अपराजिता – 5

इसके बाद तो सब कुछ बस होता चला गया...
अथर्व को रेशम शुरू से पसंद थी, और उस दिन इंटरव्यू वाली जगह पर उसे देख उसे कॉलेज के बीते दिन याद आ गए थे..
वो ठीक ठाक कमा रहा था और उसकी कमाई आगे बढ़नी ही थी! उसे घटना तो था नहीं इसके साथ ही उसे रेशम के साथ अपना सुंदर और सुरक्षित भविष्य नजर आ रहा था! कॉलेज के जमाने से ही रेशम टॉपर रही थी और इसीलिए अथर्व को विश्वास था कि रेशम सरकारी नौकरी में आ ही रहेगी और के बाद दोनों मिलकर अपना प्राइवेट नर्सिंग होम भी डाल लेंगे…
यह सब तो उसके दिमाग की सोची-समझी बातें थी लेकिन दिल का एक कोना रेशम के चेहरे की चमक से रोशन हो चुका था! और बस इसीलिए अथर्व को रेशम अपनी जीवनसंगिनी के तौर पर भाग गई थी और उसने धीरे से यह बात अपनी मौसी से कह कर अपनी मां तक पहुंचा दी थी! उसकी मां ने भी जब उसके पिताजी से बात की तो उन्हें भी इस बात पर किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं हुई….
इससे अच्छा रिश्ता वह भी कहां से ढूंढ कर लाते ! लड़की डॉक्टर भी थी और उन्हीं की जाति बिरादरी की भी थी ! समस्या की कोई बात ही नहीं थी और इसीलिए उन्होंने अपने ऑफिस में काम करने वाले शुक्ला जी से बात करके उनके छोटे भाई की बेटी के लिए रिश्ता भिजवा दिया ! दोनों ही पक्ष राजी खुशी इस शादी के लिए तैयार हो गये और इसके बाद अवस्थी परिवार बताता गया और शुक्ला परिवार करता गया!
अथर्व की बहन भी तुरंत चली आई और सारी तैयारियों में लग गयी.. उसने एक बार अपनी माँ के सामने दुल्हन को साथ बुला कर शॉपिंग पर जाने की बात भी कहीं लेकिन अथर्व की माँ ने मना कर दिया..
“अरे बाद में तो सब अपनी मर्ज़ी से ही लेना खरीदना है.. अभी तो हमारी मर्ज़ी का पहन ओढ़ लें !”
अथर्व की बहन आशा फिर आगे कुछ नहीं बोल पायी.. वो अपनी माँ का स्वभाव जानती थी..
अवस्थी परिवार जैसी शादी चाहते थे, अपनी सारी चाह उन्होंने शुक्ला जी को बता दी.. !
शुक्ला जी के घर पर भी तैयारियां शुरू हो चुकी थी.. सबकुछ बहुत जल्दबाज़ी में तय हुआ था, हालाँकि इस सब के बावजूद शुक्ला जी ने लड़के के बारे में सारी पतासाजी करवा ली थी, आखिर अपनी बेटी देनी थी वहाँ..
दिन दिन भर रेशम अपनी माँ और पूर्वी के साथ शॉपिंग कर के थक जाती.. शाम को घर वापस आते ही सारे सामान को सही तरीके से पैक करना, और अपनी खुद की ग्रूमिंग करने में उसका समय कब बीतता जा रहा था, उसे भी मालूम नहीं चल रहा था..
इस सब के बीच उसकी और अथर्व की फ़ोन पर बातें भी शुरू हो चुकी थी, लेकिन दिन भर अस्पताल में बिता कर शाम को अथर्व भी थका होता था और रेशम भी…
बावजूद दोनों के बीच दुनिया भर की बातें होने लगी थी.. कॉलेज की, अपने दोस्तों की, प्रोफेसर्स की.. इन ढ़ेर सारी बातों में बहुत बार ऐसा हुआ की रेशम को लगा वो अथर्व को सब बता दे, पर वो बता नहीं पायी..
वो बात याद आते ही जाने क्यूँ वो सिहर कर रह जाती थी..
वो जानती थी की उसे ये बात शादी से पहले ही अथर्व को बता देनी चाहिए लेकिन उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ रहीं थी…!
उस बात को शुरू करना मतलब उस सारी तकलीफ को वापस जीना था, और फ़िलहाल रेशम अपनी ज़िंदगी के इन खूबसूरत पलों को जीना चाहती थी…!
और उसे मालूम था कि वो पल अब उसकी ज़िंदगी का बीता हुआ कल थे, अगर वो उन्हें पकड़ कर रखी रहेगी तो ना खुद चैन से जी पायेगी और ना अपने करीबियों को जीने देगी..
