
अपराजिता – 6
ससुराल में सारा दिन रस्मो रिवाज़ के बीच बीत गया..
घबराई सी बैठी रेशम बीच बीच में सर उठा कर उसे ढूंढने की कोशिश कर लेती जिससे बंधी वो अपना घर द्वार छोड़ आई थी, लेकिन अथर्व का कोई पता नहीं था..
मुहँ दिखाई की रस्म के साथ ही औरतों ने ढोलक मंजीरा बजा बजा कर बन्ना बन्नी गाना शुरू कर दिया था..
रिश्ते की मौसी सास उसे भी भजन सुनाने की गुज़ारिश कर रहीं थी, लेकिन इतने लोगों की भीड़ में संकोच से वो चुप ही बैठी रहीं..
“जिज्जी तुम्हारी बहु ने नाक कटा दी.. बताओ तुम हमारी भजन मण्डली की सरदार हो और तुम्हारी बहु के मुहँ से आवाज़ नहीं निकलती.. !”
मौसी सास के व्यंग पर वो और भी सहम सी गयी.. लेकिन उनकी बात सुन कर आसपास बैठी औरतें भी हंसने मुस्कुराने लगी..
वो वहाँ बैठे बैठे थक चुकी थी, लेकिन औरतों का रंग ढंग देख लग नहीं रहा था, की उसकी जल्दी छुट्टी होने वाली है..
आखिर उसने उन्हीं मौसी सास के पास झुक कर धीमे से उनकी कान में कुछ कह दिया..
“मौसी जी चक्कर से आ रहे, ज़रा उलटी भी… यहाँ कहाँ.. ?” वो घूंघट की आड़ से इधर उधर जगह ढूंढती सी लगी..
“अरे अरे रुको, तुम्हें तुम्हारे कमरे में ही लें चलते हैं !”
रेशम को राहत सी लगी और इस डर में कि नयी बहु ने कहीं यहीं उलटी कर दी तो, सब के बीच फजीहत अलग हो जायेगी सोच कर मौसी गिरते पड़ते उसे उसके कमरे में पहुंचा गयी..
और रेशम की साँस में साँस आई…
मौसी के कमरे से निकलते ही उसने दरवाज़ा बंद किया और सबसे पहले अपना घूंघट पलटा, एक सुकून भरी लम्बी सी साँस लेकर वो पलंग पर पसर गयी…..
एक रात पहले रात भर शादी में जागने के बाद से बिदाई होकर ससुराल पहुँच रेशम को अब शाम होने को आयी थी और अब तक उसे सोने छोडो कमर सीधी करने नहीं मिला था.. !
उसकी थकान उस पर ऐसी हावी हुई की पलंग पर पड़ते ही वो सो गयी…!
और सोई भी ऐसी गहरी नींद में की शाम गहराने पर चाय बनी और उसे बुलाने के लिए मौसी दरवाज़ा खटखटाने लगी लेकिन घोड़े बेच कर सोई पड़ी रेशम जागी नहीं..
आखिर मौसी ने दूल्हे और उसकी माँ को भी बुला लिया..
अथर्व भी ज़ोर से दरवाज़े पर दस्तक देने लगा..!
लेकिन जब दरवाज़ा नहीं खुला तब उसने रेशम के मोबाइल पर रिंग देनी शुरू कर दी..
वो तो अच्छा था कि मोबाइल की रिंग इस ढंग से बनी होती है कि उसके बजते ही नींद खुल ही जाती है,वैसा ही कुछ रेशम के साथ हुआ ..
वो चौंक कर उठी और मोबाइल उठा लिया…
दूसरी तरफ से अथर्व बोल पड़ा..
“रेशम क्या हुआ..?, सब ठीक तो है ना ? दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रहीं हो ?”
“हाँ… जी… बस अभी खोल रहीं.. !”
रेशम ने दरवाज़ा खोला और सामने सब को घबराया सा देख रेशम झेंप गयी.. लेकिन उसने खुद को संभाल लिया..
“वो ज़रा चक्कर सा आ गया था.. सर घूम गया..
उसकी बात पूरी होने से पहले अथर्व बोल पड़ा..
