
अपराजिता – 7
राजेंद्र ने अपने सहयोगी बिट्टू के साथ मिल कर अपना अस्पताल चमका लिया.. ये गाँव उसी का था, कभी उसका बचपन यहीं बीता था ! उसके माता पिता तो बचपन में ही गुज़र गए थे, उसके दादा जी ने ही उसे पाला पोसा था..
और इसीलिए राजेंद्र अपनी ज़िम्मेदारी निभाने वापस गाँव लौट आया था..
वो चाहता तो मजे से शहर के किसी बड़े अस्पताल में नौकरी कर लाखों रूपये कमा सकता था, दादाजी को भी ज़िद करके अपने साथ ले जा सकता था, लेकिन वो अपने गाँव के लोगों की सेवा का जज्बा रखता था, बस इसीलिए गाँव लौट आया था…!
वो सुबह सवेरे तैयार होकर अपनी डिस्पेंसरी में चला आता था..!. धीरे से लोगों को भी मालूम चला की शहर से डॉक्टरी पढ़ कर राजेंद्र वापस लौटा है, और लोग उसके पास अपना मर्ज़ दिखाने आने लगे..।
ऐसे ही एक सुबह वो अपने कमरे में बैठा मरीज़ देख रहा था कि उसे बुलेट की घड़घड़ाती आवाज़ सुनाई दी, और पल भर के अंदर कुसुम उसके केबिन में खड़ी थी.. राजेंद्र ने एक बार उसे देखा और वापस अपने मरीज़ को देखने लगा..
“डॉक्टर साहब.. वो… हम.. !”
“बाहर इंतज़ार कीजिये.. !”
राजेंद्र का जवाब सुन कुसुम का मुहँ लटक गया..
“हम भी बीमार है… इसीलिए.. !”
“बाहर इंतज़ार कीजिये… आपकी पारी आने पर आपको भी देख लूंगा.. !”
कुसुम मुहँ लटका कर जाने को हुई और फिर खड़ी हो गयी..
“डॉक्टर साहब.. !”
“बाहर इंतज़ार कीजिये… बिट्टू !”
.
राजेंद्र ने बिट्टू को आवाज़ लगा दी.. और बिट्टू एक छलांग में वहाँ पहुँच गया..
“हुजूर… !”
“क्या है ये.. कोई प्राइवेसी नहीं… मैं यहाँ मरीज़ देख रहा हूँ, और लोग घुसे चले आ रहे… एक एक कर के भेजा करो ना !”
बिट्टू ने हाँ में सर हिलाया और कुसुम की तरफ घूम गया.. कुसुम ने उसे घूर कर देखा और पांव पटकती बाहर निकल गयी..
“अपना नंबर आने पे चले जाना जिज्जी… काहे कलेश मचा रहीं ! डॉक्टर साहब का दिमाग बड़ा गरम है, जल्दी मिजाज ख़राब हो जाते हैं !”
“तो हम कम है क्या ?”
कुसुम ने तमक कर कहा और बट्टू की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी…
“इसके बाद और कितने मरीज बचे हैं ?”
बिट्टू ने पलट कर वेटिंग एरिया पर नज़र मार ली, उसके पीछे कुसुम ने भी देखा लगभग पंद्रह सोलह लोग वहाँ बैठे थे.. उन गाँव वालों के बीच बैठने में वैसे भी कुसुम को संकोच सा लग रहा था..
वो बड़े घर की लड़की थी और बड़े छोटे का भेद भाव ऊँची नीची जाति का भेदभाव उसे बचपन से घुट्टी के समान पिला दिया गया था..
इसलिए वो भी उसी रंग में रंगी थी..
इतने सारे लोगों को देख वो रुआंसी हो गयी.. और वहाँ बैठे गरीब बुज़ुर्ग लोगों ने उसे ही पहले अंदर जाने का इशारा कर दिया..
बिट्टू ने भी कुसुम से डर कर एक मरीज़ के बाद ही उसे अंदर भेजने पर हामी भर दी.. जैसे ही अंदर का मरीज़ बाहर आया, बिट्टू ने उसे ही अंदर जाने कह दिया.. कुसुम अपनी सहेली भावना के साथ अंदर दाखिल हो गयी..
