अपराजिता -17

कुसुम को देख कर पल भर को सुजाता की नज़र भी उस पर ठहर गयी…

“अच्छी लग रहीं हैं नंद रानी.. चलिए आपके ससुराल वाले आ गए.. !”

“आप तो मान ही बैठी है कि वो हमारे ससुराल वाले ही हैं !”

“हाँ तो काहे नहीं मानें ? रिस्ता पक्का ही समझिये, बस आज ये लोग सगुन साईत कर जायेंगे… आपका ओली पड़ने वाला है रानी जी !”

“हूँ.. आपके कहने भर से ऐसा हो जायेगा क्या ?”

“चलिए नीचे तो चलिए ! फिर देख लीजियेगा !”

कुसुम को लेकर सुजाता नीचे चली, उसी के पीछे पीछे भावना भी बढ़ गयी…

नीचे कमरे में तीन औरतें बैठी कुसुम का इंतज़ार कर रहीं थी..
उनमे से एक अखंड और यज्ञ की माँ शची थी, दूसरी उनकी देवरानी और तीसरी उनकी सास यानी अखंड की दादी…
उन तीनों के पीछे दो नौकर हाथ बांधे खड़े थे..
सामने टेबल पर बड़े बड़े टोकनों में फल फूल मिठाई मेवा धरे थे.. कुछ साड़ियां नारियल चूड़ियाँ भी रखी थी..
ये सब देख कुसुम का दिमाग भी पल भर को ठनका…

और तभी उसकी अम्मा उसका परिचय सामने बैठी औरतों से करवाने लगी…

“ये हमारी कुसुम है… बचपन से घर भर की लाड़कुंवर है… ।
पलको पर बैठा कर पाला है, और अब तो इसके ब्याह के नाम पर कलेजा मुहँ को आता है कि ये कैसे संभालेगी सब? क्या करेगी अपने ससुराल में ?”

“काहे…. कुछ सिखाये नहीं है क्या ?”

अखंड की काकी बोल पड़ी…

“सिखाएंगे काहे नहीं, लेकिन माँ का तो करेजा फट ही ना जाता है, अपनी बिटिया को बिदा करने में ?”

“सही कह रहीं बहुरिया… हमारे बखत तो हम पांच साल की भई की हमारा ब्याह हो गया, ऊंच नीच सब तो ससुराल आके ही सीखा…। अब आजकल की लड़कियां तो फिर भी उम्र गुज़ार लेती हैं मायका में.. हमको तो कुछ याद तक नहीं… !”

दादी ने अपनी व्यथा कथा कह दी…
इस सब प्रकरण में घर से कोई पुरुष सदस्य उपस्थित नहीं हुआ था..
क्यूंकि बड़े ठाकुर का मानना था कि वो घर परिवार और सामाजिक दायरा देख कर विवाह स्थिर करने में विश्वास करते हैं और समाज में कुसुम के पिता का खासा नाम है। तो उन्हें इनसे कोई शिकायत नहीं, बाकी रही लड़की देखने दिखाने की बात तो वो तो औरतों का काम है ! वहीं देखें और छांटे… !

अखंड की माँ के चेहरे पर मुस्कान छायी हुई थी…
उन्हें अपने यज्ञ के लिए कुसुम भा गयी थी..

“हमें आपकी बिटिया पसंद है !”

शची के ऐसा कहते ही साथ बैठी देवरानी ने धीरे से खोंसा लिया…

“अरे ई का जिज्जी, इतना जल्दी कौन हाँ बोलता है ?
थोड़ा बात तो कर के देखिये !”

“हमको तो ठीक ही लग रही छोटी !”

शची ने अपनी बात स्पष्ट कर दी…

दोनों देवरानी जेठानी की खुसुर फुसुर बाकियों को सुनाई नहीं दे रही थी…

शचीरूपा ने सामने बैठी कुसुम की माँ की तरफ देखा..

“लड़की क्या कर रही अभी ?”

