अपराजिता -4

अपराजिता – 4

पुलिस स्टेशन में पहुँच कर वो सब को खदेड़ते हुए अंदर लें गया…

थाने का पूरा स्टाफ आश्चर्य से खड़ा उन सब को देखने लगा.. तभी उनमे से एक हवलदार सामने चला आया..

“कौन है बे तू.. और ये गधों को कहाँ से पकड़ लाया.. ?”

अनिर्वान ने सामने खड़े हवलदार को देखा और हल्का सा मुस्कुरा दिया..

“मतलब तुम्हारी आँखे सही है… तुम्हें भी ये गधे ही नज़र आ रहें हैं ना ?”

अनिर्वान की बात पूरी होते ही उन लड़कों में से एक चिल्लाया..

“ठाकुर साहब को पता लगा ना, यहां थाने में ख़ून खराबा हो जायेगा.. !”

अनिर्वान ने गर्दन टेढ़ी कर बड़ी अदा से उसे देखा..

“मैं गाँधी जी का भक्त हूँ, सत्यवादी और अहिंसावादी ! मुझे ख़ून खराबे से बहुत डर लगता है…

इतना बोल कर अनिर्वान ने घूमा कर एक थप्पड़ उस लड़के को जड़ दिया..
लड़का गोल घूम कर ज़मीन पर गिरा और उसका ख़ून छलक आया…
और उसके साथ ही अपना आई कार्ड निकाल कर सामने खड़े हवलदार को पकड़ते हुए अनिर्वान ने अपना अधूरा वाक्य पूरा कर लिया…

“इसलिए मैं कोशिश करता हूँ की सामने वाले का ख़ून ना निकले… चाहें अंदरूनी चोट कितनी भी गहरी हो जायें.. !”

वो लड़का सिर्फ एक थप्पड़ के बाद ही ज़मीन से उठने की हालत में नहीं था..

अब तक में हवलदार ने अनिर्वान का आई कार्ड देख कर उसे सेल्यूट ठोंक दिया था…
उसके बाद एक एक कर स्टाफ आता गया और उसे सेल्यूट ठोंक कर अपना परिचय देता गया…

“इन चारों को फ़िलहाल अंदर डालो, इनके बाप के आते तक किसी को छोड़ना नहीं है.. !”

अनिर्वान के आदेश पर उन चारों लड़कों को अंदर डाल दिया गया.. उसी वक्त बाहर से किसी के चीखने चिल्लाने की आवाज़ आने लगी..

“कौन है बे वो माई का लाल जो ठाकुर साहब के आदमियों पर बुरी नज़र डाला है.. !”

अंदर खड़े सभी ने ये आवाज़ सुन ली और अनिर्वान की तरफ देखने लगे.. सामने खड़े उसी हवलदार की यूनिफॉर्म में लगी उसके नाम की प्लेट को ध्यान से पढ़ कर अनिर्वान बोल पड़ा..

“देखो बाबूराव, अब किस गली का कुत्ता भौंकने लगा.. ?”

“हुज़ूर ये सब ठाकुर के आदमी हैं.. !”

“इतने कुत्ते पाल रखें हैं ठाकुर ने ?”

“हाँ साहब, अंदर लें आये उसे.. ?”.

“हाँ लें ही आओ..ज़रा हम भी तो दर्शन करें.. ! और सुनो ज़रा अच्छी सी कड़क चाय भी मंगवा देना… दूध ज्यादा, चीनी कम और कड़क अदरक और इलायची.. ! भोले बाबा की नगरी से आये हैं हम और हमारे यहाँ की चाय, चाट पान और हम बहुत प्रसिद्ध है.. !”

मुस्कुरा कर बाबूराव ने अनिर्वान के सामने गर्दन झुकाई और बाहर निकल गया..
चाय लेने दूसरे लड़के को भेज अभी अभी वहाँ पहुँच कर बेतुकी लफ़्फ़ाज़ी करते उस लड़के को बाबूराव साथ लिए अंदर लें आया…

“कौन हो बे तुम ? और ये क्या किये, ठाकुर साहब के आदमियों को अंदर कर दिये.. ? जानते नहीं हो क्या ठाकुर साहब को ? नए आये हो ?”