“आप… आप यहाँ कैसे ?”
राजेंद्र ने नाराज़गी से पूछा..
“हम बीमार है… दिखाने आये हैं.. !”
“वो जानता हूँ मैं, लेकिन अभी आपका नंबर नहीं आया.. ! बाहर जो मरीज़ पहले से इंतज़ार में बैठे हैं, मैं पहले उन्हें ही देखूंगा….।
आप बहुत बाद में आई हैं, इसलिए जाइये, बाहर इंतज़ार कीजिये.. !”
“ओह्ह डॉक्टर साहब… आप जानते भी हैं, हम हैं कौन..? कुसुम कुमारी नाम है हमारा, चंद्रभान सिंह तोमर की इकलौती बहन है हम… आजतक किसी की हिम्मत नहीं हुई, हमें ना कहने की !”
“तो… क्या करूँ ?”
“तो… ये की पहले हमारा इलाज कीजिये. !”
“आपको देख कर लग नहीं रहा कि आपको मेरे इलाज की ज़रूरत है, आपकी दवा पानी बिट्टू ही कर देगा..
बिट्टू…… मैडम को क्या दिक्कत है, पूछ कर अच्छे से दवा दे देना.. ! जाइये.. !”
“अरे…. ये तो हद ही हो गयी.. मतलब अस्पताल आये मरीज़ को कौन ऐसे देखता है भला ?”
“ऐसा ही हूँ मैं.. ! आप जाइये बाहर !”
उसकी बात सुन भावना ने कुसुम का हाथ पकड़ लिया..
” चल ना कुसुम.. बाहर चल, और कितना इंसल्ट करवाएगी.. ?”
राजेंद्र ने भावना की तरफ देख कर कहना शुरू किया..
“थैंक यू.. वैसे आप कुछ समझदार लग रहीं है… नाम क्या है आपका.. ?”
“जी… सर…. भावना नाम है हमारा !”
“हाँ तो भावना जी अपनी सहेली को यहाँ से बाहर नहीं सीधा घर वापस ले जाइये.. !”
“जी सर.. !”
भावना कुसुम को बाहर ले गयी…
राजेंद्र एक एक कर मरीज़ निपटाता चला गया..
गाँव की डिस्पेंसरी हो, मुफ्त की दवाएं मिलती हो तो मरीज़ कैसे नहीं आएंगे..?
एक के बाद एक आते गए और दोपहर ढलने को आ गयी…
राजेंद्र बिना खाए पिए मरीज़ देख रहा था.. आखिर आखिरी मरीज भी चला गया..
राजेंद्र खड़ा हुआ और अपना सामान रखने लगा तभी दरवाज़े से कुसुम वापस झांक उठी..
“अब आ जायें दिखाने..?”
“अरे तुम गयी नहीं अब तक.. ?”
“तकलीफ बहुत थी… इसलिए रुक गए.. !”
“आओ.. बताओ क्या हुआ है.. ?”
कुसुम ने अपने पैर को सामने की ओर कर अपनी सलवार ज़रा सी ऊपर सरका ली…
उसके पैर पर एक ज़ख्म नज़र आ रहा था… किसी गहरी नुकीली सतह से रगड़ सा खा कर बना ज़ख्म था.. ख़ून बह बह कर सूख गया था… लेकिन घाव काफ़ी गहरा सा नज़र आ रहा था…
उस घाव पर नज़र पड़ते ही राजेंद्र को बुरा लगने लगा, उसने तुरंत बिट्टू को आवाज़ दी और ड्रेसिंग का सामान लाने बोल दिया..
“पहले बोलना चाहिए था ना, कि इतनी ज्यादा चोट लगी है.. !”
उसके पैर को उठा कर एक छोटी टेबल पर रखते हुए राजेंद्र बोल उठा..
“आपने बोलने ही कहाँ दिया ?”
राजेंद्र ने उसे देखा और ना में गर्दन हिला कर उसकी सलवार ज़रा और ऊपर कर दी.. अपने हाथों में दस्ताने पहनने के बाद उसने कुसुम के पैर की पायल उतार कर टेबल पर रखी और हाथ में रुई लेकर उसका घाव साफ़ करने लगा… वो धीरे धीरे उसका घाव साफ करता जा रहा था और वो बड़े आराम से राजेंद्र को देखती बैठी थी..
