अपराजिता -16

“तुम तो दूर रहो इस सब से.. काम की ना काज काज की दुश्मन अनाज की… कुछ करना नहीं है, बस दिन भर अपनी फटफटी में पूरा गाँव में धुर्रा उड़ाती फिरेंगी, किसी दिन चंद्रा का दिमाग ख़राब हुआ ना, तुम्हारी फटफटी में आग लगा देगा !”

“काहे इतना जलती हो अम्मा हमसे ? हम मानते हैं तुमको अपना जीवन में शादी के अलावा कुछ करने नहीं मिला तो अब हमसे उसका बदला लोगी ?”

हँसते हुए कुसुम अपनी माँ के गले से झूल गयी..

“हम काहे बदला लेंगे, हम तो चाहते हैं हमसे भी अच्छा घर मिले तुमको ! हर माँ यहीं तो चाहती है !”

“तो अच्छा घर काहे चाहती हो, अच्छा वर चाहो ना? वर अच्छा होगा तो घर अच्छा होईहे ना जायेगा !
हमको खुश तो आखिर हमारा वर ही रखेगा ना… ? घर कित्ता भी बड़ा हो अगर वर में दम नहीं होगा तो अपनी वधु को तो दुःखी कर जायेगा ना अम्मा ! क्यूँ कम्मो, सही बोले हम ?”

उसने पास खड़ी कम्मो के कंधे पर हाथ धर दिया.. और कम्मो ने कुसुम की वर वधु वाली बात को अपने अंदाज़े से समझा और हुलस के हँस पड़ी…

“छी, चुप करो ! कुछ भी बेशर्मो वाली बात ना कहो.. अभी बाहर कोई सुन लिया तो..

इन सारी बातों के बीच कुसुम इधर उधर बर्तन अलट पलट करती रबड़ी के लिए डिब्बा ढूंढने लगी और उसकी ढूँढ को समझ कर कम्मो ने उसे एक डिब्बा पकड़ा भी दिया…….
उसने उस छोटे डिब्बे में रबड़ी रख ली..

कम्मो को माँ बेटी की इस चुहलबाज़ी में बड़ा आंनद आता था… वो अपनी हंसी दबाने की कोशिश कर रहीं थी…
उसी वक्त गिट्टू को सुला कर सुजाता भी बिल्कुल बेमन से रसोई में चली आई..
सुजाता का जब काम करने का मन नहीं करता वो अक्सर गिट्टू को सुलाने या दूध पिलाने के बहाने ऊपर अपने कमरे में चली जाया करती थी..
और फिर गिट्टू को पलंग पर अपने पास लेटा कर मनोहर कहानियां खोल लेती थी.. कई बार ऐसे पढ़ते हुए उसे झपकी भी लग जाती थी…
सुजाता ज़रा तेज़ स्वभाव की थी भी, वो बात बेबात चंद्रा को भी समय कम देने के लिए दोष देते हुए अपनी सास के सामने चार बातें सुना जाया करती थी…
चंद्रा वैसे तो तेज़तर्रार था लेकिन घर के अंदर बात ना बढे इसलिए कई बार सुजाता की बात सुन लिया करता था और इसी कारण सुजाता का हौसला और बढ़ जाता था..
इन्हीं सब कारणों से सुजाता की सास उससे दबती थी… और यहीं बात कुसुम को पसंद नहीं आती थी..
इसी लिए कुसुम और सुजाता के बहुत सरल सुलझे हुए संबंध नहीं थे… लेकिन ऐसे बुरे भी नहीं थे…!

रसोई में आते ही बर्तन उठापटक करती सुजाता ने बिल्कुल वो समा बांध दिया जैसे अब तक रसोई के महाभारत की वही अकेली अभिमन्यु थी…

उसकी सास सब समझते हुए भी चुपचाप काम में लगी रही….

“ये रबड़ी डिब्बे में क्यूँ रख रहीं हो कुसुम ?”.

अपनी भाभी के सवाल पर कुसुम मुस्कुरा उठी..

“अभी तो मालपुआ भी रखेंगे.. !”

और उसने मालपुआ भी डिब्बे में रखना शुरू कर दिया..

“हाँ पर जिसके लिए लेकर जाना था वो तो यहीं आ गयी..

सामने से आती भावना पर नज़र पड़ते ही सुजाता ने कुसुम को टोक दिया..

कुसुम ने भावना को देखा और मुस्कुरा उठी..

“हाँ ! आज हम दोनों का तालाब किनारे पिकनिक का प्लान है… बस उसी लिए रख रहें.. !”

“लेकिन भावना तो कुछ नहीं लायी !”

सुजाता को जैसे कुसुम को छेड़ने में मज़ा आ रहा था..

“ऐ.. कोई पिकनिक विकनिक नहीं जाना है, आज तुम घर से बाहर नहीं जाओगी!”

“काहे… काहे नहीं जायेंगे ?”

“क्यूंकि कुसुम कुमारी जी आज आपको देखने लड़के वाले आने वाले हैं ना.. !”

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Nidhi
Nidhi
2 years ago

Nice