“हाँ आये तो नए हैं, लेकिन इतनी देर में समझ आ गया है की ठाकुर यहाँ का कोई बड़ा कैंडी सॉरी कांडी है ! तो बुलाओ ज़रा.. मिल ही लेते है तुम्हारे कांडी से !”

“अबे बिल्कुल ही बौरा गए हो क्या ? ठाकुर साहब यहाँ आएंगे.?. यहाँ.. ?…इस सड़ियल सी जगह में.. ?”

“क्यों तुम्हारा ठाकुर ताजमहल में सोता है ?”

अनिर्वान की बात सुन बाबूराव हॅंस पड़ा…

“अबे तमीज़ से बात कर लो बे.. कहीं ठाकुर साहब का दिमाग सटका ना तो..तुम्हारी माँ बहन…

उसके इतना बोलते ही अनिर्वान का एक झन्नाटेदार तमाचा उसके चेहरें का भूगोल बिगाड़ गया..

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“तो.. ? तो क्या ? शुक्र मनाओ की अब तक हमारा दिमाग सही सलामत है और दूसरी बात हम गाँधी जी के भक्त हैं.. सिर्फ थप्पड़ से काम चला लें रहें हैं.. कही हमारे अंदर का भगत सिंह जाग गया ना तो अंग्रेज़ो भारत छोडो वाली हकीकत से रूबरू होना पड़ जायेगा बचुवा !”

लड़के के चेहरें पर इतना ज़ोर से थप्पड़ पड़ा की उसकी एक तरफ के कान की लोरी फट गयी.. उसे आँखों के आगे जुगनू नज़र आने लगे.. उसने चेहरें को झटक कर अपनी आँखों के गोलकों को सही दिशा में फोकस करने की कोशिश की, तभी चाय वाला लड़का अनिर्वान के सामने एक कप चाय रख गया..

“मेहमान जी को भी चाय दो बाबूराव !”

उस लड़के के सामने भी चाय रख दी गयी….

“हद है ये तो.. मतलब खुद को गाँधी का भक्त बोल बोल कर झपड़िया रहें हो.. इस देश में कानून है की नहीं.. !”

वो लड़का बिलबिला उठा.. और अनिर्वान मुस्कुराने लगा..

“गाँधी जी के भक्त है इसलिए सिर्फ एक गाल पर मार कर चुप नहीं बैठते… उनकी बात का मान रखते हैं..! अभी तुम अगली गलती करो, तुम्हारा दूसरा जबड़ा भी हिला देंगे.. आई प्रॉमिस !”

उस लड़के ने गुस्से में एक फुंकार छोड़ी और अपनी चाय की कप उठा ली.. लेकिन उसमें मक्खी गिरी हुई थी..

थाने में अनिर्वान के सामने बैठे उस उज्जड गंवार लड़के ने चाय का कप उठाया और वापस टेबल पर पटक दिया..

“इसमें तो मक्खी गिरा हुआ है, ?”

उसने शिकायत से सामने बैठे अनिर्वान को देखा.. अनिर्वान की भौंह में बल पड़ गए…

“देखना ज़रा बाबूराव.. चाय में मक्खी कैसे गिर गयी.. ?”

बाबूराव ने चाय का कप उठा लिया..

“गिरी तो है हुज़ूर !”

ये कह कर बाबूराव चाय का कप लेकर जाने को हुआ कि अनिर्वान ने टोक दिया..

“अरे तो कप कहाँ लें जा रहे हो.. मक्खी निकाल के फेंक दो और चाय इन्हें दे दो.. !”

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“साहब वो.. !”..

बाबूराव ने आश्चर्य से अनिर्वान को देखा..

“हुज़ूर चम्मच से निकाल देते हैं.. ऊँगली डालेंगे तो चाय गन्दी हो जायेगी ना !”