मरहम पट्टी करने के बाद उसने बिट्टू से टिटनस का इंजेक्शन मंगवाया और कुसुम चौंक गयी..
“इंजेक्शन… ना… हम नहीं लगवाएंगे.. !”
“अरे.. ऐसे कैसे.. इंजेक्शन तो लगवाना ही पड़ेगा.. ।”
कुसुम तुरंत पीछे खड़ी भावना की तरफ घूम गयी..
“नहीं… भावना.. नहीं.. सुनो हम नहीं लगवाएंगे.. कहें दे रहें !”
“तुम्हारे कह देने से कुछ नहीं होता,समझी ! चुपचाप लगवा लो.. !”
राजेंद्र ने मुस्कुरा कर भावना को देखा और उसे आकर कुसुम को पकड़ने कहा.. कुसुम चिल्लाने लगी.. भावना उसके पास आकर उसका सर अपने पेट से लगा कर खड़ी हो गयी और राजेंद्र ने दूसरी तरफ खड़े होकर उसकी बांह में इंजेक्शन घोंप दिया..
ज़ोर से चिल्ला कर कुसुम पल भर को खामोश हो गयी..
” कुसुम… ए कुसुम.. जिन्दा हो ना, कहीं टपक तो नहीं गयी.. !”
भावना ने मुस्कुरा कर पूछा.. आंखें अब तक बंद किये बैठी कुसुम ने आंखें खोल दी… उसने भावना की तरफ देखा और धीरे से बोल पड़ी..
“बिल्कुल भी पता नहीं चला भावना.. ! इनका हाथ तो बहुत अच्छा है !”..
भावना मुस्कुरा उठी..
उसने राजेंद्र को देख धीरे से थैंक यू बोला और राजेंद्र ने हल्की सी गर्दन झुका ली..
भावना का सहारा लेकर कुसुम धीरे धीरे चलते हुए बाहर तक चली आयी..
राजेंद्र भी उनके पीछे बाहर चला आया..
“कुसुम गाड़ी कैसे चलाओगी अब.. ?”
राजेंद्र के सवाल पर कुसुम खुश हो कर भावना की तरफ झुक गयी.. -” देखो पहली बार में ही हमारा नाम याद रह गया डॉक्टर साहब को !”
भावना ने मुस्कुरा कर हामी भर दी.. तभी राजेंद्र वापस बोल पड़ा..
“भावना को भी बुलेट चलानी आती है क्या ?”
भावना ने गहरी नजरों से कुसुम की तरफ देखा..
“इन्हें तो हमारा भी नाम याद हो गया.. !”
कुसुम कुछ नहीं बोली और भावना ने हामी भर दी..
“जी डॉक्टर साहब.. हम भी चला लेते हैं बुलेट !”
“बहुत बढ़िया !”
“हम ही सिखाये हैं… !”
कुसुम की जलन वापस कुलबुला उठी और उसका जवाब सुन भावना और राजेंद्र हॅंस पड़े… कुसुम को गाड़ी में बैठा कर भावना ने गाड़ी आगे बढ़ा दी…
सुबह रेशम की ऑंख जल्दी खुल गयी… सोकर उठने के बाद उसकी नज़र अपने करीब सोये पड़े अथर्व पर पड़ गयी और वो झेंप कर रह गयी..
कल तो थकान के कारण वो कुछ भी कहाँ महसूस कर पायी थी ना उसकी घूरती आंखें, ना उसकी बाँहों का स्पर्श..
पता नहीं कल उसका दिमाग क्यूँ इतना अस्थिर था? लेकिन भोर के उजाले में, आज ये कमरा कुछ अलग ही लग रहा था..
सामने अथर्व सो रहा था.. लोवर और बनियान में.. !.उसे ऐसे देख कर ही रेशम वापस झेंप गयी..!
कॉलेज में हमेशा उसे सुथरे फॉर्मल्स में ही देखा था, और आज इतने करीब से ऐसे देखना भी कितना अजीब था..
