सफेद दाग छूने से नही फैलता: शरीर में असामान्य रूप से छोटे बड़े ऐसे दाग जो दिखने में पूरी तरह से सफेद होते हैं इन्हें सफेद दाग कहा जाता है।
सामान्य तौर से सफेद दागों को लोग कुष्ठ की बीमारी समझ लेते हैं लोगों को यह लगता है कि यह छूने से फैलता है। यह सिर्फ एक भ्रांति है ऐसा कुछ नहीं होता।यह एक प्रकार का ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण त्वचा के रंगों में परिवर्तन होने लगता है त्वचा में सफेद रंग के चकत्ते पड़ने लगते हैं। शरीर के इम्यून सिस्टम की प्रणाली में बाधा होने से त्वचा में उपस्थित रंग का निर्धारण करने वाला तत्व मेलानोसाइट्स कई जगहों से गायब हो जाता है जिसके कारण उस जगह की त्वचा विवर्ण हो जाती है और त्वचा की रंगत सामान्य की तुलना में सफेद हो जाती है ऐसे चकत्तों पर उपस्थित बालों का रंग भी सफेद हो जाता है इसे सामान्य रूप से विटिलिगो या सफेद दाग कहा जाता है। कई बार लोग इसे कुष्ठ की प्रारंभिक अवस्था समझ कर डर भी जाते हैं लेकिन यह एक सिर्फ भ्रांति है यह कुष्ठ ना होकर सिर्फ एक तरह का त्वचारोग है। यह मुख्य रूप से होठों चेहरे की त्वचा हाथों पैरों से शुरू होता है । बहुत से लोगों में यह हाथों पैरों की त्वचा में होकर रुक जाता है लेकिन कई लोगों में यह पूरे शरीर में फैल जाता है। इसके होने के कारणों का पूरी तरह से पता नहीं होने के कारण ही बहुत बार चिकित्सा में भी असमर्थता मिलती है। कई बार ये जेनेटिकल कारणों से भी होता है। यह रोग छूने से बिल्कुल भी नहीं फैलता है। यह एक प्रकार का चर्म रोग है जिससे शरीर के किसी अंदरूनी हिस्से को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। यूरोपीय देशों में इतना सामान्य रूप से पाया जाता है कि वहां इसे रोग की संज्ञा भी नहीं दी जाती है।
बहुत बार डेढ़ से 2 साल की अवधि में विटिलिगो चिकित्सा से ठीक हो जाता है लेकिन बहुत बार यह ठीक नहीं होता। जैसे जैसे समय बढ़ता जाता है वैसे वैसे इसके ठीक होने की संभावनाएं कम होती जाती हैं। विटिलिगो के मरीज को चिकित्सा के दौरान डॉ अल्ट्रावायलेट रेस से बच के रहने की सलाह देते हैं।
विश्व भर में .5 से 1% की आबादी विटिलिगो से प्रभावित है वही हमारे देश भारत में 8.8% आबादी विटिलिगो से प्रभावित है।
आमतौर पर यह समस्या बचपन में ही शुरू हो जाती है अधिकतर 20 साल से पहले की उम्र में विटिलिगो के लक्षण शुरू हो जाते हैं बहुत कम केसेस में 40 की उम्र में भी लक्षणों की शुरुवात हो सकती है।
आमतौर पर विटिलिगो में मरीज को किसी भी तरह की जलन खुजली या कोई और समस्या नहीं होती इस तरह के त्वचा रोग से ग्रस्त व्यक्ति को सूर्य की किरणों से एलर्जी की समस्या कभी कभार हो सकती है।
कारण :–आमतौर पर देखा जाता है कि अगर माता या पिता किसी को भी विटिलिगो का संक्रमण है तो उनके बच्चों में भी विटिलिगो पाया जा सकता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि माता या पिता के विटिलिगो होने पर बच्चे को होना जरूरी ही हो।
जिन रोगियों में एलोपेसिया की समस्या पाई जाती है उनमें भी आगे चलकर विटिलिगो डिवेलप हो सकता है। कुछ बच्चों में जन्मजात पाए जाने वाले बर्थ मार्क पर भी आगे चलकर सफेद दाग की समस्या जन्म ले लेती है।केमिकल्स के कारण उत्पन्न होने वाले विटिलिगो में सामान्यता एक ही जगह पर अगर कोई वस्तु लगातार प्रयोग की जाती है तो उसके कारण वहां की त्वचा में एक अलग सा श्वेत वर्ण उत्पन्न होता है, जैसे लगातार केमिकल वाले गम युक्त बिंदियों के प्रयोग से माथे की त्वचा पर सफेदी उत्पन्न होना।