“ये सही बोल रहें हो बाबूराव.. चम्मच से निकाल दो !”..

बाबूराव ने चाय उस लड़के के सामने रख दी..
वो भौच्चका सा कभी अनिर्वान कभी बाबूराव को देखने लगा…

“पगला गए हैं क्या. ? हम ये मक्खी मच्छर वाला चाय नहीं पिएंगे ! छी वो मक्खी डूब के मर भी गया था.. !”
.
“चिकन मटन तो दबा के खाते हो, तब दिमाग में नहीं आता की लाश खा रहे.. इतनी सी मक्खी क्या मरी तुमसे चाय नहीं पी जा रहीं..।
सरकारी चाय है, एक एक का हिसाब देना पड़ता है हमें.. इसलिए बाबू चाय तो तुम यहीं पियोगे..।
खुद उठा कर पी लो, क्यूंकि अगर मैं उठा ना तो फिर चाय के साथ और जाने क्या क्या पिला दूंगा.. !

अनिर्वान का हाथ सामने टेबल पर ज़ोर से पड़ा…
और उसकी लाल लाल आंखें देख सामने बैठा लड़का एक घूंट में सारी चाय गटक गया…

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सुबह से ही रेशम की माँ रसोई में लगीं थी.. रेशम की ताई भी उनकी मदद करने चली आई थी..
हालाँकि वो मदद कम कर रहीं थी और अपनी बतकही में ज्यादा लगीं थी..
यही तो आम मध्यमवर्गीय परिवार के घरो में होता है… लड़की की शादी किसी त्यौहार से कम नहीं होती, और उस त्यौहार का पहला चरण दोनों परिवारों का मिलना मिलाना होता है…
ताई अपनी बहु को भी साथ लें आई थी जो अपनी शादी के समय की दो तीन गोटा जरी वाली भारी भरकम बनारसी साड़ियां भी लें आई थी और ऊपर रेशम के कमरे में उसे तैयार करने चली गयी थी..
मानव ऑफ़िस गया हुआ था, वो दोपहर में आधे दिन की छुट्टी लेकर लौटने वाला था.. उसे उसकी माँ ने पहले ही ढ़ेर सारी लिस्ट थमा रखी थी जो उसे लेते हुए आना था..

रेशम का मन भाभी की लायी साड़ियों को देख एकदम ही उचाट हो गया था..!
उसे इनमें से कुछ नहीं भा रहीं थी.. एक बैंगनी साड़ी थी जिस पर बड़े बड़े कलश बने थे और दूसरी तोता हरा रंग की..
दोनों ही रंग रेशम को आँखों में चुभ से रहे थे..

“भाभी इन साड़ियों में कुछ ज्यादा ही गाॅडी नहीं लगूंगी ?”

“शादी ब्याह में तो यहीं सब अच्छा लगता है.. बाकी आप देख लीजिये ! वैसे भी आजकल की लड़कियां सब अपने मुताबिक करती हैं.. !”

उनकी बात सुन रेशम मुस्कुरा उठी.. -“आप भी तो इसी जनरेशन की है भाभी? आप मुझसे ज्यादा से ज्यादा दो साल बड़ी होंगी !”

“हाँ हूँ तो… लेकिन बात ये है जिज्जी की आपकी ताई ने हमारा दिमाग एकदम चौक कर रखा है… हम भी शादी के पहले क्या थे और अब देखो क्या हो गए ? आपको पता है कॉलेज के बाइक रेसिंग चैंपियनशिप में हम ही अव्वल आते थे, कॉलेज में बास्केटबाल की चैम्पियन थी हम, कॉलेज की मासिक पत्रिका में हमारा लेख हर बार होता था,कॉलेज में वाद विवाद में मजाल कोई हमें हरा लें…

“फिर क्या हुआ भाभी.. ?”

