अपराजिता -18
अखंड की माँ को कुसुम पसंद आ गयी थी और वो कुसुम का रोका कर लेना चाहती थी…
लेकिन तभी कुसुम अपनी जगह पर खड़ी हो गयी…
“रुकिए हमें कुछ कहना है !”
कुसुम की माँ को कुसुम का ऐसे खड़ा होना पसंद नहीं आया…
उनकी समझ से उनकी बेटी कुछ तो अनर्थ करने जा रहीं थी.. होने वाले ससुरालियों के सामने कौन सी अच्छे घर की लड़की ऐसा बोलती है..?
“क्या बोल रही कुसु ?”
कुसुम ने अपनी माँ की तरफ देखा और वापस सामने खड़ी उन औरतों की तरफ देखने लगी…
” देखें आप लोग बुरा मत मानिएगा, हम आज की लड़की हैं, आज के तौर-तरीकों से ही हमारे अम्मा और बाबूजी ने हमें पाला पोसा है। हम शादी से पहले एक बार आपके बेटा से मिलना चाहते हैं। क्या हमारा ऐसा चाहना गलत है… ?”
कुसुम के ऐसा बोलते ही भावना ने राहत की लंबी सी सांस ली।
उसे लगा था, पता नहीं यह पागल लड़की क्या बोल जाएगी। लेकिन उस हिसाब से कुसुम ने बहुत सादी सी ही बात कही थी, और इस बात पर ऐतराज़ करने का भी कोई कारण नहीं था…
कुसुम की बात सुनकर अखंड की मां और काकी ने एक दूसरे की तरफ देखा। काकी की आंखों में हल्का सा रोष नजर आया लेकिन अखंड की मां की आंखों में गहरी शांति थी। उन्होंने धीरे से पलक झपकाई और मुस्कुराकर कुसुम की तरफ देखने लगी।
” हां हां बिटिया क्यों नहीं ? तुम आज की लड़की हो, तुम्हारा अपने होने वाले पति से मिलने का पूरा हक है। हम ऐसा करते हैं, यज्ञ से फोन में बात कर लेते हैं, अगर उसे आते बन जाए तो अभी ही आ जाएगा और नहीं तो पहले एक बार तुम दोनों आपस में मिल लेना उसके बाद ही रोका करेंगे..।”
कुसुम ने हां में गर्दन हिला दी… वह भी इतना तो समझती ही थी कि अगर लड़के के पास पहले ही वक्त रहा होता तो वह अपनी मां और काकी के साथ ही यहां आया होता, इसलिए अभी फोन कर तुरंत बुलाने का नतीजा सिफर ही निकलना था। यह बात कुसुम भली प्रकार समझती थी। उसके मन से तुरंत ही रोका होने का डर दूर हट गया। जैसा कुसुम ने सोचा था वही हुआ। अखंड की मां ने यज्ञ को फोन जरूर किया, लेकिन यज्ञ ने इस वक्त वहां पहुंचने में असमर्थता जता दी। अखंड की मां और काकी अखंड की दादी के साथ बड़ी खुशी खुशी कुसुम के घर से विदा होकर चले गए। एक तरह से दोनों ही पक्ष की औरतों के बीच यज्ञ और कुसुम की शादी की मौन स्वीकृति तय हो गई…।
उन लोगों के वहां से जाते ही कुसुम कुमारी भी अपने हाथ में मालपुआ और रबड़ी का डिब्बा सजाए भावना को साथ लिए निकल गई। हालांकि उसके जाने पर उसकी भाभी ने उसे टोका भी लेकिन कुसुम कब किसके टोकने से रुकने वाली थी। उसने अपनी बाइक निकाली और पीछे भावना को बैठा कर डाक साहब की डिस्पेंसरी की तरफ निकल गई। लेकिन डिस्पेंसरी का दरवाजा बंद था। हमेशा की तरह मरीजों की भीड़ भी वहाँ नजर नहीं आ रही थी। कुसुम ने अंदर जाकर देखा बिट्टू भी वहां मौजूद नहीं था..।
अस्पताल में साफ सफाई करने वाला पार्ट टाइम स्वीपर वहां मौजूद था, कुसुम ने उसे ही आड़े हाथों ले लिया..