आज भी कई बार रातों में वो सिहर कर उठ बैठती थी, और फिर पूरी रात उसकी आँखों में ही काट जाती थी..
घर वालों ख़ास कर मानव ने और उसकी दोस्त पूर्वी ने उसे सम्भलने में बहुत मदद की थी…
वरना शायद वो अपने डिप्रेशन में कहीं गुम हो चुकी होती!
बस इसीलिए उन बातों को चाह कर भी वो अथर्व से नहीं बता पायी..!
शादी की तैयारियों में दिन पलक झपकते बीत गए….
जितनी हैसियत थी उससे कहीं ज्यादा करके शुक्ला जी ने अपनी बेटी को बड़ी शान से विदा कर दिया….!
सब कुछ इतनी जल्दबाजी में हुआ कि रेशम को ज्यादा सोचने समझने का वक्त ही नहीं मिला!
फेरे हुए और रेशम को उसके कमरे में वापस ले आया गया !
लगभग घंटे भर बाद विदाई थी और दूसरी तरफ कुंवर कलेवा चल रहा था !
रेशम की मां, मासी, ताई, फूफी और बाकी सभी लोग वहां व्यस्त थे!
रेशम के साथ पूर्वी बैठी थी… फेरों के पहले दुल्हन को उसकी ताई ने व्रत करवा दिया था.. इसलिए अब पूर्वी उसके लिए खाना लेकर आई थी..
हालाँकि इतनी सजी धजी थाली में से भी रेशम से कुछ खाया नहीं जा रहा था.. !
अपना घर अपने माता पिता अपना जान से प्यारा भाई सबको छोड़ कर आज उसे जाना है,यहीं बात उस पर हावी हुई जा रहीं थी..!
उधर अथर्व को भी उसकी माँ ने व्रत करवाया था, और अब कुंवर कलेवा में अपने सामने परोसे छप्पन तरह के व्यंजनों में से उसे कुछ खाने का मन नहीं कर रहा था.. लेकिन रेशम के घर की औरतें उसके पीछे पड़ी थी.. कहां की हर एक औरत अपने जंवाई सा को अपने हाथ से कलेवा जीमाना चाहती थी…उन सब के बीच फंसा अथर्व किसी को मना भी नहीं कर पा रहा था… उसने मानव की तरफ लाचारगी से देखा और मानव उसे आल द बेस्ट का अंगूठा दिखा कर रेशम के कमरे में पहुँच गया..
मानव को आया देख रेशम भावुक हो गयी ..
” क्या हुआ रेशु? तू कुछ परेशान लग रही है..?”
रेशम ने ना मे गर्दन हिला दी ! मानव प्यार से कदम बढ़ाते हुए उसके पास चला आया! रेशम चुपचाप पलंग पर बैठ गई और मानव उसके सर पर हाथ फेरने लगा!
” अपना हाथ आगे बढ़ा !”
मानव ने प्यार से कहा और रेशम अपनी बड़ी बड़ी आंखों से टुकुर-टुकुर उसे देखने लगी!
” क्या हुआ?”
“हाथ बढ़ा तो !”
.
रेशम ने अपना हाथ आगे कर दिया और मानव ने उसकी वही अंगूठी जो उसके पिता ने रेशम के मेडिकल सलेक्शन पर तोहफे के तौर पर दी थी उसकी हथेली में रख दी!
” यह कहां से मिली आपको ?”
“मेरी प्यारी सी झूठी बहन, तूने यह अंगूठी जिसे दी थी उसका काम पूरा हो गया और उसने कल मुझे आकर अंगूठी वापस लौटा दी ..!
मेरी लाडली बहन तेरे सारे गुणों को अच्छे से जानता है तेरा भाई ! तेरी बचपन से जो झूठ बोलने की आदत है ना, तू जब भी कुछ बोलती है मुझे तुरंत समझ में आ जाता है कि तू झूठ बोल रही है..!”
“सच बोलना डरावना भी तो होता है, बहुत हिम्मत चाहिए होती है सच बोलने के लिए..!”
