सुजाता मुस्कुरा उठी… और कुसुम की गुस्से में माथे की नस फड़कने लगी..
“ये क्या सुन रहें हम अम्मा ?”..
“ठीक ही सुन रही हो !”
“हम अपना प्रदर्शनी नहीं लगवाएंगे.. हम इंसान है कोई टीवी फ्रिज नहीं कि हमको देख के ग्राहक पसंद कर जायें..
पसंद आया तो घर ले जायें वरना दुकानदार को कमी बता कर छोड़ जायें.. !”
“ऐ कुसुम ! बहुत बोलती हो तुम ! आज तक थप्पड़ नहीं लगाए तुम्हारे, अब मजबूर ना करो… समझी !”
“नहीं समझे.. ! और ना समझेंगे ! हमको ये सब अजायब में मत फंसाओ अम्मा ! हमको ये देखना दिखाना नहीं पसंद !”
“भावना… इसे अपने साथ ऊपर ले जाओ.. इसके लिए साड़ी जेवर भेजते हैं, ज़रा तैयार कर देना इसे.. !”
कुसुम की माँ भी ठकुराइन थी आखिर.. जब उन्होंने आदेश दे दिया तो फिर बहुत बार ठाकुर साहब की भी मजाल ना होती थी उनकी बात काटने की…
अभी भी उनकी बड़ी बड़ी आँखों में आदेश की आहट पाते ही दोनों लड़कियां सर झुकाये ऊपर चली गयी…
सुजाता ने उन दोनों को जाते देखा और वापस काम पर लगने जा रही थी कि उसकी सास का आदेश उसके लिए भी आ गया..
“जाओ बहु हमारे कमरे में हम साड़ी निकाल कर आये हैं… वो और वहीँ रखें जेवर कुसुम को दे आना… और ज़रा अच्छे से उसे तैयार भी करवा दो.. !”
“जी अम्मा जी !”
ऐसे भले ही सुजाता कितनी भी तेज़ हो लेकिन जब उसकी सास को गुस्सा चढ़ता था तब वो शांत रह कर उनकी सब बातें सुन लेती थी…
कुसुम पैर पटकती अपने कमरे में पहुँच गयी.. भावना उसे तैयार हो जाने की ज़िद कर रहीं थी..
“अबे यार कुसुम कली तुम तैयार तो हो जाओ… बाद की बाद सोचेंगे !”
“क्या बाद में सोचोगी भावना ? लड़का हमको पसंद कर गया तो… ? क्या हम उससे शादी कर लेंगे ? फिर हमारे डाक साब का क्या होगा ?”
“पागल लड़की!! अभी बस तुमको देखने आ रहें, अभी कोई रिश्ता तय नहीं हुआ है तुम्हारा…
आज ये देखने दिखाने ना कार्यक्रम निपटा लो, बाद में इसी लड़के से मिल कर बता देना की तुम शादी नहीं कर सकती क्यूंकि…
“क्यूंकि क्या… ?”
“क्योंकि तुम डाक्टर साहब से प्यार करने लगी हो…।”
भावना अपने भोलेपन में कह गयी और ये बात आज कुसुम के कानों से उतरती उसके दिल को गुदगुदा गयी…
वो प्यार करने लगी है, अपने डाक्टर साहब से… ?
हाँ ये सच ही तो है… कुसुम के चेहरे पर मुस्कान रेंग गयी…
“भावना !! ये लड़के वाले चले जाएं उसके बाद हमारे साथ चलोगी ना.. !”
“कहाँ ?”
“और कहाँ ?”
भावना ने कुसुम की बात समझी और अपना माथा पीट लिया…
“लो अभी तो तुम तैयार हो जाओ… बाद की बाद में देखेंगे.. !”
उसी समय सुजाता रेशमी साड़ी और जेवर के डिब्बे लेकर चली आई…
कुसुम के पलंग पर सारा सामान रख कर मुस्कुराती हुई सुजाता बाहर चली गयी..
“जल्दी तैयार हो जाओ नंद रानी, आज आपके राजा जी आने वाले हैं… !”
और हंसती खिलखिलाती सुजाता नीचे चली गयी..
“तैयार हो होगी ही आपकी नंद रानी लेकिन अपने डाक सब के लिए, आपके लाये हुए राजा जी के लिए नहीं… !”
कुसुम ने उठ कर कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया….
ढ़ेर सारे मंदिर घूमते हुए रेशम और अथर्व धीरे धीरे बातचीत में खुलते भी जा रहे थे….
दोनों एक ही कॉलेज के पढ़ें थे इसलिए आपस में बातों के टॉपिक भी बहुत से थे..
ऐसे प्रोफेशनल कॉलेज में अक्सर कई नमूनापंथी वाले विद्यार्थी और कई अतरंगी किस्से हुआ ही करते हैं.. दोनों उन्हीं किस्सों कहानियों को याद करते उनकी चर्चा में खुद भी पास आ रहे थे..

Nice