अपराजिता -11

रेशम ने एक नज़र अपने हरियाले बन्ने पर डाली… वो वाकई हरियाला था..
अपने हर ओर छोर से उस पर प्यार बरसाता उसका प्यारा पति…।
रेशम को लगा उसकी नज़र उतार ले…
रेशम ने धीरे से अपनी ऑंख का काजल ऊँगली में लिया और अथर्व की तरफ देखने लगा…
उसे ऐसे अथर्व को काजल लगाने में संकोच सा हो रहा था…
काजल लगाने के लिए उसे छूना भी तो पड़ेगा और वो जैसा है अगर रेशम ने अपनी तरफ से एक कदम भी बढ़ाया तो ये बेसब्रा यहीं शुरू हो जायेगा…।

रेशम को अपनी तरफ देखता पाकर अथर्व उससे पूछ बैठा..

“हम्म… क्या हुआ ?”

“नहीं कुछ नहीं.. ! वो आपके चेहरे पर कुछ लगा है.. हटा दूँ ?”

रेशम के सवाल पर अथर्व ने मुस्कुरा कर अपना चेहरा रेशम के करीब कर दिया..

रेशम ने धीरे से अथर्व के कान के पीछे अपनी ऊँगली छुआ दी..

अथर्व मुस्कुरा कर सीधा बैठ गया..

“लगा दिया काजल का टीका अपने पति को.. !”

वो मुस्कुरा कर रेशम को छेड़ने लगा..

“नहीं.. नहीं तो.. वो तो बस… !”

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