“अरे तबियत ठीक नहीं थी तो बोलना चाहिए ना.. !”
“नहीं.. बस ज़रा सा बीपी डाउन हो गया था !”
रेशम ने अपनी झेंप मिटाने एक छोटा सा झूठ और चिपका दिया, लेकिन उसके झूठ के कारण उसकी जान बच गयी और अब उसे वापस नीचे जाकर महिलाओं की गोष्ठी में बैठने से बचा लिया गया..!
चाय का कप पकडे आराम से पलंग पर बैठी रेशम ने राहत की साँस ली..
मौसी उसके लिए कुछ खाने का लेने चली गयी और अथर्व वहीँ उसके पास बैठ गया…
रेशम चाय के कप में झुकी हुई थी… उसने धीरे से नजर उठा कर अथर्व की तरफ देखा, वो किसी से फ़ोन पर बात कर रहा था..
रेशम वापस चाय पीने लगी…
अथर्व रेशम को ही देख रहा था..
“तुम बहुत सुंदर हो रेशम ! “
अथर्व की गहरी सर्द सी आवाज़ सुन रेशम चौंक गयी… चौंकने के साथ ही शरम की लाली भी उसके चेहरे पर दौड़ गयी…
अथर्व ने एक बार बाहर की तरफ नज़र दौड़ाई और किसी को आता ना पाकर रेशम का माथा चूम लिया.. रेशम इस अप्रत्याशित व्यवहार के लिए तैयार नहीं थी…।
उसकी धड़कन शताब्दी से होड़ लेने लगी.. उसने अपना एक हाथ सीने में रख अपनी धड़कनों को सामान्य करने की कोशिश की, और उसी वक्त मौसी चली आई…
नाश्ता टेबल पर रख कर वो रेशम को समझाने लगी..
“थोड़ा कुछ खा पीकर मुहँ हाथ धोकर फ्रेश हो जाना… थोड़ी देर में लेने आ जाउंगी..।
अच्छा नहीं लगता ना, नयी बहु अपने कमरे में आराम फरमाती रहें.. दो चार दिन की ही बात है! उसके बाद कौन सा ये सारे मेहमान यहाँ रहेंगे, तब तो तुम्हें आराम कर कर के पलंग ही तोडना है.. ठीक है !”
अपना ज्ञान उड़ेल कर मौसी जी चली गयी और रेशम का चेहरा बुझ गया..
बैठे बैठे कमर ऐसी अकड़ गयी थी कि अब उसका नीचे जाने का बिल्कुल मन नहीं था.. उसने अथर्व की तरफ देखा, वो अपनी मदहोश हुई जाती आँखों से उसे ही देख रहा था…
“सुनिए… मैं आराम करना चाहती हूँ..। लगातार बैठे बैठे कमर में भी दर्द हो गया है.. नीचे नहीं जाऊं तो चलेगा क्या ?”
अथर्व ने ना में गर्दन हिला दी..
“मौसी ने कहा है तो जाना ही पड़ेगा रेशम! तुम फ्रेश हो लो ना.. उसके बाद चली जाना, वैसे भी इतनी देर तो सो ही चुकी हो..।
“इतनी देर… ? अरे सिर्फ पंद्रह मिनट की झपकी ली है मैंने !”
“मैं वो सब नहीं जानता, जैसा मम्मी, मौसी बोले चुपचाप उन दोनों की बात मान लिया करो.. मुझे इन सारी बातों का कोई आईडिया नहीं है ! और मौसी ने कहा ना दो चार दिन की बात है यार.. उसके बाद तो बस तुम, मैं और हमारा ये कमरा.. !”
रेशम का चेहरा बुझ गया… हद है !!
थकान से उसकी बैठने की हिम्मत नहीं है और इन लोगों को फॉर्मेलिटी सूझ रहीं है..
उसका दिल किया सब की तरफ से आंखें मूँद कर सो जायें लेकिन ये उसका ससुराल था मायका नहीं..!