“फिर क्या ? फिर हमारी शादी हो गयी…आपकी ताई जी के अनुशासन की भट्टी में हम ऐसे सिंके की अपनी सारी मौज मस्ती भूल ही गए.. अभी पिछली बार मायके गए तब दादा (बड़े भाई )ख़ूब बोले की जा एक राउंड लगा कर आ जा हमारी नयी बुलेट में.. पर अब मन ही नहीं किया.. !
अब तो मायके जाने पर लगता है, बस अम्मा की गोद में सर रख कर लेटे रहें..|
उन्हीं के हाथ का खाना उन्हीं के हाथों से खाते रहें और बस उनकी बातें सुनते रहें.. !”

पता नहीं कृति की बातों में ऐसा क्या था लेकिन रेशम की ऑंखें भर आई..

“अरे जिज्जी आप तो रोने लगी… हम आपको रुलाने के लिए थोड़े ना बोले.. ये मत सोचियेगा की हमें आपके घर में कोई तकलीफ है..। आपकी ताई थोड़ी कड़क ज़रूर है, पर अच्छी सास है। समय समय पर सिखाती रहती हैं हमें, ससुर जी तो हमसे कम ही बोलते हैं, पर अच्छे हैं वो भी…।
और आपके भैया… वो तो सबसे अच्छे हैं..। हम खुश हैं, बहुत खुश, लेकिन ये बात तो है ना कि ससुराल चाहे सोने का महल हो मायके की बराबरी कोई नहीं कर सकता.. !”

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रेशम ने अपनी आंखें पोंछ ली.. उसी वक्त दरवाज़े को ठेल कर मानव अंदर चला आया…
वो नीचे से चाय लेकर आया था..

“अरे तू आ गया मानव ?”

मानव को आया देख कृति खड़ी हो गयी..

“आप क्यूँ खड़ी हो गयीं भाभी ? बैठिये ना.. ये लीजिये चाय !”

उसने उन दोनों के सामने चाय बढ़ा दी…

मानव की नजर पलंग पर फैली साड़ियों पर चली गयी..
वहीँ पलंग पर एक तरफ रेशम और कृति बैठे थे..
मानव ने उन साड़ियों को देख कर गन्दा सा मुहँ बना लिया..

“तू ये पहनने वाली है ? वैसे भी भूतनी दिखती है, इनमें तो पक्का साबित हो जायेगा की ये पीपल के पेड़ से लटकी चुड़ैल ही है !”

“छी देवर जी, कैसी बात बोल रहें हैं आप ?”

“सच कह रहा हूँ भाभी.. रुक.. मैं देखता हूँ कुछ !”

मानव ने रेशम की अलमारी खोली और एक आसमानी रंग का प्योर सिल्क का कुरता निकाल दिया..
किनारे सुनहरी जरी के बॉर्डर वाला दुपट्टा था..
उसे निकाल उसने रेशम के ऊपर लाकर रख दिया..

“इसे पहनना.. समझी.. ?”

रेशम ने मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिला दी…

“भैया भी आ रहें हैं क्या भाभी ?”

मानव ने कृति से पूछा और कृति ने ना में गर्दन हिला दी..

“नहीं.. इन्हें ऑफ़िस से छुट्टी कहाँ ? बहुत बार तो शनिवार रविवार भी काम करना पड़ जाता है.. !”

हाँ में गर्दन हिला कर मानव ने अपनी चाय ख़त्म की और उन लोगों को जल्दी करने बोल नीचे चला गया..

शाम के वक्त अवस्थी परिवार उनके घर आ पहुंचा..
सभी बड़ों के मिलने मिलाने के साथ ही बातों और चाय नाश्ते का दौर भी शुरू हो गया..
रेशम भी नीचे आ कर अपनी माँ के कमरे में बैठी इंतज़ार कर रहीं थी कि तभी उसे बुलाने कृति चली आई..

“ये लो जिज्जी.. चाय की ट्रे पकड़ लो.. !”

चाय की ट्रे देख रेशम का मुहँ बिगड़ गया..

“मैं ये ट्रे पकड़ कर नहीं जाउंगी !”

“अरे ऐसे ही जाना पड़ता है.. !”

