समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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Divya joshi
Divya joshi
2 years ago

समिधा आपकी लिखी कालजयी रचना है। समिधा पढ़ने के बाद महसूस हुआ कि ऐसी रचना न तो मैंने कभी पढ़ी और न ही शायद कोई इस तरह कभी लिख पाएगा जैसे समिधा लिखी गई। उसका एक एक दृश्य अब भी चलचित्र की भाँति घूमता है आँखों के समक्ष। आपको हार्दिक शुभकामनाएं इतनी अच्छी कृति के लिए और ढेर सारा धन्यवाद🙏 आप हर क्षेत्र में उत्तरोत्तर उन्नति करें यही कामना है। 🙏

Pushpa burnwal
4 years ago

पता नहीं अब पारो की जिन्दगी क्या मोड़ लेगी 😔😔😔😔

Raniya Memon
Raniya Memon
4 years ago

Kya paro bhi vidhva aashram me jayegi🥺. ?

Duhanmukesh
4 years ago

बहुत सुंदर जी …..आज इंतजार खत्म हुआ

Doman Singh
Doman Singh
4 years ago

Nice part… 🙏🙏🙏🙏🙏

js
js
4 years ago

आज की कहानी पढ़ के प्रेम रोग मूवी के सीन्स याद आ गए काफी कुछ वैसा ही जैसा उसमे दिखाया है शायद आज भी कई बैकवर्ड areas में ऐसा होता होगा शहरों में ऐसा कुछ देखने नही मिलता है या फिर शायद हमारे आस पास ऐसा कुछ नहीं है इसलिए । ख़ैर जो भी है लेकिन पारो और वरुण के मिलन के रास्ते खुलने वाले है आने वाले कुछ पार्ट्स में।
हर चीज़ का सजीव चित्रण
Very well written

Roopaligupta
Roopaligupta
4 years ago

Amazing part..kuch bolne ke liye words hi nahi hain..very emotional..

nilam agrawal
nilam agrawal
4 years ago

Superb part paromita ka dard to padkhar hi dil mai dard mahsus hota hai aapke kirdaro ke sath itna judav ho jata hai wo apne lagne lagte hai

sonunehra192
sonunehra192
4 years ago

Sharir varun ka h or aatma dev ki tabhi to varun ko paro ka dukh mahsus ho rha h ab to varundev or paro k milne ka intjar h

Rashmi Nigam
Rashmi Nigam
4 years ago

बेचारी पारो को कितना दुख कितना विषाद सहना पड़ रहा है वही वरुण के मन में जो टीस उत्पन हो रही है वो तो होना ही था क्योंकि वो देव की ही तो आत्मा थी वो अपनी प्रिय का दुख कैसे ना समझ पाती। अब जल्द ही ईश्वर इनकी इच्छा पूरी कर दे।।।