जिस लड़की ने कभी मायके में कान में टॉप्स तक नहीं डाले थे आज दोनों हाथों में दो दर्ज़न चूड़ियाँ, जड़ाऊ कंगन पहने बैठी थी ! पैरों में मोटे पायजेब थे जो जगह जगह से गड़ रहें थे, कमर से ज्यादा मोटी तो करधन थी…
गले में पहन रखें हारों से गला टूट रहा था, उधर कान में लटके तीन तोले के झुमके कान चीरे दे रहे थे !
उस पर रेशमी बनारसी साड़ी की जरी सर के बालों में उलझ उलझ कर अलग उसका दिमाग खाएं जा रहीं थी…!
उसे सब कुछ उतार फेंकने का जी कर रहा था…!
लेकिन ये उसकी ससुराल थी मायका नहीं.. ये बात उसने अपने अंदर बैठा ली थी..!
रात जब उसे वापस अपने कमरे में पहुँचाया गया, तब तक थकान से दुहरी होती रेशम को रोना सा आने लगा था…
मौसी और उनकी बेटी ने उसे सजे सजाये पलंग पर बैठा दिया..
“भाभी, भैया का इंतज़ार करना, सो मत जाना !”
रेशम ने एक फीकी सी मुस्कान दी और वो लड़की वहीँ बैठ कर उसे अपने कॉलेज के किस्से सुनाने लगी…
रेशम को वापस तेज़ नींद आ रहीं थी और वो लड़की सामने बैठी अपनी बातों में लगी थी…
उसी समय अथर्व कमरे में चला आया.. और उसे देख रेशम को भी सुकून मिल गया…
“मैं अभी नहीं जाउंगी भैया ! मैं तो आज अपनी भाभी के पास घुस कर सोऊंगी !”
लेकिन उसकी बात का अथर्व पर कोई असर नहीं पड़ा, उसने पीछे से उसकी चोटी पकड़ कर खींची और उसे कमरे से बाहर कर दरवाज़ा बंद कर दिया..
रेशम ने राहत की साँस ली… .. …
“सर.. मैं बहुत थक गयी हूँ.. !”
बहुत संकोच से रेशम ने कहा और अथर्व ने मुस्कुरा कर उसे अपनी बाँहों में भर लिया..
“मैं कौन सा कुछ करने बोल रहा हूँ.. अब तो ज़िंदगी भर का साथ है हमारा ! और सुनो, ये हमारा घर है कॉलेज नहीं, यहाँ मैं तुम्हारा सीनियर नहीं हूँ, इसलिए सर की जगह कुछ और भी बोल सकती हो !”
अथर्व ने बड़े प्यार से रेशम को बाँहों में लिए अपने मन की बात कह दी…
अथर्व ने रेशम के गहने उतारने में उसकी मदद की और रेशम कपड़े बदल कर उसके पास चली आयी..
रेशम ने आने के बाद अपने बालों को अच्छे से झाड़ा और पलंग पर एक किनारे बैठ गयी..
“सर… सॉरी..मेरा कहने का मतलब है आपने आज की रात के लिए काफी कुछ सोच रखा होगा ना.. !”
रेशम ने बड़े संकोच से पूछा, अथर्व मुस्कुराते हुए उसे ही देख रहा था..
रेशम के आते तक में वो भी अपने कपड़े बदल कर आरामदायक नाइट सूट में आ चुका था..
“हाँ सोचा तो था !”
“मैंने सारा प्लान चौपट कर दिया ना ! वो असल में थकान इतनी ज्यादा हो गयी है… !”
“मैं समझता हूँ यार…मैं भी तो जगा हूँ कल रात भर, लेकिन सुबह नाश्ते के बाद मैं गेस्ट रूम में सोने चला गया था और आराम से तीन चार घंटे सो लिया, पर मालूम है तुम्हें ज़रा भी आराम नहीं मिला..
कोई नहीं..
अच्छा सुनो, अभी मुझे ज्यादा छुट्टियां नहीं मिल पायी थी, तो परसों से मैं ज्वाइन कर लूंगा, नेक्स्ट वीक में तीन दिन की छुट्टी अरेंज हो रहीं है उसी समय कहीं घूमने चलेंगे.. ओके !
कोई ऐसी जगह जहाँ जाने का विशेष मन हो तुम्हारा, तो बता देना !”