“बीए कर रही… पढ़ने का ख़ूब सौक है, पहले हमने कहा भी कि घर में ही पढ़वा दीजिये, प्राइभेट से परीक्षा दे लेगी… लेकिन कुसुम के बाबूजी बोलने लगे थोड़ा घर से बाहर निकलेगी तभी तो दुनियादारी सीखेगी…
सीधी बहुत है हमारी कुसुम… गाय है एकदम गाय !!
घर की गाड़ी में सर नीचे झुकाये कॉलेज जाती और आती है.. आज तक गाँव का नहर बाजार कुछ नहीं देखा इसने… बस शिवरात्रि के मेला में हमारे ही साथ निकलती है… ! खाना तो अइसन पकौती है की कलछुल तोड़ दे.. !”

वहीँ बैठी कुसुम कुमारी को अपने गुणों की प्रशंसा सुन हंसी आ रहीं थी.. क्यूंकि इन गुणों का दशमांश भी उसमें ना था…

“सुघड़ और गुणी तो लग ही रही आपकी कुसुम… इसलिए कह रहें हैं.. हमें आपकी बिटिया पसंद है, और अगर आप लोगों को आपत्ति ना हो तो क्या हम कुसुम की ओली भर दें… ?”

शची ने बड़े प्यार से पूछ लिया….
उस परिवार में से किसी ने होने वाले वर को देखा तक नहीं था ।
लेकिन ठाकुरो का लड़का था, लम्बा चौड़ा कद्दावर तो होगा ही… सामने बैठी माँ को देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि लड़का माँ पर बिल्कुल ही नहीं गया तभी उसके बदसूरत होने के आसार हो सकते थे…।
उन सभी को संकोच में देख शची ने अपने पर्स से एक फोटो निकाल उन लोगों के सामने रख दिया..

तस्वीर में दो लड़के आसपास बैठे मुस्कुरा रहे थे..
दोनों का ही चेहरा मिल रहा था…
एक जैसे ऊँचे पूरे, लड़के तस्वीर में हल्का सा मुस्कुरा रहे थे….
तस्वीर किसी पारिवारिक आयोजन की लग रही थी..

“ये…. ?

कुसुम की माँ ने अखंड की तस्वीर पर ऊँगली रख पूछा और शची बोल पड़ी…

“ये हमारा बड़ा बेटा है अखंड सिंह परिहार.. ये शहर में रहता है… बहुत समय से वहीँ रह गया है तो अब गाँव इसे भाता नहीं है…।
छात्र जीवन से ही राजनीती से जुड़ गया था, दो दो बार छात्र युवा परिषद् का अध्यक्ष रह चुका है… इसे राजनीती में ही जाना है, इसलिए इधर का रुख कम ही करता है..
ये हमारा दूसरा बेटा यज्ञ है.. यहीं हमारे साथ रहता है और हमारा सारा पुश्तैनी काम धंधा सब यहीं संभाल रहा… कुसुम के लिए इसी का रिश्ता लाये हैं.. !”

तस्वीर में मुस्कुराते बैठे दोनों लड़के सुंदर थे, लेकिन अखंड के चेहरे की बात ही अलग थी… उसे देखने के बाद देखने वाले को दूसरा कोई पसंद नहीं आ सकता था…।
यज्ञ भी अखंड की परछाई सा ही दिखता था, पर फिर भी जो बात अखंड में थी वो यज्ञ में नहीं थी..।

कुसुम की माँ की आंखें भी अखंड की तस्वीर पर पल भर को अटक गयी..

“इनका ब्याह कहाँ भया ?”

“अरे अभी ब्याह ही कहाँ भया… ? बाबू अभी मना किये बैठे है सादी ब्याह के लाने !”

अबकी बार दादी ने जवाब दिया..

“काहे ?”

कुसुम की माँ अपनी उत्सुकता दबा नहीं पायी…

“अभी कहते हैं पहले राजनीती में कोई बढ़िया सा पद मिल जायें तभी ब्याह करेंगे !”

शची ने बात को गोल गोल घूमा दिया…

4.2 5 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments