे घर वापस चलने का इशारा कर दिया..
उसके इशारे को समझ कर सरना ने भी हाँ में गर्दन हिला दी..
“हाँ.. निकलो आप लोग.. अँधेरा घिरने लगा है.. !”
कुसुम का वहाँ से जाने का बिल्कुल मन नहीं था, लेकिन वो भी जानती थी कि वहाँ से जाना ही पड़ेगा..
एक बार अपने डाक साब पे पूरी नज़र मार कर वो भारी मन से वहाँ से निकल गयी… वहाँ से निकलते ही भावना की साँस में सांस आई…।
कुसुम के जाते ही वहाँ मौजूद सभी के चेहरे पर भी राहत चली आयी..
“डाक्टर बाबू दलिया खाएंगे ? लें आएं ?”
गेंदा ने पूछा और राजेंद्र ने ना में सर हिला कर आंखें मूंद ली..
वो भी क्या करता, जितना ही कुसुम से अपना मन हटाना चाहता था उतना ही उसका मन उसी की तरफ भागे जा रहा था…
बाहर कोई किशोरवय लड़का अपने नए नवेले रेडियो में कोई गाना सुनता हुआ निकला और स्वरलहरी खुली खिड़की से अंदर तक तैरती चली आई…
किया रे जो भी तूने कैसे किया रे
जिया को मेरे बाँध ऐसे लिया रे
समझ के भी न मैं समझ सकूँ…
सवेरो का मेरे तू सूरज लागे
तू मेरा कोई ना होके भी कुछ लागे…..
कुसुम अपनी बाइक संभाले वहाँ से निकल गयी, लेकिन उस मुहल्ले के चौक पर की गुमटी में खड़े दीपक ने उन दोनों को देख लिया..
दीपक चंद्रा भैया का चमचा था… उसकी आंखें कुसुम को इस मुहल्ले से निकलते देख चौड़ी होकर चमक उठी….
अथर्व अगली सुबह भी घूमने के लिए जल्दी तैयार हो गया, लेकिन रेशम ने गौर किया की अथर्व कुछ बुझा बुझा सा था..
रेशम भी उसे देख कर सहमी सी थी..
उसके मन की हालत अजीब हो रही थी, वो अपने मन में चलती तकलीफ के कारण अथर्व को भी परेशान नहीं करना चाहती थी..
लेकिन अथर्व से कुछ कह भी नहीं पा रहीं थी..
होटल के कमरे में अथर्व जैसे ही तैयार होकर बैठा, रेशम ने उसके सामने चाय का कप रख दिया..
होटल रूम में पड़े पाउच और गर्म पानी से ही उसने ये बनाया था..
अथर्व ने एक नज़र उस चाय पर डाली और ना में गर्दन हिला कर अपना फ़ोन उठाये निकलने के लिए तैयार खड़ा हो गया…
“क्या हुआ ? चाय नहीं पिएंगे आप ?”
अथर्व ने रेशम की तरफ देखा..
“यहाँ ठेठ दक्षिण भारत में आकर चाय कौन पीता है, मुझे तो वैसे भी कॉफ़ी पसंद है और यहाँ तो जगह जगह मस्त फिलटर कॉफ़ी मिलती है, वहीं पिएंगे..!
दूसरी बात ये पाउच मिल्क और डिप चाय मुझे पसंद नहीं है।”
रेशम ने धीमे से हाँ में गर्दन हिला दी…
अपनी बात कह कर वो बाहर निकल गया, रेशम भी अपना पर्स लटकाये तुरंत बाहर आ गयी..
बाहर आज मौसम सुहावना था.. आसमान में हलके से बादल थे, खुशनुमा हवाएं बह रहीं थी..
उनकी टैक्सी भी आ चुकी थी..
टैक्सी में सवार वो लोग निकल पड़े..
” किसी अच्छे से रेस्टोरेंट ले चलो! “
अथर्व ने ड्राइवर को कहा और अपना मोबाइल निकाल लिया..
उनके होटल बुकिंग में उनका ब्रेकफास्ट बुफे भी बुक था, फिर भी अथर्व ने उधर रुख भी नहीं किया और ड्राइवर को पहले रेस्टोरेंट लें जाने ही क्यूँ बोल रहा ये रेशम के दिमाग में नहीं घुसा..
फिर उसे लगा, गुस्से में अथर्व शायद होटल के ब्रेकफास्ट को भूल गया होगा और अब भूख लगने पर रेस्टोरेंट चलने बोल रहा..
अथर्व के बतायें को समझ कर ड्राइवर उन्हें विशुद्ध दक्षिण भारतीय कैफे में ले आया..
वहाँ पहुँच कर अथर्व ने अपनी पसंद से अपने लिए नाश्ता मंगवाया और मेनू कार्ड रेशम की ओर बढ़ा दिया…
वो अब तक मन ही मन अथर्व से सहमी हुई थी, उसे लग रहा था अथर्व उससे नाराज़ हो गया है, और अब तक नाराज़ ही है..
“आप ही ऑर्डर कर दीजिये.. !”
“ऐसे कैसे ? तुम अपनी चॉइस भी तो बताओ !”
रेशम की आँखों में झांकते हुए अथर्व ने कहा.. लेकिन रेशम उसकी बात समझ नहीं पायी….
” लेकिन मैं आपकी चॉइस का खाना चाहती हूं..!”
” शादी हो गई इसका यह मतलब नहीं रेशम कि तुम हर काम मेरी चॉइस से करो.. मेरे साथ रिश्ते में बंधने के साथ ही यह बात भी याद रखना कि मैं कभी अपनी पसंद और नापसंद तुम पर नहीं थोपूंगा, यह तुम्हारी अपनी जिंदगी है और तुम इसे अपने तरीके से ही जियोगी..
शादी हो जाने का ये मतलब नहीं हो जाता कि तुम मेरे अधीन हो गई,या मेरी गुलाम हो गई हो…!
तुम अपनी चॉइस, अपनी इच्छा अनिच्छा बता सकती हो.. !”
अथर्व ने गहरे भाव से कहा और उसकी बात समझ कर रेशम भावुक हो गयी.. उसका उसी वक्त अपने पति के सीने से लगने को मन मचलने लगा, लेकिन इतने लोगों के बीच संकोच में घिरी वो बस उसे आँखों ही आँखों में पीती बैठी रहीं…
इडली और साम्भर बड़ा खाते हुए अथर्व ने दो कप फ़िल्टर कॉफ़ी भी मंगवा ली..
पहले घूंट में रेशम को कॉफ़ी कड़वी लगी लेकिन फिर दूसरे तीसरे घूंट में कॉफ़ी का असली रंग जमा और वहीं कॉफ़ी उसे अमृत घूंट लगने लगी…