एक अलग सी झुरझुरी सी उसके शरीर में दौड़ गयी..
वो पलंग पर इधर उधर टूट कर गिरी रजनीगंधा की बेले उठा उठा कर समेटने लगी कि अथर्व की नींद खुल गयी..
उसने मुस्कुरा कर रेशम को गुड़ मॉर्निंग बोला और वो चौंक गयी..
“अरे आप जाग गए.. ?”
“हम्म…!”
वो रेशम को भीनी नी नजरों से देखता रहा..
“ये सब कुछ वेस्ट हो गया ना, हमारे किसी काम के ही नहीं रहें ये फूल..।
अथर्व की इस बात का रेशम कोई जवाब नहीं दे पायी.. बस चुपचाप सब समेटती रही..
“क्या हुआ.. इन्हें आज के लिए संभाल रही हो क्या.. अरे फूल और आ जायेंगे !”
उफ़ ये क्या बक रहा था ये सुबह सुबह.. मन ही मन रेशम सोचने लगी लेकिन जो भी बोल रहा था उसे सुन रेशम के कान जलने लगे थे..
अचानक अथर्व एक झटके में उसके करीब आ गया और उसे अपने करीब खींच लिया..
अपनी नाक से उसकी गर्दन छूते हुए वो उसके कान तक पहुँच गया…
और रेशम थरथर कांपने लगी..
“आई लव यू रेशम ! मैंने कभी सोचा नहीं था ये हीरा मेरे हाथ लग जायेगा… तुम बहुत बहुत प्यारी हो.. !”
उसकी भीगी सी आवाज़ रेशम के कानों को पिघलाने लगी….
उसकी आवाज़ का असर था या छुवन का, रेशम की आंखें बंद होने लगी…
अथर्व के होंठ उसके होंठो तक आते उसी वक्त दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दे दी..
“शिट.. यार.. !”
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अथर्व ने रेशम को छोड़ा और एक तरफ खड़ा हो गया…
रेशम अब तक उस छुवन के बाद सामान्य नहीं हो पायी थी.. ऐसा लग रहा था जैसे उसके पाँव थिरक रहे हो.. उसमें फ़िलहाल दरवाज़ा खोलने की हिम्मत नहीं थी..। उसने अथर्व की तरफ देखा, अथर्व ने उसे दरवाज़ा खोलने जाने का इशारा किया और उसने ना में गर्दन हिला दी..
मुस्कुरा कर अथर्व दरवाज़े पर चला गया..
दरवाज़े पर मौसी चाय लेकर खड़ी थी..
” बड़ी देर कर दी, दरवाज़ा खोलने में.. ?”
अंदर झांकते हुए मौसी ने कहा और दरवाज़ा छेक कर खड़े अथर्व ने उन्हें वहीँ से टरका दिया..
“आप भी तो इतनी सुबह चाय ले आयीं.. !”
“हाँ फिर.. ? अच्छा सुनो कुछ देर में पंडित जी आ जायेंगे… जल्दी नहा धोकर आ जाओ दोनों नीचे.. !”
हाँ में गर्दन हिला कर अथर्व ने दरवाज़ा बंद कर दिया..
लेकिन तब तक में रेशम नहाने घुस गयी..
बड़ी देर तक वो नहाती रहीं… अपने ही पास से आने वाली हल्दी और मेहँदी की खुशबू उसे बहुत भा रहीं थी…
सब कुछ नया नया सा लग रहा था.. सही मायनों में आज उसे अपना कमरा बहुत अपना सा लग रहा था..।
नहा कर वो बाहर आई और अथर्व उसे चाय पीता मिला..
“बड़ी देर लगा दी नहाने में.. वैसे मैं यहाँ बैठे बैठे सब देख रहा था.. !”
रेशम चौंक कर उसे देखने लगी..
“अरे मजाक कर रहा हूँ बाबा… बीवी हो, तुमसे मजाक भी नहीं कर सकता क्या ? और अब तो मेरे साथ ही रहना है, मेरी और मेरी बातों की आदत डाल लो..!”