“जानता हूं! और तुझ में वह हिम्मत नहीं है, आज तक पापा ने तुझे हमेशा अपनी प्रिंसेस बना कर रखा है। मैं जानता हूं, जब पहली बार उन्होंने यह कहा था ना कि मेरे घर राजकुमारी आई है, तब मैं चार-पांच साल का था लेकिन रिक्शा में मम्मी की गोद में घर आती राजकुमारी को देखकर मैं आश्चर्य में डूब गया था। मुझे लगा शायद राजकुमारियां रिक्शा पर ही घर आती हैं…।
जब जब महीने के आखिर में पापा के पैसे खत्म हो जाते थे और साग सब्जी खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे तब मम्मी अक्सर गट्टे, आलू या मटर की सब्जी बनाया करती थी, और उस समय पापा हमेशा कहते थे, मेरी प्रिंसेस को मटर बहुत पसंद है। तब मुझे लगता था शायद राजकुमारियां मटर ही खाती है। वह तो बड़ा होने के बाद समझ में आया कि हमारे राजमहल की राशनिंग के चक्कर में हमारी प्रिंसेस को कभी मटर और कभी आलू ही खाने को मिलते थे..।
पापा के साथ-साथ मुझे भी यही फील होने लगा कि मेरी बहन एक प्रिंसेस है..।
बहुत बड़ा होने के बाद समझ में आया की यह सिर्फ मेरी और पापा की ही प्रिंसेस है, बाकी दुनिया के लिए तो यह एक साधारण सी लड़की है। डरपोक दब्बू सी। लेकिन चुलबुली सी मस्तीखोर और बेहद झूठी भी..।
अपने आप को कभी खोना मत लाडो। तू जैसी है वैसी ही रहना..।
खिलखिलाती हुई हंसती हुई, मस्तियां करती हुई..। और सुन किसी बीती बात को खुद पर कभी हावी मत होने देना.. वहाँ मैं या मम्मी तेरे पास नहीं होंगे तुझे संभालने के लिए !”
मानव की आंखें भीग गयी….
लेकिन रेशम अपने भाई को रोता नहीं देख सकती थी..
“लेकिन ये सब तो ससुराल वालों पर निर्भर करता है ना! बचपन से यह भी तो सुनती आई हूं माँ से कि, जैसे ससुराल मिलेगी वैसे ही रहना पड़ेगा..!
अभी 4 दिन से घर भर की औरतें मुझे घेर कर बस यही शिक्षा तो दे रही है कि वहां यहां जैसे जोर-जोर से हंसना मत..!
फटफटा कर चलना मत..!
सुबह 8 बजे सोकर मत उठना, जल्दी उठ जाना ! नहा कर ही अपने कमरे से बाहर निकलना ! साड़ी पहनना ! सर पे पल्लू लेना और भी जाने क्या-क्या !
मुझे तो समझ नहीं आता कि जब एक लड़के के जीवन में शादी के बाद कुछ नहीं बदलता तो लड़की के जीवन में क्यों इतना कुछ बदल जाता है मानव.. ?”
मानव ने आगे बढ़कर रेशम को अपने सीने से लगा लिया और उसके सिर को सहलाने लगा..
“एक लड़की के लिए भले ही शादी के बाद बहुत सी चीजें बदल जाती होंगी, लेकिन अपने भाई पर इतना विश्वास रखना कि तेरा मायका कभी नहीं बदलेगा। तेरे माता-पिता और तेरा यह भाई जैसे पहले थे, वैसे ही रहेंगे। पुराने लोगों की सिखाई इस बात को कि “डोली में गई है अर्थी में वहां से निकलना” इस बात को भूल जाना। अगर कभी तुझे एक पल को भी लगे कि तेरा वहाँ दम घुट रहा है तो तुरंत अपना बैग उठाकर मेरे पास चली आना..
तेरा भाई हमेशा तेरे लिए खड़ा है !”
“जानती हूं !! सुन….. एक सिगरेट पिला दे..। अब न जाने कब पीने को मिले..।शायद अब कभी ना लूँ… वैसे भी गिन कर पांच बार फूंकी है.. और पांचो ही बार तबाही टेंशन था मुझे !”
“क्यों अपने सैया जी को भी बता देना कि, तू कभी कभी अपने मूड को सहीं करने के लिए सिगरेट पी लेती है, जब कभी तुझे चाहिए होगी तब वो ला दिया करेगा ! वैसे भी तुझे कोई लत तो है नहीं..!”
“बता तो दूंगी, लेकिन पहले देखना पड़ेगा कि बंदा कैसा है ? वैसे जैसी इसकी कॉलेज में इमेज थी, मुझे नहीं लगता कि यह सिगरेट फूंकता होगा!”
“यह तो बहुत अच्छी बात है ! वरना मैं कौन सा सिगरेट फूंकता हूं, लेकिन तेरे लिए ले आता हूं ना कभी कभार वैसे ही तेरा मियां भी ले आएगा ..
खैर…
चल फटाफट फूँक लें.. मैं बाहर खड़ा हूं जिससे कोई आ ना जाए उसके बाद चल तेरी विदाई है…।”
मानव बाहर निकल गया.. दरवाज़े के बाहर खड़े होकर चुपके से उसने आंखें पोंछ ली और तभी दरवाज़ा खोल कर रेशम ने उसे अंदर बुला लिया..
“क्या हुआ ?”