“मुझे तिरुपति बालाजी जाने का बहुत मन है.. बहुत पहले जाना था, अब तक नहीं जा पायी !”
अथर्व के माथे पर बल पड़ गए… -“हनीमून की लिए तिरुपति.. ?”
“नहीं दर्शनों के लिए ! उनके दर्शनों के बाद ही हम अपना जीवन शुरू करें तो कैसा रहेगा ?”
अथर्व मुस्कुरा उठा..
” ओके, फिर मैं वहीँ के टिकट्स देख लेता हूँ ! वहाँ दर्शन के बाद आसपास ऊटी कोडाइकनाल घूम लेंगे.. लेकिन मुझे छुट्टियां थोड़ी और बढ़ानी पड़ेंगी.. !”
रेशम ने खुश होकर हामी भर दी..
अथर्व पलंग के दूसरी तरफ था, उसने धीरे से रेशम की बाँह पकड़ कर उसे अपने पास खींच लिया..
रेशन ने उसकी बाँहों पर सर रख लिया..
अथर्व की बाँहों में लेटी रेशम को वो अपने और अपने घर वालों के बारे में बताता रहा और जाने कब रेशम गहरी नींद में ढुलक गयी…..
सरना ने अनिर्वान को राजेंद्र और कुसुम के बारे में बताना शुरू किया….
राजेंद्र शहर से डॉक्टरी पढ़ कर दूर्वागंज लौटा था..
उसका सपना था की उसके गाँव के लोगों को किसी तरह की स्वास्थ्य संबंधी असुविधा ना हो..
अपने कस्बे के छोटे से अस्पताल में जब वो पहले दिन पहुंचा तो अस्पताल का हाल देख चौंक गया..
अस्पताल में एक अदद कम्पाउंडर बैठा मनोरमा पढ़ रहा था….
टेबल पर अपनी टाँगे रखें बैठा वो वहीं एक तरफ रखें रेडियो पर गाने भी सुन रहा था..
बी एच यू से कर के बीए बबुआ हमार
एम ए में लेके एड्मिसन कम्पेटिसन देता…
राजेंद्र उसके सामने जाकर खड़ा हो गया..
कम्पाउंडर ने ऑंख उठा कर एक बार उसे देखा और वापस मैगज़ीन पढ़ने लगा..
“इंचार्ज कौन है यहाँ का ?”
“हम ही है ?”
“मरीज़ आप ही देखते हैं ?”
“हव … !”
“डॉक्टर नहीं है.. ?”
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अब उस आदमी ने वापस नज़र उठाई..
” हम तुमको क्या नज़र आ रहें हैं ?”
“डॉक्टर तो नज़र नहीं आ रहें हो ?”
“हाँ फिर… कम्पाउंडर है.. सूजी पानी देना सब आता है.. तुम बताओ क्या तकलीफ है.. काहे की दवा चाहिए ?”
राजेंद्र ने अपना जॉइनिंग लेटर निकाल कर उसके सामने टेबल पर पटक दिया..
जॉइनिंग लेटर को ध्यान से पढ़ते ही वो लड़का उछल कर खड़ा हो गया..
“आप डॉक्टर राजेंद्र कुमार रघुवंशी हैं ?”
“जी… !”
“माफ़ कीजियेगा डॉक्टर साहब… हमें लगा कोई मनचला है.. वो क्या है न.. ये गाँव में बहुत मनचले भरे हैं…!
साले कफ सिरप मुफ्त में मांगने चले आते हैं… सस्ता नशा करने….. हमें लगा… बस वहीं !”
“आपको मैं सस्ता नशा करने वाला मनचला दिख रहा हूँ.. ?”
“नहीं… मतलब.. हाँ.. अरे..
का बात पकड़ कर बैठे है.. ?
आइये आपको आपका कमरा दिखा दे.. !”
कम्पाउंडर ने एक तरफ को बढ़ कर एक दरवाज़ा खोल दिया.. चरमरा कर वो दरवाज़ा खुला और एक छोटा सा चमगादड़ राजेंद्र के सर के ऊपर से उड़ कर निकल गया.. राजेंद्र उससे बचने नीचे झुक गया..!