कीमोथेरेपी के बाद भी पाया जाता है।
प्लास्टिक फैक्ट्री या केमिकल फेक्ट्री में काम करने वालों में भी पाया जाता है।
संतुलित आहार की कमी से भी बहुत बार शरीर पर कुछ दूर सरवन के चक्के बन जाते हैं यह पूरी तरह से सफेद तो नहीं नजर आते लेकिन फिर भी इन्हें भी एक तरह से त्वचा रोग माना जा सकता है।
कुछ विशेष विटामिंस की कमी से भी सफेद दाग उत्पन्न होता है।
थायराइड के मरीजों में पाया जाता है।
सामान्य रूप से लिवर की कमजोरी के कारण भी श्वेत दाग की समस्या उत्पन्न होती है।
बहुत सी तरह के फंगल इनफेक्शन भी सफेद दाग पैदा करते हैं।
त्वचा बालों हो तो आधी को रंग प्रदान करने वाली मेलानोसाइट्स कोशिका जब अचानक काम करना बंद कर देती है तब मुख्य रूप से श्वेत दाग उत्पन्न होते हैं।
जलने या चोट लगने से।
पाचन तंत्र खराब होने से।
शरीर में कैल्शियम की कमी होना।
बच्चों के पेट में कृमि।
आयुर्वेद में चिकित्सा:– आयुर्वेद के अनुसार रंजक पित्त त्वचा में उपस्थित वर्ण के लिए उत्तरदाई होता है। जब कभी शरीर में रंजक पित्त की कमी हो जाती है, तब विटिलिगो की समस्या उत्पन्न होती है। पित्त वर्धक आहार-विहार का सेवन करने वाले रोगियों में यह समस्या अधिक रूप से पाई जाती है। इसके अलावा विरुद्ध आहार का सेवन जैसे मछली और दूध, घृत और शहद इत्यादि का एक साथ सेवन करना भी हानिकारक होता है। आयुर्वेद में चिकित्सा के लिए पंचकर्म थेरेपी अपनाई जाती है। पंचकर्म द्वारा शरीर का अंतर शोधन और बाह्य शोधन किया जाता है जिससे त्वचा के वर्ण में असमानता को दूर किया जा सकता है। इसके अलावा कई अन्य औषधियां हैं जिनका एकल या संयुक्त प्रयोग विटिलिगो में आराम पहुंचाता है ।
एकल औषधियों में प्रमुख है :–
1) खदिर
2) बाकुची
3) आरगवध
4) दारुहरिद्रा
5) करंज
इसके अलावा संयुक्त मेडिसिन भी दी जाती है जैसे:- 1)गंधक रसायन
2) रस माणिक्य,
3)मंजिष्ठादि काढ़ा,
4)खदिरादि वटी
5) त्रिफला भी काफी असरदार है।
अन्य उपाय :–
1)तांबे के बर्तन में पानी को 8 घण्टे रखने के बाद पीना चाहिए।
2)हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर लौकी, सोयाबीन, दालें ज्यादा खाना चाहिए।
3) पेट में कीड़ा न हो, लीवर दुरुस्त रहे, इसकी जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दवा लें। 4)एक कटोरी भीगे काले चने और 3 से 4 बादाम हर रोज खाएं।
5) ताजा गिलोय या एलोवेरा जूस पीएं। इससे इम्यूनिटी बढ़ती है।
6)इससे ग्रस्त व्यक्ति को करेले की सब्जी का ज्यादा से ज्यादा सेवन करना चाहिए।
7)साबुन और डिटरजेंट का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए।
8)फल – अंगूर, अखरोट, खुबानी, खजूर, पपीता।
9)सब्जियां – मूली, गाजर, चुकंदर, मेथी, पालक, प्याज, फलियाँ।
10)अन्य खाद्य पदार्थ – गेहूँ, आलू, देशी घी, लाल मिर्च, चना, गुड़, पिस्ता, बादाम।
घरेलू लेप:–