“लेकिन क्यूँ ?”

“अरे कोई एक बहाना तो हो ना.. लड़की कैसे ऐसे बाहर चली जायें.. ?”
.
“किस चीज़ का बहाना भाभी ? जब पता ही है कि हमें ही एक दूसरे को देखना है.. !”

उसी समय मानव भी चला आया..

“क्या हुआ ? बाहर क्यूँ नहीं आ रहें तुम लोग ?”.

“ये बोल रहीं चाय की ट्रे नहीं पकड़ेंगी !”

मानव ने हॅंस कर वो ट्रे पकड़ ली..

“कोई नहीं… मैं हूँ ना ! चल रेशम !”

रेशम मानव के साथ बाहर चली आई.. मुस्कुरा कर कृति भी उन दोनों के पीछे बाहर आ गयी..
मानव के हाथ में चाय की ट्रे देख पल भर को सब चौंक गए, लेकिन अगले ही पल रेशम पर नजर पड़ते ही सबके कलेजे में ठंडक सी पड़ गयी..

अपने नाम के अनुरूप ही थी रेशम..
बेहद से बेहद खूबसूरत !
वैसे तो ईश्वर की बनायीं हर चीज़ अपने आप में एक सुंदरता समेटे होती है, बस देखने का नजरिया होना चाहिए लेकिन रेशम का चेहरा ऐसा था की देखने वालों को सुकून और राहत दे जाता था..!
दिल को एक ठंडक दे जाता था !

रेशम ने धीरे से सबको नमस्ते कहा और एक कुर्सी पर बैठ गयी..
आसमानी रंग में उसका रंग घुल मिल कर और भी प्यारा लग रहा था, इत्तेफाक से अथर्व ने भी आसमानी रंग की शर्ट ही पहन रखी थी…
रेशम से अथर्व की माँ ने कुछ सवाल पूछे और फिर उसकी माँ से बातों में लग गयी..
रेशम ने धीरे से सामने बैठे अथर्व की तरफ आंखें उठा कर देखा,और फिर आंखें झुका ली..
उसे अथर्व का चेहरा कुछ बदला सा लगा..
उसने दुबारा आंखें उठायी और सामने बैठा लड़का हॅंस पड़ा..

“भाभी जी मैं आपका देवर हूँ… आपके होने वाले पतिदेव उधर बैठे हैं !”

अथर्व दूसरी तरफ मानव के बाजू में बैठा था, रेशम को ही देख कर मुस्कुरा रहा था..
रेशम झेंप कर रह गयी..
सभी के कहने पर रेशम और अथर्व बाहर गार्डन में चले आये..
दोनों एक दूसरे के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते थे और अभी उन्हें इतना वक्त भी नहीं दिया गया था कि दोनों सबकुछ जान पाए..
ये एक औपचारिकता मात्र थी और ये उन्हें भी पता था..
अथर्व को रेशम में सब कुछ अच्छा लग रहा था, उसका शांत स्वभाव, उसका सुंदर चेहरा… रेशम को भी अथर्व में ना करने लायक ऐसा कुछ नहीं दिखा..!

दोनों चुप थे, मुस्कुरा रहें थे, जैसे अपने भविष्य का ताना बना बुन रहें हो…

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अथर्व के दिमाग में अचानक कोई सवाल आया लेकिन कुछ सोच कर वो चुप रह गया…

मिलना मिलाना सम्पन्न हुआ और मुहूर्त निकलवा कर बात करेंगे कह कर अथर्व का परिवार वापस लौट गया…

क्रमशः

aparna,…

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Chandrika Boghara
Chandrika Boghara
1 year ago

Good 👍 👍 👍

Poonam
Poonam
2 years ago

Bhaut badhiya bhag,💯💯💯

Suman Thakur
2 years ago

ख़ूबसूरत भाग 👌👌👌👌

ritakumariverma23
2 years ago

बहुत खूबसूरत भाग 👌👌👌👌

upasna dubey
upasna dubey
2 years ago

Nice part ….लिखते रहिये