पूरे कमरे की हालत ख़राब थी..
धूल से अटा पड़ा कमरा यूँ लग रहा था सदियों से बंद था.. सारी दीवारों पर जाले झूल रहें थे..
मकड़ी छिपकली मच्छर मख्खियों में यूँ लगा राजेंद्र को देखते ही आतंक मच गया हो.. वो सारे अपनी जान बचाते इधर उधर भागने लगे…
जालो से खुद को बचाते हुए राजेंद्र ने धीरे से एक तरफ की खिड़की खोल दी…
एक खुशबू से भरा हवा का झोंका अंदर समाता चला गया…
राजेंद्र ने आंखें मूँद ली…
उस खशबू को अपने अंदर भर कर उसने आँख खोली और पीछे पलट गया..
“साफ़ सफाई कौन करता है यहाँ.. ?”
“साहब एक पीटीएस (पार्ट टाइम स्वीपर) है, लेकिन… वो…
“क्या.. ? जहाँ भी हो तुरंत बुलाइये उसे.. !”
“साहब अभी तो वो ठाकुर साहब के यहाँ होगा… वहाँ भी काम करता है ना.. इसलिए यहाँ कभी कभी ही आ पाता है.. !”
“तो क्या सैलरी भी नहीं लेता है ? अरे जब सरकार तनख्वाह पूरी दे रहीं तो कम से कम अपना काम तो करें… सुबह आधा घंटा यहाँ सफाई कर के निकल जायें.. फिर जहाँ जाना हो..!”
“जी… आज उसे खबर कर देंगे.. !”
“चपरासी भी तो होगा ना.. ?”
“जी है हुज़ूर… उसके घर हफ्ता दिन पहले शोक हो गया था तो अब तक वापस नहीं आया है !”
राजेंद्र के चेहरें पर नाराज़गी चली आई…
यहीं हाल होता है गाँव कस्बो के अस्पतालों का…कोई देखनवार नहीं..
अपनी कमर पर दोनों हाथ रख कर खड़े राजेंद्र ने एक बार चारों तरफ का मुआयना किया और फिर अपनी सफ़ेद कमीज़ की बाँहें चढाने लगा..
“साहब…. आप क्या करने जा रहें.. ?”!
“सिर्फ मैं नहीं.. तुम और मैं…! हम दोनों बाहर नल से पाइप को जोड़ कर इस अस्पताल को धोने जा रहें हैं.. !”
कम्पाउंडर आँखे फाड़े उस सनकी डॉक्टर को देखने लगा….
“सर टंकी में पानी खतम है.. !”
“क्यूँ ?”
“वो गाँव के शरारती लड़के मस्ती मस्ती में टंकी फोड़ जाते हैं हुज़ूर.. ! “
“तो बनवायी क्यूँ नहीं ?”
“अपने पैसों से बनवाना पड़ता है हर बार.. और फिर बिल लगा कर बैठे रहो.. कहाँ सरकारी काम जल्दी होता है हुज़ूर.. अपना ही पैसा फंस जाता है और महीना बीतते ये लड़के फिर तोड़ फोड़ मचा देते हैं.. !”
“फिर.. अभी पानी कहाँ मिलेगा.. ?”
“यहीं बाहर बोर है सर.. हम वहाँ से ला देते हैं.. !”
“ठीक है चलो… !”
“अरे आप कहाँ बाहर धूल गर्दा में जायेंगे.. यहीं बैठिये.. ये हमारा कुर्सी साफ़ है.. बैठ जाइये.. !”
राजेंद्र ने उसे घूर कर देखा.. -“चलो.. !”
कम्पाउंडर दो बाल्टी हाथ में लिए बाहर बोर तक पहुँच गया.. उसी के पीछे राजेंद्र भी वहाँ जाकर खड़ा हो गया..
उसी वक्त एक बुलेट वहाँ से निकली और उस कच्ची सी सड़क पर के कीचड़ के छींटे हलके से उछल कर डॉक्टर साहब की सफ़ेद कमीज़ रंग गए..