1) हल्दी और सरसों के तेल को मिलाकर बनाया गया मिश्रण दाग वाली जगह लगाने से दाग कम होने लगता है। इसके लिए आप एक चम्मच हल्दी पाउडर लें। अब इसे दो चम्मच सरसों के तेल में मिलाए। अब इस पेस्ट को सफेद चकतों वाली जगह पर लगाएं और 15 मिनट तक रखने के बाद उस जगह को गुनगुने पानी से धो लें। ऐसा दिन में तीन से चार बार करें। इससे आराम मिलेगा।
2) घोड़वच , पठानी लोध्र और खड़ी मसूर समान भाग में लेकर पीसकर इसका पेस्ट दाग में लगाने पर आराम मिलता है।
3) खड़ा धनिया और खड़ी मसूर का पेस्ट भी लाभप्रद है।
4) नीम पत्ती और शहद भी लाभप्रद हैं।
5)सफेद दाग से ग्रस्त व्यक्ति को रोज बथुआ की सब्जी खानी चाहिए। बथुआ उबाल कर उसके पानी से सफेद दाग वाली जगह को दिन में तीन से चार बार धोयें। कच्चे बथुआ का रस दो कप निकालकर उसमें आधा कप तिल का तेल मिलाकर धीमी आंच पर पकायें जब सिर्फ तेल रह जाये तो उसे उतारकर शीशी में भर लें। इसे लगातार लगाते रहें।
एलोपैथी चिकित्सा :–
सामान्य रूप से एलोपैथी चिकित्सा में विटिलिगो के मरीजों को अगर किसी मल्टी विटामिन की कमी से यह रोग हुआ है तो उस मल्टीविटामिन के सप्लीमेंट दिए जाते हैं इसके अलावा कुछ लिवर टॉनिक और साथ ही स्टेरॉयड का ट्रीटमेंट दिया जाता है।
आयुर्वेद के अनुसार भी सफेद दाग के मरीजों में लीवर कमजोरी की संभावना अधिक रहती है। इसलिए चिकित्सा एलोपैथी हो या आयुर्वेद या होम्योपैथिक अगर रोगी को उसके सारे ट्रीटमेंट के साथ लिवर टॉनिक और मल्टीविटामिंस दिए जाएं तो रोग के जल्दी ठीक होने की अधिक संभावना होती है।
रोग अधिक पुराना करने या बढ़ाने से अच्छा है, समय रहते डॉक्टर के पास जाकर इलाज शुरू करवाना। समय रहते इलाज शुरू हो जाने से रोग के पूरी तरह ठीक होने की पूरी संभावना रहती है।
डॉ अपर्णा मिश्रा

अपर्णा जी, इस पोस्ट के लिए तहे दिल से शुक्रिया! मुझे ८ साल की उम्र से ल्यूकोडर्मा है. मैंने बाबची, गिलोय और गौमूत्र का भी सेवन किया था.
कई बार ऐसा लगता है कि ये रोग शरीर पर नहीं मानसिकता पर होता है. वो घूरती हुई नज़रें, झूठी सहानुभूति, भीड़ में अलग होने की भावना, ‘हे भगवान, लड़की है, शादी कैसे होगी’ के जुमले; इन दागों से ज़्यादा पीड़ादायी होते हैं. मेरा सौभाग्य है कि मेरे दोनों परिवारों (मायके और ससुराल) को मेरे दागों से शरम नहीं आती. आज बच्चे जब मेरी बेटी से पूछते हैं की आंटी को क्या हुआ, तो वो गर्व से कहती है, “मेरी मम्मी स्पेशल है, उसे ब्लेसिंग मिली है”.
काश हमारा समाज भी त्वचा के रंग के परे सोच पाए!
उफ़! ज़्यादा भाउक हो गयी. लेकिन इस जानकारी के लिए शुक्रिया। पुराना रोग होने के कारण काफी बढ़ गया है, लेकिन नए रोगियों को ज़रूर काम आएगा.
जी बिल्कुल!! सफेद दाग असल में कोई रोग होता ही नही
मैम मेरे तो मच्छर के काटने के बाद सफेद दाग हो जाते है और ये हाथ पैरो मे बने ही रहते है खत्म नही होते। इसके अलावा जैसे ही गर्मिया आती है चेहरे पर सफेद निशान बन जाते है और सर्दियो मे छुप जाते है। ये उपाय सही रहेंगे क्या
Apko insect bite infection ho jata hai… Iske liye bhi jaldi hi ek post dalungi
Jarur mam
Thank u so much for awareness .iss samsya ko lekar mere apne pariwar mai kafi galat dharnaye hai jinko badal pand kafi mushkil hai aapke iss lekh se kafi jagrukta aa sakti hai .
Behad gyanvardhak lekh
Usefull post thank you ji
Usefull post thank you
Thanks mam
Nice👍
🖒🖒🖒🖒🖒
Tq mam