मृत्युंजय

मृत्युंजय

तू गर्व था,तू गान था,तू  रश्मियों की खान था ।
सबल सकल प्रभात था,हे कर्ण तू महान था॥   

अटल तेरी भुजायें थी ,अनल तेरा प्रवाह था ।
कनक समान त्वक मे भी,तू लौह का प्रताप था ।

तू सूतों का भी दर्प था,राजाओं में आकर्श था
प्रचण्ड भी अमोघ भी,तू खुद में एक आदर्श था।

तू मैत्री का उल्लास था ,तू प्रीत की सुवास था।
हरा जिसे ना पा सके ,वो शत्रुओं का त्रास था।

तू मोतियों के कुण्डलों में ,रूप का श्रृँगार था।
कवच तेरा वो स्वर्णजङित स्वयं ही एक अगांर था।

विराट तेरे तन मे ही वो प्रेमह्रदय मन भी था,
ना मारना भ्राताओं को,तूने किया ये प्रण भी था।

तू चण्ड था प्रचण्ड था,अजेय था अशेष था।
तुझे हराने इंद्र ने भी बदला अपना भेस था।

तू वारिधी की प्यास था,तू अग्नि की उजास था,
समीर की बयार तू, तू धरतियों की आस था ।

था मारना तुझे कठिन ये पाण्डवों को ज्ञात था।
तभी तो श्री कृष्ण ने रचा नया विन्यास था ।

बस एक असत्य तेरी जिदंगी का काल बन गया
वो श्राप परशुराम का दुखों का जाल बुन गया  ।

भूल बैठा सारी विद्या और सारे ज्ञान को 
पर नही भूला तू अपने वचन स्वाभिमान  को ।

रथ का चक्का फंस गया जब काल के कपाल में ,
तीर अर्जुन के चले फिर देख अविरल ताल में ।

मृत्यु को जीत लिया ,मृत्युंजय तूने जब  ,
यम स्वयं नत हुआ कर्ण तेरे सामने तब।  

कृष्ण चाह थी तुझे ,त्यागा जो तूने प्राण था  ,
ओ दानवीर पाण्डवों की, जीत तेरा दान था।।

aparna….

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Abhishek Kishor
Abhishek Kishor
2 years ago

Behtreen Rachna Didi waah waah waah, padhkar Bahut achcha laga…💐😊

jitendravaish
jitendravaish
4 years ago

👏👏👏👏🌹👏👏👌👌👌

Advsarika
Advsarika
4 years ago

👏👏👏👏👏

Anupam
Anupam
4 years ago

What a fabulous poem. In such a short poem explaining the Karna so well…kudos to writer my wife..