बुलेट ज़रा सा आगे बढ़ कर रुक गयी…
बुलेट चलाने वाली शान से बुलेट से उतरी और अपने पीछे बैठी अपनी सखी को साथ लिए वहाँ चली आई…
एक बार फिर वहीं सम्मोहिनी खुशबू डॉक्टर साहब को भीगा गयी..
पीली बंधेज की पटियाला ख़ूब घेर वाली सलवार पर उसने नीली गुलाबी छींट की घुटनों से काफ़ी ऊपर की कसी हुई कुर्ती पहन रखी थी..
खुले लम्बे बाल कमर तक लहरा रहें थे, और आँखों पर रेबैन का चश्मा चढ़ा था..
कंधे से दूसरी तरफ स्लिंग बैग टंगा था..
लड़की का ताम्बई रंग अस्त होते सूर्य की किरणों में चमक कर और सुंदर लग रहा था..
आँखों में गाढ़ा काजल डाले वो अपना चश्मा सर पर चढ़ा कर सामने खड़े लड़के को घूरने लगी..
“अरे… आपकी कमीज़ तो गन्दी हो गयी..! “
उसने अपने पर्स से कुछ पैसे निकाल कर उसकी तरफ बढ़ा दिये..
“धोबी को दे दीजियेगा… धोकर वापस कर देगा.. !”
“मैं खुद धो लूंगा, आपके रुपयों की ज़रूरत नहीं है ! थैंक्स !”
लड़की ने उसे देखा… और पल भर को देखती रह गयी.. हल्का सांवला सा रंग, हलकी हलकी सी दाढ़ी.. आँखों पर चश्मा, हलके बिखरे से बाल और लम्बा कद.. लेकिन कद के मुकाबले शरीर बिल्कुल भी बॉडी बिल्डर या हीरो टाइप नहीं था.. बल्कि लड़का कुछ ज्यादा ही दुबला सा था..
नीली जींस पर सफ़ेद कमीज़ और भूरे जूतों पर जमी गाँव की धूल बता रहीं थी की लड़के का सामना गाँव की पथरीली ज़मीन से हो चुका है..
“नए आये हो क्या ? वैसे यहाँ किसी तरह की तकलीफ हो हमारा नाम लें देना.. कह देना कुसुम से बात हो गयी है… तुम्हारा सब काम निपट जायेगा..
समझे बिट्टू !”
कुसुम ने कम्पाउंडर की तरफ झांक कर कहा और हलके से मुस्कुरा कर अपनी बुलेट की तरफ बढ़ गयी…
“चले भावना… देर हो रहीं है.. !”
“ये यहाँ के नए डाक्टर हैं… डाक्टर राजेंदर कुमार !”
बिट्टू ने डॉक्टर साहब के क्रेडेंशियल कुसुम कुमारी को थमा दिये और वो अदा से अपनी गर्दन को झटक कर आगे बढ़ गयी…
कुसुम और उसकी सहेली भावना वहाँ से धूल उड़ाते निकल गए.. राजेंद्र ने अपनी कमीज़ पर पड़े धब्बो को देखा और बिट्टू की तरफ देखने लगा..
“क्या है… बस ऐसे ही खड़े रहोगे या पानी भरकर अस्पताल धोना भी शुरू करोगे… ?”
“जी… जी सर.. !”
बिट्टू हड़बड़ा कर काम में लग गया, और राजेंद्र एक बार फिर उस धूल उड़ती फटफटिया की दिशा में देखने लगा…
क्रमशः..

बेहद खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻रेशम और मानव की बातों ने तो रुला दिया आज। इन दोनों भाई बहन के रिश्ते का बहुत खूबसूरती से वर्णन किया है आपने 👏👏।बस ईश्वर से प्रार्थना है कि रेशम की आगामी ज़िन्दगी बहुत अच्छी हो 🙏🏼। उसका अतीत कैसा भी हो पर प्रेजेंट, फ्यूचर अच्छा ही हो 🙏🏼।अनिर्वान को पढ़ना बहुत अच्छा लग रहा है, अगर नेहा भी आ जाती तो मज़ा ही आ जाता 😊।🙏🏼🙏🏼