कितना बेशरम था अथर्व…. रेशम बिना कुछ बोले आईने के सामने बैठ गयी, लेकिन उसकी यहीं बेशर्मी रेशम को किस तरह गुदगुदाती जा रहीं थी ये वो उससे क्या कहती..
अथर्व उसके पीछे आकर खड़ा हो गया..
“सुनो… किस ड्यू रहा… पूजा पाठ निपटते ही कोई बहाना बना कर ऊपर कमरे में आ जाना.. !”
रेशम के मुहँ से बोल नहीं फूट रहे थे… क्या था ये लड़का.. कॉलेज में इससे ज्यादा शरीफ शायद ही कोई रहा होगा… सिर्फ पढाई लिखाई प्रेज़ेंटेशन असाइनमेंट्स के अलावा शायद ही इसके मुहँ से कभी कुछ फूटा होगा और आज…
रोमांस के अलावा इसे कुछ सूझ ही नहीं रहा, लेकिन उसकी यहीं रंगीनियत तो रेशम को भी डुबाये ले जा रही थी…
अथर्व नहाने घुस गया और रेशम का मोबाइल बजने लगा..
उसकी माँ का फ़ोन था..
“रेशु.. बेटा दोपहर में मानव तुझे लेने आ जायेगा.. ! पग फेरे के लिए तुझे घर आना है ना !”
“क्या.. ? आज ही ?”..
रेशम के मुँह से ये सुनते ही उसकी माँ मुस्कुरा उठी.. यही तो हाल होता है लड़कियों का.. जितना रो धोकर ससुराल विदा होती है, एक ही दिन में पति का ऐसा रंग चढ़ जाता है कि मायके लौटने के नाम पर सवाल आ जाता है..
” हाँ लाड़ो रानी.. आज ही ! मन नहीं कर रहा क्या आने का ?”
“कैसी बात कर रही हो मम्मी.. मैं तो रास्ता देख रही थी की कब वापस आऊं ?”
“अच्छा… ठीक है फिर.. मानव दो बजे तक आ जायेगा.. !”
इतना कह कर माँ ने फ़ोन रख दिया.. क्या हो गया था उसे…? वाकई अपनी माँ के बुलाने पर वो कैसे उनकी बात काट गयी..बस कुछ ही पलों में अथर्व ने इतना जादू कर दिया उस पर… आश्चर्य होता है !
कैसे झूठ बोल कर उसने अपनी बात की लाज रखी..
सोचती हुई वो मुड़ी और सामने अथर्व खड़ा था..
बेडा गर्क !!
अब अगर मम्मी से बोले झूठ को इस आदमी ने सुन लिया होगा और इसी बात पर रूठ गया तो मनाना मुश्किल हो जायेगा..
रेशम खड़ी सोच में डूब गयी और सिर्फ कमर पे टॉवेल लपेटे खड़ा अथर्व उसके करीब आ गया..
पीली साड़ी में रेशम का रंग घुल कर और पीला नज़र आ रहा था.. बीच की मांग में भरा सिंदूर हल्का सा माथे पर छलक आया था.. गोल छोटी सी लाल बिंदी और लाल लिपस्टिक की परछाई चेहरें को रक्तिम किये दे रही थी..
“रात तक कैसे रोक पाउँगा खुद को रेशु ! तुम्हारे इतने करीब रहते हुए तुमसे दूर रहना बेहद मुश्किल है.. !”..
अथर्व की मदहोश सी आवाज़ रेशम को वापस उसी भंवर में डूबाने लगी जिसके प्रभाव में अभी कुछ देर पहले ही उससे एक गड़बड़ हो चुकी थी…
क्रमशः

बेचारी रेशम इतने बहाने बनाने के बाद भी नींद पूरी नहीं हो रही और मासी सास भी बड़ी सख्त मिजाज की है यार ऐसे कौन करता है एक तो नया घर ऊपर से ये भारी भारी गहने और थकान कुछ तो समझना चाहिए उनको भी पर नहीं दिखावा जरूरी है। ये बात बहुत अच्छी लगी कि अथर्व ने रेशम पर अपनी मर्ज़ी नहीं थोपी।कुसुम की एंर्टी तो बहुत बढ़िया हुई 👏।बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻🙏🏼
Amazing story