“मन नहीं कर रहा.. ! घबराहट सी लग रहीं है.. पता नहीं कैसे लोग होंगे, मैं क्या करुँगी वहाँ… भाई मुझे ससुराल नहीं जाना !”
अपनी आखिरी पंक्ति कहते हुए रेशम रो पड़ी और उसके भाई ने उसे अपने सीने से लगा लिया…
बिदाई की घड़ी बेहद भावुक होती ही है, उस पर माहौल और ऐसा हो गया था की दोनों ही भाई बहन के आँसू नहीं रुक रहें थे..।
बिदाई का मुहूर्त आ चुका था… घर की लड़कियां और औरतें आई और मानव के गले से लग कर खड़ी उसकी छोटी सी गुड़िया को उसके पास से लेकर नीचे चली गयी… ।
रेशम ने पलट कर मानव को देखा और हुलस कर रो पड़ी..
मानव खुद अपना चेहरा हाथों में छुपाये सुबकने लगा.. सारी औरतें रेशम के साथ चली गयी थी..
मानव अकेला रो रहा था.. वैसे भी वो अपने माँ पापा के सामने रोना भी नहीं चाहता था…
नीचे से बिदाई के पहले दुल्हन को पानी पिलाने के लिए भाई की पुकार मची और पूर्वी भागती हुई मानव को बुलाने चली आई..
“मानव भैया आपको सब बुला रहें !”
हाँ में गर्दन हिला कर अपने आँसू पोंछता मानव बाहर चला आया..
सबसे गले मिलकर रेशम भरे दिल से कर में बैठ गयी..
और मानव ने रेशम को पानी पिलाने के बाद कार के दूसरी तरफ आकर अथर्व के सामने हाथ जोड़ दिये…
अथर्व ने धीरे से उसके दोनों हाथ थाम लिए….
उन हाथों में वो अपनापन था जिसे महसूस कर मानव को लगा की उसकी बहन गलत हाथों में नहीं जा रहीं है..!
नारियल को चक्के के नीचे दबा कर कार आगे बढ़ गयी…!
और फिर एक नन्ही सी कलि, एक नन्ही सी चिड़िया अपनी मायके की देहरी को छोड़, अपना आंगन छोड़ सदा सदा में लिए अनंत आकाश में अपने पर फ़ैलाने उड़ गयी….
थाने में सबको पर्याप्त ठोंकने बजाने के बाद अनिर्वान ने सरना को बुलाया और अपने सामने बैठा लिया..
“कुछ खाएं पिए हो ?”
सरना उस दबंग पुलिस वाले से झूठ नहीं बोल पाया.. उसने ना में गर्दन हिला दी..
अनिर्वान के इशारे पर बाबूराव सरना के लिए कुछ खाने का सामान और चाय ले आया..
लेकिन सरना पर उन लड़कों का डर इस कदर हावी था की वो अपने सामने रखा खाना भी खा नहीं पा रहा था..
अनिर्वान उसे ध्यान से देख रहा था..
“ये लोग कौन है ? और क्यूँ तुम्हारे पीछे पड़े है ?”
“हुज़ूर ये लोग हमारे नहीं बल्कि हमारे दोस्त राजेंद्र के पीछे पड़े हैं.. !”
“वो क्यूँ ?”
“हुज़ूर… वो इनकी बहन कुसुम को ले भागा है! हम आपको पूरी बात बताते हैं..
राजेंद्र कुमार हमारा दोस्त कम भाई ज्यादा है, उसने बचपन से हर कदम पर हमारा साथ दिया है..
साहब हम लोग इस कस्बे का वो हिस्सा है जिनसे कस्बे के बड़े लोग छुआ मानते है..
साहब वहीं बड़ी जात छोटी जात वाला मसला है.. !”
“बड़ी जात वालों का ख़ून नीला होता है क्या ?”
अनिर्वान ने गुस्से में अपना हाथ टेबल पर मारा और बाबूराव की तरफ देखने लगा..
“बाबूराव ये जात बिरादरी से उठ कर ये लोग कब सोचना शुरू करेंगे… बोलों !”
“साहब… ये मसला गाँव कस्बों के अंदर बहुत गहरे तक जड़ जमाये बैठा है… क्या कर सकते है ?”
“सुधार सकते हैं बाबूराव ! कम से कम अपने घर से पहल तो कर ही सकते हैं..
हाँ तो क्या नाम है तुम्हारा, सरना…. आगे बताओ भाई, क्या मसला हुआ था !”
“साहब…. बात आज से दो साल पुरानी है…
क्रमशः
aparna….

बेहतरीन पार्ट ❤️❤️❤️❤️❤️
बहुत खूबसूरत भाग
Beautifully narrated