अपराजिता -14

रविवार छुट्टी वाले दिन कुसुम ने घर पर खाना बनाने वाली दीदी से कह कर अपनी पसंद का रोगन जोश बनवाया, और नरम मखमली मुगलई पराठों के साथ डिब्बे में पैक कर अपनी बाइक निकालकर भावना के घर जाने के लिए बोल कर निकली ही थी कि भावना खुद वहां चली आई। कुसुम ने उसे इशारे से साथ चलने की बात कही और भावना के मना करने के बावजूद कुसुम ने भावना को गाड़ी में बैठाया और गाड़ी राजेंद्र के घर की तरफ मोड़ ली…

राजेंद्र घर पर ही था..
कुसुम ने गाड़ी एक तरफ खड़ी की और धड़धड़ाते हुए अंदर पहुँच गयी… राजेंद्र एक मोटी सी मेडिकल की किताब पर आंखें गड़ाए बैठा था…

कमरा सांय सांय कर रहा था..
वाकई सिर्फ एक इंसान के चले जाने से कितना कुछ बदल जाता है… कुसुम आज दूसरी ही बार इस घर में आई थी, लेकिन उसे भी आज इस कमरे में रौनक नहीं बल्कि एक शांत नीरवता पसरी नज़र आ रही थी..
दादा जी की तस्वीर एक दीवार पर टंगी थी जिसके सामने एक दीपक जल रहा था..
कितनी अजीब बात थी, जो इंसान आज से पंद्रह दिन पहले इस कमरे में चहलकदमी कर रहा था आज एक तस्वीर बन कर दीवार तक सीमित रह गया था…

कुसुम तो बिना किसी झिझक के अंदर चली आई, उसके पीछे भावना एक संकोच के साथ अंदर आ गयी…।

कुसुम ने अपने बैग से टिफिन निकाला और राजेंद्र के ठीक सामने की टेबल पर जैसे ही रखा उसी वक्त एक परोसी हुई थाली भी राजेंद्र के सामने रख गयी…

कुसुम ने तुरंत सामने देखा, थाली परोसने वाली भी कुसुम को ही देख रहीं थी..
सांवली रंगत लिए खड़ी लड़की का चेहरा एक बार दिखने पर दुबारा पलट कर देखने के लिए बाध्य कर देता था..
तीखे से चेहरे पर सामने ज़रा झुक कर पीछे ऊपर की तरफ खींची हुई आंखें थी.. कमान सी भँवे और छोटी गोल मंगोलियन नाक के नीचे हलके भरे भरे से होंठ जैसे कुछ कहने को आतुर थे..
उसके चिबुक पर उसने एक चांदी की बाली पहन रखी थी… घुंघराले से बालों को कस कर पीछे बांध रखा था पर कुछ एक ज़िद्दी लटें उसके माथे पर बिखर कर उसके चेहरें की शोभा बढ़ा रहीं थी…

कुसुम ने उसे देखने के बाद चिढ कर अपने डिब्बे को राजेंद्र के सामने सरका दिया..

“रोगन जोश लेकर आये हैं आपके लिए डाक साब !”

राजेंद्र ने ऑंख उठा कर कुसुम की तरफ देखा.. उतनी देर में बाहर से सरना भी चला आया…

वो आते ही कुसुम और भावना को देख चौंक गया….

“लेकिन मैं ये सब नहीं खाता !” कह कर राजेंद्र ने उस दूसरी लड़की की परोसी थाली अपनी तरफ खींच ली..
दो मोटी मोटी हाथ से थापी घी चुपड़ी रोटियों के साथ कोई हरा सा साग, एक मोटा सा हाथ से कुचरा प्याज का टुकड़ा एक लम्बी सी हरी मिर्च और गुड़ थाली में रखा था..
उस रूखी सी थाली को देख कुसुम का मुहँ बन गया…
राजेंद्र उस थाली को हाथ में लिए बैठ गया..

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